धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय

धीरे -धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय। 


                                             
धीरे. -धीरे एक- एक सीढ़ी  पर चढ़ने वाले को गिरने का भय  नहीं रहता। ऊपर चढ़ने में देर अवश्य लगती हैं पर वह अपनी मंजिल तक पहुचँ  ही जाता हैं। ज्ञानी पुरुष वह हैं  अपनी बुद्धि  से काम ले किसी भी काम को करनेसे पहले उसके परिणाम को सोच लेना चहिये, यही बुद्धिमानी की निशानी हैं। यदि तुम्हे अपनी बुद्धि  पर भरोसा नहीं तो अपने आपको भगवान  के चरणो में सौंप दो। जिस तरह नासमझ बच्चा माँ की गोद  में जाकर निर्भय हो जाता है।  माता अपने बच्चे के सुख -दुःख का भार अपने ऊपर लेकर उसकी रक्षा करती हैं। 
          तुम भी भगवान पर भरोसा करके निर्भय हो जाओ। सोच लो वो जो भी करेंगे तुम्हारे भले के लिए ही करेंगे। जो कुछ भी वह तुम्हे दे , उसे प्रसन्नता पूर्वक लो। दूसरे के सुख वैभव  देखकर मन मत ललचाओ। अपने भाग्य को मत धिक्कारो। सोच लो कि जितना तुम भोग सकते  हो , उतना ही भगवान ने तुम्हे दे रखा हैं। जिस तरह माँ के चार बच्चे हैं उनको वह समान ही प्यार करती हैं। अगर उसमे से एक बीमार हो जाता हैं  तो वह  समानता रखते हुए भी बीमार बच्चे कोकड़वी दवाई पिलाएगी। अगर वह मिठाई की चाह  करेगा तो वह उसकी जिद पूरी नहीं करेगी , क्योंकि माँ जानती हैं की उसके बच्चे के हित  के लिए क्या अच्छा हैं , और क्या नहीं। ऐसे ही हम दुसरो के सुख वैभव को देखकर अपने को दुखी करे , भगवान को भला -बुरा कहे , तो यह हमारी मूर्खता होगी। 
         दुःख  कड़वी दवा के सामान हैं , जिसे देखते ही हम अबोध बच्चे की तरह हाथ -पांव मारने लगते हैं , अपने भाग्य को कोसते हैं ;यह नहीं समझते दयालु प्रभु ने हमारी भलाई के लिए ही यह कड़वी दवाई भेजी हैं। तुम मानो  या न मानो हमारी  बढ़ती    
इच्छा ही हमारी  बीमारी का कारण हैं। यह जब बढ़ती जाती हैं तो हमे भले -बुरे का ज्ञान नहीं रहता। जिस पर प्रभु की कृपा 
दृष्टि हो जाती हैं उसे जल्द ही ठोकर लग जाती हैं और वह सँभल जाता हैं ,इसलिए  जितना जल्दी हो सके अपनी इच्छाओ का दमन करो और जहाँ तक हो सके उन से दूर रहने की कौशिश करो। 
           मानो या न मानो जितना तुम्हे जरूरत हैं तुम्हे उतना दे रखा हैं। छोटे -से -छोटे कीड़े का भी पेट भरते हैं वह। 
           शरीर में गर्मी का रहना जरुरी हैं यह कौन नहीं जानता ,जब यही गर्मी जरूरत से ज्यादा बड़ जाती हैं  तो लोग इसे बुखार कहने  लगते हैं। इसी प्रकार जितनी तुम्हारी शरीर की जरूरत हैं उससे अधिक की इच्छाए भी एक बुखार की तरह हैं। इनसे जितना दूर रहो उतना ही अच्छा हैं। नही तो यह इच्छाए  एक दिन तुम्हारे लिए मृत्यु का बहाना कर देंगी।
             एक लक्खुमल था -पता नही , माँ -बाप ने क्या सोचकर उनका यह नाम रख दिया पर लक्खू को यह लगता था कि यह नाम उसके लखपति बनने की निशानी हैं। भगवान ने खाने पीने को पर्याप्त दे रखा था दो जीव थे पति और पत्नी। मजे में गुजारा हो रहा था। पर लखपति बनने के चक्कर में खाना -पीना हराम हो गया।  इतना पैसा कैसे प्राप्त हो बस यही चिंता रहने लगी। धीरे -धीरे पैसा जमा करेंगे तो जीवन बीत जाएगा इसलिए  जल्दी लखपति बनने के चक्कर में सट्टे  सहारा लिया घर में जो जमा पूंजी थी वो लगा दी जीत गए , हौसला बढा तो जीती हुई रकम सारी  फिर लगा दी। लक्खू जी एक ही दिन में लखपति बन गए खुशी के मारे चीख उठे और ठंडे हो गए। लोगो ने संभाला  सेठ जी ठण्डे हो चुके थे। मृत्यु को उनकी दौड़ भाई नहीं। जो तुम्हारे पास हैं उसमे संतोष करो ,उसी में आनंद हैं। भगवान के कृपा -पात्र बने रहोगे और सुख का अनुभव करोगे।
                                                                                             श्री  राधे !

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