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दिसंबर, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

bhakt himmtdas

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भक्त  हिम्मतदास   भगवान सदा अपने भक्तो का ध्यान रखते हैं। उनके बड़े से बड़े कष्टो को पलमात्र में नष्ट कर देते हैं, परन्तु वह उन्ही भक्तो का साथ देते हैं जो पूर्णरूप से प्रभु के चरणो में समर्पित हो जाते हैं। ऐसे ही प्रभु  के कृपापात्र हुए हैं -भक्त हिम्मतदास।     हिम्मतदास और उनकी पत्नी में अगाध प्रेम था। दोनों ही भगवान के प्रति पूर्ण समर्पित थे। एकबार लक्ष्मीजी ने भगवान से पूछा कि महाराज  क्या आपसे बड़ा भी कोई हैं ? भगवान विष्णु ने सरल भाव से कहा -हाँ हैं , वह हैं हमारा भक्त। लक्ष्मीजी ने कहा -तब तो वे रिश्ते में मेरे जेठ हुए। जेठ अथवा ससुर से नारियो में पर्दे का विधान हैं अत:मैं भी आपके भक्तो से पर्दा करती रहूंगी। आप देखते हैं कि  जो भगवान का सच्चा भक्त होता हैं वह लक्ष्मीजी की कृपा से तो वंचित रहता हैं परन्तु प्रभु  की कृपा का पात्र बन जाता हैं , और प्रभु उसके सभी कष्टो को दूर करने के लिए वैसा ही रूप धारण कर लेते हैं , जिससे उसके कष्ट दूर हो। इसी प्रकार भक्त हिम्मतदास भी अपनी पत्नी के साथ प्रभु चरणो में लीन होकर राम नाम जपते थे...

धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय

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धीरे -धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय।                                                धीरे. -धीरे एक- एक सीढ़ी  पर चढ़ने वाले को गिरने का भय  नहीं रहता। ऊपर चढ़ने में देर अवश्य लगती हैं पर वह अपनी मंजिल तक पहुचँ  ही जाता हैं। ज्ञानी पुरुष वह हैं  अपनी बुद्धि  से काम ले किसी भी काम को करनेसे पहले उसके परिणाम को सोच लेना चहिये, यही बुद्धिमानी की निशानी हैं। यदि तुम्हे अपनी बुद्धि  पर भरोसा नहीं तो अपने आपको भगवान  के चरणो में सौंप दो। जिस तरह नासमझ बच्चा माँ की गोद  में जाकर निर्भय हो जाता है।  माता अपने बच्चे के सुख -दुःख का भार अपने ऊपर लेकर उसकी रक्षा करती हैं।            तुम भी भगवान पर भरोसा करके निर्भय हो जाओ। सोच लो वो जो भी करेंगे तुम्हारे भले के लिए ही करेंगे। जो कुछ भी वह तुम्हे दे , उसे प्रसन्नता पूर्वक लो। दूसरे के सुख वैभव  देखकर मन मत ललचाओ। अपने भाग्य को मत धिक्...

देवयानी कौन थी भाग 2

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देवयानी कौन थी ?भाग २ कच  ने मृत संजीवनी विद्या को सीखकर जीवित होकर शुक्राचार्य का पेट फाड़कर बाहर निकल कर ,शुक्राचार्य को भी जीवित कर लिया। कच ने एक हजार वर्ष की तपस्या पूरी करने के पश्चात दीक्षा लेकर स्वर्ग जाने की अनुमति शुक्राचार्य से मांगी। गुरु से आज्ञा लेकर स्वर्ग को प्रस्थान करते हुए कच  के समक्ष देवयानी आई , देवयानी ने करबद्ध होकर प्राथर्ना की कि  मैं आपसेप्रेम करती हूँ एंव आपसे शादी करना चाहती हूँ।  कच ने विन्रम भाव से कहा कि  मैं आपसे शादी नहीं कर सकता क्योंकि एक तो आप गुरु पुत्री हैं , दूसरा मेरा पुनर्जन्म आपके पिता के पेट से हुआ हैं इसलिए आप मेरी बहन हुई। आप ही विचार कीजिये आपका विवाह मेरे साथ धर्म मर्यादा के विरुद्ध हुआ कि  नहीं।  वृहष्पति पुत्र के द्वारा ठुकराए जाने से आहत व अपमानित देवयानी ने क्रोधित होते हुए कहा -मेरे प्रेम का आपने निरादर किया हैं     इसीलिए मैं आपको श्राप देती हूँ कि  मेरे पिता द्वारा सिखाई गई विद्या आपके किसी काम नहीं आएगी।  कच बोले मैं आपके द्वारा दिए गए इस श्राप को शिरोधार्य...

devyani kaun thi ?

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देवयानी कौन थी राजस्थान में एक सरोवर हैं जिसका नाम हैं देवदानी। इसका असली नाम हैं देवयानी।देवयानी का नाम क्यों पड़ा तथा देवयानी कौन थी ? यह निश्चित रूप से जिज्ञासा का विषय हैं। प्राचीन समय की बात हैं देव और दानवो में युद्ध चल रहा था। देवताओ के गुरु वृहस्पतिजी और दानवो के गुरु शुक्राचार्य अपनी अपनी सेना का प्रतिनिधत्व कर रहे थे युद्ध में दोनों और से प्रतिदिन देव और दानवो का वध हो रहा था , किन्तु राक्षस सेना में कोई भी कमी न होते देख देवताओ को चिंता हुई। दैत्य गुरु अपनी मृत संजीवनी विद्या से तुरंत जीवित कर लेते थे। देव गुरु वृहस्पतिजी के पास ऐसी कोई विद्या नहीं थी , ऐसे में चिंतित देवता एकत्रित होकर वृस्पतिजी के पुत्र कच  के पास गए। उन्होंने प्राथर्ना की कि और कहा -हे गुरु पुत्र हम सब आपकी शरण में हैं , आपको विदित हैं की शुक्राचर्य पास मृत संजीवनी विद्या हैं जिसके कारण राक्षस दुबारा जीवित  जाते हैं। आपको देवताओ के सम्मान , प्रतिष्ठा और रक्षा हेतु उनकी शरण में जाकर यह विद्या सीखनी होगी।  देवताओ के आग्रह को स्वीकार करते हुए कच  दैत्य गुरु की शरण में गए और व...