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अगस्त, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रोना हो तो भगवान के लिए ही रोयें......

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                                  श्री हरिः शरणम्  रोना हो तो भगवान के लिए ही रोयें...... पूज्य हरिबाबा से एक भक्त ने कहाः  "महाराज ! यह अभागा, पापी मन रूपये पैसों के लिए तो रोता पिटता हैलेकिन भगवान अपना आत्मा हैं, फिर भी आज तक नहीं मिलि इसके लिए रोता नहीं है।  क्या करें ?"  पूज्य बाबा - "रोना नहीं आता तो झूठमूठ में ही रो ले।"  "महाराज ! झूठमूठ में भी रोना नहीं आता है तो क्या करें ?"  महाराज दयालु थे। उन्होंने भगवान के विरह की दो बातें कहीं।  विरह की बात करते-करते उन्होंने बीच में ही कहा कि  "चलो, झूठमूठ में रोओ।"  सबने झूठमूठ में रोना चालू किया तो देखते-देखते भक्तों में सच्चा भाव जग गया।  झूठा संसार सच्चा आकर्षण पैदा करके चौरासी के चक्कर में डाल देता है तो भगवान के लिए झूठमूठ में रोना सच्चा विरह पैदा करके हृदय में प्रेमाभक्ति भी जगा देता है।  अनुराग इस भावना का नाम है कि भगवान हमसे बड़ा स्नेह करते हैं,  हम पर बड़ी भारी कृपा रखते हैं। हम उनको न...

रामजी के ऊपर हनुमान जी का कर्ज़ा.

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                              . हनुमान जी का कर्ज़ा ... राम जी लंका पर विजय प्राप्त करके आए तो कुछ दिन पश्चात राम जी ने विभीषण, जामवंत, सुग्रीव और अंगद आदि को अयोध्या से विदा कर दिया।  तो सब ने सोचा हनुमान जी को प्रभु बाद में विदा करेंगे, लेकिन राम जी ने हनुमान जी को विदा ही नहीं किया।  अब प्रजा बात बनाने लगी कि क्या बात है कि सब गए परन्तु अयोध्या से हनुमान जी नहीं गये। अब दरबार में कानाफूसी शुरू हुई कि हनुमान जी से कौन कहे जाने के लिए, तो सबसे पहले माता सीता जी की बारी आई कि आप ही बोलो कि हनुमान जी चले जायें। माता सीता बोलीं मै तो लंका में विकल पड़ी थी, मेरा तो एक-एक दिन एक-एक कल्प के समान बीत रहा था। वो तो हनुमान जी थे, जो प्रभु मुद्रिका ले के गये, और धीरज बंधवाया कि...! कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।। निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥ मैं तो अपने बेटे से बिल्कुल भी नहीं बोलूंगी अयोध्या छोड़कर जाने के लिए, आप किसी और से बुलावा लो। अब बारी आई लखन जी की। तो ल...

ऊँ की ध्वनि का महत्व जानिये

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                      ऊँ की ध्वनि का महत्व जानिये एक घडी,आधी घडी,आधी में पुनि आध,,,,,,, तुलसी चरचा राम की, हरै कोटि अपराध,,,,,,। ।    1 घड़ी= 24मिनट  1/2घडी़=12मिनट  1/4घडी़=6 मिनट क्या ऐसा हो सकता है कि 6 मि. में किसी साधन से करोडों विकार दूर हो सकते हैं।    उत्तर है "हाँ, हो सकते हैं। वैज्ञानिक शोध करके पता चला है कि......  सिर्फ 6 मिनट ऊँ का उच्चारण करने से सैकडौं रोग ठीक हो जाते हैं जो दवा से भी इतनी जल्दी ठीक नहीं होते.........  छः मिनट ऊँ का उच्चारण करने से मस्तिष्क मै विषेश वाइब्रेशन (कम्पन) होता है.... और औक्सीजन का प्रवाह पर्याप्त होने लगता है।  कई मस्तिष्क रोग दूर होते हैं.. स्ट्रेस और टेन्शन दूर होती है,,,, मैमोरी पावर बढती है..। लगातार सुबह शाम 6 मिनट ॐ के तीन माह तक उच्चारण से रक्त संचार संतुलित होता है और रक्त में औक्सीजन लेबल बढता है।   रक्त चाप , हृदय रोग, कोलस्ट्रोल जैसे रोग ठीक हो जाते हैं....। विशेष ऊर्जा का संचार होता है ......... मात्र 2 सप्ताह दोनों समय ॐ के उच...

कृष्णजी की कृपा मिल जायेगी अगर

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कृष्णजी की कृपा मिल जायेगी             कृष्णजी की कृपा मिल जायेगी अगर आप रोज तीन बार या कम से कम एक बार निम्नलिखित श्लोक पढे :- गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरुपिणम | गोकुलोत्सवमिशानं गोविन्दं गोपिका प्रियं | | हे प्रभु ! हे गिरीराज धर ! गोवर्धन को अपने हाथ में धारण करने वाले हे हरि !  मेरी भक्ति और विश्वास को भी आप ही धारण करना |  प्रभु आपकी कृपा से ही मेरे जीवन में भक्ति बनी रहेगी, आपकी कृपा से ही मेरे जीवन में भी विश्वास रूपी गोवर्धन मेरी रक्षा करता रहेगा |  हे गोवर्धनधारी आपको मेरा प्रणाम है आप समर्थ होते हुए भी साधारण बालक की तरह लीला करते थे |  गोकुल में आपके कारण सदैव उत्सव छाया रहता था ।  मेरे ह्रदय में भी हमेशा उत्सव छाया रहे । साधना में, सेवा-सुमिरन में मेरा उसाह कभी कम न हो | मै जप, साधना सेवा, करते हुए कभी थकूँ नहीं | मेरी इन्द्रियों में संसार का आकर्षण न हो, मैं आँख से आपको ही देखने कि इच्छा रखूं, कानों से आपकी वाणी सुनने की इच्छा रखूं, जीभ के द्वारा आपका नाम जपने की इच्छा रखूं !  हे गोविन्द ! आप गोपियों के प्यारे हो ...

रामायण मे एक घास के तिनके का रहस्य

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  रामायण मे एक घास के तिनके का भी रहस्य है,जो हर किसी को नहीं मालूम क्योंकि आज तक किसी ने हमारे ग्रंथो को समझने की कोशिश नहीं की,सिर्फ पढ़ा है, देखा है,और सुना है,आज आप के समक्ष ऐसा ही एक रहस्य बताया जा रहा हैं– रावण ने जब माँ सीता जी का हरण करके लंका ले गया,  तब लंका मे सीता जी वट व्रक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी, रावण बार बार आकर माँ सीता जी को धमकाता था  लेकिन माँ सीता जी कुछ नहीं बोलती थी,यहाँ तक की रावण  ने श्री राम जी के वेश भूषा मे आकर माँ सीता जी को भी  भ्रमित करने की कोशिश की लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ, रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी  बोली आप ने तो राम का वेश धर कर गया था फिर क्या हुआ, रावण बोला जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो सीता मुझे नजर ही नहीं आ रही थी ! रावण अपनी समस्त ताकत लगा चुका था लेकिन जगत जननी माँ को आज तक कोई नहीं समझ सका फिर रावण भी कैसे समझ पाता ! रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी हो कि मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर –घूर कर देखने लगती हो, क...

कथा सुनने के चार लाभ है.....

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                       कथा सुनने के चार लाभ है..... श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव ।। वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् । देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥ कथा सुनने के चार लाभ है...... भागवत की कथा अर्थात भगवान की कथा तो है ही पर भगवान की कथा बिना भक्तो की कथा के अधूरी है। इसलिए हर शास्त्र में पुराण में भगवान की कथा के साथ साथ भक्तो की कथा भी आती है.नवधा भक्ति में सबसे पहली भक्ति श्रवण ही है। जो हम कानो से सुनते है वही हमारे ह्रदय में प्रवेश करता है,और फिर वही हम बोलते है.यदि हम कथा सुनते है तो मुख से कथा ही निकलेगी. " जिन्ह हरि कथा सुनी नहीं काना, श्रवण रन्ध्र अहि भवन समाना” संतजन कथा सुनने के चार लाभ बताते है- 1. - तृष्णा रहित वृति 2. - अन्तः करण की शुद्धि 3. - अनन्य भक्ति भक्तो से प्रीति– 1. तृष्णा रहित वृति - यदि कथा ईमानदारी से कही और सुनी जाए तो दोनों कहने और सुनने वाले को कुछ ओर पाने की अभिलाषा नहीं रह जाती। इसलिए सुनने वह ये निश्चय करके कथा में बैठे कि कथा मनोरजन नहीं है,मनो मंथन है.कथा ए...

महादेव जी को एक बार बिना कारण के किसी को प्रणाम करते देखकर पार्वती जी ने पूछा आप किसको प्रणाम करते रहते हैं

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  महादेव जी को एक बार बिना कारण के किसी को प्रणाम करते देखकर पार्वती जी ने पूछा आप किसको प्रणाम करते रहते हैं? शिव जी पार्वती जी से कहते हैं कि हे देवी ! जो व्यक्ति एक बार  राम कहता है उसे मैं तीन बार प्रणाम करता हूँ।  पार्वती जी ने एक बार शिव जी से पूछा आप श्मशान में क्यूँ जाते हैं और ये चिता की भस्म शरीर पे क्यूँ लगाते हैं? उसी समय शिवजी पार्वती जी को श्मशान ले गए। वहाँ एक शव अंतिम संस्कार के लिए लाया गया। लोग राम नाम सत्य है* कहते हुए शव को ला रहे थे।  शिव जी ने कहा कि देखो पार्वती ! इस श्मशान की ओर जब लोग आते हैं तो राम नाम का स्मरण करते हुए आते हैं। और इस शव के निमित्त से कई लोगों के मुख से मेरा अतिप्रिय दिव्य राम नाम निकलता है उसी को सुनने मैं श्मशान में आता हूँ, और इतने लोगों के मुख से राम नाम का जप करवाने में निमित्त बनने वाले इस शव का मैं सम्मान करता हूँ, प्रणाम करता हूँ, और अग्नि में जलने के बाद उसकी भस्म को अपने शरीर पर लगा लेता हूँ।   राम नाम बुलवाने वाले के प्रति मुझे अगाध प्रेम रहता है।  एक बार शिवजी कैलाश पर पहुंचे और पार्वती जी से भोजन...

श्री हरि का नाम सुनते ही या कन्हैया का नाम सुनते ही उससे मिलने की, उसको पाने की तड़प होने लगे उसी का नाम प्रेम है।

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          प्रेम के दो रुप हैं; एक प्यास और एक तृप्ति श्री हरि का नाम सुनते ही या कन्हैया का नाम सुनते ही उससे मिलने की, उसको पाने की तड़प होने लगे उसी का नाम प्रेम है। नन्दनन्दन, श्यामसुन्दर, मुरलीमनोहर,पीताम्बरधारी– जिनके मुखारविन्द पर मन्द-मन्द मुस्कान है। सिर पर मयूर-पिच्छ का मुकुट, गले में पीताम्बर, ठुमुक-ठुमुककर चलने वाला, बाँसुरी बजाने वाला जो मनमोहन प्राणप्यारा है, उसको प्राप्त करने की इच्छा, उत्कंठा, व्याकुलता, तड़प जब अपने ह्रदय को दग्ध करने लगे, तब समझो कि प्यास जगी और जब उसकी बात सुनकर, उसकी याद आने से, उसके लिये कोई कार्य करने से अपने ह्रदय में रस का प्राकट्य हो, अनुभव हो तब इसे तृप्ति कहते हैं। श्रीहरि को ढूँढ़ने के लिये निकले और पानी में उतरे ही नहीं, किनारे पर ही बैठे रहे, इसका नाम प्यास नहीं है और जब प्यास ही नहीं तो तृप्ति कैसी? कहीं हम स्वयं को ही तो मृग-मरीचिका के भ्रम में नहीं डाल रहे ! श्री हरी से प्रेम तो है पर उनको पाने की साधना में आलस है या रुचि नहीं है। मेहनत नहीं करना चाहते हैं। आनन्द के लिये प्यास और आनन्द की प्राप्ति पर तृप्ति ! संयोग ...