महिषासुर मर्दिनी का दूसरा एवं तीसरे हिंदी में अर्थ
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का हर श्लोक देवी दुर्गा के अलग-अलग नामों को बताता है। इसकी गहराई से संकेत के लिए हर श्लोक का विश्लेषण किया जा सकता है। यहां "अयि गिरिनन्दिनी" के अगले कुछ श्लोकों का भावार्थ प्रस्तुत है सुरवर वर्षिणि दुर्धर वर्षिणी दुर्मुखमर्षणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते। दनुजनिरोषिणि दितिसुत रोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते, जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनी शैलसुते।। भावार्थ : 1. सुरवर वर्षिणि: हे देवी, आप देवताओं पर कृपा की वर्षा करने वाली हैं। 2. दुर्धरधर्षिणि: जो दुर्जेय शत्रुओं का दमन करता है। 3. दुर्मुखमर्षणि: दुष्टों और उनके आचरण को नष्ट करने वाली। 4. त्रिभुवनपोषिणि: त्रिलोकों की रक्षा और पोषण करने वाली। 5. शंकर तोषिणी: भगवान शिव को भी प्रसन्न करने वाली। 6. किल्बिष मोषिनि: पापों को हरने वाली। 7. दनुजनिरोषिणि: राक्षसों के प्रति क्रोध से दंड वाली। 8. दितिसुत रोषिणि: दैत्य माता दिति के पुत्रों को स्थापित करने वाली। 9. दुर्मदशोषिणि: दुष्टों का नाश करने वाली। 10. सिन्धुसुते: शुभ कार्य में आनंदित होने वाली। इस श्लोक में बताया गया ह...