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संत भक्त महिमा एंव सत्संग

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                                                    संत भक्त महिमा एंव सत्संग                                                       सत्संग का लाभ मिलता हैं तो धीरे धीरे मन में शांति आती  हैं अन्यथा प्रत्येक प्राणी तन ,मन ,धन और जन से दुखी दिखाई पड़ता हैं। संसार के सारे कार्य किसी के भी अनुकूल नहीं होते हैं। एक न एक प्रतिकूलता रहती हैं। अपने इष्ट देव में दृढ़ विश्वास रखने वाला जो शरण में हैं और जो सन्मुख हैं वही निश्चिन्त हैं और सुखी हैं। सत्य ,दया ,क्षमा और चोरी न करना आदि धर्म सभी वर्णो के धर्म हैं। जो दुसरो के व्यवहार से परेशान नहीं होते और अपने व्यवहार से किसी को परेशान  नहीं  करते हैं वही संत हैं। तन ,मन ,धन से उपकार क र ने  वाले गृहस्थ जन महान हैं। मन की शुद्धि और लोगो के साथ व्यवहा...

वृंदावन भाव..... वृंदावन वास चाहूं और कुछ ना चाहूं।

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             ब्रज की महिमा का बखान कैसे संभव है? प्रभु कृपा से ऐसा कोई तीर्थ नहीं; जो ब्रज में नहीं है।   वृंदावन भाव..... वृंदावन वास चाहूं और कुछ ना चाहूं। ब्रज की महिमा का बखान कैसे संभव है? प्रभु कृपा से ऐसा कोई तीर्थ नहीं; जो ब्रज में नहीं है।  अपने बाबा और मैया यशोदा की इच्छापूर्ति हेतु कन्हैया ने सभी तीर्थों को ब्रज में ही बुला लिया और उन्हें ब्रज चौरासी कोस में सभी तीर्थों के दर्शन कराये। यही कारण है कि "ब्रजवासी" जावे तो कहाँ ?  ब्रज-चौरासी कोस की एक परिक्रमा 84 लाख योनियों के पाप-कर्मों के फ़ल से मुक्ति प्रदान कर श्रीश्यामा-श्याम के श्रीचरणों की भक्ति प्रदान करती है।  एक बार अयोध्या जाओ, दो बार द्वारिका, तीन बार जाके त्रिवेणी में नहाओगे।   चार बार चित्रकूट, नौ बार नासिक, बार-बार जाके बद्रीनाथ घूम आओगे॥   कोटि बार काशी, केदारनाथ, रामेश्वर, गया-जगन्नाथ, चाहे जहाँ जाओगे।   होंगे प्रत्यक्ष जहाँ दर्शन श्याम-श्यामा के, वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे॥  वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे......

कुमार्ग पर पैर रखते हीं शरीर में तेज, बुद्धि एवं बल का लेश भी नहीं रह जाता है।

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कुमार्ग पर पैर रखते हीं शरीर में तेज, बुद्धि एवं बल का लेश भी नहीं रह जाता है।                    इमि कुपंथ पग देत खगेसा।                  रह न तेज तन बुधि बल लेसा।। कुमार्ग़ पर पैर रखते ही बल और तेज़ जाता रहता हैं, बात बिल्कुल सही है। कोई कितना भी बलवान एवं बुद्धिमान हो या फिर विद्वान ही क्यों न हो, जैसे ही उसकी प्रवृत्ति स्वयं को गर्हित कार्य में नियोजित करने की होती है सबसे पहले उसकी विवेकशक्ति का नाश हो जाता है। विवेकशून्य व्यक्ति जल्द ही काम, क्रोध और लोभ के अधीन कार्य कर अपना हीं अनिष्ट कर डालता है चाहे वह दशानन ही क्यों न हो।  प्रसंग उसी दशानन रावण का ही लेते हैं जिसके पदचाप से धरती डोलती थी, जो अपने भुजाओं में स्थित बल को तौलने हेतु कौतुक से कैलाश पर्वत तक को तौल आनंदित होता था वही रावण जब सीताहरण जैसे गर्हित कर्म में प्रवृत्त हुआ तो उसका सारा तेज जाता रहा।  राक्षस होते हुए भी जो कुल परम्परा से न केवल ब्राह्मण था बल्कि प्रकांड पंडित भी था तथा जिसके अतुलनीय बल से समस्त देव एवं...

माता के 9 अवतारों का सरल वर्णन

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          माता के 9 अवतारों का सरल वर्णन                     ये हैं सती_पार्वती के 9 अवतार कैलाश पर्वत के ध्यानी की अर्धांगिनी मां सती पार्वती को ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है। इसके अलावा भी मां के अनेक नाम हैं जैसे दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेरांवाली आदि। इनके दो पुत्र हैं गणेश और कार्तिकेय। प्रथम स्वरूप –शैलपुत्री      प्रजापति दक्ष ने अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु अपनी पुत्री सती और शिव को जान-बूझकर नहीं बुलाया। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में शिवजी ने उन्हें समझाया कि तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।' शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहा...

आज का शुभ विचार

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                   अपने  गुरुजनों ,पिता ,माता से  डरना चाहिए। यदि जीवन से भय निकल जाय तो वह व्यक्ति उद्दंड ,उन्मत  और उच्छ्रखंल  हो सकता हैं। 

भक्ति प्राप्ति के आठ सरल साधन

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भक्ति प्राप्ति के आठ सरल साधन  १. स्वभाव में सरलता। मन से कुटिलता का हटाना। दूसरे का अनिष्ट करके अपने स्वार्थ की सिद्धि मन की कुटिलता हैं।  २.जो कुछ भगवान ने घर ,परिवार दिया हैं उसमे संतुष्ट रहना। अनुचित उपायों से संसारी वस्तु को करने  की इच्छा न करना संतुष्ट रहना।  ३.भगवान का दास कहला कर दूसरे धनी मानियों  की आशा व चापलूसी नहीं करना।  ४. अकारण किसी से वैर विग्रह न करना।  ५.सत्संग से प्रेम ,संसारी लोगो से घनिष्ठता न रखकर प्रयोजन भर का संबंध रखना। .  ६.भक्ति की श्रेष्ठता को मानना ,दुष्ट से तर्क न करना।  ७.स्वर्ग मोक्ष के सुखों की भी  इच्छा न करना।  ८.भगवत् गुणानुवाद का गान  करना।  इन उपदेशो को श्री राम ने दिया। सभी संत भी यही कहते हैं। एक एक  बात को ध्यान में लाकर उस पर विचार करना ,फिर उस पर दृढ निश्चय करना। इसलिए थोड़ा ही सही जितना भी समय मिले मन में पूजा व लीला चिंतन अवश्य करना चाहिए।