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कुसंग, (बुरा संग)

                             कुसंग, यानि बुरा संग बचपन का सत्संग जीवन भर के लिए लाभदायक होता है। इसी तरह बचपन का कुसंग भी जीवन को बिगाड़ देता है। दिनभर सत्संग में रहो, एक क्षण भी यदि कुसंग मिल गया तो सत्संग का प्रभाव नष्ट हो जाएगा। व्यक्ति के संग का, वेशभूषा का, खानपान का, कुसंग भी हानिकारक है।            जे राखे  रघुवीर ते उबरे तेहि काल महूँ।।  प्रभु ही सत्संग देने वाले हैं और कुसंग से बचाने वाले हैं। अतः हरिः शरणं हरिः शरणं । मैं भगवान की शरण में हूं, मैं भगवान की शरण में हूं। बार-बार कहना चाहिए, स्मरण रखना चाहिए।(दादा गुरु श्री गणेशदास भक्त माली जी के श्री मुख से)

कभी सुख कभी दुख भाग्य के अनुसार मिलते हैं

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कभी सुख कभी दुख भाग्य के अनुसार मिलते हैं जो लोग अपने मन को भगवान में लगाते हैं ,वाणी से नाम गुणों का कीर्तन करते हैं। शरीर से मंदिर में सेवा करते हैं वह भाग्यशाली हैं। इन्हीं कामों को प्रेम पूर्वक करते-करते भगवान के रूपों का ह्रदय में साक्षात्कार कर लेते हैं।संसार में प्राणी निरंतर सुखी नहीं रह सकता है। कभी सुख कभी दुख भाग्य के अनुसार मिलते हैं, इनसे घबराना नहीं चाहिए। सच्चाई के साथ व्यवहार करते हुए, किसी का बुरा नहीं सोचना चाहिए ।अपने साथ बुराई करने वाले को भी सज्जन शाप नहीं देते हैं ।ऐसे परोपकारी पर भगवान प्रसन्न रहते हैं। कष्ट के समय भक्तों की परीक्षा होती है। परीक्षा समझ कर बुद्धि को स्थिर करके कष्ट सहन करना चाहिए। इतिहास देखने से पता चलता है कि बड़े-बड़े भक्तों को अवतार काल में परमात्मा को कष्ट सहन करते देखा जाता है। कष्ट काल में भी अपने धर्म का त्याग ना करके जो उपकार करते हैं, वही धन्य हैं। जो करना चाहिए उसे कर्तव्य कहते हैं। वही धर्म भी है अतः शास्त्र एवं बड़ों की सम्मति से जो कर्तव्य है, उसे तत्परता पूर्वक करना चाहिए। अधिकारी शासक को मालिक बनने की इच्छा नहीं करनी चाह...

हम अपने जीवन में उन्नति कर रहे हैं अथवा अवनति यह हमें कैसे पता लगेगा

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   हम अपने जीवन में उन्नति कर रहे हैं अथवा अवनति यह         हमें कैसे पता लगेगा धार्मिक जीवन में आध्यात्मिक जीवन में हम उन्नति कर रहे हैं अथवा हम नीचे गिर रहे हैं, इस पर भी विचार करना चाहिए। जब भगवत चर्चा, सत्संग प्रिय लगे, भगवान की सेवा पूजा प्रिय लगे, दीन दुखी प्राणियों की सेवा प्रिय लगे, तो समझो कि हम उन्नति की ओर बढ़ रहे हैं। कुसंग में संसारी बातें अच्छी लगे दुष्टों के संग में आसक्ति हो जाए, दूसरों को धोखा देकर, छल कपट से संपत्ति बढ़ाने की इच्छा हो जाए, तो समझो कि हमारी अवनति हो रही है। प्रत्येक बुद्धिमान मनुष्य अवनति से बचकर उन्नति चाहता है। हमारा मन हमारी बुद्धि भगवत सेवा में लग रही है या नहीं, यदि लग रही है तो इसे भगवान की कृपा या प्रेरणा ही समझो। कभी कभी मन की आंखों से प्रभु को सामने खड़ा देखो, कभी बैठे हैं, कभी कुछ कह रहे हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे भगवत का सानिध्य प्राप्त करें। मन में कोई संकट हो व्याकुलता हो तो प्रभु के सामने निवेदन करके निश्चिंत हो जाना चाहिए। जो कुछ भी हो उसे प्रभु की इच्छा मानकर संतुष्ट रहना चाहिए। गुरुदेव की कृपा से श...

मन आपका मित्र भी है और शत्रु भी

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                 मन आपका मित्र भी है और शत्रु भी गीता में प्रभु का कथन है कि अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए अर्थात भवसागर से पार होना चाहिए। यत्न पूर्वक साधन करने से प्रभु कृपा अवश्य करेंगे। मन अपना मित्र है और शत्रु भी है। अपने वश में हुआ मन अपना मित्र है, उसे भजन साधन बनेगा, मित्रता का काम करेगा। विषयी मन, अवश मन,अवश इंद्रियां शत्रु है। यह सब नर्क में गिरा देंगें।अतः मन की ओर से सावधान रहें। हठ करके भजन में लगावे। मन भजन में ना लगे तो भी बिना मन लगे, भजन करने से मन लगने लग जाएगा। सबका मन भगवान में लगे, सब पर प्रभु की कृपा बनी रहे।  जय श्री राधे  (परमार्थ के पत्र पुष्प दादा गुरु भक्त माली जी के श्री मुख से)

कलयुग बुरा युग नहीं है अगर

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कलयुग बुरा युग नहीं है अगर कलयुग है ऐसा मानकर असत्य, मिथ्या, हिंसा, कपट नहीं करना चाहिए। कलयुग राजा है उसके अधर्म से बचकर उसमें जो गुण हैं उनकी बढ़ाई करनी चाहिए। उसका लाभ उठाना चाहिए। नास्तिक दुष्टों के लिए कलयुग बुरा युग है। आस्तिक भक्तों के, भगवान नाम जपने वालों के लिए यह युग अच्छा है। इसके समान कोई दूसरा युग नहीं है यह बात श्री भागवत, रामायण आदि में बार-बार कही गई है। ज्ञान वैराग्य के साथ प्रभु की भक्ति करनी चाहिए। ज्ञान वैराग्य केवल विरक्त साधु के लिए नहीं है गृहस्थाश्रम में उसकी बड़ी आवश्यकता है।बिना ज्ञान वैराग्य के गृहस्थाश्रम अति दुखदाई है। परिवार के जितने सदस्य हैं वह अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से मिले हैं। अतः उनका प्रेम से पालन करना चाहिए। हमको अच्छा, हमारे मन के अनुकूल यदि कोई पुत्र,स्त्री, भाई आदि नहीं मिले तो उनके दोष नहीं है, वे बुरे नहीं है, हमारी तपस्या पूर्व जन्म का पुण्य ही कम है। ऐसा मानकर संतुष्ट रहना चाहिए ।आग के बिना, बिजली के बिना हमारा काम नहीं चलता है पर यदि हम चुक जाए तो वह हमारे प्राण ले लेंगे।इसी तरह आग बिजली से बचकर हम अपना काम करते हैं। उसी तरह ...

हम प्रभु के भेंजें हुए सुन्दर पुष्प है

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                  हम प्रभु के भेंजें हुए सुन्दर पुष्प है हमारा सौभाग्य है कि प्रभु की इस पुष्प वाटिका में हमने जन्म लिया। उन को प्रसन्न करने के लिए हम एक पुष्प की तरह खिले और उन्हें अर्पण हो जाएं। इष्ट देव को प्रसन्न करना ही प्राणी का कर्तव्य है। जिस प्रकार से आपका मन प्रसन्न रहें, वैसे ही कीजिए। स्वंय प्रभु सत्य दया क्षमा के समुंद्र है तो हमको भी प्राणियों के साथ सत्य व्यवहार करना चाहिए। सब के साथ दयामय  व्यवहार ही कर्तव्य है ।किसी के अपराध पर हम उसे क्षमा कर दें तो प्रभु प्रसन्न होंगे।क्षमा करने में भगवान पृथ्वी से भी अधिक हैं पृथ्वी माता के ऊपर हम अनेक अपराध करते हैं, पर वह सब सहन करती हैं। हमको भी दूसरों के अपराध पर रुष्ट ना होकर क्षमा ही करना चाहिए। यह प्रभु को प्रसन्न करने का साधन है। बदला लेने की इच्छा से फिर जन्म लेना पड़ता है।भजन करने के लिए जन्म लेना अच्छा है, बदला चुकाने के लिए जन्म लेना अच्छा नहीं है। किसी का ऋण रह गया तो उसे चुकाने के लिए पशु बनना पड़ेगा। कष्ट होगा ,सत्संग, भजन सेवा के लिए बार-बार जन्म लेना अच्छा है।...

अनजाने में किया गया भगवतश्रवण भी कैसा फल देता है।

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       अनजाने में किया गया भगवत का नाम भी कैसा फल देता है। दुष्ट मन से स्मरण किया गया भी भगवान का नाम, पापों का नाश करता है। जैसे अनजान में स्पर्श की गई अग्नि भी जला देती है ।अतः 'हरी' वह नाम है जो सभी के पाप तापों को हरते हैं। अपने श्रवण कीर्तन द्वारा भक्तों के मन को हरते हैं। अतः हरि यह नाम है जो किसी के मन को भी हरता है। अतः उसका नाम हरा है उसके संबोधन में हरे ऐसा रूप होता है। इसलिए ' हरे राम हरे राम'  मंत्र प्रयुक्त हरे का अर्थ है हे राधे। 'कृष्' आकर्षण करने वाला ' ण' आनंद दायक है। सब को आकृष्ट करने वाले आनंद देने वाले का नाम कृष्ण है।  ' रा'  का उच्चारण करने से पाप बाहर निकल जाते हैं फिर ' म' का उच्चारण करने पर कपाट बंद हो जाते हैं फिर मुख के बंद होने पर पाप प्रवेश नहीं कर पाते हैं। अतः हरे राम यह महामंत्र विधि अविधि जैसे भी जपा जाय कलयुग में विशेष फल प्रदान करती है। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे (परमार्थ के पत्र पुष्प में दादागुरु श्री भक्तमाल जी महाराज के श्री मुख से)

मन को काबू में लाना हो तो,

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मन को काबू में लाना हो तो, समय सार्थक होगा, समय सार्थक वही है जो भगवान अथवा भगवान के भक्तों के गुणों पर चर्चा हो कहने को मिले, चाहे सुनने को मिले,चाहे किसी  सदग्रंथ में पढ़ने को मिले और अंतःकरण से उनपर  विचारने का अवसर मिले। तो समय की सार्थकता होती हैं धन्य घड़ी सोई जब सत्संगा धन्य जन द्विज भक्तिअभंगा समय की सार्थकता होगी और जो गायेंगे उनकी वाणी पवित्र होगी और जो सुनेंगे उनके कान पवित्र होंगे और क्या होगा? मन की वृत्ति सधी रहे। बोले महाराज- मन बहुत भटकता है। मन बहुत भटकाता  है। चंचल  बंचक जानिए मनहि भूत विकराल, कबहूँ जाए आकाश में कबहूँ जाए पाताल। मन काबू में नहीं आता है, तो कहते हैं मन को काबू में लाना हो तो, तो भक्तों का चरित्र गाने बैठ जाओ, सुनने बैठ जाओ ।मजाल है जो मन इधर-उधर भाग जाए। कम से कम इतनी देर के लिए मन की वृत्ति सधी रहे और बुद्धि,बुद्धि कंप्यूटर वाली बात उतनी देर नहीं सोच सकती है।   मन की वृती सधी रहे ,बुद्धि प्रभु से बंधी रहे। अंतर की ही स्वच्छता और आवे प्रीत रीत ज्यों । मन की स्वच्छता जरूरी है जैसे घर में...

ह्रदय व्याकुल हो जाए प्रभु से मिलने के लिए तो, प्रभु दूर नहीं है।

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ह्रदय व्याकुल हो जाए प्रभु से मिलने के लिए तो, प्रभु दूर नहीं है। कौन कहता है मुलाकात नहीं होती है, रोज मिलते हैं केवल बात नहीं होती है। मामाजी भक्तमालीजी के श्री मुख से हम प्रभु से रोज मिलते हैं क्या हम मिलने के लिए कहीं से आते हैं या कहीं जाते हैं नहीं क्योंकि वह तो हर पल हर क्षण हमारे साथ ही रहते हैं इसलिए मिले ही रहते हैं। पर बात नहीं होती, एक साथ रहते हैं पर बात नहीं होती। क्यों? हम 36 हो रहे हैं। दुनिया के लिए हम खूब रो रहे हैं, उसके लिए रोना नहीं आता है। कभी आंसू आते भी तो उसमें प्रदर्शन का भाव आ जाता है और सूख जाते हैं।   हम प्रभु के लिए रोना शुरू कर दें। बलिहारी, बलिहारी। एक बार मैं बक्सर से पटना जा रहा था, डुमराव स्टेशन पर एक सज्जन एक बच्चे को गोद में लिए हुए थे, गाड़ी में बैठ गए। बाप रे बाप, उस बच्ची का रोना सारे डिब्बे के लोग परेशान हो गए, डांटने लगे उसको, तुम क्यों नहीं  चुप करा रहे हो। इसके रुदन से हमारे कान फट रहे हैं,उसने कहा कि बाबूजी आप लोग ही चुप करा कर देख लीजिए, कोशिश कर लीजिए। सब लोगों ने पूछा बात क्या है?...

संत सदगुरुदेव में श्रद्धा की आवश्यकता है

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             संत सदगुरुदेव में श्रद्धा की आवश्यकता है। संत सदगुरुदेव में श्रद्धा की आवश्यकता है। जहां पर श्रद्धा होगी वहीं पर प्रभु अपना रूप प्रकट करके अनुभव करा देते हैं और अश्रद्धा के द्वारा दिया गया दान, हवन तुच्छ फल देता है। श्रद्धा पूर्वक थोड़ा दान भी महान फल देता है। शिष्य विदेश जाने लगा तो गुरु ने कहा कि वापस आओगे तो रहस्य कि बात बताऊंगा। वापस आते आते गुरु का शरीर छूट गया, पर अपनी श्रद्धा के कारण उसने गुरु के शरीर त्याग को स्वीकार नहीं किया। बिना मुझे, उस बात को बताए, गुरुदेव भगवान वैकुंठ नहीं जा सकते। गुरु की वाणी में शिष्य को विश्वास था अतः गुरुदेव वैकुंठ से वापस आ गए और कहा संत में मुझसे अधिक श्रद्धा रख कर सेवा करो।'  गुरु वचन में विश्वास यह संदेश मिला।वैकुंठ जाकर कोई वापस नहीं आता है पर शिष्य की श्रद्धा ने गुरु को वापस बुला लिया, पुनर्जीवित कर लिया। शिष्य ने गुरु को जिंदा करवाया। गुरुदेव प्रदेश जाने लगे तो शिष्य से कहा गंगा जी को गुरु मानो मेरे स्थान पर, उन्हें प्रणाम करो। शिष्य ने गंगा जी में स्नान, वस्त्र धोना बंद कर दिया।गुरु के...

श्री कृष्ण ही जगतगुरु हैं।

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             परमार्थ के पत्र पुष्प- भगवान श्री कृष्ण ही जगतगुरु है। भगवान श्री कृष्ण जगद्गुरु हैं। जहां-जहां से हितकारी उपदेश प्राप्त होते हैं वे सब गुरु तत्व है। श्री कृष्ण ही सब गुरुओं में व्याप्त होकर फिर उपदेश देते हैं। प्रत्येक श्रद्धालु शिष्य का गुरु श्री कृष्ण का स्वरुप है। सर्वत्र उपदेशक श्री कृष्ण ही है। सर्वत्र गुरु तत्व श्री कृष्ण ही हैं। इस प्रकार श्री कृष्ण और गुरुदेव एक है इनमें अभेद है।' संत सबै गुरुदेव हैं व्यासहिं यह परतीति।'  हरिराम जी व्यास कहते हैं कि मुझे यह विश्वास है भक्त संत गुरुदेव हैं। ' संत भगवंत अन्तर निरंतर नहीं किमपि मती विमल कह दास तुलसी ।।' विमल बुद्धि से विचार कर श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि 'संत और भगवंत में नाम मात्र का भी अंतर नहीं है। इस प्रकार भक्तमाल का दिव्य सत्य सिद्धांत ही सत्य है कि( संत )भक्त, भक्ति, भगवंत, गुरु यह चारों एक है इनमें कोई अंतर नहीं है। इनके चरण कमल की वंदना करने से सभी प्रकार के विघ्नों का नाश होता है। यह समझ में आ जाय, इस सिद्धांत में विश्वास हो जाए तो कल्याण है। इससे ही शांति, भक्...

क्पा आप जानते है प्रभु के चरणों में कौन-कौन से चिन्ह है,और उनके दर्शन करने से क्या लाभ होता है?

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प्रभु के चरणों में जो चिन्ह है उनके दर्शन करने से क्या लाभ होता है और उनका अर्थ क्या है। अब इसमें अलग-अलग चिन्हों का महत्व का वर्णन करते हैं। राजराजेश्वर रामचंद्र जी ने अपने चरण सरोज में सुख सुविधा के चिन्ह धारण कर रखे हैं। अगर कोई अपने मन को काबू में नहीं कर पाता हो तो, उसको प्रभु के चरणों में धारण अंकुश का ध्यान करना चाहिए। याद करें,ध्यान करें तो   मनु रूपी मतवाला हाथी काबू में आ जाता है।जैसे महावत मतवाले हाथी को अंकुश के द्वारा बस में कर लेता है ऐसे ही भगवान के चरणों के चिह्न में अंकुश का ध्यान करने से हमारा मन मतवाला काबू में आ जाता है  अंकुश के बाद अंबर।अंबर कहते हैं वस्त्र को, अंबर आकाश को भी कहते हैं। तो अगर अंबर का अर्थ अकाश लिया जाए, तो जैसे आकाश अनंत है ऐसे भगवान भी अनंत हैं और अगर अंबर का अर्थ यहां वस्त्र लिया गया है, तो जाड़े में वस्त्र की जरूरत होती है और उसमें भी गरम कपड़ा,तो सठता रूपी शीत अगर सता रहा हो तो इस वस्त्र के चिन्ह का ध्यान करने वाले का शोक दूर हो जाता है। इस चिन्ह का ध्यान करने से बड़ा ही सुख मिलता है। जैसे जाड़े में रजाई ओढ़ने पर सुख मिलता ...

भगवान की भक्ति में खो जाने से लाभ

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            भगवान की भक्ति में खो जाने से लाभ भगवान में लीन हो जाने की प्रक्रिया । नानक लीन भयो  गोविंद संग ,ज्यों पानी संग पानी । तो मोक्ष पांच प्रकार के बताए गए हैं। तो इसमें जो एक मोक्ष है "एक्त"- तो इसमें मुक्ति है। भगवान में विलीन हो जाना अथवा एक निर्वाण  केवल्य पद कहलाता है। यह ज्ञान पद के सिद्धों को , साधकों को प्राप्त होता है ।वहां पहुंचने के बाद संसारी दुख और संसारी सुख दोनों से आप  किनारे होना जाएंगे। यह ज्ञान पथ के पथिको का गंतव्य और चरम उपलब्धि है और भक्ति पथ के पथिको को स्वर्ग से ऊपर -तो ज्ञान है, मोक्ष है और मोक्ष से ऊपर भी भगवान का धाम बताया गया है। जहां प्रभु अपने मित्र सिद्ध साधकों, सिद्ध परिकरों के सहित निवास करते हैं और विभिन्न प्रकार के आमोद-प्रमोद अपनी लीलाओं के द्वारा भक्तों को सुख प्रदान करते रहते हैं। भक्त अपनी सेवाओं के द्वारा भगवान को सुख प्रदान करते हैं और भगवान अपनी लीलाओं के द्वारा, अपनी कृपा दृष्टि के पोषण द्वारा उनको आनंद प्रदान करते रहते हैं। तो यह जो भगवत धाम है  उसको वैदिक भाषा मे त्रिपाक ...

भगवान और भगवान के भक्तो को प्रणाम करने से भी कष्ट दूर हो जाते है।

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भगवान और भगवान के भक्तो को प्रणाम करने से भी कष्ट दूर हो जाते है। गुरूदेव मलूकापीठेश्वर,वृन्दावन भगवान का सिमरन करो पद वंदन करो तो सारे विघ्न नष्ट हो जाते हैं। गुरु का पद वंदन करो तो भी सारे कष्ट, नष्ट हो जाते हैं। भक्तों का पद वंदन करो, तो भी सारे कष्ट, विघ्न, नष्ट हो जाते हैं। इसका एक उदाहरण है कि आमिर के राजा माधव सिंह छोटे भाई थे उनकी पत्नी श्री रत्नावती जी, पहले तो उनकी भक्ति का विरोध किया लोगों ने। लेकिन फिर बाद में उनकी भक्ति का लोहा मान लिया लोगों ने, और परिवार वालों ने, कि यह भक्ति दिखावा नहीं है सच्ची भक्ति है। इसके बाद मान सिंह और माधव सिंह दोनों कहीं नोका में बैठकर कहीं जा रहे थे और नोका आपद् ग्रस्त हो गई लगा कि दोनों डूब जाएंगे। तो मानसिंह ने कहा कि अब क्या करना चाहिए,तो कहा कि आपकी अनुज बधू रत्नावती भक्त है और सिद्ध कोटि की भक्त हैं, उनका स्मरण करें उनका पद वन्दन करें, उनके नाम की दुहाई दे,नैया पार लग जाएगी।तो सचमुच में रत्नावती जी के नाम की दुहाई की, पद वंदन किया, सिमरन किया तो नासे विघ्न अनेक।मान सिंह जी ने इच्छा व्यक्त की कि मैं उनक...

परमार्थ के पत्र पुष्प भाग 2

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 दादा गुरु श्री गणेश दास भक्तमाली जी महाराज के श्री मुख से कुछ प्रवचन हमारे जीवन का उद्धार करने के लिए सत्संग करते रहोगे,सत्संग में आते-जाते रहोगे, सत्संग करते-करते सब कुछ का ज्ञान हो जाएगा। सत्संग से जुड़े रहो।सत्संग से जुड़े रहोगे तो  आपको क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? इस बात का ज्ञान आपको हो जाएगा। आपके कर्तव्य का ज्ञान, आपका क्या कर्तव्य है?आपको क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। सत्संग में आते-आते तरह-तरह की कथाएं आपको सुनने को मिलेंगीं। उससे आपको सब कुछ ज्ञान हो जाएगा। हम भगवान के शरण में हैं। अहंकार का त्याग होना जरूरी है।अहंकार का त्याग, जिसमें मैं राजा हूं,मैं धनी -मानी हूं,मैं बलवान हूं ,मैं रूपवान हूं। इस तरह से जाति में, उत्तम जाति में हूं। यह सब अहंकार छोड़ने के लिए होते हैं।एक अहंकार रहना चाहिए केवल, कि मैं भगवान का दास हूं। यह अहंकार नहीं छोड़ा जाएगा। वैष्णव के लक्षण, वैष्णव या भक्तों के लक्षण सभी रामायण, गीता, श्रीमद् भागवत सभी में बड़े-बड़े, लंबे चौड़े वाक्य में कहे गए हैं। मुख्य चार लक्षण श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि प्राणियों पर दया करनी...

प्रभु से प्रार्थना करने पर लाभ

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श्री राधे, पाप का रास्ता छोड़ कर के हमें पुण्य के रास्ते पर चलना चाहिए और चलने का हमारा सामर्थ्य नहीं है। अगर हम कहें कि हम से नहीं चला जा सकता, हम से नहीं बन सकता। जाने अनजाने पाप होते रहते हैं। इसके लिए हमें भगवान से प्रार्थना करते रहने चाहिए। जो हमारे बस की नहीं रह जाती है उसके लिए हम क्या करते हैं? भगवान से प्रार्थना करते हैं। कोई काम है, हमारे करे से नहीं हो रहा है। हमारे बनाए से नहीं बन रहा है। तो हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि ठाकुर जी कृपा करें ,हमारा काम बन जाए। इसी तरह से सच के रास्ते पर, पुण्य के रास्ते पर, चलते हम से नहीं बन रहा है। तो पाप के रास्ते से हम बच नहीं पा रहे हैं इसके वास्ते भगवान से हमें प्रार्थना करनी चाहिए ।हर समय हमें भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए। ईश्वर हमें पाप के रास्ते से चलने पर बचाएगा। प्रार्थना में अहंकार नहीं होना चाहिए, प्रार्थना के समय दीनता होनी चाहिए। प्रार्थना की बहुत बड़ी महिमा है ।इतनी महिमा है कि पूजा पद्धति में अनंत उपचार हो जाते हैं।राजा लोग अनंत उपचार से पूजा करते हैं लेकिन साधारण इंसान पांच उपचारों से ही पूजा कर देता है। पाँच ह...

दुर्गा कवच का पाठ हिदी में

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                          दुर्गा कवच (हिंदी में ) आजकल पूरे विश्व में करोना जैसी महामारी फैली हुई है और सभी परेशान है, हताश है अपने अपने तरीके से सभी पराक्रम कर रहे हैं, इस महामारी  से लड़ रहे हैं ।इसी के साथ ही हमें दुर्गा माता कवच का पाठ नित्य करना चाहिए क्योंकि वह हमारी मां है, अंबे मां, जगदंबे मां है, वह हमारी पुकार को जरूर सुनेगी और हमारी इस महामारी से हमारी रक्षा करेंगी। ॐ चंडिका देवी को नमस्कार है।  मार्कंडेय जी ने कहा- पितामह, जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्य की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो ऐसा कोई साधन मुझे बताइए । ब्रह्माजी बोले- ब्राह्मण ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है ।जो गोपनीय से भी परम गोपनीय,पवित्र तथा संपूर्ण प्राणियों का उपकार करने वाला है।महामुने! उसे श्रवण करो।। देवी की नौ मूर्तियां हैं, जिन्हें 'नवदुर्गा' कहते हैं। उनके पृथक पृथक नाम बतलाए जाते हैं। प्रथम नाम 'शैलपुत्री' दूसरी मूर्ति का नाम 'ब्रह्मचारिणी' हैं . तीसरा स्वर...

ढलती हुई शाम होते हैं मां बाप

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                   (  ढलती हुई शाम होते हैं मां बाप, संभल ना कहीं तुम्हारे जीवन में रात ना हो जाए? एक दंपत्ति दिवाली की खरीदारी करने की हड़बड़ी में थे। पति ने पत्नी से जल्दी करने को कहा और कमरे में बाहर निकल गया, तभी बाहर लॉन में बैठी 'मां' पर उसकी नजर पड़ी। कुछ सोचते हुए पति वापस कमरे में आया और अपनी पत्नी से बोला 'शालू! तुमने मां से पूछा कि उनको दिवाली पर क्या चाहिए? शालिनी बोली, नहीं पूछा। अब उनको इस उम्र में क्या चाहिए होगा, दो वक्त की रोटी और 2 जोड़ी कपड़े। इसमें पूछने वाली क्या बात है?  वह बोला 'यह बात नहीं है शालू... मां पहली बार दिवाली पर हमारे घर रुकी हुई है, वरना तो हर बार गांव में ही रहती हैं, तो औपचारिकता के लिए ही पूछ लेती । ' अरे, इतना ही मां पर प्यार उमड़ रहा है तो खुद क्यों नहीं पूछ लेते',झल्लाकर चीखी थी शालू, और कंधे पर हैंड बैग लटकाकर हुए तेजी से बाहर निकल आई।  सूरज मां के पास जाकर बोला,' मां हम लोग दिवाली की खरीदारी करने के लिए बाजार जा रहे हैं। आपको कुछ चाहिए तो बताइए। माँ बीच में ही बोल पड़ी,...

हम कैसी भक्ति से प्रभु को आकर्षित करें?

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                 हम कैसी भक्ति से प्रभु को आकर्षित करें? वृन्दावन में संत है -प्रेमानंदजी महाराज,कभी आपको समय मिलें तो उनका youtube chanle है।उनको जरूर सुनिएगा।आपके बहुत से सवालों के जवाब मिल जाऐंगें।उनकी एक video आपके समक्ष भेज़ रही हूँ। सुनिएगा जरुर,और अपने विचार जरूर बताइएगा। https://youtu.be/-oX_xUsgEHw https://youtu.be/-oX_xUsgEHw
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                           हरे कृष्णा श्री राधे  हम औषधि के देवता भगवान धन्वंतरि के प्रति 1000 प्रार्थनाओं की एक कड़ी अर्पित कर रहे हैं । हमारा उनसे विनम्र निवेदन है कि वे कोरोना वायरस कोविड19 से हम सभी को सुरक्षित रखें।  कृपया यह प्रार्थना बोलकर इसे अन्य लोगों के पास भेज दें ताकि हम सभी मिलकर अपनी रक्षा के लिए उनसे निवेदन कर सकें। ॐ नमो भगवते महा सुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वन्तरये अमृत कलश हस्ताय सर्व भय विनाशाय सर्व रोग निवारणाय त्रैलोक्य पतये त्रैलोक्य निधये श्री महा विष्णु स्वरूप श्री धन्वंतरि  स्वरुप श्री श्री श्री औषध चक्र नारायणाय स्वाहा "अनुवाद"- मैं उन भगवान धन्वंतरि को सादर नमन करता हूं जो भगवान विष्णु के अवतार हैं और जिन्हें *सुदर्शन वासुदेव धनवंतरी* के नाम से जाना जाता है । आपके हाथों में अमरता के अमृत से भरा कलश है । हे ईश्वर आप सभी रोगों और भय से मुक्ति देने वाले हैं। आप तीनों लोगों के रक्षक हैं और सभी जीवों के शुभचिंतक हैं। आप आयुर्वेद के अधिपति हैं और भगवान विष्णु के...

शिव तांडव कब और कैसे शुरू हुआ?

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                  शिव तांडव  कैसे शुरू हुआ?                      शिव तांडव नृत्य की कथा दारूक नामक एक दैत्य असुरों में उत्पन्न हुआ। तपस्या से पराक्रम प्राप्त करके वह असुर देवताओं तथा सभी को पीड़ित करने लगा। उस समय वह दारुक, ब्रह्मा, ईशान, कुमार ,विष्णु, यम, इंद्र आदि के पास पहुंच कर उनको सताने लगा। इससे वह देवता बहुत पीड़ित हुए,वह असुर स्त्रीवध्य है, ऐसा सोचकर स्त्रीरूप धारी तथा युद्ध के लिए स्थित ब्रह्मा जी आदि के साथ में ,असुर युद्ध करने लगा। तब उसके द्वारा पीड़ित किए गए सभी देवता  ब्रह्मा जी के पास पहुंचकर उनसे सबकुछ निवेदन करके , उमापति  के पास जाकर ,पितामह को आगे करके (शिव) की स्तुति करने लगे।इसके बाद देवेश के निकट जाकर अत्यन्त विन्रम भाव से विनती करने लगे-" हे भगवन् ! दारुक महाभयंकर है; हम लोग उससे पहले ही पराजित हो चुके है।स्त्री के द्वारा वध्य उस दारुक का संहार करके आप हम लोगों की रक्षा कीजियें ।।" बह्मा जी की प्रार्थना सुनकर महादेव ,देवी गिरिजा से हँसते ह...

(आध्यात्मिक बोध कथा)श्रेष्ठतम का सहारा ही श्रेष्ठ होता है

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 जो सब में श्रेष्ठ हो का सहारा लेना है श्रेष्ठ होता है बहुत सी भेड़ बकरियां जंगल में चरने गई । उनमें से एक बकरी चरते चरते एक लता में उलझ गई ।उसको उस लता में निकलने में बहुत देर लगी ,तब तक अन्य सब भेड़ बकरियां अपने घर पहुंच गयें। अंधेरा भी हो रहा था वह बकरी घूमते घूमते एक सरोवर किनारे पहुंची। वहां किनारे की गीली जमीन पर सिंह का एक चरण चिन्ह अंकित था ,उस चरण चिन्ह के शरण होकर उसके पास बैठ गई। रात में जंगली सियार, भेड़िया ,बाघ आदि प्राणी बकरी को खाने के लिए पास में आए तो, उस बकरी ने बता दिया कि पहले देख लेना कि मैं किसके शरण में हूं,, तब मुझे खाना वह चिन्ह को देखकर कहने लगे अरे यह तो सिंह के चरण चिन्ह है। जल्दी भागो यहां से,आ जाएगा तो हम को मार डालेगा। इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग गए। अंत में जिसका चरण चिन्ह था, वह  आया और बकरी से बोला तू जंगल में अकेले कैसे बैठी है ।बकरी ने कहा यह चरण चिन्ह देख लेना, फिर बात करना। जिसका यह चरण चिन्ह है उसी के में शरण हुए बैठी हूं। सिंह ने कहा कि वह तो मेरा ही चरण चिन्ह है ,यह बकरी तो मेरे शरण हुई ।सिंह ने बकरी को आश्वासन दिया कि अब ...

एक खूबसूरत उपहार प्रभु भक्तों के लिए

 नमस्कार ,जय श्री राधे मुझे आज ही किसी ने यह खूबसूरत नोट फॉरवर्ड किया  जो कि प्रभु भक्तों के लिए बहुत ही सुंदर उपहार है। वही मैं आप सब लोगों को भी भेज रही हूं ।इस उपहार का लाभ जरूर उठाइएगा ।बहुत ही सुंदर तरीके से यह आईआईटी कानपुर  ने तैयार किया है IIT Kanpur has develped a website on our treasures of Vedas, Shahstras etc. Finally someone from today's science & technology field, is pursuing this seriously in india. Check it out: https://www.gitasupersite.iitk.ac.in/ No issue of language as IITK smartly put each Shloka in various languages. Most amazingly, commentary on each shloka by various scholars has also been provided. When you select the language as Bengali, it automatically translates everything into Bengali. Fabulous use of technology. Please share this as much as u can. 🙏कृपया यह शास्त्रों का खजाना प्रत्येक भारतीय तक फारवर्ड करें। एक साथ गीता, रामायण, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, व अन्य ग्रन्थ पढ़ व सुन भी सकते हैं। कृपया टेक्नोलॉजी का लाभ उठाएं।

वैदिक प्रार्थना- ॐ सहनाववतु का भावार्थ

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                    ॐ सह नाववतु का भावार्थ- ॐ   सह नाववतु ।सह नौ भुनक्तु सह वीर्य करवावहै । तेजस्वी नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।  ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ।। ॐ वह प्रसिद्ध परमेश्वर हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों को साथ साथ विद्या के फल का भोग कराए। हम दोनों एक साथ मिलकर वीर्य यानी विद्या की प्राप्ति के लिए सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढा हुआ तेजस्वी हो, हम दोनों परस्पर द्वेष ना करें।  ॐ शांतिः शांतिः शांतिः  (कृष्ण यजुर्वेद)

वैदिक प्रार्थना भावार्थ के साथ

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                      वैदिक प्रार्थना ॐ पूर्णमद:             ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते।              पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।              ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ।।  भावार्थ- ॐ यानी कि वह (परब्रह्म) पूर्ण है।  यह (कार्यब्रह्रम) भी पूर्ण है, क्योंकि पूर्ण से पूर्ण ही निकलता है, (प्रलयकाल में) पूर्ण (कार्य ब्रह्म) का पूर्णत्व लेकर पूर्ण (परब्रह्म) ही शेष रहता है। ॐ शांति: शांति: शांति: (यजुर्वेद)।।

प्रार्थना- एक ओंकार का अर्थ

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                 प्रार्थना एक ओंकार का भावार्थ- एक ओंकार सतनाम कर्ता पुरूष निर्भऊ निर्वैर अकाल मूरत अजूनी   सैभं गुरुप्रसाद जप। आदि सच, जुगादि सच, है भी सच , नानक होसी भी सच। वाहेगुरु।। परमात्मा एक है।उसका नाम सत्य है, अर्थात वह सदा स्थिर और एक रस है ।सृष्टि का कर्ता है, निर्भय और निवैंर है, उसका स्वरूप काल से परे है, वह समय के चक्र में कभी नहीं आता - मृत्यु, रोग और बुढ़ापा उसके लिए नहीं है ।वह अजन्मा है, स्वयंभू है ,पथ-प्रदर्शक है और कृपा की मूर्ति है । हे मनुष्य ! तू उसे जप।