प्रभु का स्वभाव कैसा होता है?
प्रभु का स्वभाव भगवान श्री राम का कथन हैं कि कोई भी मुझसे मित्रता के लिए हाथ बढ़ाये तो मैं इंकार नहीं कर सकता हूँ , फिर चाहे उसमे दोष ही क्यों न हो। मैं जब जीवों को अपनाता हूँ , जीव जब पूर्ण रूप से आत्मसमर्पण कर देता हैं तब वह निर्दोष हो जाता हैं। शरणागत को प्रभु के सन्मुख रहना चाहिए। हर समय प्रभु के श्री मुख को भक्त देखा करता हैं और प्रभु भक्त को देखते रहते हैं। इस प्रकार के भक्त को सन्मुख कहते हैं। सन्मुख भक्त के सभी पाप -ताप नष्ट हो जाते हैं। विमुख प्राणी ईश्वर से पीठ करके रहता हैं , तो प्रभु भी उससे पीठ कर लेते हैं। भक्तो के...