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कर्म कितने प्रकार के होते हैं?

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                       कर्म की खोज(कर्म क्या है ) मनुष्य का मन एक पल के लिए भी शांत नहीं रहता। मन की दौड़ बहुत लंबी होती है ।मन की दौड़ का क्षेत्र सीमित है ।वह हर क्षण कार्यरत रहता है। मन पर नियंत्रण करना बहुत कठिन कार्य है। यही कार्य कर्म कहलाते हैं।  ऋषि मुनियों ने कर्म के तीन भेद बताए हैं- १-क्रियमाण कर्म- मैं कर्म करता हूं! इस प्रकार की बुद्धि रखकर मनुष्य जो कर्म करता है ,उसे क्रियमान कर्म कहते हैं। जीवन काल में जो जो कर्म होते हैं। वह सब क्रियमाण कर्म कहलाते हैं।  कर्म का स्वरूप ~मनुष्य कर्म करने में पूर्ण रुप से स्वतंत्र है। मन में जो अशुभ संस्कार होते हैं,वे  अशुभ कर्म करने के लिए मन ललचाते  हैं ।बुद्धि उसका मार्गदर्शन करती है, जिसका निश्चिय दृढ़ होता है। वह प्रलोभन से आकर्षित नहीं होता। शुभ कर्मों से स्वर्ग मिलता है और अशुभ कर्मों से नरक में जाना पड़ता है। क्या करना और क्या नहीं करना है, इसका निर्णय लेने में मनुष्य स्वतंत्र है। २ - संचित कर्म- क्रियमाण कर्म तो हर समय होते रहते हैं। उनमें ...

तुलसी कंठी या जो भी माला पसंद है वह जरूर श्रद्धा के साथ धारण करनी चाहिए

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तुलसी कंठी या जो भी माला पसंद है वह जरूर श्रद्धा के साथ धारण करनी चाहिए गले में माला पहनने का जहां आध्यात्मिक महत्व है, वहीं ये धारक के मन, मस्तिष्क, चर्म, अस्थि, रक्त प्रवाह, वात संस्थान और संवेगों को भी प्रभावित करती हैं। रुद्राक्ष की माला इस दृष्टि से सर्वगुण संपन्न मानी गई है। लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश, राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, दत्त तथा नवग्रह आदि की साधना में रुद्राक्ष की माला का उपयोग मनोवांछित फल देने वाला है। माला चाहे जैसी भी हो, उसका शुद्ध पूर्ण और वास्तविक होना आवश्यक है। टूटी-फूटी, आधी-अधूरी, अशुद्ध माला प्रभावकारी नहीं होती। जप के प्रभाव को कम या ज्यादा करने में माला एक प्रमुख उपदान है, इसलिए किसी विद्वान के निर्देश पर ही इसका प्रयोग करना चााहिए। माला को गंगाजल अथवा कच्चे दूध से स्नान करवाने के बाद ही उपयोग में लाना चाहिए। शुद्धता किसी भी माला के प्रभावकारी होने की पहली शर्त है।  हाथी दांत के मनकों से बनी हुई माला से जप करने पर गणेश जी प्रसन्न होते हैं, हालांकि यह माला काफी महंगी और दुर्लभ होती है। कमलगट्टे की माला का प्रयोग शत्रु के नाश और धन प्राप्ति के लिए क...

सुख दुख दोनों ही किस को भोगने पड़ते हैं?

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           सुख दुख दोनों ही किस को भोगने पड़ते हैं संसार में मनुष्य को सुख और दुख दोनों ही भोगने पड़ते हैं। परंतु सुख में प्रसन्नता दुख में क्षोभ,  सामान्य लोगों को होता है। धैर्यवान ,सुख दुख दोनों में समान रहते हैं ।यही ईश्वरीय कृपा का अनुभव होना है। अपने कर्तव्य का पालन करने वाला निर्धन मनुष्य श्रेष्ठ है और अपने कर्तव्य का त्याग करना ,अन्याय से धनवान होकर सुखी होना अच्छा नहीं है । इसीलिए शरणागत हो जाओ, शरण सफलता की कुंजी है ,निर्बल का बल है ,साधक का जीवन है, भक्तों का महामंत्र है ,आस्तिक का अचूक अस्त्र है ,दुखी की दवा है, इसलिए जो परमात्मा का सहारा ले लेता है। उसके सुख और दुख एक समान हो जाते हैं ।वे दोनों ही परिस्थिति में कृपा का अनुभव करता है ।दुख हो या सुख दोनों में ही वह अनुभव करता है कि ईश्वर उसे उसके कर्म के हिसाब से  प्रदान कर रहे हैं, इसलिए वह दोनों को सहज ही स्वीकार करता है। इसलिए सुख और दुख केवल वही भोगता है जिसने परमात्मा की शरण नहीं ली है। (भक्तमाली जी महाराज वृंदावन)

गीता माधुर्य, तीसरा अध्याय( श्रीमद् भागवत गीता का सरल भावार्थ

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 गीता माधुर्य,( तीसरा अध्याय) श्रीमद्भागवत का सरल भावार्थ अर्जुन बोले- श्री जनार्दन !आपके अनुसार जब ज्ञान, बुद्धि श्रेष्ठ है, तो फिर है केशव! आप मुझे हर करम में क्यों लगाते हैं तथा आप कभी कहते हैं, कर्म करो और कभी कहते ज्ञान का आश्रय लो, आपकी इन मिले हुए वचनों से मेरी बुद्धि मोहित सी हो रही है ।इसलिए एक निश्चित बात कहिये, जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊं ।।१-२ भगवान बोले -हे निष्पाप अर्जुन! इस मनुष्य लोक में दो प्रकार से होने वाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कहीं गई है, उनमें सांख्य  योगियों की निष्ठा ,ज्ञान योग से, और योगियों की निष्ठा कर्म योग  से होती है ।तथा ज्ञान योग और कर्म योग से एक ही सम बुद्धि की प्राप्ति होती है । उस  समता की प्राप्ति के लिए क्या कर्म करना जरूरी है?  हां जरूरी है; क्योंकि मनुष्य ना तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता को प्राप्त होता है और ना कर्मों के त्याग से सिद्धि को ही प्राप्त होता है। तात्पर्य है कि वह समता की प्राप्ति कर्मों का आरंभ किए बिना भी नहीं होती और कर्मों के त्याग से भी नहीं होती । कर्मों के त्याग से क्यो...

गीता माधुर्य अध्याय 2 का शेष( श्रीमद्भागवत गीता का सरल भावार्थ)

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                   गीता माधुर्य अध्याय 2 का शेष - वह स्थिर मन बोलता कैसे हैं ? उसको बोलना साधारण क्रिया रूप से नहीं होता है बल्कि भाव रूप से होता है ।वर्तमान में व्यवहार करते हुए दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होगा और सुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में स्पर्ह  नहीं होती तथा जो राग ,द्वेष, क्रोध से रहित हो गया है। वह मनुष्य  स्थितप्रज्ञ कहलाता है ।सब जगह आसक्ति रहित हुआ ,जो मनुष्य प्रारब्धः  के अनुसार अनुकूल परिस्थिति आने पर हर्षित नहीं होता और प्रतिकूल परिस्थिति के द्वेश नहीं करता ,उसकी बुद्धि स्थिर हो गई है अथार्थ पहले उसने मुझे परमात्मा की प्राप्ति ही करनी है ।ऐसा जो निश्चय किया था वह अब सिद्ध हो गया है ।वह स्थितप्रज्ञ अवस्था कैसे हो ? जैसे कछुआ अपने चारों पैर ,गर्दन और पूछं इन 6 अंगों को समेट  कर बैठता है ।ऐसा ही जिस समय गया कर्म योगी संपूर्ण इंद्रियों और मन को अपने अपने विषयों से समेट कर हटा लेता है, समेट लेता है। उस समय उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।  इंद्रियों को समेटने की वास...

मनुष्य जीवन के कुछ दोष

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                         मनुष्य जीवन के कुछ दोष ( नित्यलीलालीन  श्रद्धेय भाई जी श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी) कुसंगति, कुकर्म ,बुरे वातावरण, खानपान के दोष ,आदि अनेक कारणों से मनुष्य में कई प्रकार के दोष आ जाते हैं ।जो देखने में छोटे मालूम होते हैं, बल्कि आदत पड़ जाने से मनुष्य उन्हें दोषी नहीं मानता, पर वह ऐसे होते हैं, जो जीवन को अशांत, दुखी बनाने के साथ ही उन्नति के मार्ग को भी रोक देते हैं ,और उसे अधः पतन की ओर ले जाते हैं। ऐसे दोषोें में से कुछ पर यहां विचार किया जा रहा है- १-  मुझे तो बस अपने को देखना  है - इस विचार वाले मनुष्य का स्वार्थ छोटी सी सीमा में आकर गंदा हो जाता है, किस काम में मुझे लाभ है ,मुझे सुविधा है, मेरी संपत्ति कैसे ब़ढे, मेरा नाम सबसे ऊंचा कैसे हो, सब लोग मुझे ही नेता मान कर मेरा अनुसरण करें ,इसी प्रकार के विचारों और कार्यों में वह लगा रहता है ।मैंरे किस कार्य से किस की क्या हानि होगी ,किस को क्या असुविधा होगी ,किस का कितना मान भंग होगा ,किसके हृदय पर कितनी ठेस पहुंचेगी...

एक मुखी रुद्राक्ष की महिमा और उसके पहनने से लाभ

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                             एक मुखी रुद्राक्ष श्री महादेव जी ,नारद जी से कहते हैं हे मुनिश्रेष्ठ जिस मनुष्य के घर में एक मुखी रुद्राक्ष रहता है ,उसके घर में भलीभांति स्थिर होकर लक्ष्मी जी निवास करती हैं । जो मनुष्य कंठ में अथवा भुजा में एक मुखी रुद्राक्ष को धारण करता है ,उसके दुर्भाग्य का उदय नहीं होता और ना तो उसकी अकाल मृत्यु होती है। अत्यंत कठिनता से प्राप्त होने वाले भगवान शिव उस पर प्रसन्न हो जाते हैं।  मनुष्य जो भी श्रेष्ठ धर्म तथा कर्म करता है ,वह महान फलदायक होता है ।(महा भागवत पुराण) रुद्राक्ष का वृक्ष एक सदाबहार वनस्पति है, जिसकी ऊंचाई 50 से 60 फीट तक होती है। रुद्राक्ष के वृक्ष के पत्ते लंबे होते हैं। यह एक कठोर तने वाला वृक्ष होता है। रुद्राक्ष के वृक्ष का फूल सफेद रंग का होता है और इसमें लगने वाला फल शुरू में हरा, पकने पर नीला एवं सूखने पर काला हो जाता है। रुद्राक्ष इसी काले फल की गुठली होता है। इसमें दरार के सदृश दिखने वाली धारियां होती हैं, जिन्हें प्रचलित भाषा में 'रुद्राक्ष का मुख' कह...

हमारा कर्त्वय

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                                   कर्तव्य  अपने कर्तव्य का सावधानी से पालन करना चाहिए। अच्छे विचार रखने चाहिए। मन ,वाणी ,शरीर  को सत्संग में लगाना चाहिए। बुरे विचार ,कुसंग से हमेशा बचना चाहिए ।हम सभी के अंदर सत्य, सच बोलना ,दया, दूसरों को क्षमा करना,आदि का पालन करने से मन ,बुद्धि और शरीर का विकास होता है ।हमेशा बड़ों को प्रणाम और उनकी सेवा से आयु, विद्या ,यश की प्राप्ति होती है। मन में शुद्ध विचारों को रखकर जीवन का प्रथम भाग विद्या के अध्यन मे  बिताना चाहिए। विद्या के पढ़ने के साथ विवेक को उत्पन्न करना चाहिए। क्या उचित है, या अनुचित है ।इसे बुद्धि के द्वारा निर्णय करके ही करम करना चाहिए ।बिना विचारे ,जल्दबाजी में किसी भी काम को करने से बाद  ,में पछताना पड़ता है। इसलिए बिना विचारे कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। बड़ों से शिक्षा अध्ययन करना चाहिए ,छोटों को शिक्षा देना चाहिए ।अध्ययन करते समय भी अध्यापन करना चाहिए। ईश्वर ने आपको जिस रूप में भी इस धरती पर भेजा है। चाहे वह महिला ...

भगवान् का भक्त कोन है?

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                       भगवान् का भक्त कौन है? भगवान् की भक्ति का आरम्भ अपरे घर से ही होता है। घर के बड़े बूढ़े, माता-पिता में श्रद्धा रखना, उनकी सेवा करना, घर के ,परिवार के लोगों से जो निष्काम प्रेम करेगा ।वह भगवान की भक्ति कर सकेगा। संबंधित लोगों से ईर्ष्या, द्वेष रखने वाले भगवान के भक्त नहीं हो सकते। अतः सृष्टि को भगवान की मान करके ,उसे प्रेम करना चाहिए। माया से भरी  हुई   तामसी सृष्टि से दूर रहना चाहिए। जो प्रसन्न रहता है और दूसरों को प्रसन्न करता है। वही भगवान का भक्त है  जिसके व्यवहार से लोगों के मन में अशांति और दुख हो वह भगवान का भक्त नहीं हो सकता। जिससे सभी सुखी रहते हैं वह भगवान का सच्चा भक्त  है। जिससे लोग दुखी रहते हैं, वह  भगवान का भक्त नहीं हो सकता। दादा गुरु भक्तमाली जी महाराज( वृंदावन )के श्रीमुख से 

भजन करने से ही राम जी की कृपा प्राप्त होती है।

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                        भजन करने से ही प्रभु कृपा प्राप्त होती है। मन कर्म वचन छाँडि चतुराई। भजन कृपा करिहै रघुराई।। मन ,वाणी और कर्म से कपट का त्याग करके जो भजन करते हैं ,उन पर अवश्य ही श्री राम जी की कृपा होती है। अलौकिक कामनाएं ,जिनका प्रभु भजन से कोई संबंध नहीं है  केवल संसारी लोगों से ही संबंध है। ऐसी कामनाओं से भजन करना, कपट पूर्ण भजन है। निष्काम भाव से  जिनसे भजन में सहायता मिलती है। जिनसे परोपकार होता है। ऐसी कामनाएं रखकर भजन करना  चतुराई को छोड़कर भजन करना है। खाने ,पीने ,रहने की सुविधा,लौकिक प्रतिष्ठा की प्राप्ति , ईश्वर की कृपा का उत्तम फल नहीं है। बुद्धि की पवित्रता, नाम- रूप लीला -धाम का आश्रय, सत्संग में, भक्त भावनाओं में, प्रेम की प्राप्ति भगवान की कृपा को उत्तम फल है। शरीर, परिवार, संपत्ति जो कुछ भी प्रभु ने दिया है, उसमें संतुष्ट रहना, नौकरी खेती ,व्यापार आदि को ईश्वर की प्रसन्नता के लिए करना ।भगवान का भजन है। भगवान का भजन करने में आलस्य का त्याग करना चाहिए ,भगवान की कृपा सब पर रहे  प...

हमें क्रोध क्यों नहीं करना चाहिए?

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                हमें क्रोध क्यों नहीं करना चाहिए? प्रभु कृपा से बुद्धि शुद्ध और सात्विक रहे ।परस्पर प्रेम बनाए रखें। किसी से कोई भूल हो तो उसे क्षमा करें , उसे समझा दे, क्रोध ना करें, जिसके ऊपर क्रोध किया जाता है ,उसकी हानि नहीं होती है ।जो क्रोध करता है ,उसी का रक्त जलता है ।क्रोध करने से बुद्धि का नाश होता है। विकास की गति मंद हो जाती है ।क्रोध से हिंसा के और बदला लेने के भावों का उदय होता है। उसे बार-बार जन्म मरण होता है ।जन्म लेना है ,सत्संग भजन के लिए। बदला चुकाने के लिए नहीं, इसलिए क्रोध से बचना चाहिए ।कभी क्रोध आ जाए ,तो मौन हो जाना चाहिए और जब आप शांत हो जाएं  तो विचार जरूर करना चाहिए। जय श्री राधे( दादा गुरु भक्तमाली जी के श्रीमुख से)

हमें कष्ट क्यों होता है?

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                         हमें कष्ट क्यों होता है?  जब हम हर समय ईश्वर के ध्यान में उनकी लीलाओं में और मंत्र जाप में अपने आप को व्यस्त रखते हैं, तो हम महसूस करते हैं कि दुख हो कर भी हम दुखी नहीं होते, क्योंकि प्रभु स्मरण ही हमें कष्ट का अनुभव नहीं होने देता। जब हम अपने ईश्वर को भूलकर संसार में व्यस्त हो जाते हैं, तो हमें छोटे से छोटे कष्ट का भी अनुभव होने लगता है। दयामय प्रभु की कृपा सभी पर सदा बरसती रहती है। अन्यथा जीव सुख की सांस नहीं ले सकता है। तीर्थ मे सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं। प्रभु एक ना एक कष्ट ,चिंता इसलिए देते हैं कि प्राणी हमारा स्मरण करें,हमें याद करें ।भक्तों का जीवन चरित्र प्रेरणादायक रहता है। हर भक्त ने भगवान का चिंतन और विश्वास करके भगवान को पाया है ,और सद्बुद्धि प्राप्त की है ।सद्बुद्धि बनी रहे ,इस बात की ही  तो आवश्यकता है। इससे प्राणियों के प्रति प्रेम बना रहता है ।अपनी वर्णाश्रम के कर्तव्य को यदि सच्चाई के साथ पालन किया जाए  ,तो इसी से प्रभु संतुष्ट हो जाते हैं। मन की प्रसन...

गीता माधुर्य अध्याय २का शेष(श्री मद्भागवत गीता का सरल रूप)

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                    गीता माधुर्य अध्याय २का शेष क्या मैं यह सह नही सकता भगवन्? नही, तू सह नही सकता,क्योंकि तेरे शत्रुओं को वैरभाव निकालने का मौका मिल जायेगा। वेे तेरी सामर्थ की निन्दा करते हुये तुझे बहुत सी न कहने वाली बातें कहेंगे। उससे बढ़कर दुख और क्या होगा?॥३६॥ और अगर मैं युद्ध करूं तो?  युद्ध करते हुए अगर तू मारा जायगा तो तुझे स्वर्ग मिल जायेगा और अगर तू युद्ध जीत गया तो तुझे पृथ्वी का राज्य मिल जायेगा। अतः हे कुन्ती नन्दन! तू युद्ध का निश्चय करके खड़ा हो जा॥३७॥ क्या युद्ध से मुझे पाप नही लगेगा भगवन् ? नहीं, पाप तो स्वार्थ बुद्धि से ही होता है, अतः तू जय-पराजय, लाभ-हानि, सुख - दुख में समबुद्धि रखकर युद्ध कर। इस प्रकार युद्ध करने से तुझे पाप नही लगेगा॥३८॥ जिस समबुद्धि से कर्म करते जरा भी पाप नही लगता, उसकी और क्या विशेषता है भगवन्?  इस समबुद्धि की बात मैंने पहलें सांख्ययोग मेंं कह दी है अब तू इसको कर्म योग के विषय में सुन- १.  इस सम बुद्धि से युक्त हुआ तू  संपूर्ण  कर्मों के  बंधन से  छ...

गीता माधुर्य अध्याय 2

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                          गीता माधुर्य  अध्याय 2 रथ के मध्य भाग में बैठे बैठ जाने पर अर्जुन की क्या दशा हुई संजय?   संजय बोले- हे राजन्! जो बड़े उत्साह से युद्ध करने आए थे, पर कायरता के कारण जो विषाद कर रहे हैं और जिनके नेत्रों में इतने आंसू भर आए हैं कि देखना भी मुश्किल हो रहा है, ऐसे अर्जुन से भगवान मधुसूदन बोले कि हे अर्जुन! इस बेमौके पर  तुझ में यह कायरता कहां से आ गई? यह कायरता ना तो श्रेष्ठ पुरुषों के द्वारा धारण करने लायक है, ना स्वर्ग देने वाली है,और ना कीर्ति देने वाली है। इसलिए हे पार्थ! तू इस कायरता को अपने में मत आने दे; क्योंकि तेरे जैसे पुरुष में इसका आना उचित नहीं है। अतः है परंतप! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को छोड़कर तू युद्ध के लिए खड़ा हो जा॥१-३॥ ऐसा सुनकर अर्जुन क्या बोले संजय ? अर्जुन बोले- महाराज! मैं मरने से थोड़े ही डरता हूं, मैं तो मारने से डरता हूं। हे हरीसूदन! यह भीष्म और द्रोण तो पूजा करने योग्य हैं। इसलिए हे मधुसूदन! ऐसे पूज्य जनों को तो कटु शब्द भी नहीं कहना चाहि...

(सच्चाई ) पढो़, समझो और करों

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                       गरीब महिला की ईमानदारी  जय श्री राधे ,गीता प्रेस वालों की कल्याण मैगजीन को मैं हमेशा पढ़ती रहती हूं, उसी में कुछ हमें शिक्षाप्रद कहानियां सुनने को मिलती हैं ,जिसमें सच्चाई होती है। उसी में से यह एक कहानी मैंने पढ़ी और मुझे लगा कि आप सबके साथ भी इसको शेयर करूँ- घटना इस प्रकार है- मुझे कुछ प्लास्टिक डिब्बे तथा स्टील के बर्तनों की खरीदारी करनी थी और इसके लिए मैं अपने पौत्र के साथ सोनिया विहार स्थित मार्केट में एक दुकान पर गया जहां पर अष्टमी - नवमी की वजह से वह काफी बड़ी भीड़ थी दुकानदार को मैंने अपना सामान नोट कराया तथा उसने कहा कि आपको आधे घंटे प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। मैं दुकान में एक तरफ खड़ा हो गया। तभी मेरी दृष्टि एक महिला पर पड़ी जो दुकानदार से दो - 4 मिनट अपनी भाषा में झगड़ती और फिर एक तरफ बैठ कर रोने लगती, ऐसा तीन - चार बार हुआ। दुकानदार को कोई परवाह नहीं थी। लेकिन उस महिला के आंसू देख कर, मेरी व्याकुलता बढ़ती गई और एक समय ऐसा आया कि मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और उससे जानना चाहा कि आखिर...

गीता माधुर्य अध्याय 1 का शेष

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                   गीता माधुर्य अध्याय 1 का शेष  कौरव सेना के बाजे बजने के बाद पांडव सेना के बाजे बजने चाहिए थे पर उस सेना को कोई आज्ञा नहीं मिली। तब सफेद घोड़ों से युक्त महान रथ पर बैठे हुए भगवान श्री कृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक और अर्जुन ने देवदत्त नामक दिव्य शंख को बड़ी जोर से बजाया। उसके बाद भीम ने पाैण्ड्र नामक, युधिष्ठिर ने अनंत विजय नामक, नकुल ने सुघोष नामक और सहदेव ने मणिपुष्पक नामक अलग अलग शंख बजाये फिर और किसने शंख बजाये?  हे राजन्! पांडव सेना के श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज, महारथी शिखंडी, तथा धृष्टधुम्न, राजा विराट, अजय सत्यकि, राजा द्रुपद, द्रोपदी के पांचों पुत्र और महाबाहु सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु - इन सभी महारथियों ने अपने-अपने शंख बजाएं। पांडव सेना की उस शंख ध्वनि का क्या परिणाम हुआ?  पांडव सेना की उस शंखो की ध्वनि ने आकाश और पृथ्वी को गुँजाते हुए अन्याय पूर्वक राज्य हड़पने वाले कौरवों के ह्दय विदीर्ण कर दिए। शंख बजाने के बाद पांडवों ने क्या किया संजय? है महीपते! शंखो के बजने के बाद युद्ध आरंभ होने के ...

शुभ विचार

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                                  शुभ विचार पत्थर व लाठी से हड्डियां टूट जाती है परन्तु शब्दों से प्रायः संबंध टूट जाते हैं, इसलिए यदि आप क्रोध में हैं ,तो शांत रहिए और बोलना है तो सोच समझ कर बोलिए।  जय श्री राधे

गीता माधुर्य प्रथम अध्याय हिंदी मे

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                                 गीता माधुर्य श्रीमद्भागवत गीता मनुष्य मात्र को सही मार्ग दिखाने वाला सार्वभौम महाग्रंथ है। लोगों में इसका अधिक से अधिक प्रचार हो, इस दृष्टि से परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज ने इस ग्रंथ को प्रश्नोत्तर शैली में बड़े सरल ढंग से प्रस्तुत किया है। जिससे गीता पढ़ने में सर्वसाधारण लोगों की रुचि पैदा हो जाए और वह इसके अर्थ को सरलता से समझ सके। नित्य पाठ करने के लिए भी है पुस्तक बड़ी उपयोगी है। आप  से मेरा निवेदन है कि इस को स्वयं भी पढ़े व औरों को भी प्रेरित करें।                                श्री परमात्मने नमः                                  श्री गणेशाय नमः                       गीता माधुरी प्रथम पहला अध्याय वसुदेव सुतम देवं कं...

यमुना स्तुति भावार्थ के साथ(विनय पत्रिका)

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                                यमुना स्तुति जमुना ज्यों-ज्यों लागी बाढन।  त्यों त्यों  सुकृत - सुभट कली भूपहिं, निदरि लगे बहु काढ़न॥१॥  ज्यों ज्यों जल मलिन त्यों त्यों  जमगन मुखमलीन लहै आढ़ न।  तुलसीदास जगदघ जवास ज्यों अनघमेघ लगे डाढ़न॥२॥ भावार्थ- यमुना जी जैसे जैसे बढने लगी, वैसे ही पुण्य रूपी योद्धागण कलयुग रूपी राजा का निरादर करते हुए उसे निकालने लगे। बरसात में यमुना जी का जल बढ़कर जो जो मैला होने लगा, त्यों त्यों यमदूतों का मुख भी काला होता गया, अंत में उन्हें कोई भी आसरा नहीं रहा, अब वह  किस को यमलोक में ले जाएं। तुलसीदास जी कहते हैं कि यमुनाजी के बढ़ते हुए पुण्य रूपी मेघ ने संसार के पाप रूपी जवासे को जलाकर भस्म कर डाला। 

गंगा स्तुति( विनय पत्रिका)

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                                 गंगा स्तुति(विनय पत्रिका) जय जय भगीरथ नंदिनी, मुनि चय चकोर - चंदनी, नर - नाग- विबुध- बंदिनी जय जह्नु बालिका। विष्णुपद सरोजजासी, ईस-सीस पर बिभासि, त्रिपथगासि, पुण्यराशि, पापछालिका॥१॥ विमल विपुल बहसि बारी, शीतल त्रयताप - हारी, भंवर बर बिभंगतर तरंग मलिका। पुरजन पूजाेपहार, शोभित शशि धवलदार, भंजन भव भार, भक्ति कल्पथालिका ॥२॥ निज तटबासी बिहंग, जल-थर-चर पशु पतंग  की, जटिल तापस सब सरिस पालिका। तुलसी तब तीर तीर सुमिरत रघुवंश बीर, बिचरत मति देहि मोह-महिष-कालिका॥३॥  भावार्थ- हे भगीरथ नंदिनी! तुम्हारी जय हो ,जय हो। तुम मुनियों के समूह रूपी चकोरों के लिए चंद्रिका रूप हो। मनुष्य नाग, देवता तुम्हारी वंदना करते हैं। यह जह्नु की पुत्री! तुम्हारी जय हो। तुम भगवान विष्णु के चरण कमल से उत्पन्न हुई हो  शिवजी के मस्तक पर शोभा पाती हो। स्वर्ग, भूमि और पाताल इन तीन मार्गो से तीन धाराओं में होकर बहती हो। पुण्य की राशि और पापों को धोने वाली हो। तुम आगाध निर्मल...

सब के सब सुखी हो जाए

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                   सभी लोग एक दूसरे के सुख की कामना करें   गीता आश्रम में ऋषिकेश मे एक संत हुए स्वामी रामसुखदास जी उन्हीं के मुख से बोले गए ये प्रवचन हैं जिसमें वह बता रहे हैं कि यदि हमने ईश्वर को अपना मान लिया है तो इस संसार में रहने वाली प्रत्येक जीव और निर्जीव ईश्वर के ही हैं । तो हमें उन सब का भी आदर , प्यार और सहायता करनी चाहिए। प्रभुके साथ हमारा अपनापन सदासे है और सदा रहेगा। केवल हम ही भगवान से विमुख हुए हैं, भगवान् हमसे विमुख नहीं हुए। हम भगवान् के हैं और भगवान् हमारे हैं— अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥ ( मानस ,  अरण्य ११। २१) मीराबाई इतनी ऊँची हुई, इसका कारण उसका यह भाव था कि । ‘मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।’  केवल एक भगवान् ही मेरे हैं, दूसरा कोई मेरा नहीं है। सज्जनो ! हम भगवान् के हो जाते हैं तो भगवान् की सृष्टिके साथ उत्तम-से-उत्तम बर्ताव करना हमारे लिये आवश्यक हो जाता है। यह सब सृष्टि प्रभुकी है, ये सभी हमारे मालिक के हैं—ऐसा भाव रखोगे तो उनके साथ हमारा बर्ताव बड़ा अच्छा ह...

देवि स्तुति भावार्थ के साथ (विनय पत्रिका)

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                                 देवि स्तुति(विनय पत्रिका)  जय जय जग जननी देवी सुर- नर- मुनि - असुर सेवि,  भुक्ति- मुक्ति- दायिनी, भय-हारणि कालिका।  मंगल - मुद-सिद्धि- सदनि  पर्वशर्वरीश-वदनि,  ताप-तिमिर- तरुण - तरणि- किरणमालिका॥१॥  वर्म, चर्म कर कृपाण, शूल- शैल- धनुषबाण,  धरणि दलनि दानव दल, रण-करालिका।  पूतना- पिशाच - प्रेत - डाकिनी- शाकिनी - समेत,  भूत-ग्रह- बेताल खग- मृगाली- जालिका॥२॥  जय महेश -भामिनी, अनेक रुप नामिनी , समस्त लोकस्वामनी, हिमशैल बालिका । रघुपति -पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम,  देहु ह्वै प्रसन्न  पाहि प्रणत- पालिका॥३॥  भावार्थ- हे जगत की माता! हे देवी!! तुम्हारी जय हो, जय हो देवता, मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते हैं। तुम भोग और मोक्ष दोनों को ही देने वाली हो ।भक्तों का भय दूर करने के लिए तुम कालिका हो ,कल्याण सुख और सिद्धियों की शान हो, तुम्हारा सुंदर मुख पूर्णिमा के चंद्र के सद...

शिव स्तुति (विनय पत्रिका)

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                               शिव स्तुति  श्री तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में भगवान शिव से विनय करके भगवान राम की कृपा पाने का अनुरोध किया है। उनका मानना है यदि शिव प्रसन्न हो जाएंगे तो ,वह भगवान राम से मेरी सिफारिश कर देंगे ,और भगवान राम मेरी और देख कर मुझ पर कृपा कर देंगे- दानी कहूंँ शंकर सम- नाही। दीन - दयालु दिबोई भावेै, जाचक सदा सोहाही॥१॥ मारिकै मार थप्यौ जग में, जाकी प्रथम रेख भट माही। ता ठाकुर कोै रीझि निवाजिबौ, कह्यौ क्यों परत मो पाही॥२॥जोक कोटि करि जो गति हरिसों, मुनी मांगत सकुचाहीं। वेद- विदित तेहि पद पूरारी-पुर, कीट-पतंग समाही॥३॥ ईस उदार उमापति परिहरि, अनंत जे जाचन जाहीं। तुलसीदास थे मूढ़ मांगने, कबहुं ना पेट आघाही॥४॥ भावार्थ - शंकर के समान दानी कहीं नहीं है। वह दीन- दयालु है। देना ही उनके मन भाता है, मांगने वाले उन्हें सदा सुहाते हैं॥१॥ वीरों में अग्रणी कामदेव को भस्म कर के फिर बिना ही शरीर जगत में उसे रहने दिया, ऐसे प्रभु को प्रसन्न होकर कुछ कृपा करना मुझसे क्यों कर कहा जा सक...

सूर्य स्तुति

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                                  सूर्य स्तुति  यह स्तुति तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में कही है- दीन- दयालु दिवाकर देवा। कर मुनि, मनुज, सुरासुर सेवा॥१॥ हिम- तम- करी- केहरि करमाली। दहन दोष - दुख - दुरित - रुजाली॥२॥  कोक- कोकनद- लोक- प्रकाश।तेज- प्रताप- रूप - रस -रासी॥३॥ सारथी- पंगु,दिव्य रथ- गामी।हरि-शंकर-बिधि-मूरति स्वामी॥४॥ वेद- पुराण, प्रगट जस जागे। तुलसी राम-भगति वर मांगे ॥५॥ भावार्थ- हे दीन दयालु भगवान सूर्य! मुनि ,मनुष्य, देवता और राक्षस सभी आपकी सेवा करते हैं॥१॥आप पाले और अंधकार रुपी हाथियों को मारने वाले वनराज सिंह हैं। किरणों की माला पहन रहते हैं; दोष, दुख, दुराचार और रोगों को भस्म कर डालते हैं॥२।। रात के बिछड़े हुए चकवा चकवियों को मिलाकर प्रसन्न करने वाले, कमल को खिलाने वाले तथा समस्त लोकों को प्रकाशित करने वाले हैं। तेज, प्रताप, रूप और रस कि आप खानी है॥३॥ आप दिव्य रथ पर चलते हैं, आपका सारथी (अरुण) लूला है। हे स्वामी! आप विष्णु, शिव और ब्रह्मा जी के ही रूप हैं।।४॥ वेद- ...

श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में चौथा अध्याय का शेष

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        श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में चौथा अध्याय           ( स्वामी रामसुखदास जी के श्रीमुख से)  भगवान्  ' विवस्वते   प्रोक्तवान् ’  पदोंसे साधकोंको मानो यह लक्ष्य कराते हैं कि जैसे सूर्य सदा चलते ही रहते हैं अर्थात् कर्म करते ही रहते हैं और सबको प्रकाशित करनेपर भी स्वयं निर्लिप्त रहते हैं, ऐसे ही साधकोंको भी प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन स्वयं करते रहना चाहिये (गीता—तीसरे अध्यायका उन्नीसवाँ श्लोक) और दूसरोंको भी कर्मयोगकी शिक्षा देकर लोकसंग्रह करते रहना चाहिये; पर स्वयं उनसे निर्लिप्त (निष्काम, निर्मम और अनासक्त) रहना चाहिये।  सृष्टिमें सूर्य सबके आदि हैं। सृष्टिकी रचनाके समय भी सूर्य जैसे पूर्वकल्पमें थे, वैसे ही प्रकट हुए— ' सूर्या -  चन्द्रमसौ   धाता यथापूर्वमकल्पयत् ’। उन (सबके आदि) सूर्यको भगवान्ने अविनाशी कर्मयोगका उपदेश दिया। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् सबके आदिगुरु हैं और साथ ही कर्मयोग भी अनादि है। भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें जो कर्मयोगकी बात...