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प्रभु का स्वभाव कैसा होता है?

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                                                                                                             प्रभु का स्वभाव भगवान श्री राम का कथन हैं कि कोई भी मुझसे मित्रता के लिए हाथ बढ़ाये तो मैं इंकार नहीं कर सकता हूँ , फिर चाहे  उसमे दोष ही क्यों न हो। मैं जब जीवों को अपनाता हूँ , जीव जब पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर  देता हैं तब वह निर्दोष हो जाता हैं। शरणागत को प्रभु के सन्मुख रहना चाहिए। हर समय प्रभु के श्री  मुख को भक्त देखा करता हैं और प्रभु भक्त को देखते रहते हैं। इस प्रकार के भक्त को सन्मुख कहते हैं। सन्मुख भक्त के सभी पाप -ताप नष्ट हो जाते हैं। विमुख प्राणी ईश्वर से पीठ करके रहता हैं , तो प्रभु भी उससे पीठ कर लेते हैं।                 भक्तो के...

वेद शास्त्रों की विस्तृत जानकारियाँ

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वेद शास्त्रो की विस्त्तृत जानकारी                                            प्र.1- वेद किसे कहते है ? उत्तर- ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है। प्र.2- वेद-ज्ञान किसने दिया ? उत्तर- ईश्वर ने दिया। प्र.3- ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ? उत्तर- ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया। प्र.4- ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ? उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए। प्र.5- वेद कितने है ? उत्तर- चार प्रकार के । 1-ऋग्वेद 2 - यजुर्वेद 3- सामवेद 4 - अथर्ववेद प्र.6- वेदों के ब्राह्मण । वेद ब्राह्मण 1 - ऋग्वेद - ऐतरेय 2 - यजुर्वेद - शतपथ 3 - सामवेद - तांड्य 4 - अथर्ववेद - गोपथ प्र.7- वेदों के उपवेद कितने है। उत्तर - वेदों के चार उप वेद है । वेद उपवेद 1- ऋग्वेद - आयुर्वेद 2- यजुर्वेद - धनुर्वेद 3 -सामवेद - गंधर्ववेद 4- अथर्ववेद - अर्थवेद प्र 8- वेदों के अंग हैं कितने होते है । उत्तर - वेदों के छः अंग होते है । 1 -...

भजन- गोवर्धन वासी सांवरे तुम बिन रहा न जाए-------

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श्री कृष्ण प्रेमियों के लिए बहुत ही काम की बात:-) तुम्हारे इस पद का कम से कम एक वर्ष तक भाव से नित्य पाठ व गायन करने वाले को मेरे दर्शन अवश्य होंगे ही :- हमारे प्यारे श्री कृष्ण का अष्ट छाप के कवियों मे चर्तुभुज दास जी को ये वचन दिया है ऐसा नाभा जी ने इनकी जीवनी मे लिखा है क्यों न लाभ लिया जाय !   "जय श्री राधे" गोवर्धनवासी सांवरे तुम बिन रह्यो न जाये । — हे गोवर्धनवासी श्री कृष्ण, अब मैं आपके बिना नही रह सकता बंकचिते मुसकाय के सुंदर वदन दिखाय । लोचन तलफें मीन ज्यों पलछिन कल्प विहाय ॥१॥ — आपकी इस सुन्दर छवि ने मेरा मन मोह लिया है औ र आपकी मुस्कान में मेरा चित्त अटक गया है । जैसे मछली बिना पानी के तडपती है वैसे ही मेरी आँखौ को आपसे बिछडने की तडपन हो रही है र मेरा एक एक पल कल्प के समान बीत रहा है । सप्तक स्वर बंधान सों मोहन वेणु बजाय । सुरत सुहाई बांधि के मधुरे मधुर गाय ॥२॥ — हे मोहन आपकी वंशी की धुन सेकडौ संगीत स्वरौ से अोतप्रोत मधुर गीत गा रही है। रसिक रसीली बोलनी गिरि चढ गाय बुलाय । गाय बुलाई धूमरी ऊंची टेर सुनाय ॥३॥ — आप जब पर्वत पर चढकर गायौं को ...

पवित्र जीवन जीने के साधन कौन-कौन से हैं

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                                                                                                        पवित्र जीवन का जीने की कला विचारो की पवित्रता -                               मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे                                बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे।                         जब तक कि तन में जान रंगों में लहू रहे ,                         तेरा  ही जिक्र हो और तेरी जुस्तजू रहे।। हमारा कर्तव्य है कि हम प्रत्येक कार्य ...

भगवान के नाम की क्या महिमा है भाग 2

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एक व्यक्ति वृन्दावन जा रहा था दूसरे ने पैसे देकर  उससे कहा  कि मेरे लिए एक तुलसी की माला लेते आना। अभी माला आई नहीं, नाम का जप शुरू नहीं किया केवल विचार मात्र ही किया था कि इतने से ही यमराज ने कहा  चित्रगुप्त  उस माला मांगने वाले के खाते को ख़त्म कर दो। महाराज उसे तो बहुत कर्मो के फल भोगने हैं , यमराज बोले नहीं क्योंकि उसने नाम जप का संकल्प ले लिया हैं , उसपर कृपा हो गयी हैं। उस जीव के कर्म बंधन समाप्त हो गए हैं। यही हैं कलयुग में नाम का महत्व।  दुष्ट चित्त से स्मरण किया गया भी भगवन्नाम भी पापो का नाश करता हैं। जैसे अनजाने में भी अग्नि को स्पर्श करने पर हाथ जल जाता हैं। अतः 'हरि 'यह नाम हैं। जो सभी के पाप तापो को हर लेते हैं। हरि नाम के संबोधन में हरे ऐसा रूप होता हैं जो मन को हर लेता हैं।  हरे राम हरे राम , राम राम हरे हरे।  हरे कृष्ण हरे कृष्ण , कृष्ण कृष्ण हरे हरे।। मन्त्र का अर्थ हैं हरे मतलब हे राधे। कृष आकर्षण करने वाला 'ण 'आनन्ददायक। सबको आकृष्ट करके आनन्द देने वाले का नाम कृष्ण हैं।  'रा 'का उच्चारण करने से पाप ...

भगवान के नाम की महिमा क्या होती है भाग एक

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               परमार्थ के पत्र -पुष्प (भगवान  के नाम  महिमा ) एक सेठ अपने घर की दुकान के कार्य में इतना व्यस्त था कि उन्हें नाम लेने की फुरसत नहीं मिलती थी। जब वह toilet में जाता तो उसे फुरसत मिलती थी और वह राम राम रटते। श्री हनुमानजी को क्रोध आया कि कामों को छोड़ नहीं सकता हैं और टॉयलेटमें राम राम करता हैं। हनुमानजी ने उसकी पीठ पर एक लात मारी। रात्रि के समय श्री हनुमानजी , श्री रामजी की सेवा करने लगे तो , जब श्री राम जी की पीठ पर हाथ लगाया तो श्री रामजी करहाने लगे , पीठ में बहुत पीड़ा हैं। बहुत पूछने पर श्री रामजी ने बताया जब मेरा भक्त कीर्तन कर रहा था तो तुमने मारा  था , अगर उस मार को मैं अपने ऊपर न लेता तो तुम्हारी मार से वो बेचारा मेरा भक्त तो मर ही जाता। अतः मेने उसकी रक्षा की। उसकी मार को अपने ऊपर ले लिया। हनुमानजी ने भूल स्वीकार करके क्षमा याचना की। सेठ को राम नाम का उपासक माना , आदर किया। तात्पर्य यह हैं कि राम जप पवित्र -अपवित्र सभी अवस्था में लिया जा सकता हैं। पर दुःख इसी बात का हैं कि फिर भी हम नाम जप का ...

क्या आप वृंदावन से दूर रहकर भी वृंदावन वास चाहते हैं?

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                                                                                                                  वृन्दावन वास 'आशा जाकी जँह बसी तँह ताहि को वास ' मन श्री वृन्दावन में रहे। प्रारब्धवश शरीर बाहर हैं, तो यह वृन्दावन वास ही हैं और यदि शरीर वृन्दावन में हैं ,मन बाहर हैं तो यह उत्तम धाम वास नहीं कहा जायेगा। धाम से बाहर रहने से मन में प्रभु का ध्यान बना हुआ हैं तो प्रभु आपके पास ही हैं। आनन्दमय भगवदधाम में भगवान के नाम , रूप , लीला के सर्वत्र दर्शन होते हैं। अनन्य भक्त अपने घर में रहकर नाम , रूप , लीला का अनुभव करते हैं। उनका घर का निवास , धाम निवास के तुल्य हैं।                     अनंत गुण संपन्न परमात्मा आप सबका कल्याण करे। भगवद...

भगवत भक्ति

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                                                                                                                                भगवद्भक्ति                          परमार्थ के पत्र पुष्प ) भक्ति की महिमा  का वर्णन करते हुए श्री कृष्ण ने उद्धव से कहा -जो साधक भक्त हैं अभी सिद्ध नहीं हुए हैं,अपनी ईन्द्रियों को जीतकर अपने वश में नहीं कर सके हैं , उसे संसार के विषय , काम , क्रोध बाधा पहुँचातI हैं। वह साधक अपने आप को इन सबसे अलग करता हैं , क्षण क्षण नाम जप , संकीर्तन  अभ्यास करता हैं। भक्ति के प्रताप से वह भक्त इन विषयों के वश  में नहीं होता हैं , विषयों से कभी हारता नहीं हैं। भगवान ...

प्रभु का नाम जपने से क्या लाभ होता है?

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                                                                                                     राम -नाम का अखूट ख़जाना राम -नाम कुछ खास लोगो के लिये  नहीं हैं , वह सबके लिए हैं। जो राम नाम लेता हैं , वह अपने लिए भारी ख़जाना जमा करतI जाता हैं और यह तो एक ऐसा खज़ाना हैं , जो कभी कम नहीं होता हैं। जितना इसमें से निकालो , उतना बढ़ता जाता हैं। इसका अंत नहीं हैं। जैसा कि उपनिषद कहता हैं -पूर्ण मे से पूर्ण निकालो , तो पूर्ण ही बाकी रह जाता हैं , वैसे ही  राम नाम हैं। यह त माम बिमारियों का एक मात्र इलाज हैं फिर चाहे वह बीमारी शारीरिक हो या मानसिक हो या आध्यात्मिक। राम नाम ईश्वर के कई नामों में से एक हैं। आप राम की जगह कृष्ण कहे या ईश्वर के अनगिनित नामों में से कोई और नाम ले लें, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ल...

राम नाम का खजाना( महात्मा गांधी)

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                                                                                           राम -नाम का अखूट ख़जाना (महात्मा गाँधी ) राम -नाम कुछ खास लोगो के लिये  नहीं हैं , वह सबके लिए हैं। जो राम नाम लेता हैं , वह अपने लिए भारी ख़जाना जमा करतI जाता हैं और यह तो एक ऐसा खज़ाना हैं , जो कभी कम नहीं होता हैं। जितना इसमें से निकालो , उतना बढ़ता जाता हैं। इसका अंत नहीं हैं। जैसा कि उपनिषद कहता हैं -पूर्ण मे से पूर्ण निकालो , तो पूर्ण ही बाकी रह जाता हैं , वैसे ही  राम नाम हैं। यह त माम बिमारियों का एक मात्र इलाज हैं फिर चाहे वह बीमारी शारीरिक हो या मानसिक हो या आध्यात्मिक। राम नाम ईश्वर के कई नामों में से एक हैं। आप राम की जगह कृष्ण कहे या ईश्वर के अनगिनित नामों में से कोई और नाम ले लें, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लड़कपन में मुझे भूत...

क्या आप जानना चाहते हैं कि भगवान का भजन करने से क्या होगा?

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              भगवान का भजन करने से कल्याण होगा। एक संत थे। वे एक सेठ के पास गए। सेठ ने आकर नमस्कार किया.संत ने भी किया। वह संत के पैरों में पड़ा तो संत ने भी ऐसे ही  किया , तो सेठ बोला कि , आप कैसे पैरों पड़ते हैं , आप त्यागी है , आपने अपने स्त्री , बच्चों धन , जमीन , जायदाद , मकान  आदि का त्याग कर दिया हैं। आप महान  हैं। तो संत ने कहा मुझसे बड़ा त्यागी तो तू हैं । मैने तो छोटी चीजों का त्याग किया हैं पर तुम तो संसार के भरोसे भगवान  का त्याग करके बैठे हो।  तो बड़ा त्यागी कौन हुआ मैं  कि  तुम। जो बड़ा त्याग करे वो ही तो बड़ा त्यागी हुआ। तो सज्जनो ऐसा मत करना , ऐसे त्यागी मत बनना। जरा सोचो एक पलक मारते  ही प्राण चले जाएँगे तो उस समय धन , सम्पत्ति , वैभव क्या काम आएगा ? अगर भगवान  का भजन किया हैं तो वह जरूर काम आएगा। धन कमाने में तो  हर कोई लखपति बन सकता हैं। पर जिसने राम नाम लाख बार जपने का विचार कर लिया असली धन तो वह कमा  रहा हैं। यहा आप को यह नहीं कहा जा रहा कि  आप धन दौलत न ...

जब आप अपना व्यवहार अच्छा रखोगे तो आप सबके बन के रह सकते हो

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                                                                                                                   याद रखो प्रेम , सहानुभूति , सम्मान , मधुर वचन , सहायता के लिए हर समय तैयार , त्याग और सच के व्यवहार से ही तुम किसी को अपना बना सकते हो। तुम्हारा ऐसा व्यवहार होगा तो लोग तुम्हारे लिए बड़ा से बड़ा त्याग करने को तैयार रहेंगें। तुम्हारी लोकप्रियता मौखिक नहीं होगी। लोगो के हृदय में बड़ा मधुर और प्रिय स्थान तुम्हारे लिए सुरक्षित हो जायेगा। तुम भी सुखी हो जाओगे और तुम्हारे सम्पर्क में जो आएगा , उनको भी सुख शांति मिलेगी। इसलिए हमेशा सबके साथ मुस्कुराकर पेश आएं ,आपने अनुभव किया होगा कि आप जब किसी का हर समय मुस्कुराता चेहरा देखते हैं, तो आप को वह अच्छा लगने लगता है और आप हमेशा उसकी प्रशंसा कर...

शांति और परम आंनद चाहते हो तो?

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                                                       अगर जीवन में शांति और परम आंनद चाहते हो तो क्या करो ? उन मनुष्यो का संग करो , अधिक से अधिक उनके साथ रहने और उनके निकट होकर उनकी सेवा करने  में बिताओ जिनका हृदय परम शांति और परम आनंद के सागर रूपी भगवान  में डूबा हुआ हैं। उनके संग से , लगातार के सत्संग से तुम्हारे ह्रदय से भगवान का सम्बन्ध जुड़ जायेगा। फिर तुम्हारे ह्रदय के द्वार भी परम शांति और आनंद के लिए खुल जायेंगे। अगर ऐसे महापुरुष  से मिलना संभव न हो तो उनके द्वारा लिखे पुस्तक और लेख को पढो। चैनल  द्वारा सत्संग को अपनाओ। जो भी बात अच्छी लगे उसे जीवन में उतारने  का प्रत्यन करो। जरुरी नहीं कि  महापुरषो के द्वारा कही गयी सभी बातों को अपनाओ किसी भी एक विचार को अपनाने की कोशिश में लग जाओ। ऐसे महापुरुष जगत में सर्वत्र शांति और आनंद का प्रवाह ही बहाया करते हैं। उनको कोई लोभ नहीं होता, कोई लालच नहीं होता , स...

भक्तराज केवट

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                              भक्तराज केवट  क्षीर सागर में भगवान विष्णु शेष शैय्या पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं। विष्णुजी के एक पैर  का अंगूठा शैय्या के बाहर आ गया और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगीं। क्षीरसागर के एक कछुवे ने इस दृश्य को देखा और मन में यह विचार किया कि मैं यदि भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिह्वा से स्पर्श कर लूं तो मेरा मोक्ष हो जायेगा, यह सोच कर वह उनकी ओर बढ़ा।  उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुये शेषनाग ने देख लिया और कछुवे को भगाने के लिये जोर से फुंफकारा, फुंफकार सुन कर कछुवा भाग कर छुप गया। कुछ समय पश्चात् जब शेषनाग जी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया। इस बार लक्ष्मीदेवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया। इस प्रकार उस कछुवे ने अनेकों बार प्रयास किया पर शेष नाग और लक्ष्मी माता जी के कारण उसे  सफलता नहीं मिली। यहां तक कि सृष्टि की रचना हो गई और सतयुग बीत जाने के बाद त्रेतायुग आ गया। इस मध्य उस कछुवे ने अनेक बार अनेक योनियों में जन...

Parmatma Aur Jivan: जीवन में सफलता के सूत्र (भाग 1)

Parmatma Aur Jivan: जीवन में सफलता के सूत्र (भाग 1) : जीवन में सफलता के सूत्र  1 . जीवन का उद्देश्य निर्धारित करें - उद्दे श्य के बिना व्यक्ति  के  जीवन का कोई  महत्व नहीं रखता ।मनुष्...

जीवन की कीमत

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                                                                                                             कीमती जीवन एक दीन हीन  लकड़हारे को राजा ने देखा तो उसके मन में दया आ गयी। उसने लकड़हारे को चन्दन का बगीचा दे दिया। सोचा कि  चन्दन बेच कर धनी हो जायेगा और सुखी हो जायेगा। परन्तु उस लकड़हारे ने चन्दन की महिमा को नहीं जाना और उसको जलाकर कोयला बना कर बेचने लगा। बगीचे के तीन भाग उसने इसी तरह बेच दिए। सयोगवश एक दिन उसे राजा मिला ,उस दिन लकड़हारा कोयला बेचने जा रहा था तो उसे राजा ने देखा वो पहले की तरह दुखी और गरीब था। राजा ने हैरान  हो कर पूछा कि मेने तुम्हे इतना कीमती चन्दन का बगीचा दिया था तुमने उसे जला कर कोयला क्यों कर दिया ,तो उसने माफ़ी मांगी और बोला  की उसे चन्दन के म...

संत भक्त महिमा एंव सत्संग

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                                                    संत भक्त महिमा एंव सत्संग                                                       सत्संग का लाभ मिलता हैं तो धीरे धीरे मन में शांति आती  हैं अन्यथा प्रत्येक प्राणी तन ,मन ,धन और जन से दुखी दिखाई पड़ता हैं। संसार के सारे कार्य किसी के भी अनुकूल नहीं होते हैं। एक न एक प्रतिकूलता रहती हैं। अपने इष्ट देव में दृढ़ विश्वास रखने वाला जो शरण में हैं और जो सन्मुख हैं वही निश्चिन्त हैं और सुखी हैं। सत्य ,दया ,क्षमा और चोरी न करना आदि धर्म सभी वर्णो के धर्म हैं। जो दुसरो के व्यवहार से परेशान नहीं होते और अपने व्यवहार से किसी को परेशान  नहीं  करते हैं वही संत हैं। तन ,मन ,धन से उपकार क र ने  वाले गृहस्थ जन महान हैं। मन की शुद्धि और लोगो के साथ व्यवहा...

वृंदावन भाव..... वृंदावन वास चाहूं और कुछ ना चाहूं।

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             ब्रज की महिमा का बखान कैसे संभव है? प्रभु कृपा से ऐसा कोई तीर्थ नहीं; जो ब्रज में नहीं है।   वृंदावन भाव..... वृंदावन वास चाहूं और कुछ ना चाहूं। ब्रज की महिमा का बखान कैसे संभव है? प्रभु कृपा से ऐसा कोई तीर्थ नहीं; जो ब्रज में नहीं है।  अपने बाबा और मैया यशोदा की इच्छापूर्ति हेतु कन्हैया ने सभी तीर्थों को ब्रज में ही बुला लिया और उन्हें ब्रज चौरासी कोस में सभी तीर्थों के दर्शन कराये। यही कारण है कि "ब्रजवासी" जावे तो कहाँ ?  ब्रज-चौरासी कोस की एक परिक्रमा 84 लाख योनियों के पाप-कर्मों के फ़ल से मुक्ति प्रदान कर श्रीश्यामा-श्याम के श्रीचरणों की भक्ति प्रदान करती है।  एक बार अयोध्या जाओ, दो बार द्वारिका, तीन बार जाके त्रिवेणी में नहाओगे।   चार बार चित्रकूट, नौ बार नासिक, बार-बार जाके बद्रीनाथ घूम आओगे॥   कोटि बार काशी, केदारनाथ, रामेश्वर, गया-जगन्नाथ, चाहे जहाँ जाओगे।   होंगे प्रत्यक्ष जहाँ दर्शन श्याम-श्यामा के, वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे॥  वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे......

कुमार्ग पर पैर रखते हीं शरीर में तेज, बुद्धि एवं बल का लेश भी नहीं रह जाता है।

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कुमार्ग पर पैर रखते हीं शरीर में तेज, बुद्धि एवं बल का लेश भी नहीं रह जाता है।                    इमि कुपंथ पग देत खगेसा।                  रह न तेज तन बुधि बल लेसा।। कुमार्ग़ पर पैर रखते ही बल और तेज़ जाता रहता हैं, बात बिल्कुल सही है। कोई कितना भी बलवान एवं बुद्धिमान हो या फिर विद्वान ही क्यों न हो, जैसे ही उसकी प्रवृत्ति स्वयं को गर्हित कार्य में नियोजित करने की होती है सबसे पहले उसकी विवेकशक्ति का नाश हो जाता है। विवेकशून्य व्यक्ति जल्द ही काम, क्रोध और लोभ के अधीन कार्य कर अपना हीं अनिष्ट कर डालता है चाहे वह दशानन ही क्यों न हो।  प्रसंग उसी दशानन रावण का ही लेते हैं जिसके पदचाप से धरती डोलती थी, जो अपने भुजाओं में स्थित बल को तौलने हेतु कौतुक से कैलाश पर्वत तक को तौल आनंदित होता था वही रावण जब सीताहरण जैसे गर्हित कर्म में प्रवृत्त हुआ तो उसका सारा तेज जाता रहा।  राक्षस होते हुए भी जो कुल परम्परा से न केवल ब्राह्मण था बल्कि प्रकांड पंडित भी था तथा जिसके अतुलनीय बल से समस्त देव एवं...

माता के 9 अवतारों का सरल वर्णन

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          माता के 9 अवतारों का सरल वर्णन                     ये हैं सती_पार्वती के 9 अवतार कैलाश पर्वत के ध्यानी की अर्धांगिनी मां सती पार्वती को ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है। इसके अलावा भी मां के अनेक नाम हैं जैसे दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेरांवाली आदि। इनके दो पुत्र हैं गणेश और कार्तिकेय। प्रथम स्वरूप –शैलपुत्री      प्रजापति दक्ष ने अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु अपनी पुत्री सती और शिव को जान-बूझकर नहीं बुलाया। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में शिवजी ने उन्हें समझाया कि तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।' शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहा...

आज का शुभ विचार

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                   अपने  गुरुजनों ,पिता ,माता से  डरना चाहिए। यदि जीवन से भय निकल जाय तो वह व्यक्ति उद्दंड ,उन्मत  और उच्छ्रखंल  हो सकता हैं। 

भक्ति प्राप्ति के आठ सरल साधन

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भक्ति प्राप्ति के आठ सरल साधन  १. स्वभाव में सरलता। मन से कुटिलता का हटाना। दूसरे का अनिष्ट करके अपने स्वार्थ की सिद्धि मन की कुटिलता हैं।  २.जो कुछ भगवान ने घर ,परिवार दिया हैं उसमे संतुष्ट रहना। अनुचित उपायों से संसारी वस्तु को करने  की इच्छा न करना संतुष्ट रहना।  ३.भगवान का दास कहला कर दूसरे धनी मानियों  की आशा व चापलूसी नहीं करना।  ४. अकारण किसी से वैर विग्रह न करना।  ५.सत्संग से प्रेम ,संसारी लोगो से घनिष्ठता न रखकर प्रयोजन भर का संबंध रखना। .  ६.भक्ति की श्रेष्ठता को मानना ,दुष्ट से तर्क न करना।  ७.स्वर्ग मोक्ष के सुखों की भी  इच्छा न करना।  ८.भगवत् गुणानुवाद का गान  करना।  इन उपदेशो को श्री राम ने दिया। सभी संत भी यही कहते हैं। एक एक  बात को ध्यान में लाकर उस पर विचार करना ,फिर उस पर दृढ निश्चय करना। इसलिए थोड़ा ही सही जितना भी समय मिले मन में पूजा व लीला चिंतन अवश्य करना चाहिए। 

मन्त्र प्रयोग के द्वारा रोग और गृह क्लेश को दूर करने के उपाय

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मंत्र प्रयोग के द्वारा रोग  व क्लेश को दूर करने के उपाय (ब्रह्मलीन अन्नत श्री विभू षित गोवर्धन पी ठा धीश्वर जगदगुरु स्वामी श्री निरंजनदेव तीर्थ जी   महाराज ) अच्युताय नमः ,अनन्त्ताय नमः ,गोविन्दाय नमः - इस मंत्र का निरंतर जप करने से हर प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। जब तक रोग न मिटे ,श्रद्धा पूर्वक जप करते रहे। यह अनुभूत प्रयोग हैं।  वाराणस्यां दक्षिणे तु  कुक्कुटो नाम वै द्विजः।  तस्य स्मरणमात्रेण दुःस्वप्नह सुखदो भवेत्।। यदि किसी को बुरे स्वप्न आते हैं तो रात्रि में हाथ पैर धोकर शांत चित्त से पूर्वमुख आसन पर बैठकर प्रतिदिन इस मन्त्र का 108बार जप करे ,दुःस्वप्न बंद हो जायेंगे तथा उनके फल  भी अच्छे होंगे।  या देवी सर्व भूतेषु शांति रूपेण संस्थिता।  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। इस मंत्र का प्रतिदिन 108 बार जप करने से पारिवारिक कलह की निवृत्ति होगी। 

संसार में कैसे रहे

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मनुष्य का प्रथम कर्तव्य हैं कि  किसी भी कार्य को करने  से पहले अच्छी तरह से विचार कर ले। बिना  सोचे विचार किसी भी काम को न करे। कर्म का फल क्या मिलेगा यह पहले ही विचार  कर  लेना चाहिए। हम जो भी कार्य या कर्म करते हैं उसका  सिंह अवलोकन करना चाहिए। सिंह का स्वभाव होता हैं कि वह कुछ दूर चलता हैं फिर पीछे घूम कर देखता हैं। इसी प्रकार अब तक इतने दिनों तक हम  जो करते  आ रहें हैं  उससे मुझे क्या लाभ मिला या क्या हानि हुई इस पर विचार कर ,जहाँ  अपने व्यवहार में विचार में त्रुटि हो उसे सुधार लेना चाहिए। अपने परिवार का पालन करने के लिए यदि हम झूठ ,पाप ,हिंसा का सहारा नहीं लेते तो ईश्वर हमारा हर समय ध्यान रखता हैं ,वो हमे कभी भी अकेला नहीं पड़ने देता। 

आज का शुभ विचार

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आप अपनी सारी आशायें   भगवान पर  छो ड़  दें ,तब किसी भी व्यक्ति से कोई  भी निराशा नही मिलेगी ।  ।।जय सियाराम।।

इस कलयुग में केवल भगवान का नाम ही बचा सकता है।

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                                                                                                                     इस कलयुग में भगवन्न नाम महिमा संसार में अनेक रोग हैं ,और उनकी अलग -अलग औषधियाँ हैं ,परन्तु राम नाम तो सभी रोगों की रामबाण औषधि हैं। शोक ,मोह ,लोभ आदि सभी रोगों के लिए एक राम नाम ही महा औषधि हैं। कलियुग में नाम स्मरण करके ही दोषो से बचा जा सकता हैं। अन्यथा समय के प्रभाव से बचना कठिन हैं। भगवान  के नाम , रूप , लीला और धाम ये चारों सच्चिंदानन्दमय हैं। एक को पकड़ने से चारों पकड़ में आ जाते हैं। सुलभ एवं शक्तिमान होने से नाम ही चारों में श्रेष्ठ हैं। नाम में लीला भरी हैं। राम में रामायण , कृष्ण नाम में भागवत पुराण स्थित हैं। नाम को पुकारने से रूप का आकर्षण होता हैं। नाम में ध...