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हमारा कर्त्वय

                                   कर्तव्य


 अपने कर्तव्य का सावधानी से पालन करना चाहिए। अच्छे विचार रखने चाहिए। मन ,वाणी ,शरीर  को सत्संग में लगाना चाहिए। बुरे विचार ,कुसंग से हमेशा बचना चाहिए ।हम सभी के अंदर सत्य, सच बोलना ,दया, दूसरों को क्षमा करना,आदि का पालन करने से मन ,बुद्धि और शरीर का विकास होता है ।हमेशा बड़ों को प्रणाम और उनकी सेवा से आयु, विद्या ,यश की प्राप्ति होती है। मन में शुद्ध विचारों को रखकर जीवन का प्रथम भाग विद्या के अध्यन मे  बिताना चाहिए। विद्या के पढ़ने के साथ विवेक को उत्पन्न करना चाहिए। क्या उचित है, या अनुचित है ।इसे बुद्धि के द्वारा निर्णय करके ही करम करना चाहिए ।बिना विचारे ,जल्दबाजी में किसी भी काम को करने से बाद  ,में पछताना पड़ता है। इसलिए बिना विचारे कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। बड़ों से शिक्षा अध्ययन करना चाहिए ,छोटों को शिक्षा देना चाहिए ।अध्ययन करते समय भी अध्यापन करना चाहिए। ईश्वर ने आपको जिस रूप में भी इस धरती पर भेजा है। चाहे वह महिला ,पुरुष ,मां ,बेटा ,बहन  ,भाई,पिता ,पुत्र, पुत्री जो भी हमें रिश्ते निभाने के लिए भेजा है हमें उस रिश्ते को न्याय पूर्वक सच्चाई के साथ अपने कर्तव्य का पालन करते हुए निभाना चाहिए। क्योंकि हर रिश्ते का अपना अपना कर्तव्य होता है। जिससे हम भली भांति परिचित होते हैं ।उसका हमें इमानदारी से पालन करना चाहिए।
।। जय श्री राधे ,श्री सीताराम।।

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