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(संत वचनामृत) प्रभु की खुशी में ही हमारी खुशी है

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               प्रभु की खुशी में ही हमारी खुशी होनी चाहिए। सिद्धांत यह है कि प्रभु के दिए हुए धन में, परिवार में, शरीर में, हमको संतुष्ट रहना चाहिए। जो प्रभु ने दिया है, उसमें संतुष्ट ना होकर जब हम अपने मन में असंतोष व्यक्त करते हैं, तो प्रभु का अपमान होता है। हमको कृतज्ञ होना चाहिए। भगवान ने कृपा करके जो कुछ दिया है वह ठीक है। प्रभु को धन्यवाद है इतना सब कुछ दिया है। यदि हम को और अधिक आवश्यक होगी, तो प्रभु हमको और देंगे। ईश्वर की इच्छा में अपनी इच्छा को, प्रभु की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता को मिला देना चाहिए जो कुछ सहज प्राप्त है उसमें ही संतुष्ट रहना चाहिए। प्रभु के द्वारा दिए गए धन जन में संतुष्ट ना हो कर, हम तरह-तरह की कामना करते हैं उसके लिए देवी-देवताओं से विनय करते हैं, कामना की पूर्ण न होने पर अविश्वास हो जाता है। इसलिए यदि कामना हो तो अपने इष्ट देव के सामने निवेदन करना चाहिए। यदि कामना की पूर्ति में आप प्रसन्न रहे हो तब आप पूर्ण कर दीजिए। यह भाव रखना चाहिए। आप प्रसन्न न रहें, मेरा कल्याण भी ना हो, तो ऐसी कामना का अपूर्ण होना ही अच्छा है...

श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं

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      श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या पंद्रह दिन पितृपक्ष (पितृ = पिता) के नाम से विख्यात है। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों (पूर्वजों) को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं। श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌ (जो श्रद्धा से किया जाये, वह श्राद्ध है।) भावार्थ यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वही श्राद्ध है। हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं। आश्...

प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ सुंदर मंत्र –संग्रह––

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        प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ सुंदर मंत्र जो आपके जीवन में अद्भुत परिवर्तन ले आएगा।  प्रात: कर-दर्शनम् कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती। करमूले तू गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥ पृथ्वी क्षमा प्रार्थना समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडिते। विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥ त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ स्नान मन्त्र गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥ सूर्यनमस्कार ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्युषश्च आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने। दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम् सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥ ॐ मित्राय नम: ॐ रवये नम: ॐ सूर्याय नम: ॐ भानवे नम: ॐ खगाय नम: ॐ पूष्णे नम: ॐ हिरण्यगर्भाय नम: ॐ मरीचये नम: ॐ आदित्याय नम: ॐ सवित्रे नम: ॐ अर्काय नम: ॐ भास्कराय नम: ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम: आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥ संध्या द...

सच्चा मित्र हमारे कर्म हैं।

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                               सच्चा मित्र कौन है ?  एक व्यक्ति था उसके तीन मित्र थे।_  एक मित्र ऐसा था जो सदैव साथ देता था। एक पल, एक क्षण भी बिछुड़ता नहीं था।_  दूसरा मित्र ऐसा था जो सुबह शाम मिलता।_  और तीसरा मित्र ऐसा था जो बहुत दिनों में जब तब मिलता।_ एक दिन कुछ ऐसा हुआ की उस व्यक्ति को अदालत में जाना था और किसी कार्यवश साथ में किसी को गवाह बनाकर साथ ले जाना था।_  अब वह व्यक्ति अपने सब से पहले अपने उस मित्र के पास गया जो सदैव उसका साथ देता था और बोला :- "मित्र क्या तुम मेरे साथ अदालत में गवाह बनकर चल सकते हो ?_  वह मित्र बोला :- माफ़ करो दोस्त, मुझे तो आज फुर्सत ही नहीं।_  उस व्यक्ति ने सोचा कि यह मित्र मेरा हमेशा साथ देता था। आज मुसीबत के समय पर इसने मुझे इंकार कर दिया।_  अब दूसरे मित्र की मुझे क्या आशा है।_  फिर भी हिम्मत रखकर दूसरे मित्र के पास गया जो सुबह शाम मिलता था, और अपनी समस्या सुनाई।_  दूसरे मित्र ने कहा कि :- मेरी एक शर्त है कि मैं सिर्फ अदाल...

श्री गणेश स्तुति(विनय पत्रिका)

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                             श्री गणेश स्तुति  तुलसीदास जी द्वारा रचित पुस्तक विनय पत्रिका में तुलसीदास जी ने श्रीराम जी से विनय  शुुरू करने से पहले  सभी देवी देवताओंं की स्तुति की है - जिस में सबसे पहले गणेश जी की वंदना की है-  गाइए गणपति जगवंदन। शंकर - सुवन भवानी नंदन॥१॥  सिद्धि- सदन गजबदन विनायक। कृपा सिंधु सुंदर सब लायक॥२॥  मोदक प्रिय, मुद- मंगलदाता ।विद्या-वारिधि ,बुद्धि- विधाता ॥३॥ मांगत तुलसीदास कर जोरे। बसहि रामसिय मानस मोरे॥४॥ भावार्थ - संपूर्ण जगत के वंदनीय, गणों के स्वामी श्री गणेश जी का गुणगान कीजिए, जो शिव पार्वती के पुत्र और उन को प्रसन्न करने वाले हैं ॥१॥जो सिद्धियों के स्थान हैं, जिनका हाथी का सा मुख है, जो समस्त विघ्नों के नायक हैं , यानी विघ्नों को हटाने वाले हैं, कृपा के समुंद्र हैं, सुंदर हैं, सब प्रकार से योग्य हैं॥२॥ जिन्हें लड्डू बहुत प्रिय हैं ,जो आनंद और कल्याण देने वाले हैं, विद्या के अथाह सागर हैं, बुद्धि के विधाता है॥३॥ऐसे श्री गणेश जी से यह त...

क्रोध करने के नुकसान और परिणाम

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                      क्रोध  करने के नुकसान और परिणाम        जो व्यक्ति बदले की भावना रखता है दरअसल वो अपने ही घाव हरे रखता है। एक इंसान गुस्से में अपना मुंह खोल लेता है और आंखें बंद कर लेता है जिससे उसे कुछ दिखाई नहीं देता है और वो काले अंधेरे में कुछ भी कर बैठता है , लेकिन ध्यान रहें ये अंधेरा आपके साथ भी कुछ भी कर सकता हैं।     गुस्सा एक तरह का पागलपन है जो बेवकूफों के दिल में ही बसता है ये एक ऐसी हवा है जो बुद्धि के दिया को बुझा देती है। कोई भी गुस्सा हो सकता है ये करना आसान है। लेकिन सही इंसान पर सही सीमा में सही समय पर और सही वजह से और सही तरीके के साथ क्रोधित होना आसान नहीं हैं।      गुस्से के कारण की तुलना में उसके परिणाम ज्यादा जोखिम भरे होते है। क्रोध को पाले रखना किसी और पर फेकने की नियत से पकड़े रहने के जैसा है इससे आपका ही हाथ जलता हैं।     गुस्से पर अगर काबू (control) न किया जाए तो वो जिस चोट के कारण आया हो उससे कही ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। जैसे माचिश की त...

सत्संग बड़ा है या तप

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                      ------ सत्संग बड़ा है या तप ------ एक बार विश्वामित्र जी और वशिष्ठ जी में इस बात‌ पर बहस हो गई, कि सत्संग बड़ा है या तप? विश्वामित्र जी ने कठोर तपस्या करके ऋध्दी-सिध्दियों को प्राप्त किया था, इसीलिए वे तप को बड़ा बता रहे थे।जबकि वशिष्ठ जी सत्संग को बड़ा बताते थे। वे इस बात का फैसला करवाने ब्रह्मा जी के पास चले गए। उनकी बात सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा- मैं सृष्टि की रचना करने में व्यस्त हूं। आप विष्णु जी के पास जाइये। विष्णु जी आपका फैसला अवश्य कर देगें।अब दोनों विष्णु जी के पास चले गए। विष्णु जी ने सोचा- यदि मैं सत्संग को बड़ा बताता हूं तो विश्वामित्र जी नाराज होंगे, और यदि तप को बड़ा बताता हूं तो वशिष्ठ जी के साथ अन्याय होगा। इसीलिए उन्होंने भी यह कहकर उन्हें टाल दिया,कि मैं सृष्टि का पालन करने मैं व्यस्त हूं। आप शंकर जी के पास चले जाइये।अब दोनों शंकर जी के पास पहुंचे। शंकर जी ने उनसे कहा- ये मेरे वश की बात नहीं है।इसका फैसला तो शेषनाग जी कर सकते हैं। अब दोनों शेषनाग जी के पास गए। शेषनाग जी ने उनसे पूछा- कहो ऋषियों...

रामायण" जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं ।

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    रामायण" जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं । अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना....... रामायण का एक छोटा सा वृतांत है, उसी से शायद कुछ समझा सकूँ...  एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते समय अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी।  नींद खुल गई, पूछा कौन हैं ? मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं । माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया | श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ?  क्या नींद नहीं आ रही ?शत्रुघ्न कहाँ है ? श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी,  गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए । उफ !  कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया । तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए ।  आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी,  माँ चली । आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ? अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी...

14 वर्ष वनवास में भगवान राम कहाँ कहाँ रुके

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      14 वर्ष वनवास में भगवान राम कहाँ कहाँ रुके  चौदह वर्ष के वनवास में श्रीराम प्रमुख रूप से '17' जगह रुके, यात्रा विवरण . . .  पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी ॥ प्रभु श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह के भारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया। संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया। रामायण में उल्लेखित और अनेक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार जब भगवान राम को वनवास हुआ तब उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से प्रारंभ करते हुए रामेश्वरम और उसके बाद श्रीलंका में समाप्त की। इस दौरान उनके साथ जहां भी जो घटा उनमें से 200 से अधिक घटना स्थलों की पहचान की गई है। जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंध...

प्रणाम का महत्व

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                                    प्रणाम का महत्व        महाभारत का युद्ध चल रहा था -      एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर "भीष्म पितामह" घोषणा कर देते हैं कि - "मैं कल पांडवों का वध कर दूँगा"         उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई -     भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए|         तब -श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा अभी मेरे साथ चलो -    श्रीकृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुँच गए -   शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि - अन्दर जाकर पितामह को प्रणाम करो -       द्रौपदी ने अन्दर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने– "अखंड सौभाग्यवती भव" का आशीर्वाद दे दिया , फिर उन्होंने द्रोपदी से पूछा कि !!    "वत्स, तुम इतनी रात में अकेली यहाँ कैसे आई हो...

जब रुक्मिणी जी और राधिका मिली?

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 कभी सूरदास ने एक स्वप्न देखा था कि रुक्मिणी जी और राधिका मिली हैं और एक दूजे पर न्योछावर हुई जा रही हैं।       सोचता हूँ, कैसा होगा वह क्षण जब दोनों ठकुरानियाँ मिली होंगी। दोनों ने प्रेम किया था। एक ने बालक कन्हैया से, दूसरे ने राजनीतिज्ञ कृष्ण से। एक को अपनी मनमोहक बातों के जाल में फँसा लेने वाला कन्हैया मिला था, और दूसरे को मिले थे सुदर्शन चक्र धारी, महायोद्धा कृष्ण। जब दरबान ने ब्रह्मा जी से पूछा आप कौन से ब्रह्मा है? कृष्ण राधिका के बाल सखा थे, पर राधिका का दुर्भाग्य था कि उन्होंने कृष्ण को तात्कालिक विश्व की महाशक्ति बनते नहीं देखा। राधिका को न महाभारत के कुचक्र जाल को सुलझाते चतुर कृष्ण मिले, न पौंड्रक-शिशुपाल का वध करते बाहुबली कृष्ण मिले। रुक्मिणी कृष्ण की पत्नी थीं, पटरानी थीं, महारानी थीं, पर उन्होंने कृष्ण की वह लीला नहीं देखी जिसके लिए विश्व कृष्ण को स्मरण रखता है। उन्होंने न माखन चोर को देखा, न गौ-चरवाहे को। उनके हिस्से में न बाँसुरी आयी, न माखन। कितनी अद्भुत लीला है। राधिका के लिए कृष्ण कन्हैया था, रुक्मिणी के लिए कन्हैया कृष्ण थे। पत्नी होने के बाद भी...

राम कथा का सार...जिस घर में भाई भाई मिलकर रहते हैं––

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 राम कथा का सार...जिस घर में भाई भाई मिलकर रहते हैं–– भाई-भाई "विपत्ति" बांटने के लिए होते है ... न कि "सम्पति" का बंटवारा करने के लिए ... राम, लखन, भरत, शत्रुघ्न भाईयो का बचपन का एक प्रसंग है ... जब ये लोग गेंद खेलते थे । तो लक्ष्मण, राम की साइड उनके पीछे होता था , और सामने वाले पाले में भरत, शत्रुघ्न होते थे । तब लक्ष्मण हमेशा भरत को बोलते राम भैया सबसे ज्यादा मुझे प्यार करते है, तभी वो हर बार अपने पाले में अपने साथ मुझे रखते है। लेकिन भरत कहते नहीं राम भैया सबसे ज्यादा मुझे प्यार करते है तभी वो मुझे सामने वाले पाले में रखते है, ताकि हर पल उनकी नजरें मेरे ऊपर रहे, वो मुझे हर पल देख पाए , क्योंकि साथ वाले को देखने के लिए तो उनको मुड़ना पड़ेगा । फिर जब भरत गेंद को राम की तरफ उछालते तो राम जानबूझ कर गेंद को छोड़ देते और हार जाते , फिर पूरे नगर में उपहार और मिठाईयां बांटते खुशी मनाते । सब पूछते राम जी आप तो हार गए फिर आप इतने खुश क्यों है, राम बोलते मेरा भरत जीत गया । फिर लोग सोचते जब हारने वाला इतना कुछ बांट रहा है तो जितने वाला भाई तो पता नहीं क्या -क्या देगा .....लोग ...