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करवा चौथ पर चंद्रमा को जल क्यों चढ़ाया जाता है

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🌕 करवा चौथ पर चंद्रमा को जल क्यों चढ़ाया जाता है? करवा चौथ   का पर्व भारतीय स्त्रियों की श्रद्धा, प्रेम और समर्पण का सबसे पवित्र प्रतीक है 🔹 1. चंद्रमा “सौभाग्य और दीर्घायु” का प्रतीक है हिंदू ज्योतिष में चंद्रमा मन, सौंदर्य, शीतलता और सौभाग्य का प्रतिनिधित्व करता है। व्रत रखने वाली स्त्रियाँ मानती हैं कि — "जैसे चंद्रमा अमर और शीतल है, वैसे ही मेरे पति का जीवन दीर्घ और सुखमय हो।" इसलिए चंद्रमा को जल चढ़ाकर वे पति की दीर्घायु का आशीर्वाद माँगती हैं। 🔹 2. जल = शुद्ध भावना और अर्पण जल हिंदू धर्म में सबसे पवित्र तत्व माना गया है। जब जल चढ़ाया जाता है, तो उसका अर्थ होता है — “मैं अपने मन, वचन और कर्म से चंद्रदेव को नमन कर रही हूँ।” यह जल भावना और भक्ति का प्रतीक है — जैसे हम अपनी पवित्र नीयत चंद्रमा तक पहुँचा रहे हों। 🔹 3. चंद्रमा मन का कारक ग्रह है। ज्योतिष के अनुसार, चंद्रमा मन और भावनाओं का स्वामी ग्रह है। व्रत के पूरे दिन स्त्रियाँ संयम, श्रद्धा और प्रेम से अपने मन को स्थिर रखती हैं। चंद्रमा को जल चढ़ाना, अपने मन को शुद्ध और शांत करने का संकेत है — ...

गोवर्धन राधा कुंड का भी आज के दिन प्राकट्य हुआ था

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      🌸 राधा कुंड प्राकट्य कथा (अहोई अष्टमी विशेष) ✨ परिचय कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी , जिसे हम अहोई अष्टमी के रूप में जानते हैं, केवल मातृ व्रत का दिन ही नहीं, बल्कि भक्ति जगत का एक दिव्य पर्व भी है। इसी दिन श्रीधाम वृंदावन के समीप गोवर्धन पर्वत के पाद में स्थित राधा कुंड और श्याम कुंड का प्राकट्य हुआ था। यह स्थान इतना पवित्र है कि स्वयं श्रीकृष्ण ने इसे “तीर्थराज” की उपाधि दी। 🌺 कथा – राधा कुंड और श्याम कुंड का प्राकट्य एक बार श्रीकृष्ण ने अरीष्टासुर नामक असुर का वध किया। यह असुर बैल के रूप में आया था और श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा के लिए उसका संहार किया। किन्तु जब वे गोपियों के बीच गए, तो उन्होंने कहा — “कृष्ण! तुमने बैल का वध किया है। बैल गोवंश में आता है, इसलिए तुम अपवित्र हो गए हो। पहले प्रायश्चित्त करो।” तब श्रीकृष्ण मुस्कुराए और बोले — “यदि यह पाप है, तो मैं अभी सभी पवित्र तीर्थों को यहीं बुलाकर स्नान करूंगा।” ऐसा कहते हुए उन्होंने अपने पग से भूमि पर प्रहार किया। उसी क्षण सभी पवित्र तीर्थ वहाँ प्रकट हो गए और जल का एक अद्भुत सरोवर बन गया...

अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami)

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                   अहोई अष्टमी (Ahoi Ashtami)   एक अत्यंत पवित्र व्रत है, जो मुख्य रूप से संतान की दीर्घायु, सुख और समृद्धि के लिए किया जाता है। यह व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है, अर्थात दीपावली से लगभग 8 दिन पहले । नीचे विस्तार से इसकी जानकारी दी गई है 👇 🌙 अहोई अष्टमी का महत्व अहोई अष्टमी का व्रत विशेषकर माताएँ अपने पुत्रों की लम्बी उम्र, स्वास्थ्य और सुख के लिए रखती हैं। पहले यह व्रत केवल पुत्रवती स्त्रियाँ करती थीं, परंतु अब कई महिलाएँ संतान सुख की प्राप्ति के लिए भी करती हैं। इस दिन माँ अहोई माता की पूजा होती है, जिन्हें अहोई भगवती , पार्वती माता का ही रूप माना गया है। 📅 2025 में अहोई अष्टमी की तिथि तारीख: 13 अक्टूबर 2025 अष्टमी तिथि प्रारंभ: 13 अक्टूबर, सुबह 1:42 बजे अष्टमी तिथि समाप्त:  14 अक्टूबर, सुबह 4:10 बजे पूजन का उत्तम समय: संध्या (सूर्यास्त के बाद सितारे दिखने तक) 🕉️ अहोई अष्टमी की कथा (कहानी) बहुत समय पहले एक साहूकार था जिसकी सात पुत्रियाँ थीं। कार्तिक माह में व...

कार्तिक माह 2025: महत्व, व्रत, नियम और दीपदान का धार्मिक रहस्य | Parmatma Aur Jivan

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माह का महत्व और नियम – जानिए इस पवित्र महीने का रहस्य कार्तिक स्नान, दीपदान और व्रत का महत्व – पूर्ण जानकारी क्यों कहा गया है कार्तिक मास को भगवान विष्णु का प्रिय महीना कार्तिक माह में क्या करें और क्या न करें – धार्मिक नियम व लाभ कार्तिक पूर्णिमा तक का विशेष पूजन विधि और कथा ✍️ ब्लॉग का परिचय (Introduction) यह जो अब चल रहा है यह महीना कार्तिक ही है। कार्तिक माह हिंदू पंचांग का आठवाँ महीना है, जो शरद ऋतु में आता है। यह महीना भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की उपासना का समय है। इस दौरान स्नान, दीपदान, दान और व्रत करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। कार्तिक माह को “ धर्म, दान और दीप का महीना ” भी कहा गया है। 🌸 कार्तिक माह का धार्मिक महत्व कार्तिक मास में भगवान विष्णु शयनावस्था से जागते हैं (देवउठनी एकादशी) । तुलसी विवाह इसी महीने में होता है। दीपदान से अंधकार दूर होता है और घर में सुख-शांति आती है। इस माह में स्नान, विशेषकर तीर्थ स्नान , अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। 🌼 कार्तिक माह में किए जाने वाले मुख्य कार्य प्रातःकाल स्नान (विशेषकर ब्रह्ममुहूर्त में)। दीपदान ...

“भीड़ में अकेलापन — आत्मा की पुकार | जीवन का आध्यात्मिक सत्य”

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 🌸 भीड़ में अकेलापन — आत्मा की पुकार             (लेख: Parmatma Aur Jivan) 🌿 प्रस्तावना आज का मनुष्य हर ओर से जुड़ा हुआ लगता है — मोबाइल, सोशल मीडिया, काम, और समाज से। फिर भी भीतर एक गहरी खामोशी है। एक ऐसी चुप्पी, जो सबसे ज़्यादा सुनाई देती है। भीड़ में रहने के बाद भी, इंसान अकेलापन महसूस करता है। क्यों? क्योंकि आज के युग में संबंध मन से नहीं, माध्यमों से बने हैं। 🌼 बाहरी जुड़ाव, भीतर का खालीपन हमारे पास हजारों “फ्रेंड्स” हैं, पर कोई एक भी ऐसा नहीं, जिसे हम दिल खोलकर सब कुछ कह सकें। हम हँसते हैं, बातें करते हैं, फोटो डालते हैं, पर भीतर एक शून्य बैठा रहता है। वो शून्य, जो हमें याद दिलाता है — कि “सच्चा जुड़ाव आत्मा से होता है, लोगों से नहीं।” 🔥 प्रतिस्पर्धा ने रिश्तों की ऊष्मा छीन ली पहले रिश्तों में अपनापन था, अब तुलना और स्वार्थ ने जगह ले ली है। हर कोई आगे बढ़ने की दौड़ में लगा है, पर किसी का हाथ पकड़ने का समय नहीं। सफलता की चमक के पीछे मनुष्य अपने “अस्तित्व की शांति” खो चुका है। 🌷 मन की बात — अब मौन हो चुकी है हम अपने दिल की सच्ची बातें अब शब्दो...

गोवर्धन पर्वत | कथा, पूजा, परिक्रमा और महत्व

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गोवर्धन पर्वत का धार्मिक महत्व, श्रीकृष्ण की दिव्य लीला, गोवर्धन पूजा और 21 किमी परिक्रमा की सम्पूर्ण जानकारी यहाँ पढ़ें। मथुरा स्थित इस पावन स्थल की यात्रा गाइड। 🌿 गोवर्धन पर्वत: श्रीकृष्ण की दिव्य लीला, पूजा, परिक्रमा और महत्व ✨ प्रस्तावना भारत की पावन भूमि पर अनेकों तीर्थ स्थल हैं, लेकिन गोवर्धन पर्वत का स्थान अनोखा और दिव्य है। मथुरा के समीप स्थित यह पर्वत न केवल एक धार्मिक धरोहर है, बल्कि श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला का जीवंत प्रतीक भी है। भक्तों का विश्वास है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण आज भी गोवर्धन पर्वत में निवास करते हैं। 📖 गोवर्धन पर्वत की कथा भागवत पुराण और श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित है कि जब इन्द्र देव ने गोकुलवासियों पर निरंतर वर्षा कर उनका जीवन संकट में डाल दिया, तब नन्हें बालक कृष्ण ने अपनी छोटी उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सम्पूर्ण वृज को सुरक्षा दी। सात दिन तक पर्वत धारण कर भगवान ने यह संदेश दिया कि प्रकृति और धरती माता की पूजा सर्वोच्च है। यही कारण है कि आज भी गोवर्धन को "श्रीकृष्ण का स्वरूप" मानकर पूजा जाता है। 🌸 गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव दी...

दुर्गा नवमी 2025 का महत्व, पूजा विधि और व्रत नियम जानें। मां सिद्धिदात्री की पूजा, कन्या पूजन और दान का विशेष महत्व। महानवमी से प्राप्त करें सुख-समृद्

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🌺 दुर्गा नवमी (महानवमी) – महत्व, पूजा विधि और व्रत ✨ दुर्गा नवमी क्या है? दुर्गा नवमी, शारदीय नवरात्रि का नवां दिन है। इस दिन मां दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इसी दिन महिषासुर का वध हुआ और देवी दुर्गा ने धर्म की पुनः स्थापना की। 🕉️ दुर्गा नवमी का महत्व इस दिन व्रत और पूजा करने से जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं। मां सिद्धिदात्री की कृपा से विद्या, बुद्धि और आध्यात्मिक शक्तियों की प्राप्ति होती है। इस दिन कन्या पूजन (कन्या भोज) का विशेष महत्व है। नवमी का व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है। 🌼 दुर्गा नवमी पूजा विधि प्रातःकाल स्नान कर घर को स्वच्छ करें और पूजास्थल को सजाएँ। देवी मां की मूर्ति या चित्र स्थापित कर गंगाजल से शुद्धिकरण करें। लाल फूल, चुनरी, नारियल, फल और मिठाई अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती या देवी के 108 नामों का पाठ करें। कन्या पूजन करें – 9 छोटी कन्याओं और 1 छोटे बालक (लंगूर) को आमंत्रित कर उन्हें भोजन कराएँ और उपहार दें। दीपक जलाकर आरती करें और प्रसाद बाँटें। 🌸 दुर्गा नवमी पर क्या करें? गरीबों और ...

श्री हनुमान चालीसा का संपूर्ण पाठ, महत्व और लाभ जानें। भय, रोग और संकट दूर करने तथा सुख-समृद्धि पाने के लिए हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करें।

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      श्री हनुमान चालीसा का संपूर्ण पाठ, महत्व और लाभ जानें। भय, रोग और संकट दूर करने तथा सुख-समृद्धि पाने के लिए हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करें। 🕉️ श्री हनुमान चालीसा – पाठ, अर्थ और लाभ ✨ परिचय हनुमान चालीसा एक अमर काव्य है जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने रचा। इसके पाठ से भय, रोग, संकट और नकारात्मकता दूर होती है। हनुमान जी को प्रसन्न करने का यह सबसे सरल और प्रभावी उपाय है। 🙏 श्री हनुमान चालीसा (पूरा पाठ)   🙏 श्री हनुमान चालीसा 🙏 दोहा श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि । बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ॥ बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार । बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार ॥ चालीसा जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥ राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥ महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥ कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुण्डल कुँचित केसा ॥ हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥ शंकर सुवन केसरी नन्दन । तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥ विद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर...

माँ दुर्गा के 108 नाम (संस्कृत + सरल अर्थ)

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      माँ दुर्गा के 108 नाम (संस्कृत + सरल अर्थ) १. दुर्गा – कठिनाइयों को दूर करने वाली २. देवी – सबकी आराध्या शक्ति ३. त्र्यंबका – तीन नेत्रों वाली ४. काली – समय और मृत्यु की अधिष्ठात्री ५. कात्यायनी – ऋषि कात्यायन की पुत्री ६. चामुंडा – चंड और मुंड का वध करने वाली ७. महिषासुरमर्दिनी – महिषासुर का वध करने वाली ८. चंडिका – क्रोधमूर्ति ९. भवानी – संसार की माता १०. भव्या – कल्याणमयी ११. जया – सदैव विजय देने वाली १२. आद्या – आदिशक्ति १३. विन्ध्यवासिनी – विंध्याचल में वास करने वाली १४. रुद्राणी – रुद्र की अर्धांगिनी १५. शिवा – मंगलमयी १६. शर्वाणी – भगवान शंकर की शक्ति १७. अम्बिका – सबकी माता १८. आनन्दमयी – आनंद देने वाली १९. भवप्रिया – भक्तों को प्रिय २०. भद्रकाली – कल्याण करने वाली काली २१. शूलधारिणी – त्रिशूल धारण करने वाली २२. खड्गधारिणी – खड्ग (तलवार) वाली २३. घण्टायुधध्वनि – घंटी की ध्वनि से दुष्टों को भयभीत करने वाली २४. शंखिनी – शंख धारण करने वाली २५. चक्रिणी – चक्र धारण करने वाली २६. धनुर्धारिणी – धनुष वाली २७. पिनाकधारिणी – पिनाक (शिवधनुष) ...

कृष्ण कृपा कटाक्ष स्तोत्रम् – हिंदी अर्थ सहित

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          कृष्ण कृपा कटाक्ष स्तोत्रम् – हिंदी अर्थ सहित " कृष्ण कृपा कटाक्ष " का अर्थ है – भगवान श्रीकृष्ण का अनुग्रहपूर्ण दृष्टि-पात (कृपापूर्ण नज़र डालना)। यह वाक्यांश भक्ति-साहित्य में बहुत मिलता है। इसका भाव है – जब भगवान कृष्ण अपनी कृपादृष्टि (कटाक्ष) भक्त पर डालते हैं, तो उसके जीवन के कष्ट मिट जाते हैं, मन में शांति आ जाती है और भक्ति का मार्ग सरल हो जाता है। कभी इसे प्रार्थना के रूप में भी प्रयोग किया जाता है – "हे नंदलाल! मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि डालो।" इसका अर्थ है – "हे कृष्ण! अपनी दयालु नज़र से मेरी ओर देखो और मेरे जीवन के अंधकार को दूर करो।" श्लोक १ वन्दे नन्द व्रजस्त्रीणां पादरेणुमभीक्ष्णशः। यासां हरिकथोद्गीतं पुणाति भुवनत्रयम्॥ अर्थ: मैं नन्दगाँव की गोपियों के चरणों की धूल को बार-बार प्रणाम करता/करती हूँ। जिनके मुख से निकली श्रीकृष्ण लीला की कथाएँ तीनों लोकों को पवित्र कर देती हैं। श्लोक २ कृष्ण कृपा कटाक्षेण भूरिभाग्यं प्रसिद्ध्यति। तत्प्रसादात्सदा साम्यं स्वपदं प्राप्यते नरः॥ अर्थ: श्रीकृष्ण की कृपा दृष्टि मात्र से ही जीव अत...

यह लोभ एक ऐसा कुआं है जिसमें आदमी एक बार गिरता है तो-------

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यह लोभ एक ऐसा कुआं है जिसमें आदमी एक बार गिरता है तो------  एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा कि ऐसा कौन सा कुआं है जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता?* *इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया। आखिर में राजा भोज ने राज पंडित से कहा कि इस प्रश्न का उत्तर सात दिनों के अंदर लेकर आओ, वरना आपको अभी तक जो इनाम धन आदि दिया गया है,वापस ले लिए जायेंगे तथा इस नगरी को छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा।* *छः दिन बीत चुके थे।राज पंडित को जबाव नहीं मिला था।निराश होकर वह जंगल की तरफ गया। वहां उसकी भेंट एक गड़रिए से हुई। गड़रिए ने पूछा आप तो राजपंडित हैं, राजा के दुलारे हो फिर चेहरे पर इतनी उदासी क्यों?* *यह गड़रिया मेरा क्या मार्गदर्शन करेगा?सोचकर पंडित ने कुछ नहीं कहा।इसपर गडरिए ने पुनः उदासी का कारण पूछते हुए कहा - पंडित जी हम भी सत्संगी हैं,हो सकता है आपके प्रश्न का जवाब मेरे पास हो, अतः नि:संकोच कहिए।राज पंडित ने प्रश्न बता दिया और कहा कि अगर कल तक प्रश्न का जवाब नहीं मिला तो राजा नगर से निकाल देगा।  गड़रिया बोला मेरे पास पारस है उससे खूब सोना बनाओ। एक भोज क्या लाखों भोज तेरे पीछे...

श्री कृष्ण के जीवन में आठ अंक का महत्व

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           श्री कृष्ण के जीवन में आठ अंक का महत्व कृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। कृष्ण के जीवन में वह सबकुछ है जिसकी मानव को आवश्यकता होती है। कृष्ण गुरु हैं, तो शिष्य भी। आदर्श पति हैं तो प्रेमी भी। आदर्श मित्र हैं, तो शत्रु भी। वे आदर्श पुत्र हैं, तो पिता भी। युद्ध में कुशल हैं तो बुद्ध भी। कृष्ण के जीवन में हर वह रंग है, जो धरती पर पाए जाते हैं इसीलिए तो उन्हें पूर्णावतार कहा गया है। मूढ़ हैं वे लोग, जो उन्हें छोड़कर अन्य को भजते हैं… ‘भज गोविन्दं मुढ़मते। आठ का अंक  कृष्ण के जीवन में आठ अंक का अजब संयोग है। उनका जन्म आठवें मनु के काल में अष्टमी के दिन वसुदेव के आठवें पुत्र के रूप में जन्म हुआ था। उनकी आठ सखियां, आठ पत्नियां, आठमित्र और आठ शत्रु थे। इस तरह उनके जीवन में आठ अंक का बहुत संयोग है। कृष्ण के नाम  नंदलाल, गोपाल, बांके बिहारी, कन्हैया, केशव, श्याम, रणछोड़दास, द्वारिकाधीश और वासुदेव। बाकी बाद में भक्तों ने रखे जैसे ‍मुरलीधर, माधव, गिरधारी, घनश्याम, माखनचोर, मुरारी, मनोहर, हरि, रासबिहारी आदि। कृष्ण के माता-पिता  कृष्ण की माता का न...

बांके बिहारी जी की सच्ची घटना🙏

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 बांके बिहारी जी की सच्ची घटना🙏 सन्त हरिदास जी ने जब पूरी इत्र की शीशी राधा जी को होली खेलने के लिए रेत में डाल दी। एक व्यक्ति लाहौर से कीमती रूहानी इत्र लेकर आये थे। क्योंकि उन्होंने सन्त श्री हरिदास जी महाराज और बांके बिहारी के बारे में सुना हुआ था। उनके मन में आये की मैं बिहारी जी को ये इत्र भेंट करूँ। इस इत्र की खासियत ये होती है की अगर बोतल को उल्टा कर देंगे तो भी इत्र धीरे धीरे गिरेगा और इसकी खुशबु लाजवाब होती है। ये व्यक्ति वृन्दावन पहुँचा। उस समय सन्त जी एक भाव में डूबे हुए थे। सन्त देखते है की राधा-कृष्ण दोनों होली खेल रहे हैं। जब उस व्यक्ति ने देखा की ये तो ध्यान में हैं तो उसने वह इत्र की शीशी उनके पास में रख दी और पास में बैठकर सन्त की समाधी खुलने का इंतजार करने लगा। तभी सन्त देखते हैं की राधा जी और कृष्ण जी एक दूसरे पर रंग डाल रहे हैं। पहले कृष्ण जी ने रंग से भरी पिचकारी राधा जी के ऊपर मारी। और राधा रानी सिर से लेकर पैर तक रंग में रंग गई। अब जब राधा जी रंग डालने लगी तो उनकी कमोरी (छोटा घड़ा) खाली थी। सन्त को लगा की राधा जी तो रंग डाल ही नहीं पा रही हैं, क्योंकि उनका रं...

नवरात्रि के नौ दिन और नौ देवी

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                  🌺 नवरात्रि के नौ दिन,महत्व,रूप,भोग और नौ देवी 1️⃣ प्रथम दिन – माँ शैलपुत्री रूप : पर्वतराज हिमालय की पुत्री। वाहन : वृषभ (बैल)। महत्व : जीवन में स्थिरता और शांति देती हैं। पूजा विधि : गंगाजल से शुद्धिकरण करें, फूल और धूप अर्पित करें। भोग : घी। 2️⃣ द्वितीय दिन – माँ ब्रह्मचारिणी रूप : तपस्विनी, हाथ में जपमाला और कमंडल। महत्व : तप, संयम और इच्छाशक्ति देती हैं। पूजा विधि : दीपक जलाएं, मां को पुष्प और रोली अर्पित करें। भोग : शक्कर और फल। 3️⃣ तृतीय दिन – माँ चंद्रघंटा रूप : मस्तक पर अर्धचंद्र, सिंह पर सवार। महत्व : साहस और शत्रु नाश। पूजा विधि : घंटे की ध्वनि से पूजा करें, शंख बजाएं। भोग : दूध और मिठाई। 4️⃣ चतुर्थ दिन – माँ कूष्मांडा रूप : आठ भुजाओं वाली, सूर्य की ऊर्जा से ब्रह्मांड रचने वाली। महत्व : स्वास्थ्य और ऊर्जा देती हैं। पूजा विधि : दीपक, धूप और फल अर्पित करें। भोग : मालपुआ। 5️⃣ पंचम दिन – माँ स्कंदमाता रूप : भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता। महत्व : संतान सुख और परिवार की उन्नति। पूजा विधि ...

नवरात्रि के बारे मे सम्पूर्ण जानकारी

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                    नवरात्रि के बारे मे सम्पूर्ण जानकारी  🌺 नवरात्रि क्या है? नवरात्रि का अर्थ है – नौ रातें । साल में चार नवरात्रियाँ आती हैं: चैत्र नवरात्रि (मार्च–अप्रैल) आषाढ़ नवरात्रि (जून–जुलाई) – गुप्त नवरात्रि आश्विन/शारदीय नवरात्रि (सितंबर–अक्टूबर) – सबसे प्रमुख माघ नवरात्रि (जनवरी–फरवरी) – गुप्त नवरात्रि इनमें से चैत्र और शारदीय नवरात्रि सबसे अधिक मनाई जाती हैं। 🌼 नवरात्रि का महत्व यह शक्ति की उपासना का पर्व है। मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। माना जाता है कि इन दिनों उपासना से मन, शरीर और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है। भक्त व्रत रखते हैं और देवी का आशीर्वाद पाते हैं। 🙏 नवरात्रि के नौ स्वरूप (प्रति दिन वार पूजा) प्रथम दिन – शैलपुत्री माता 🌸 द्वितीय दिन – ब्रह्मचारिणी माता तृतीय दिन – चंद्रघंटा माता चतुर्थ दिन – कूष्मांडा माता पंचम दिन – स्कंदमाता षष्ठम दिन – कात्यायनी माता सप्तम दिन – कालरात्रि माता अष्टम दिन – महागौरी माता नवम दिन – सिद्धिदात्री माता 🕉️ व्रत और पूजा विधि...

लघु गीता अध्याय 7

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                              लघु गीता अध्याय 7 सैकंडों में कोई एक बिरला ही होता है जो सही तरह से सिद्धि प्राप्त करता है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, मन व बुद्धि से सब प्राणी को ईश्वर उत्पन्न करता है और फिर प्रलय हो जाती है। जल में रस, चंद्रमा में शीतलता, सूर्य में प्रकाश, पृथ्वी में सुगंध, प्राणियों में जीवन व सनातन बीज , आकाश में शब्द, अग्नि में तेज, बुद्धिमानों में बुद्धि, सब ईश्वर के रूप हैं या ईश्वर का शरीर ही है और उसी में सब कलपुर्जे कार्यरत है। सात्विक, तामसिक, राजस ईश्वर से पैदा होते है परंतु ईश्वर उसमें नहीं रहता और इन तीनों गुणों से सारा संसार मोहित है परंतु जो ईश्वर को अनन्य भाव से भजते हैं व इस माया से परे उतर जाते है। चार प्रकार के लोग ईश्वर को याद करते हैं दुखिया, जिज्ञासु व ऐश्वर्या प्रिय व ज्ञानी परंतु एकाग्र चित्त से भजने वाला ही ईश्वर को सर्व प्रिय हैं।               कुछ अल्प बुद्धि उन फलों का चाहना करते हुए संबंधित देवताओं की पूजा करते हैं और ईश्वर उनको दृ...

श्राद्ध क्या है? पितृपक्ष श्राद्ध की सरल विधि

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                                श्राद्ध क्या है?             पितृपक्ष श्राद्ध की सरल विधि श्राद्ध (श्रद्ध + अ) का अर्थ है — श्रद्धा और आस्था के साथ किया गया कर्म। श्राद्ध एक धार्मिक कर्मकांड है जो मुख्य रूप से पितरों (पूर्वजों) की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए किया जाता है। यह विशेष रूप से पितृपक्ष (भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक के 16 दिन) में किया जाता है। श्राद्ध का उद्देश्य पितरों को स्मरण और तृप्त करना – अन्न, जल और तिल अर्पित करके। पितृ ऋण से मुक्ति – हमारे ऊपर तीन ऋण बताए गए हैं – देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। श्राद्ध से पितृ ऋण की पूर्ति होती है। परिवार की उन्नति और सुख-शांति – मान्यता है कि पितर प्रसन्न होने पर परिवार को आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध में क्या किया जाता है आचमन, संकल्प और पूजा। पितरों को जल (तर्पण), तिल और पिंड (चावल के लड्डू) अर्पण। ब्राह्मणों को भोजन व दान देना। गाय, कुत्ते और कौवे को भोजन कराना, क्योंकि इन्हें पितरों क...

लघु गीता अध्याय 6

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                            लघु गीता अध्याय 6  योग की प्राप्ति कर्म से ही हैं और जब मनुष्य विषय और वासनाओं से छूट जाता है तो योगी कहलाता है।मन को जीतना व मन के वश में होना –इस प्रकार मनुष्य अपना मित्र व शत्रु स्वयं ही है और मन जीतने वाले की आत्मा, शीत–उष्ण, दुख–सुख, मान –अपमान होने पर स्थिर रहती हैं और मिट्टी ,पत्थर, सोने को समान मानता है, मित्र और शत्रु, साधु और पापी के लिए समान दृष्टि रखता है। योगी को किसी एकांत व नर्म व साफ स्थान पर बैठकर निरंतर ध्यान योग लगाना चाहिए और मन व इंद्रियों को एकाग्र कर,गर्दन को सीधा कर,ब्रह्मचर्य को पालन करते हुए ही ध्यान लगाना चाहिए।जो लोग अधिक उपवास या अधिक खाना या अधिक सोना व जागना करते हैं उनको योग प्राप्त नहीं होता, और जो नियम अनुसार जागते, सोते, खाते–पीते व कर्मों का सही पालन करते है वहीं योगी है,तथा परमानंद और मोक्ष प्राप्त करते है। इसके बाद कोई और बड़ा लाभ और सुख नहीं है।         जैसा कि मन बहुत चंचल है और इसे वश में रखना बहुत कठिन है परंतु अभ्यास और उपा...

लघु गीता अध्याय 5

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                          लघु गीता अध्याय 5 ईश्वर में  मन को लगाते हुए – ज्ञान द्वारा–कर्म को करते हुए –उसमें लिप्त न होना ,किसी से द्वेष न होना,फल की इच्छा न करना ,मन तथा इंद्रियों को जीतने वाला , सब में अपनी जैसी आत्मा देखने वाला ही मोक्ष को सीधा प्राप्त होता है। और कर्मयोग को करते हुए,सुनते हुए,सूंघते हुए,स्पर्श करते हुए,खाते हुए,सांस लेते हुए भी अपने को निमित्त मात्र मानता है वह शीघ्र मोक्ष को प्राप्त होता है।जो प्रिय वस्तु को प्राप्त करने से प्रसन्न नहीं होते व अप्रिय वस्तु को पाकर दुखी नहीं होते वे ब्रह्म ज्ञानी है।जो ईश्वर में निष्ठा करके सदा चिंतन करते हैं और ज्ञान द्वारा जिनके सब पाप नाश हो गए है, काम व क्रोध काबू में है; इंद्रियों के भोगों से रहित है वे जीव मात्र के हितकारी है और भय से रहित है वहीं मोक्ष प्राप्त करते है। ।।श्री राधे।।

लघु गीता अध्याय 4

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                          लघु गीता अध्याय 4 भगवान कृष्ण ने कहा कि कई बार मैंने धर्म स्थापना हेतु और पापियों के नाश करने के लिए जन्म लिए, ताकि साधुओं की रक्षा हो सके।  जो मनुष्य जन्म-मरण के तत्व को समझ लेता है और मोह,भय, क्रोध को त्याग कर मेरी शरण मे आता है उसे मोक्ष मिल जाता है। इस संसार में मनुष्य जिस भावना से, जिस देवता की भक्ति करता है वह ईश्वर की ही भक्ति है और शीघ्र फल प्राप्त होता है। जो लोग द्रव्य यज्ञ, तप यज्ञ, स्वाध्याय यज्ञ, व ज्ञान यज्ञ व आहार कम करके रहते हैं वह सब  यज्ञवेत्ता है व इन सब यज्ञों से सब पाप नष्ट हो जाते हैं और जो यज्ञ नहीं करते उन्हें लोक व परलोक दोनों प्राप्त नहीं होते। ज्ञान यज्ञ सबसे उत्तम है। श्रद्धा रहित व मन में संदेह बना रहा ऐसे लोग नरक को ही जाते हैं। इसलिए ज्ञान से अपने संदेह को मिटाकर कर्म को करना ही  मोक्ष दिला सकता है।

आरती: सुखकर्ता दुखहर्ता (मराठी) हिन्दी में अर्थ के साथ

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आरती: सुखकर्ता दुखहर्ता (मराठी) हिन्दी में अर्थ के साथ सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची सर्वांगी सुंदर उटी शेंदूराची कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ॥१॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥धृ॥ https://www.parmatmaaurjivan.co.in/2026/03/blog-post_7.html रत्नखचित फरा तुझे मस्तक शोभे सुंदर दोन डोळा सुरवंटाचे लोभे वीसावा तुझा वंदन करितो लोळे संपत्तीचा भांडार तूचि रे ॥२॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥धृ॥ कर्णीकर्णिके मुकुट शोभतो भारी तारक हार वागे गरगर भारी पद्मासना वर बसलासवारी चरणी लोटांगण वंदितो आम्ही ॥३॥ जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती दर्शनमात्रे मनकामना पुरती ॥धृ॥ हिंदी अर्थ पहला पद: जो सुख देने वाले और दुख दूर करने वाले हैं, विघ्नों की सारी बातें मिटा देते हैं, जो प्रेम और कृपा से सबकी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं। जिनका संपूर्ण शरीर सुंदर है, जिन पर लाल चंदन (सिंदूर) का उटी लगी है, गले में मोतियों की माला शोभा देती है। ध्रुव पंक्ति: जय हो, जय हो, हे मंगलमूर्ति गणेशजी! आपके दर्शन मात्र से सभी मनोक...

गणेश चतुर्थी का इतिहास,धार्मिक महत्व

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गणेश चतुर्थी का इतिहास,धार्मिक महत्व 1. गणेश चतुर्थी का इतिहास प्राचीन मान्यता – गणेश चतुर्थी का उल्लेख मुद्गल पुराण और गणेश पुराण में मिलता है। लोकमान्य तिलक का योगदान – 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इस पर्व को सार्वजनिक रूप से मनाने की परंपरा शुरू की, ताकि लोगों में एकता और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति जागरूकता फैले। तब से यह केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी बन गया। 2. धार्मिक महत्व भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और सिद्धि-विनायक कहा जाता है। उन्हें बुद्धि, विवेक और सौभाग्य का देवता माना जाता है। गणेश चतुर्थी पर गणेशजी की मूर्ति स्थापित कर 10 दिनों तक पूजा की जाती है। अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा मोरया, पुढ़च्या वर्षी लवकर या (अगले साल जल्दी आना) कहते हुए विसर्जन किया जाता है। 3. उत्सव की विशेषताएं भव्य मूर्तियां – छोटी घर की मूर्तियों से लेकर 15–20 फीट ऊंची सार्वजनिक मूर्तियां। थीम पंडाल – पौराणिक कथाएं, सामाजिक संदेश, या ऐतिहासिक स्थल की झलक। सांस्कृतिक कार्यक्रम – भजन, आरती, नृत्य, रंगोली और कला प्रदर्शन। भोग – मोदक, लड्डू, प...

भाद्रपक्ष में मुंबई की गणेश चतुर्थी – भक्ति, भव्यता और उल्लास"

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भाद्रपक्ष में बॉम्बे की गणेश चतुर्थी – भक्ति और उल्लास का संगम 🌸 भूमिका गणेश चतुर्थी भारत का एक प्रमुख उत्सव है, लेकिन मुंबई (बॉम्बे) में इसकी भव्यता देखने लायक होती है। भाद्रपक्ष शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को यह पर्व मनाया जाता है और 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में पूरे शहर का वातावरण गणेशमय हो जाता है। 🌺 गणेश चतुर्थी का महत्व यह पर्व भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। गणपति को विघ्नहर्ता और शुभारंभ के देवता माना जाता है। महाराष्ट्र, विशेषकर मुंबई में, इसे सामाजिक एकता, कला और संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। 🎉 मुंबई में गणेश चतुर्थी की खासियत 1. लालबागचा राजा मुंबई का सबसे प्रसिद्ध गणपति पंडाल, जहाँ लाखों भक्त दर्शन के लिए आते हैं। 2. भव्य पंडाल सजावट हर गली-मोहल्ले में अद्भुत थीम पर आधारित पंडाल सजाए जाते हैं — जैसे मंदिर की आकृति, ऐतिहासिक किले, या सामाजिक संदेश देने वाले डिज़ाइन। 3. सांस्कृतिक कार्यक्रम भजन-कीर्तन, नृत्य, नाटक, और लोककला प्रदर्शन का आयोजन। 4. विसर्जन यात्रा अनंत चतुर्दशी के दिन विशाल शोभायात्रा के साथ गणेशजी को विदाई दी जाती है। ...

श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत,पूजा विधि,महत्व और विशेषताएं

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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2025 – भगवान के अवतरण का पावन पर्व 🌸 भूमिका जन्माष्टमी हिंदू धर्म का प्रमुख और पावन त्योहार है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और अर्धरात्रि का समय इस दिन का विशेष संयोग होता है। इस दिन मंदिरों और घरों में झूला सजाकर, भजन-कीर्तन गाकर और व्रत-पूजा करके वातावरण को कृष्णमय बनाया जाता है। 🌺 जन्माष्टमी का महत्व भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में मथुरा की कारागार में हुआ। उन्होंने अत्याचारी कंस का अंत कर धर्म और न्याय की स्थापना की। गीता के उपदेश से उन्होंने मानवता को सत्य, धर्म और कर्म का संदेश दिया। जन्माष्टमी हमें प्रेम, करुणा, निडरता और धर्मनिष्ठा की प्रेरणा देती है। 🪔 व्रत और पूजा विधि व्रत का पालन – भक्त निर्जल या फलाहार उपवास रखते हैं। मध्यरात्रि पूजन – रात 12 बजे, श्रीकृष्ण जन्म समय, विशेष पूजा की जाती है। झांकी और झूला – कृष्ण-लीला की झांकियां बनाई जाती हैं और भगवान का झूला सजाया जाता है। भोग अर्पण – माखन-मिश्री, पंजीरी और मिश्री का भोग लगाया जाता है। ...