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जिसे आप हर ढूंढ रहे हो वह तो आपके अंदर है।

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            *कस्तूरी कूंडल बसे**मृग ढूढें वन माहीं* एक बहुत बड़े महानगर में एक भिक्षु मर गया था। वह जिस जमीन पर तीस वर्षों से भीख मांगता रहा बैठ कर, जहां उसने अपने गंदे चीथड़े फैला रखे थे, और तीस वर्षों की गंदगी फैला रखी थी। वह मर गया, तो पड़ोस के लोगों ने उसकी लाश को तो फिंकवा दिया। और चूंकि उस भिखारी ने तीस वर्षों तक गंदगी की थी उस जमीन पर, उन्होंने सोचा, इसे थोड़ा खोद कर जरा इसकी जमीन साफ करवा दें। वे हैरान रह गए। जहां उन्होंने खोदा वहां खजाने गड़े थे। और वह भिखारी उन्हीं के ऊपर बैठ कर जीवन भर भिक्षा का पात्र फैलाए बैठा रहा और भीख मांगता रहा। क्या अर्थ था उस खजाने का जो नीचे गड़ा था? कोई भी नहीं। वह न होने के बराबर था। वह भिखारी और हममें बहुत भेद नहीं। जिस जमीन पर हम खड़े हैं वहीं बहुत कुछ गड़ा है। जहां हम हैं वहां बहुत कुछ है। ऐसे खजाने हैं जिन्हें पाकर आदमी परम आनंद को उपलब्ध हो जाता है। ऐसा सौंदर्य है, ऐसा सत्य है, ऐसा संगीत है कि जिसमें डूब कर जीवन का अर्थ उपलब्ध हो जाता है। लेकिन उस तरफ आंख उठनी चाहिए।लेकिन उसके होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। व...

सन्तान के रूप में कौन आता है?

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                            कर्म - भोग  पूर्व जन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता - पिता , भाई - बहन , पति - पत्नि , प्रेमी - प्रेमिका , मित्र - शत्रु , सगे - सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं , सब मिलते हैं । क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है ।                   सन्तान के रुप में कौन आता है ?  वेसे ही सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का 'सम्बन्धी' ही आकर जन्म लेता है । जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है --     ऋणानुबन्ध   :-पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो , वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा , जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये ।   शत्रु पुत्र   :-पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा ...

Contact & connection( संपर्क और संजोग)

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             *CONTACT &     CONNECTION*                       *(संपर्क और संजोग) रामकृष्ण मिशन के एक साधु का न्यूयार्क का बड़ा पत्रकार इंटरव्यू ले रहा था पत्रकार ने जैसा प्लान किया था वैसे ही इंटरव्यू लेना शुरू किया। *पत्रकार*– सर, आपने अपने लास्ट लेक्चर में संपर्क (Contact) और संजोग (Connection) पर स्पीच दिया लेकिन यह बहुत कन्फ्यूज करने वाला था। क्या आप इसे समझा सकते हैं???? साधु ने मुस्कराये और उन्होंने उल्टा प्रश्न से कुछ अलग पत्रकार से ही पूछना शुरू कर दिया। "आप न्यूयॉर्क से है???" *पत्रकार*: "Yep..." *सन्यासी*: "आपके घर मे कौन कौन हैं???" पत्रकार को लगा कि साधु उनका सवाल टालने की कोशिश कर रहा है क्योंकि उनका सवाल बहुत व्यक्तिगत और उसके सवाल के जवाब से अलग था। फिर भी पत्रकार बोला: मेरी "माँ अब नही हैं, पिता हैं तथा 3 भाई और एक बहिन हैं जो सब शादीशुदा हैं". साधू ने चेहरे पे एक मुसकान के साथ पूछा: "आप अपने पिता से बात करते हैं???" पत्रकार चेहरे से गुस्...

क्या आप जानते है?

कुछ एसी महत्वपुर्ण जानकारियाँ जिसका आप सब को जानना जरुरी है:- दो लिंग : नर और नारी । दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)। दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन। तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी। तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल। तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण। तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु। तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत। तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा। तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव। तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी। तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान। तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना। तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं। तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति। चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका। चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार। चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। चार निति : साम, दाम, दंड, भेद। चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद। चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री। चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग। चार समय : सुबह, ...

परमात्मा की प्राप्ति के लिए निराश नहीं होना चाहिए

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    ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्री जय दयाल जी गोयन्दका के श्री मुख से  परमात्मा की प्राप्ति के लिए निराश नहीं होना चाहिए      ( ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्री जय दयाल जी गोयन्दका) बहुत से भाई परमात्मा की प्राप्ति के लिए  यथा साध्य , साधन( पूजा,व्रत,नाम-जप,आदि) करते हैं पर बहुत समय तक साधन करने पर भी जब परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती ,तब निराश हो जाते हैं, पर वे सज्जन निराश ना होकर यदि परमात्मा की प्राप्ति ना होने का कारण जान जाए, तो उन्हें पता लगेगा कि श्रद्धा प्रेम तथा आदर पूर्वक और तत्परता के साथ साधना करना ही इसमें प्रधान कारण है। जिस प्रकार लोभी मनुष्य धन की प्राप्ति के लिए पूरी तत्परता के साथ साधन करता है ,अपना सारा समय समस्त बुद्धि कौशल धन की प्राप्ति के प्राप्ति में ही लगाता है तथा नित्य सावधानी के साथ कोई ऐसा भी काम नहीं करता जिससे धन की तनिक भी क्षति हो ,इसी प्रकार यदि श्रद्धा, प्रेम तथा आदर के साथ पूर्ण तत्परता से साधन किया जाए, तो इस युग में परमात्मा की प्राप्ति बहुत शीघ्र हो सकती है। आत्मा के उद्धार या परमात्मा की प्राप्ति में अब तक ज...

एक पल,एक क्षण,एक घडी़ का वास्तविक अर्थ-

               विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र                             (ऋषि मुनियो का अनुसंधान )               आप जिज्ञासुओं के व अपने आने वाली पीढ़ी के लिये ये बहुत काम का संकलन है,कृपया बच्चों को यह भी सिखाए-रमक झमक ■ क्रति = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग ■ 1 त्रुति = सैकन्ड का 300 वाँ भाग ■ 2 त्रुति = 1 लव , ■ 1 लव = 1 क्षण ■ 30 क्षण = 1 विपल , ■ 60 विपल = 1 पल ■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) , ■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा ) ■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) , ■ 7 दिवस = 1 सप्ताह ■ 4 सप्ताह = 1 माह , ■ 2 माह = 1 ऋतू ■ 6 ऋतू = 1 वर्ष , ■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी ■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी , ■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग ■ 2 युग = 1 द्वापर युग , ■ 3 युग = 1 त्रैता युग , ■ 4 युग = सतयुग ■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग ■ 76 महायुग = मनवन्तर , ■ 1000 महायुग = 1 कल्प ■ 1 नित्य प्रलय = 1 म...

क्या आप जानते हैं हमारे शब्द भी हमारे कर्म बन जाते हैं।

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                  हमारी शब्द हमारे कर्म बन जाते हैं 18 दिन के युद्ध ने,  द्रोपदी की उम्र को 80 वर्ष जैसा कर दिया था... शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी शहर में चारों तरफ़ विधवाओं का बाहुल्य था.. पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी । तभी, *श्रीकृष्ण* कक्ष में दाखिल होते हैं द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है ... कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं थोड़ी देर में, उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बैठा देते हैं । *द्रोपदी* : यह क्या हो गया सखा ?? ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था । *कृष्ण* : नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली.. वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती ! वह हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है.. तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी ! तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ... सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं, सारे कौरव समाप्...

आरती " जय शिव ओंकारा का अर्थ "

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                             *"त्रिगुणास्वामी" *"ॐ जय शिव ओंकारा", यह वह प्रसिद्ध आरती है जो देश भर में शिव-भक्त नियमित गाते हैं..* *लेकिन, बहुत कम लोग का ही ध्यान इस तथ्य पर जाता है कि, इस आरती के पदों में ब्रम्हा-विष्णु-महेश तीनो की स्तुति है..* 👇 *एकानन (एकमुखी, विष्णु) चतुरानन (चतुर्मुखी, ब्रम्हा) पंचानन (पंचमुखी, शिव) राजे..* *हंसासन(ब्रम्हा) गरुड़ासन(विष्णु ) वृषवाहन (शिव) साजे..* *दो भुज (विष्णु) चार चतुर्भुज (ब्रम्हा) दसभुज (शिव) ते सोहे..* *अक्षमाला (रुद्राक्ष माला, ब्रम्हाजी ) वनमाला (विष्णु ) रुण्डमाला (शिव) धारी..* *चंदन (ब्रम्हा ) मृगमद (कस्तूरी , विष्णु ) चंदा (शिव) भाले शुभकारी (मस्तष्क पर शोभा पाते है)..* *श्वेताम्बर (सफेदवस्त्र, ब्रम्हा) पीताम्बर (पीले वस्त्र, विष्णु) बाघाम्बर (बाघ चर्म ,शिव) अगें..* *ब्रम्हादिक (ब्राम्हण, ब्रम्हा ) सनकादिक (सनक आदि, विष्णु ) भूतादिक (शिव ) सगें (साथ रहते है)..* *कर के मध्य कमंडल (ब्रम्हा) चक्र (विष्णु) त्रिशूल (शिव) धर्ता..* *जगकर्ता (ब्रम्ह...