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महिषासुर मर्दिनी का दूसरा एवं तीसरे हिंदी में अर्थ

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  महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् का हर श्लोक देवी दुर्गा के अलग-अलग नामों को बताता है। इसकी गहराई से संकेत के लिए हर श्लोक का विश्लेषण किया जा सकता है। यहां "अयि गिरिनन्दिनी" के अगले कुछ श्लोकों का भावार्थ प्रस्तुत है सुरवर वर्षिणि दुर्धर वर्षिणी दुर्मुखमर्षणि हर्षरते  त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते। दनुजनिरोषिणि दितिसुत रोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते, जय जय हे महिषासुरमर्दिनी रम्यकपर्दिनी शैलसुते।। भावार्थ : 1. सुरवर वर्षिणि: हे देवी, आप देवताओं पर कृपा की वर्षा करने वाली हैं। 2. दुर्धरधर्षिणि: जो दुर्जेय शत्रुओं का दमन करता है। 3. दुर्मुखमर्षणि: दुष्टों और उनके आचरण को नष्ट करने वाली। 4. त्रिभुवनपोषिणि: त्रिलोकों की रक्षा और पोषण करने वाली। 5. शंकर तोषिणी: भगवान शिव को भी प्रसन्न करने वाली। 6. किल्बिष मोषिनि: पापों को हरने वाली। 7. दनुजनिरोषिणि: राक्षसों के प्रति क्रोध से दंड वाली। 8. दितिसुत रोषिणि: दैत्य माता दिति के पुत्रों को स्थापित करने वाली। 9. दुर्मदशोषिणि: दुष्टों का नाश करने वाली। 10. सिन्धुसुते: शुभ कार्य में आनंदित होने वाली। इस श्लोक में बताया गया ह...

महिषासुर मर्दिनी का पहला अध्याय हिंदी में अर्थ

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 महिषासुर मर्दिनी का हिंदी में अर्थ है "महिषासुर का वध करने वाली देवी"। यह देवी दुर्गा का एक प्रसिद्ध रूप है। महिषासुर एक असुर (राक्षस) था, जो आधा भैंसा और आधा इंसान था। उन्हें अजेय माना जाता था, लेकिन उनके अत्याचारी भाषण में देवी दुर्गा की आराधना की बात कही गई थी। देवी दुर्गा ने महिषासुर से भीषण युद्ध करवाया और अंततः उसका वध कर दिया। इसलिए, महिषासुर मर्दिनी देवी दुर्गा के उस रूप को कहा जाता है, जो अधर्म, अन्याय और अराजकता का अंत करता है और धर्म की स्थापना करता है। महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् (जिसकी शुरुआत "अयि गिरीनंदिनी" से होती है) में देवी दुर्गा की विभिन्न शक्तियों और गुणों का वर्णन है। इसमें देवी को महिषासुर का संहार करने वाली के रूप में पूजा जाता है। यह स्तोत्र उनके साहस, करुणा, मित्रता और उनकी सर्वव्यापकता की स्तुति है। " अयि गिरिनन्दिनी" श्लोक का भावार्थ (मुख्य अर्थ): अयि गिरिन्नन्दिनी नन्दितमेदिनी विश्वविनोदिनी नन्दिनुते। गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनी विष्णुविलासिनी जिष्णुनुते। भगवती हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनी भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्...

वृंदावन में हर जगह राधाजी का नाम ही क्यों उच्चारण होता है?

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वृंदावन में हर जगह राधाजी  का नाम ही क्यों उच्चारण होता है? वृंदावन में "राधे-राधे" का उच्चारण हर जगह सुनने का मुख्य कारण धार्मिक और आध्यात्मिक है। यह भगवान कृष्ण और राधारानी की लीलाओं से जुड़े प्रेम, भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है। इसके पीछे कई कारण हैं: 1. राधा-कृष्ण की दिव्य प्रेम लीला वृंदावन को राधा और कृष्ण की दिव्य लीलाओं की भूमि माना जाता है। राधा को श्रीकृष्ण की अनन्य आराधिका और उनकी शक्ति स्वरूपा माना जाता है। इसलिए, "राधे-राधे" का जप भक्तों के लिए उनकी भक्ति को व्यक्त करने का सर्वोत्तम माध्यम है। 2. भक्ति का सर्वोच्च मार्ग राधा को भक्ति का सर्वोच्च रूप माना जाता है। उनके नाम का उच्चारण भक्तों के लिए आध्यात्मिक शांति और भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करने का साधन है। 3. सांस्कृतिक परंपरा वृंदावन की संस्कृति और परंपराओं में "राधे-राधे" का अभिवादन गहरे रूप से समाहित है। यहाँ यह केवल धार्मिक उच्चारण नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का हिस्सा भी है। लोग इसे नमस्कार, स्वागत और शुभकामनाओं के रूप में उपयोग करते हैं। 4. आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव ऐसा माना जाता है कि...

गोवर्धन परिक्रमा करने से क्या होता है?/Govardhan parikrama Se Kya hota Hai?

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    गोवर्धन परिक्रमा करने से क्या होता है? संसार के सुखों से मन को हटाने से परमात्मा सुख अपने आप मिलने लग जाता है। श्री कृष्ण ने गोवर्धन के रूप में प्रकट होकर अपने को सबके लिए सुलभ  कर दिया। गोवर्धन को समझने से श्री कृष्ण तत्व समझ में आ जाता है। बड़े  भारी और अति हल्के प्रभु हैं।सब गुरुओं के गुरु गोवर्धन नाथ है। इसी से गुरु पूर्णिमा को अपार जन, देव, दानव,मानव आकर दर्शन और प्रदक्षिणा करता है। गोवर्धन परिक्रमा का हिन्दू धर्म में विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। इसे करने से व्यक्ति को निम्नलिखित लाभ और अनुभव हो सकते हैं: 1. आध्यात्मिक शांति और पुण्य गोवर्धन परिक्रमा करने से व्यक्ति को मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव होता है। यह भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रतीक है, जिससे व्यक्ति को पुण्य फल प्राप्त होता है। 2. कर्मों का शुद्धिकरण ऐसा माना जाता है कि परिक्रमा करने से व्यक्ति के पाप कर्मों का नाश होता है और उसे मोक्ष की ओर बढ़ने का मार्ग प्राप्त होता है। 3. शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य गोवर्धन की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर लंबी होती है। इसे करने से शारीरिक ...

प्रवचन 3

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               भाई जी के प्रवचन भगवान की कृपा पर विश्वास है और उनके न्याय पर विश्वास है, दुनिया की कोई भी स्थिति नहीं बता सकती।

भाई जी के प्रवचन 2

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                            भाई जी के श्री मुख से  स्नेह, प्रीति और तज्जनित त्याग जब भी भोगों के प्रतिपादन होता है, तब उसका नाम आशक्ति होता है और भगवान के प्रतिपादन होता है तो उसका नाम भक्ति होता है।

भाई जी के प्रवचन

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 भाई जी श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी के अंतिम प्रवचन मैं आपके साथ प्रतिदिन साझा करता हूं, अगर हम अपने जीवन में आग्रह करें तो निश्चित रूप से हमारे जीवन में अमूल्य परिवर्तन हो जाएगा।                                श्री राधे  भिक्षु भगवान में सच्चा विश्वास हो जाएगा, उसी के साथ उनका विवाह दुर्बलता दूर हो जाएगा, तुम्हारा भय भाग जाएगा और विपरीत विचारधारा वाले मन के आदर्श हो जाएंगे।

राम नाम की महिमा

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                         राम नाम की महिमा  ‘रा=राक्षसानां मरणं यस्मात्। ’ ‘र’ का अर्थ है राक्षसगण ‘ म’ का अर्थ है मकार का मरण। काम, क्रोध, मान, मद् आदि राक्षस जिससे मरते हैं वह है राम नाम। श्री कबीर के शिष्य श्री पद्मनाभ ने श्री राम नाम से कुष्ठी को निरोग किया। कबीर ने कहा कि गुरुदेव कृपा से नाम का इतना ही महत्व नहीं है, यह बंधन तो नाम के आभास से ही कट जाता है। रा का उच्चारण करने से पाप बाहर निकल जाते हैं। फिर मा  का उच्चारण करने पर कपाट बंद हो जाता है। फिर मुख के बंद होने पर पाप प्रवेश नहीं कर पाते हैं अतः हरे राम महामंत्र विधि, अविधि जैसे भी जपा जाए कलयुग में विशेष फलप्रद है। जैसे अनजाने में स्पर्श किया गया अग्नि भी जला देता है ऐसे ही हरि वह नाम है जो सभी के पाप तापों को करते हैं।  एक व्यक्ति वृंदावनजा रहा था दूसरे ने पैसे देकर कहां मेरे लिए एक तुलसी की माला लेते आना। अभी माला आई नहीं नाम -जाप हुआ नहीं ,परंतु केवल नाम जप करने का विचार मात्र किया था इतने से ही यमराज ने कहा अरे चित्रगुप्त ! माला मंगाने वाले...

भगवान की प्राप्ति का उपाय

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                  भगवान की प्राप्ति का उपाय ‘रामो विग्रहवान धर्मः।’श्री राम धर्म  की मूर्ति हैं।  ‘श्री राम जय राम जय जय राम’  यह भगवान का नाम हैं और वैदिक मंत्र भी है। कम से कम 22 बार जप करने वाला धन्य है। राम नाम से बढ़कर कोई नाम नहीं है।इसका जप करने वाला भक्ति मुक्ति आदि अभीष्ट पदार्थ पाता है। भगवत्त प्राप्ति का उपाय क्या है यह जीव नही जानता, भगवान अपने आप ही बताते हैं।सदा जप, तप ,अनुष्ठान में निमग्न रहकर विश्व कल्याण की मांग करनी चाहिए। मन में नाम लेने से मुक्ति प्राप्त होती है और वाणी द्वारा उच्च स्वर से कीर्तन करने वाले को भक्ति प्राप्त होती है। उच्चस्वर  से  किया गया कीर्तन अपने तथा दूसरों के भी कानों को पवित्र कर देता है। अतः भक्तजन गौरांग प्रभु आदि ने उच्च स्वर से कीर्तन करने को श्रेष्ठ बताया है। इसलिए ऊंचे स्वर से कीर्तन करने से भगवत प्राप्ति होती है।

कलयुग के कोप से कैसे बचें?

                    कलयुग के कोप से कैसे बचें ? कलिकाल में भगवान के नाम की तरह गुरुदेव का नाम, भक्तों का नाम जपना भी मंगलकारी है। नाम की महिमा सदा थी और आगे भी रहेगी,पर कलयुग में विशेष महत्व हैं। भगवान का नाम, और भगवान आप सभी का मंगल करें। गुरुत्व का बोध हो। जो लोग कलियुग की निंदा करते हैं और उन दोषों को अपने में रखकर दोष कलियुग को देते हैं ,वे कलियुग के दोषों से बच नहीं सकते। भगवान के नाम, रूप, लीला, धाम सभी मंगलकारी हैं। जंहा- जहां जो-जो लोग भगवान के आश्रय स्थल हैं वहां मंगल कल्याण की प्राप्ति होती है। अतः कलयुग के कोप से बचने का एकमात्र उपाय है जितना हो सके भगवान के नाम का जाप करो।मन में करो चाहे उच्च स्वर में करो। दादा गुरु भक्तमाली के श्री मुख से परमार्थ के पत्र पुष्प में से  ।।जय श्री राधे।।

इंसान को चिंता से मुक्ति कैसे मिले?

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                  प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार  इंसान को चिंता से मुक्ति कैसे मिले?  मन का कार्य मनन करना, चिंतन करना वह बिना मनन चिंतन के एक पल भी नहीं रह सकता और इसको चिंतन मनन करने का अभ्यास है। तो इसको चिंतन मनन कराओ लेकिन असत नहीं सत् । जो आनंद की उत्पत्ति होती है वह भगवान के नाम में, भगवान के लीला गायन में मन को लगाओ। इसीलिए हम कहते हैं कि हर समय राधा राधा राधा नाम जपो,अगर इसको खाली छोड़ दिया अगर इसको काम में नहीं लगाया तो यह पटक देगा, यह एक भूत जैसा है। एक आदमी ने भूत सिद्ध किया अपने गुर के द्वारा दिए गए मंत्र से, भूत सिद्ध हो गया अब वह पीछे पड़ गया कि मुझे काम दो, अगर खाली छोड़ दिया तो मैं आपको मार दूंगा। अब आदमी परेशान हो गया कि मैं उसको जो भी काम देता हूं वह झट से पूरा कर देता है।अब आदमी अपने गुरु के पास गया की गुरुदेव मैं इसे कोई काम नहीं दूंगा तो यह मुझे मार देगा। तो गुरु ने एक डंडा दिया और कहां इस जमीन में गाढ़ दो,और उसको बोलो जब तक मैं कोई काम नहीं देता तुम इसके ऊपर नीचे चक्कर लगाओ, जब कोई कार्य होगा तो हम बता देंगे। ...

क्या आप धाम में वास चाहते हैं पर-----

  जिनका धाम के प्रति प्रेम है जिन्हें धाम की आशा है वह बाहर रहकर भी धाम के प्रेमी,धाम के वासी हैं जानिए कैसे---- जिनका धाम के प्रति प्रेम है जिन्हें धाम की आशा है वह बाहर रहकर भी धाम के प्रेमी,धाम के वासी हैं। मंदिरों के ध्यान स्मरण से धमवास का फल मिलता हैं। श्रीधाम का स्मरण करके श्री बिहारी जी को, श्री राधाबल्लभ को, श्री गोपेश्वर जी को, यमुना जी को नमस्कार करने से वृंदावन वास का लाभ मिलेगा। भगवान का धाम सबको अपनी और नित्य आकर्षित करता है। जो भी दर्शनार्थ आते हैं उनके मन में यही होता है कि मुझे यहां निवास मिल जाए तो उत्तम है। श्री धाम का दर्शन करके यहां के मंदिरों का श्री विग्रह का, तीर्थ का, धाम के संतों का यथा समय सांय प्रातः स्मरण ध्यान करने से तीर्थवास का फल प्राप्त होता है। सब प्रकार से धाम में आनंद है जो सन्मार्ग में है वह श्री धाम में है। जो कृष्ण सेवा चिंतन में निमग्न है वह धाम में है। नाम जापी सदा धाम में है। श्री कृष्ण शरणम ममः इस शरणागति मंत्र का सदा स्मरण करने वाला धाम में है। जो कुमार्ग में है वह धाम से बाहर है। विषयाक्त माया मोहित मनुष्य संसार में है। धाम में बुद...

हम सभी का कल्याण इस बात में हैं कि ----

              हम सभी का कल्याण इस बात में हैं कि ---- हम लोगों का कल्याण इस बात में है कि हम संत भगवान की कृपा से हम निरंतर भगवान का स्मरण करें, उन्हें कभी ना भूले। गीता अध्याय 8 शलोक 14 में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन जो अनन्य भाव से लगातार मेरा स्मरण करता है मैं ऐसे योगी के लिए सुलभ हूं, भगवान के इस वाक्य पर जिसे विश्वास है वह सर्वत्र अपने प्रभु को मानता है। जागृत अवस्था में स्मरण संभव है, परंतु सोते समय स्मरण असंभव है, जागते हुए जो कार्य किया जाता है। प्राय: वही स्वप्न में दिखाई देता है। सोने के पहले स्मरण करते-करते सोना और जाकर स्मरण करना, इसके बीच का सोने का समय भी स्मरण में माना जाएगा। जीव के सच्चे सगे संबंधी भगवान ही हैं ईश्वर दयालू है कभी भी जीवो पर कुपित नहीं होते हैं।  जैसे गर्भ के समय बालक माता के पेट में हाथ पैर चलाता है माता को कष्ट होता है परंतु माता उस बालक पर कुपित नहीं होती है, इसी प्रकार प्रभु भी आस्तिक नास्तिक सभी जीवो के साथ रहते हैं। नरक में भी साथ नहीं छोड़ते हैं अंतर्यामी रूप से प्रभु सर्वत्र जीव के साथ रहते हैं अ...

भक्ति की इच्छा कैसे बढ़े?

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                       भक्ति की इच्छा कैसे बढ़े? सद्गुरु शरणागत को तिलक, कंठी, मंत्र आदि देकर उपासना मार्ग पर चलना सीखाते हैं फिर चलकर प्रभु के निकट पहुंचा देते हैं। गुरुदेव की प्राप्ति श्री कृष्ण की प्राप्ति है। गुरु वही है जो भक्त को भक्ति का उपदेश दे। लोक धर्म में कपट छोड़कर सत्य, दया, क्षमा, उदारता का जनता के साथ व्यवहार करना सिखावे। सभी देवों को श्री कृष्ण का अंग अर्थात भक्ति मान उनका भी आदर करना सिखाए। वही सदगुरु देव है। बिना भक्तमाल भक्ति रूप अती दूर है। हमारे सदगुरु का मुख्य उद्देश्य है भक्तमाल में लोक शिक्षा का भी वर्णन है। सदगुरु देव में श्रद्धा बढ़ाना, किसी भी कारण से श्रद्धा कम ना हो।जब प्रेम में कपट या स्वार्थ का लेश होता है। तब प्रेम घटने लगता है। निस्वार्थ सच्चा प्रेम दिन दिन बढ़ता रहता है। गुरुदेव में श्रद्धा बढ़ेगी तो साथ ही साथ श्री कृष्णा में भक्ति बढ़ेगी। भक्त,भक्ति, भगवान और गुरुदेव यह चारों एक हैं। एक का हृदय में निवास हो जाए तो चारों की प्राप्ति हो जाएगी। बार-बार सत्संग में उपदेशों का श्रवण करने से भक्ति ...

स्वामी विवेकानंद जी पर उनके गुरु की कृपा हुई तो वह नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद हो गए।

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         स्वामी विवेकानंद जी पर उनके गुरु की कृपा हुई तो वह नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद हो गए। विवेकानंद जी का नाम नरेंद्र था पूरे नास्तिक थे। वह कहते थे कि पत्थर की जड़ मूर्तियों में चैतन्य आत्मा को लगाने से क्या लाभ। श्री रामकृष्ण देव परमहंस को पागल समझते थे। किसी दिन मन में आया कि देखे उसे पागल को। जब परमहंस जी के पास आए तो उन्होंने कहा– क्यों नरेंद्र! तुम इतनी देर से आए? नरेंद्र के मन में आया इन्हें मेरा नाम कैसे पता चला। इन्होंने कहा कि पत्थर की मूर्ति के सामने मां मां करने से क्या लाभ? परमहंस जी ने कहा बेटा! यह साक्षात माता है, प्यार करती हैं, बातचीत करती हैं। कृपा करके परमहंस ने कहा तुम माता जी के सामने बैठ ध्यान लगाकर मां पुकारो। नरेंद्र ने ऐसा ही किया। इस बालक पर दया करो। परमहंस की प्रार्थना पर माता ने ध्यान में दर्शन दिया सर पर हाथ रखा। उसी पल नरेंद्र के मन में विवेक की जागृति हो गई और गुरु चरण रज के सिर पर लगाते ही विवेकानंद हो गए। हाय-हाय! कर पछताने लगे कि गुरु चरणों से अलग रहकर कितना समय व्यर्थ गया।

शरणागति का क्या स्वरूप होता है।

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               शरणागति का क्या स्वरूप होता है। भूल जान यह जीव का स्वभाव है। कन्या अपने पति का वरण कर लेती है तो उसे दृढ़ विश्वास होता है कि यह मेरे पति हैं। बार-बार वह ना कहे तो कोई आपत्ति नहीं है। पर जीव शरणागत होकर भी दृढ़ विश्वास नहीं कर पाता है संसार के संबंध अपनी और खींचते हैं अतः उसे बार-बार शरणागति का स्मरण करना चाहिए। मन को नाम, रूप, लीला में अनन्य भाव से लगा लिया जाए तो उस भक्त का स्मरण भगवान अपने आप करते हैं। भक्त बार-बार ना भी कहे कि मैं शरण में हूं तो कोई आपत्ति नहीं है। पर नए साधक को बार-बार स्मरण करना ही है। जब तक जीव भगवान की शरण में नहीं जाएगा, तब तक उसे शांति नहीं मिलेगी। आज नहीं तो आगे घूम फिर कर भगवान के पास अवश्य पहुंचेंगे। इस प्रकार पहुंचने में विलंब होगा अनेक बार 84 लाख योनियों में भटकना पड़ेगा अतः प्रयत्न करके साधन को भजन करके शीघ्र से शीघ्र अपने प्रभु के पास पहुंच जाना चाहिए। इससे वह प्रभु अति प्रसन्न होंगे। जीव के विमुख होने पर ईश्वर को कष्ट होता है।   आवत निकट हंसहि प्रभु भाजत रुदन कराही   जब  भक्त निकट आता...

भगवान की प्राप्ति का उपाय

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                    भगवान की प्राप्ति का उपाय                   परमार्थ के पत्र पुष्प में से ‘ रामो विग्रहवान धर्मः।’  श्री राम धर्म की मूर्ति है।               श्री राम जय राम जय जय राम  यह भगवन्न नाम है और वैदिक मंत्र भी है। कम से कम 22 बार जप करने वाला धन्य है।राम नाम से बढ़कर दूसरा कोई नाम नहीं है। इसका जापक भक्ति मुक्ति आदि अभीष्ट पदार्थ पता है। भगवत प्राप्ति का उपाय क्या है इसे जीव नहीं जानता, स्वयं ही भगवान आकर बताते है। सदा जप ,तप ,अनुष्ठान में निमग्न रहकर विश्व कल्याण की मांग करनी चाहिए  मन में नाम लेने से मुक्ति प्राप्त होती हैं। और वाणी द्वारा उच्च स्वर से  कीर्तन करने वाले को भक्ति प्राप्त होती है। उच्च स्वर से किया गया कीर्तन अपने साथ दूसरों के भी कानों को पवित्र कर देता हैं। अतः भक्तजन गौरांग प्रभु आदि ने उच्च स्वर से कीर्तन करने को ही श्रेष्ठ बताया। दादा गुरु भक्त माली जी  के श्री मुख से, परमार्थ के पत्र पुष्प में ...

पापों का नाश कैसे हो?

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                        पापों का नाश कैसे हो?                      परमार्थ के पत्र पुष्प से दुष्ट चित्त से भी स्मरण किया गया भगवान का नाम पापों का नाश करता है। जैसे अग्नि अनजाने में भी स्पर्श करने पर जला देती है। अतः हरि यह नाम हैं।सभी के पाप तापों को हरते है।अपने श्रवण कीर्तन द्वारा भक्तों के मन को हरते हैं। अतः उसका नाम हरा हैं जो कृष्ण के मन को भी हरता है।इसलिए ’ हरे राम हरे राम’ मंत्र में  प्रयुक्त हरे का अर्थ है हे राधे  । ’ कृष’ आकर्षण  करने वाला ’ ण’  आनंददायक हैं। रा का  उच्चारण करने से पाप बाहर निकल जाते हैं।फिर म का उच्चारण करने से कपाट बंद हो जाते हैं,फिर मुख के बंद हो जाने पर पाप प्रवेश नहीं कर पाते हैं। अतः   हरे राम यह  महामंत्र विधि ,अवधि जैसे भी जपा जाए कलियुग में विशेष फलप्रद है। ( दादा गुरु भक्तमाली जी महाराज के श्री मुख से परमार्थ के पत्र पुष्प से)

Kalasang India

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तुलसीदास जी को वृन्दावन में राम दर्शन

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                    तुलसीदास जी को वृन्दावन में राम दर्शन  तुलसीदास जी जब वृन्दावन आये। तुलसीदास जी जानते थे राम ही कृष्ण है,और कृष्ण ही राम है। वृन्दावन में सभी भक्त जन राधे-राधे बोलते है। तुलसीदास जी सोच रहे है कोई तो राम राम कहेगा। लेकिन कोई नही बोलता। जहाँ से देखो सिर्फ एक आवाज राधे राधे। श्री राधे-श्री राधे। क्या यहाँ राम जी से बैर है लोगो का। देखिये तब कितना सुन्दर उनके मुख से निकला- वृन्दावन ब्रजभूमि में कहाँ राम सो बेर राधा राधा रटत हैं आक ढ़ाक अरू खैर। जब तुलसीदास ज्ञानगुदड़ी में विराजमान श्रीमदनमोहन जी का दर्शन कर रहे थे। श्रीनाभाजी एवं अनेक वैष्णव इनके साथ में थे। इन्होंने जब श्रीमदनमोहन जी को दण्डवत प्रणाम किया तो परशुरामदास नाम के पुजारी ने व्यंग किया- अपने अपने इष्टको, नमन करे सब कोय। बिना इष्ट के परशुराम नवै सो मूरख होय।। श्रीगोस्वामीजी के मन में श्रीराम—कृष्ण में कोई भेदभाव नहीं था, परन्तु पुजारी के कटाक्ष के कारण आपने हाथ जोड़कर श्रीठाकुरजी से कहा। हे ठाकुर जी! हे राम जी! मैं जनता हूँ की आप ही राम हो आप ही कृष्ण हो ...

तुलसीदास जब वृन्दावन गए,और खीर के प्रसाद के लिए उनके पास कोई भी पात्र नहीं था तो उन्होंने किसमें खीर खानी चाही?

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                          तुलसीदास जब वृन्दावन गए,और खीर के प्रसाद के लिए उनके पास कोई भी पात्र नहीं था तो उन्होंने किसमें खीर खानी चाही? तुलसीदास उस समय वृन्दावन में ही ठहरे थे। वे भंडारों में विशेष रुचि नहीं रखते थे लेकिन भगवान शंकर ने गोस्वामीजी को नाभा जी के भंडारे में जाने की आंतरिक प्रेरणा दी। तुलसीदास जी ने भगवान शंकर की आज्ञा का पालन किया और नाभा जी के भंडारे में जाने के लिए चल दिए। लेकिन थोड़ी देर हो गई। जब गोस्वामी जी वह पहुंचे तो वह संतो की बहुत भीड़ थी उनको कही बैठने की जगह नहीं मिली तो जहा संतो के जूते-चप्पल(पनहियाँ) पड़े थे वो वही ही बैठ गए। अब सभी संत जान भंडारे का आनंद ले रहे थे और अपने अपने पात्र साथ लए थे जिसमे प्रशाद डलवा रहे थे। आज भी वृन्दावन की रसिक संत भंडारे में अपने-अपने पात्र लेकर जाते है। तुलसीदास जी कोई पात्र(बर्तन) नही लाये। अब भंडारा भी था तो खीर का था क्योकि हमारे बांकेबिहारी को खीर बहुत पसंद है आज भी राजभोग में 12 महीने खीर का ही भोग लगता है, अब जो प्रसाद बाँट रहा था वो गोस्वामी जी के पास आये औ...

पूज्य डोंगरे जी महाराज जी की एक दिव्यांग बालक पर कृपा

पूज्य डोंगरे जी महाराज जी की एक दिव्यांग बालक पर कृपा  पूज्य डोंगरे जी महाराज भागलपुर मध्यप्रदेश में भागवत कथा कर रहे थे सन् १९७१ में , वहाँ माता रुक्मणी बाई जी की संस्था थी जो गरीब असहाय, विधवा और पीड़ित महिलाओं को आश्रय देकर भजन कीर्तन प्रभु स्मरण में लगाती थी। पूज्य डोंगरे जी महाराज या तो स्वयं बनाकर पाते थे या कभी किसी गरीब वात्सल्यमयी माँ रूपी जन से।  वही जब एक दिवस कथा का विश्राम हुआ तो एक गरीब माँ ने आग्रह किया कि आज इस माँ के हाथ से बनाया हुआ पा लीजिए।  पूज्य डोंगरे जी महाराज किसी भी स्त्री को दृष्टि ऊपर कर के नहीं देखते थे ; हमेशा चरणों में दृष्टि रखते थे और कथा भी नीचे दृष्टि रख कर ही करते थे । माता का अधिक आग्रह और वात्सल्य देखकर दया कृपा भाव से पूज्य महाराज जी ने मंच से ही कहा कि अपने बालक के हाथों भेज दो यहाँ । माता का बालक दिव्यांग था । उसकी बाईं टांग  बचपन से ही पोलियो ग्रस्त थी और बालक की उम्र ११-१२ वर्ष थी और इसी लाइलाज रोग और ग़रीबी के कारण ही उसके पति ने उसे छोड़ दिया था और वे पूज्य रुक्मणी बाई जी के आश्रम में ही रह रही थी । माता ने रोते हुए कहा कि...

भगवान को भेंट (भगवान को चढ़ावे की जरूरत नहीं होती वे तो केवल––)

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   भगवान को भेंट (भगवान को चढ़ावे की जरूरत नहीं होती वे तो केवल––) पुरानी बात है एक सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था। जो भी जरुरी काम हो सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता था। वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था l वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन स्मरण सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था।           एक दिन उस ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा- भाई ! "मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना।" भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल गया।          कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत सारे संत, भक्त जन, वैष्णव जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से ...

कलयुग के दोषों से बचा जा सकता है।

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                कलयुग के दोषों से बचा जा सकता है। राम नाम का आश्रय लेने वाले ही कलयुग के दोषों से बचते हैं अन्यथा बड़े से बडा भी कोई बच नहीं सकता है। एक संत सुदामा कुटी में रहते हैं उन्होंने बताया कि मेरे सामने कलयुग आया और उसने यह बात कही। इस दिन से अब मैं समय से राम मंत्र जपता हूं भगवान का नाम, रूप, लीला, धाम यह चारों समान है। इनमें एकता रहती है। इनमें से एक का भी आश्रय यदि कोई लेता है तो उसका कल्याण हो जाता है। इन चारों में से नाम सबसे ज्यादा सुलभ है। नाम लेने में कोई विधि विधान नहीं, अपवित्रता पवित्रता की भी आवश्यकता नहीं। यदि छल,कपट, ईर्ष्या, द्वेष आदि को छोड़कर नाम लेता है तो उसका अवश्य कल्याण हो जाता है। प्रभु के नाम में विश्वास रखकर उसके अभ्यास को बढ़ाना चाहिए। उसके बदले में दूसरी कामना नहीं करनी चाहिए। हमारे भीतर बाहर की सारी बातों को परमात्मा जानता है। हमारे ऊपर प्रभु कृपा है स्वयं अनुभव करना चाहिए। ।।जय श्री राधे।। दादा गुरु भक्तमाली श्री गणेशदास जी महाराज के श्री मुख से, परमार्थ के पुत्र पुष्प से लिया गया।

जन्म जन्मांतर के अशुभ संस्कारों को मिटाने के लिए

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       जन्म जन्मांतर के अशुभ संस्कारों को मिटाने के लिए जन्म जन्मांतर के अशुभ संस्कारों को मिटाने के लिए निरंतर नाम जप आदि साधन आवश्यक है। श्रेष्ठ नाम स्मरण ही है। दूसरे साधनों की योग्य हम नहीं हैं। आवश्यक कामकाज करने के बाद या करते-करते भी नाम जप का अभ्यास बढ़ाना चाहिए। नाम में प्रेम होना और भगवान में प्रेम होना एक ही बात है। नाम जप के साथ ही यह नहीं सोचना चाहिए कि हमें सिद्धि नही मिली, कोई अनुभव नहीं हो रहे हैं   नाम जप में एकाग्रता के बढ़ जाने पर विषयों से वैराग्य हो जाएगा, अंत:करण यानी मन, बुद्धि, चित् अहंकार की शुद्ध हो जाएगी। तब स्वयं दिव्य अनुभव होने लग जाएंगे। नाम जप को ध्यानपूर्वक करना चाहिए या बिना ध्यान के? ऐसा कोई प्रश्न करें तो उसका उत्तर यह है कि ध्यान सहित नाम का जप अतिश्रेष्ठ है, परंतु आरंभ में यदि ध्यान सहित नाम जप नहीं बने तो बिना ध्यान के भी नाम जप करना चाहिए पर जप करते समय मन को इधर-उधर अनिष्ट विषयों में नहीं जाना चाहिए। जाए तो रोकना चाहिए। लीला चिंतन या रूप चिंतन, शोभा चिंतन, धाम चिंतन जो भी संभव हो करना चाहिए। उसे नाम जप के साथ करना चा...

रवि पंचक जाके नहीं , ताहि चतुर्थी नाहिं। का अर्थ

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  गोस्वामी तुलसीदासजी ने एक बड़े मजे की बात कही है - कृपया बहुत ध्यान से पढ़े एवं इन लाइनों का भावार्थ समझने की कोशिश करे- " रवि पंचक जाके नहीं , ताहि चतुर्थी नाहिं। तेहि सप्तक घेरे रहे , कबहुँ तृतीया नाहिं।।" गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज कहते हैं कि जिसको रवि पंचक नहीं है , उसको चतुर्थी नहीं आयेगी। उसको सप्तक घेरकर रखेगा और उसके जीवन में तृतीया नहीं आयेगी। मतलब क्या हुआ ?  रवि -पंचक का अर्थ होता है - रवि से पाँचवाँ यानि गुरुवार ( रवि , सोम , मंगल , बुद्ध , गुरु ) अर्थात् जिनको गुरु नहीं है , तो सन्त सद्गुरु के अभाव में उसको चतुर्थी नहीं होगी।चतुर्थी यानी बुध ( रवि , सोम , मंगल, बुध ) अर्थात् सुबुद्धि नहीं आयेगी। सुबुद्धि नहीं होने के कारण वह सन्मार्ग पर चल नहीं सकता है। सन्मार्ग पर नहीं चलनेवाले का परिणाम क्या होगा ? ' तेहि सप्तक घेरे रहे ' सप्तक क्या होता है ? शनि ( रवि , सोम मंगल , बुध , बृहस्पति , शुक्र , शनि ) अर्थात् उसको शनि घेरकर रखेगा और ' कबहुँ तृतीया नाहिं।' तृतीया यानी मंगल ( रवि , सोम , मंगल )। उसके जीवन में मंगल नहीं आवेगा । इसलिए अपने जीवन में मंगल...

श्रीकृष्ण को "दामोदर" क्यों कहते हैं?

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                श्रीकृष्ण को "दामोदर" क्यों कहते हैं?     श्रीकृष्ण की लीलाओं की भांति उनके नाम भी अनंत हैं। उनमें से ही एक नाम "दामोदर" है जो उन्हें बचपन में दिखाई गयी एक लीला के कारण मिला था।  ये नाम इसीलिए भी विशिष्ट है क्यूंकि इस बार उन्होंने अपनी माया का प्रयोग असुर पर नहीं अपितु अपनी माता पर ही किया था। एक बार गोकुल में माता यशोदा दूध को मथ कर माखन निकाल रही थी। उसी समय श्रीकृष्ण वहां आये और दूध पीने की जिद करने लगे।  उनका मनोहर मुख देखकर वैसे ही माता यशोदा सब कुछ भूल जाती थी। उन्होंने सारा काम छोड़ा और श्रीकृष्ण को स्तनपान करने लगी। वो ये भूल गयी कि उन्होंने अंगीठी पर दूध गर्म करने रखा है। दूध पिलाते हुए अचानक उन्हें याद आया कि अंगीठी पर रखा दूध तो उबल गया होगा। ये सोच कर उन्होंने श्रीकृष्ण को वही छोड़ा और दौड़ कर रसोई में गयी।  उधर श्रीकृष्ण बड़े क्रोधित हुए। माता और पुत्र के मध्य किसी का भी आना उनसे सहन नहीं हुआ। उसी क्रोध में उन्होंने वहां पड़े माखन के सारे घड़ों को फोड़ दिया और प्रेमपूर्वक माखन खाने लगे। उधर जब यशोदा म...

भक्ति का क्या प्रभाव होता है?

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                        भक्ति का क्या प्रभाव होता है? एक गृहस्थ कुमार भक्त थे। एक संत ने उन्हें नाम दिया वे भजन करने लगे, सीधे सरल चित् में भक्ति प्रकट हो गई अपने घर का काम करते हुए भजन करते हुए वह सिद्ध हो गए पर उन्हें पता नहीं कि मुझ में कुछ प्रभाव है। उनके समीप जो भी कोई जिस कामना से आता उसकी कामना पूर्ण हो जाती उसका कष्ट मिट जाता। धीरे-धीरे उसकी प्रसिद्ध हो गई, गांव के राजा ने सुना, तो वह फल फूल लेकर आया दर्शन कर भेट देकर उनके समीप बैठा। राजा ने पूछा की भक्ति की क्या महिमा है? भक्त कुम्हार ने कहां  राजन मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं, अतः शास्त्रों का मुझे ज्ञान नहीं है। पर अपनी प्रत्यक्ष अनुभव की बात बतलाता हूं। मैं मिट्टी के बर्तन बनाता हूं मेरी स्त्री और बच्चे भी इसी काम में लगे रहते हैं, मिट्टी में मिलाने के लिए घोड़े की लीद की जरूरत पड़ती है। घोड़े की लीद से खाद भी नहीं बनती है, सुखाकर उसे जलाने के काम भी नहीं लिया जाता। आपके यहां बहुत से घोड़े हैं ढेरों लीद पड़ी रहती है। मेरी स्त्री बच्चे उसे उठाने जाते हैं तो आपका नौकर ...

एक श्लोकी रामायण - एक श्लोकी रामायण

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  एक श्लोकी रामायण - एक श्लोकी रामायण आदौ राम तपोवनादि गमनं, हत्वा मृगं कांचनम् || वैधिहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम् || || बालिनिर्दलानं समुद्रतरणं, लंकापुरीदाहनम् || पश्चाद रावण कुंभकर्ण हननम्, एतद्धि रामायणम् || || भावार्थ: -श्रीराम वनवास गये, वहां पर स्वर्ण मृग का वध किया गया || रावण ने सीताजी का हरण किया, जटायु ने रावण के हाथ मारे || श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता हुई || श्रीराम ने बालि का वध किया || समुद्र पार किया || लंका का दहन || इसके बाद रावण और कुंभकर्ण का वध हुआ || श्री राम वन्दना श्लोक - श्री राम वन्दना श्लोक लोकाभिरामं रंगरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् || करुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये || || भावार्थ:- मैं संपूर्ण लोकों में सुंदर तथा रंकक्रीड़ा में धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणा के भक्त और करुणा के भंडार रूपी श्रीराम के शरण में हूं || श्रीराम गायत्री मंत्र - श्री राम गायत्री मंत्र ॐ दाशरथये विद्महे जानकी वल्लभाय धी माही || तन्नो रामः प्रचोदयात् || भावार्थ:- ॐ, दिसंबर के पुत्र का ध्यान करें, माता सीता की आज्ञा, आज्ञा से मुझे उच्च बुद्धि और शक्ति ...

संसार में सबसे बड़ा कौन

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                            संसार में सबसे बड़ा कौन          एक बार नारद जी के मन में एक विचित्र सा कौतूहल पैदा हुआ।उन्हें यह जानने की धुन सवार हुई कि ब्रह्मांड में सबसे बड़ा और महान कौन है?         नारद जी ने अपनी जिज्ञासा भगवान विष्णु के सामने ही रख दी। भगवान विष्णु मुस्कुराने लगे।फिर बोले, नारद जी सब पृथ्वी पर टिका है। इसलिए पृथ्वी को बड़ा कह सकते हैं। और बोले परंतु नारद जी यहां भी एक शंका है।        नारद जी का कौतूहल शांत होने की बजाय और बढ़ गया। नारद जी ने पूछा स्वयं आप सशंकित हैं फिर तो विषय गंभीर है। कैसी शंका है प्रभु ? विष्णु जी बोले, समुद्र ने पृथ्वी को घेर रखा है। इसलिए समुद्र उससे भी बड़ा है।         अब नारद जी बोले, प्रभु आप कहते हैं तो मान लेता हूं कि समुद्र सबसे बड़ा है।यह सुनकर विष्णु जी ने एक बात और छेड़ दी, परंतु नारद जी समुद्र को अगस्त्य मुनि ने पी लिया था। इसलिए समुद्र कैसे बड़ा हो सकता है ? बड़े तो फिर अगस्त्य मुन...