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जुलाई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जिस किसी से भी आपको कुछ भी सीखने को मिल जाए वह आपका गुरु

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                                 गुरु पूर्णिमा  भगवान वेदव्यास की जयंती गुरु पूर्णिमा है इस दिन व्यास, संत गुरु जन पूज्य है। नित्य ही पूजा होती है,पर गुरु पूर्णिमा की पूजा विशेष होनी चाहिए। इस अवसर पर गो,संत सेवा की जानी चाहिएं। गुरु तत्व से परे कोई तत्व नहीं है। नास्ति तत्वं गुरो: परम्  बताया गया है कि इश्वर तत्व ही गुरु तत्व है। विद्या, बुद्धि,आयु में श्रेष्ठ सभी गुरु हैं। जो लोग अपनी दीनता से सभी जीवो को अपने से श्रेष्ठ मानते हैं, उनके लिए गुरु तत्व सर्वव्यापक है। जिस से भी कुछ सीखने को मिल जाए वही गुरु हैं। प्रथम जिन्होंने मंत्र दीक्षा दी, फिर जिन्होंने उपदेश दिया। कर्म कर्म से सभी में गुरु भावना पुष्ट होती है।सभी जगह गुरु तत्व का बोध हो जाएगा। संसार की सभी प्राणी, वस्तुएं शिक्षाप्रद है। जो प्रभु से मिलन का मार्ग दिखलाए वही गुरु है। जिसके वचनों में श्रद्धा विश्वास है, वही गुरु है। झालीरानी को रैदास जी में गुरु तत्व दिखाई पड़ा, रानी रत्नावती ने अपनी दासी से शिक्षा ग्रहण की। अनुकूल आचरण से त...

समझो! कि हम किस कैटेगरी में आते हैं

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                                          समझो संसार में दो प्रकार के पेड़- पौधे होते हैं प्रथम : अपना फल स्वयं दे देते हैं, जैसे - आम, अमरुद, केला इत्यादि । द्वितीय : अपना फल छिपाकर रखते हैं, जैसे - आलू, अदरक, प्याज इत्यादि । जो फल अपने आप दे देते हैं, उन वृक्षों को सभी खाद-पानी देकर सुरक्षित रखते हैं, और  ऐसे वृक्ष फिर से फल देने के लिए तैयार हो जाते हैं । किन्तु जो अपना फल छिपाकर रखते है, वे जड़ सहित खोद लिए जाते हैं, उनका वजूद ही खत्म हो जाता हैं।* ठीक इसी प्रकार... जो व्यक्ति अपनी विद्या, धन, शक्ति स्वयं ही समाज सेवा में समाज के उत्थान में लगा देते हैं, उनका सभी ध्यान रखते हैं और वे मान-सम्मान पाते है। वही दूसरी ओर  जो अपनी विद्या, धन, शक्ति स्वार्थवश छिपाकर रखते हैं, किसी की सहायता से मुख मोड़े रखते है, वे जड़ सहित खोद लिए जाते है, अर्थात् समय रहते ही भुला दिये जाते है। प्रकृति कितना महत्वपूर्ण संदेश देती है, बस समझने, सोचने  की बात है। ।।जय श्री राधे।।

कागभुसुंडि जी कौन थे?

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कागभुसुंडि जी कौन है?  जब भोले बाबा मां गोरा को श्री रामचरितमानस की कथा सुना रहे थे तब अंत में गौरा मां ने प्रश्न किया कि मैं यह जानना चाहती हूं कि यह काग भुसुंडि जी कौन थे? जिनसे आपने कथा सुनी। हे कृपालु ! बताइए उसको इन्हीं प्रभु का यह पवित्र सुंदर चरित्र कहां पाया और हे कामदेव के शत्रु यह भी बताइए आपने इसे किस प्रकार सुना? मुझे बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है।  तब महादेव ने प्रसंग सुनाया। महादेव बोले हे सुमुखी! है सुलोचना ! प्रसंग सुनो, पहले तुम्हारा अवतार दक्ष के घर में हुआ था, तब तुम्हारा नाम सती था। दक्ष के यज्ञ में तुम्हारा अपमान हुआ। तब तुम ने अत्यंत विरोध करके प्राण त्याग दिए और फिर मेरे से सेवकों ने यज्ञ विध्वंस कर दिया।यह सब तुम जानती हो। तब मेरे मन में बड़ा सोच हुआ और हे प्रिय! मैं तुम्हारी वियोग से दुखी हो गया,मैं विरक्त भाव से सुंदरवन पर्वत नदी और तालाबों का दृश्य देखता फिरता था। सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में और भी दूर एक बहुत ही सुंदर नील पर्वत है। उसकी सुंदर स्वर्ण में शिखर है। उनमें से चार सुंदर शिखर मेरे मन को बहुत ही अच्छे लगे। उनमें से एक बरगद, पीपल, पाकर और आम ...

श्री राम जी के द्वारा भक्तों के जन्म मरण को मिटाने वाले वचन

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 श्री राम जी के द्वारा भक्तों के जन्म मरण को मिटाने वाले वचन एक बार श्री राम जी ने अयोध्या में अपने समस्त नगरवासियों को बुलाया और उनको अपने हृदय की बात सुनाई और सब को कहा कि आप मेरी बातों को सुन लो और यह जो तुम्हें अच्छी लगे तो उसके अनुसार ही करो। वही मेरा सेवक है और वही मेरा प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने।  बड़े भाग्य से मनुष्य शरीर मिला है सब ग्रंथों में यही कहा है कि यह शरीर देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। कठिनाई से मिलता है। यह साधन का धाम और मोक्ष का दरवाजा है। इसे पा कर भी जिसने पढ़ लो ना बना लिया वह परलोक में दुख पाता है सिर पीट पीटकर पछताता है तथा अपने दोष ना समझ कर काल पर,कर्म पर और ईश्वर पर मिथ्या दोष लगाता है। हे भाई इस शरीर के प्राप्त होने का फल विषय भोग नहीं है, इस जगत के लोगों की तो बात ही क्या, स्वर्ग का भोग भी बहुत थोड़ा है और अंत में दुख देने वाला है। जो लोग मनुष्य शरीर पाकर विषय में मन लगा देते हैं। वह मूर्ख अमृत को बदलकर विष ले लेते हैं। जो पारस मणि को खोकर बदले में घुं धनघची ले लेता है। उसको कभी कोई  बुद्धिमान नहीं कहता। यह अविनाशी जीव चार खानों और 840000...

क्या आपको अपने सभी काम सफल करने हैं तो

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         क्या आपको अपने सभी काम सफल करने हैं? तो आदत डाल ले, जब भी कहीं जाए तो 4 बार नारायण, नारायण बोल कर ही निकले। आपके सब काम सफल होंगे और कुछ खराब होने भी होंगे, तो वह भी ठीक हो जाएंगे। खराब काम होने से बच जाएगा। आपका सत्संग सफल हो जाएगा। खराब काम से बचना और अच्छे काम में सफल होना, यह दोनों बातें ही नारायण– नारायण कहने से हो जाएंगे। भगवान का जो भी नाम प्रिय हो वह ले। अगर आप कोई भी काम प्रारंभ करने से पहले भगवान का नाम लेंगे और यही बातें अपने बच्चों को भी सिखा देंगे, तो हमारा बहुत बड़ा काम हो जाएगा। मैं अपने ऊपर आपकी बहुत बड़ी कृपा मानूंगा।  परम पूज्य श्रद्धेय श्री रामसुखदास जी के श्री मुख से।

श्री कृष्ण लीलामृत

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                                श्री कृष्ण लीलामृत,जब दरबान ने  लौट कर विधाता ब्रह्मा जी से पूछा की हे ब्रह्मा जी आप कौन से वाले ब्रह्मा जी है। भगवान ने पूछा है? जब भगवान श्री कृष्ण द्वारिका के राजा थे. उस समय की बात है। भगवान श्री कृष्ण  से मिलने अनेक देवता आया करते थे।        एक बार विधाता ब्रह्मा जी उनसे मिलने आए, और दरबान तुरंत ब्रह्मा जी के आगमन को भगवान श्री कृष्ण को सूचित किया। तब श्री भगवान ने दरबान, से पूछा क्या  तुम्हे पता है वो जो ब्रह्मा जी है वो कहा से आए है उनका परिचय क्या है ?दरबान लौट कर विधाता ब्रह्मा जी से पूछा की हे ब्रह्मा जी आप कौन से वाले ब्रह्मा जी है। भगवान ने पूछा है?  कौन से  ब्रह्मा ? विधाता ब्रह्मा आश्चर्यचकित थे। उन्होंने कहा कि दरबान तुम `कृपया भगवान श्रीकृष्ण को सूचित करो कि मैं चतुर्मुख ब्रह्मा ,संतकुमारो का पिता ब्रह्मा ,और श्री भगवान की ही आज्ञा से इस सृष्टि रचना करने वाला ब्रह्मा हूँ । दरबान तब ब्रह्मा जी के विवरण को श्री भगवान क...

तू ही तू

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                            ॥ सन्तवाणी ॥           –श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज                                                                               तू-ही-तू जैसे बालक मिट्टीका खिलौना चाहता है तो पिताजी रुपये खर्च करके भी उसके लिये मिट्टीका खिलौना लाकर देते हैं । ऐसे ही हम संसार को चाहते हैं तो भगवान्‌ संसार रूपमें हमारे सामने आ जाते हैं । हम शरीर बनते हैं तो भगवान्‌ विश्व बन जाते हैं । शरीर बननेके बाद फिर विश्वसे भिन्न कुछ भी जाननेमें नहीं आता‒यह नियम है । सब कुछ भगवान्‌ हैं‒इसका चिन्तन नहीं करना है, प्रत्युत इसको स्वयंसे स्वीकार करना है । स्वीकार करते ही हमारी दृष्टि बदल जायगी । दृष्टिमें ही सृष्टि है । हमारी दृष्टि बदलेगी तो सारी सृष्टि बदल जायगी ! इसलिये अपनी दृष्टि ...

बेलपत्र की उत्पत्ति कैसे हुई?

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       बेलपत्र की उत्पत्ति कैसे हुई, इसके प्रकार , और उसकी पूजा करने से लाभ स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती के पसीने की बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और उससे बेल का पेड़ निकल आया। चुंकि माता पार्वती के पसीने से बेल के पेड़ का उद्भव हुआ। अत: इसमें माता पार्वती के सभी रूप बसते हैं। वे पेड़ की जड़ में गिरिजा के स्वरूप में, इसके तनों में माहेश्वरी के स्वरूप में और शाखाओं में दक्षिणायनी व पत्तियों में पार्वती के रूप में रहती हैं। फलों में कात्यायनी स्वरूप व फूलों में गौरी स्वरूप निवास करता है। इस सभी रूपों के अलावा, मां लक्ष्मी का रूप समस्त वृक्ष में निवास करता है। बेलपत्र में माता पार्वती का प्रतिबिंब होने के कारण इसे भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है। भगवान शिव पर बेल पत्र चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं। जो व्यक्ति किसी तीर्थस्थान पर नहीं जा सकता है अगर वह श्रावण मास में बिल्व के पेड़ के मूल भाग की पूजा करके उसमें जल अर्पित करे तो उसे सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य मिलता है। बेल वृक्ष का महत्व-  1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते। 2...

कर्माबाई का खिचड़ी भोग (सत्य घटना)

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                            कर्मा बाई का खिचड़ी भोग भगवान श्रीकृष्ण की परम उपासक कर्मा बाई जी जगन्नाथ पुरी में रहती थी और भगवान को बचपन से ही पुत्र रुप में भजती थीं । ठाकुर जी के बाल रुप से वह रोज ऐसे बातें करतीं जैसे ठाकुर जी उनके पुत्र हों और उनके घर में ही वास करते हों।  एक दिन कर्मा बाई की इच्छा हुई कि ठाकुर जी को फल-मेवे की जगह अपने हाथ से कुछ बनाकर खिलाऊँ । उन्होंने जगन्नाथ प्रभु को अपनी इच्छा बतलायी । भगवान तो भक्तों के लिए सर्वथा प्रस्तुत हैं । प्रभु जी बोले - "माँ ! जो भी बनाया हो वही खिला दो, बहुत भूख लगी है ।" कर्मा बाई ने खिचड़ी बनाई थी । ठाकुर जी को खिचड़ी खाने को दे दी । प्रभु बड़े चाव से खिचड़ी खाने लगे और कर्मा बाई ये सोचकर भगवान को पंखा झलने लगीं कि कहीं गर्म खिचड़ी से मेरे ठाकुर जी का मुँह ना जल जाये । संसार को अपने मुख में समाने वाले भगवान को कर्मा बाई एक माता की तरह पंखा कर रही हैं और भगवान भक्त की भावना में भाव विभोर हो रहे हैं । भक्त वत्सल भगवान ने कहा - "माँ ! मुझे तो खिचड़ी बहुत अच्छी लगी । ...

भक्ति के 9 प्रकार हैं,आप की कौन सी भक्ति हैं?

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               भक्ति के 9 प्रकार हैं,आप की कौन सी भक्ति हैं? प्राचीन शास्त्रों में भक्ति के 9 प्रकार के बताए गए हैं जिसे नवधा भक्ति कहते हैं। श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ इन्हें ही नवधा भक्ति के नाम से जाना जाता है । ( १ ) -- श्रवण :             ईश्वर की लीला, कथा,स्त्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित मन से निरंतर सुनना। ( २ ) -- कीर्तन :              ईश्वर के गुण,चरित्र,नाम,पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना। ( ३ ) -- स्मरण :               निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना। ( ४ ) - पाद सेवन:                 ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना। ( ५ ) - अर्चन :                  मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्...