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शिव स्तुति (विनय पत्रिका)

                               शिव स्तुति
 श्री तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में भगवान शिव से विनय करके भगवान राम की कृपा पाने का अनुरोध किया है। उनका मानना है यदि शिव प्रसन्न हो जाएंगे तो ,वह भगवान राम से मेरी सिफारिश कर देंगे ,और भगवान राम मेरी और देख कर मुझ पर कृपा कर देंगे-

दानी कहूंँ शंकर सम- नाही।
दीन - दयालु दिबोई भावेै, जाचक सदा सोहाही॥१॥
मारिकै मार थप्यौ जग में, जाकी प्रथम रेख भट माही।
ता ठाकुर कोै रीझि निवाजिबौ, कह्यौ क्यों परत मो पाही॥२॥जोक कोटि करि जो गति हरिसों, मुनी मांगत सकुचाहीं।
वेद- विदित तेहि पद पूरारी-पुर, कीट-पतंग समाही॥३॥
ईस उदार उमापति परिहरि, अनंत जे जाचन जाहीं। तुलसीदास थे मूढ़ मांगने, कबहुं ना पेट आघाही॥४॥
भावार्थ - शंकर के समान दानी कहीं नहीं है। वह दीन- दयालु है। देना ही उनके मन भाता है, मांगने वाले उन्हें सदा सुहाते हैं॥१॥ वीरों में अग्रणी कामदेव को भस्म कर के फिर बिना ही शरीर जगत में उसे रहने दिया, ऐसे प्रभु को प्रसन्न होकर कुछ कृपा करना मुझसे क्यों कर कहा जा सकता है। करोड़ों प्रकार से योग की साधना करके मुनिगण जिस परम गति को भगवान श्री हरि से मांगते हुए सकुचाते हैं। वही परमगति त्रिपुरारी शिव जी की पुरी काशी में कीट पतंगे भी पा जाते हैं, यह वेदों में प्रकट है॥३॥ ऐसे परम उदार भगवान पार्वतीपति को छोड़कर जो लोग दूसरी जगह मांगने जाते हैं, उन मुर्ख मांगने वालों का पेट भली-भांति कभी नहीं भरता॥४॥

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