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अधिक चंचलता उचित नहीं है।

                      अधिक चंचलता उचित नहीं है   प्राचीन काल की बात है सूर्यवंश  में शर्याती नाम के एक राजा थे ।उनके नगर के समीप ही मानसरोवर के समान एक सरोवर था । महर्षि भृगु का चयव्न  नामक एक बड़ा ही तेजस्वी पुत्र था। वह इस सरोवर के तट पर तपस्या करने लगा, वह मुनि कुमार बहुत समय तक वृक्ष के समान निश्चल रहकर एक ही स्थान पर विरासन में बैठे रहा, धीरे-धीरे अधिक समय बीतने पर उसका शरीर तृण और लताओं से ढक गया ।उस पर चीटियों ने अड्डा जमा लिया। ऋषि बांबी के रूप में दिखाई देने लगे ,वे चारों ओर से केवल मिट्टी का पिंड जान पड़ते थे। इस प्रकार बहुत काल व्यतीत होने के बाद एक दिन राजा शर्याति इस सरोवर पर क्रीडा करने के लिए आए उनकी 4 सहस्त्र सुंदर रानियां और एक सुंदर कन्या थी, उसका नाम सुकन्या था ।वह दिव्य गुणों से विभूषित कन्या अपनी सहेलियों के साथ विचरती   हुई उस चय्वन ऋषि के बांबी के पास पहुंच गई ,उसने उस बांबी के छिद्र में से चमकती हुई आंखों को देखा ,इससे उसे बड़ा कोतूहल हुआ, फिर बुद्धि भ्रमित हो जाने से उसने उन्हे...

क्या है चरणामृत का महत्व ?

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              क्या है चरणामृत का महत्व ????? अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है,क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की कि चरणामृतका क्या महत्व है, शास्त्रों में कहा गया है। अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।। "अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है। जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता" जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है। चरणामृत से सम्बन्धित एक पौराणिक गाथा काफी प्रसिद्ध है जो हमें श्रीकृष्ण एवं राधाजी के अटूट प्रेम की याद दिलाती है। कहते हैं कि एक बार नंदलाल काफी बीमार पड़ गए। कोई दवा या जड़ी-बूटी उन पर बेअसर साबित हो रही थी। तभी श्रीकृष्ण ने स्वयं ही गोपियों से एक ऐसा उपाय करने को कहा जिसे सुन गोपियां दुविधा में पड़ गईं। श्रीकृष्ण हुए बीमार,,,,दरअसल श्रीकृष्ण ने गोपियों से उन्हें चरणामृत पिलाने को क...

वृन्दावन आखिर है क्या?

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                                  वृन्दावन क्या है?  वृन्दावन आखिर है क्या? लोग क्यों यहां एक बार जाकर केवल तन से वापस आते हैं, मन वहीं छूट जाता है? वृन्दावन का आध्यातमिक अर्थ है- "वृन्दाया तुलस्या वनं वृन्दावनं" तुलसी का विषेश वन होने के कारण इसे वृन्दावन कहते हैं। वृन्दावन ब्रज का हृदय है जहाँ भगवान श्री राधाकृष्ण ने अपनी दिव्य लीलायें की हैं। इस दिव्य भूमि की महिमा बड़े-बड़े तपस्वी भी नहीं समझ पाते। ब्रह्मा जी का ज्ञान भी यहाँ के प्रेम के आगे फ़ीका पड़ जाता है। । इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि वृन्दावन का कण-कण रसमय है। रसिकों की राजधानी भी वृन्दावन को कहा जाता है। वृन्दावन श्री राधिका जी का निज धाम है। विद्वत्जन श्री धाम वृन्दावन का अर्थ इस प्रकार भी करते हैं "वृन्दस्य अवनं रक्षणं यत्र तत वृन्दावनं" जहाँ श्री राधारानी अपने भक्तों की दिन-रात रक्षा करती हैं, उसे वृन्दावन कहते हैं। वृन्दावन तीर्थों का राजा है। कृष्ण और वृन्दावन एक दूसरे का पर्याय हैं दोनों एक हैं अलग नही। जिस प्रकार श्रीमद ...

एसा न हो फिर देर हो जाऐ

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                       ऐसा न हो फिर देर हो जाऐ जब सारे शरीर की शक्ति क्षीण हो जाती है, उसका चलना फिरना, उठना बैठना --- सब दूभर हो जाता है । खटिया पर पड़े पड़े वह पश्चाताप करता रहता है कि हाय - हाय सारा जीवन बेकार चला गया । अब उसे ईश्वर का ध्यान आता है, उनसे प्रार्थना करता है, किंतु तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है ---- इतने पर भी करुणा वरुणालय प्रभू उस पर कृपा कर कहते है ---- वत्स! अभी भी कुछ नही बिगड़ा है, तुम्हारी जिभ्हा अभी भी काम कर रही है, तुम चाहो तो अभी भी  लोक - परलोक बना सकते हो । इसलिये तुम " नारायण " नाम रुपी अमृत का निरंतर पान करो ।

जीवन मे सफलता के लिए भगवान श्रीकृष्ण के ग्यारह सूत्र

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जीवन मे सफलता के लिए भगवान श्रीकृष्ण के ग्यारह सूत्र!!!! !!!!" भगवान कृष्ण ने गीता के माध्यम से संसार को जो शिक्षा दी, वह अनुपम है। वेदों का सार है उपनिषद और उपनिषदों का सार है ब्रह्मसूत्र और ब्रह्मसूत्र का सार है गीता। सार का अर्थ है निचोड़ या रस। गीता में उन सभी मार्गों की चर्चा की गई है जिन पर चलकर मोक्ष, बुद्धत्व, कैवल्य या समाधि प्राप्त की जा सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो जन्म-मरण से छुटकारा पाया जा सकता है। तीसरे शब्दों में कहें तो खुद के स्वरूप को पहचाना जा सकता है। चौथे शब्दों में कहें तो आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और पांचवें शब्दों में कहें तो ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। भगवान श्रीकृष्ण के वे रहस्यमय सूत्र जिन्हें जानकर आपको लगेगा कि सच में यह बिलकुल ही सच है। निश्‍चित ही उनके ये सूत्र आपके जीवन में बहुत काम आएंगे। जीवन में सफलता चाहते हैं ‍तो गीता के ज्ञान को अपनाएं और निश्‍चिंत तथा भयमुक्त जीवन पाएं।  पहला सूत्र,सफलता : - भगवान श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि यदि आप लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल रहते हैं, तो अपनी रणनीति बदलें, लक्ष्य नहीं। ...इस ज...

प्रतीक्षा, परीक्षा और समीक्षा।

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                    प्रतीक्षा, परीक्षा और समीक्षा। प्रतीक्षा- भक्ति के मार्ग में प्रतीक्षा बहुत आवश्यक है। प्रभु जरूर आयेंगे, कृपा करेंगे, ऐसा विश्वास रखते हुए प्रतीक्षा करें। बहुत बड़ी प्रतीक्षा के बाद शबरी की कुटिया में प्रभु आये थे। परीक्षा- संसार की परीक्षा करते रहें। इस संसार में सब अपने कारणों से जी रहे हैं। किसी के भी महत्वाकांक्षा के मार्ग पर बाधा बनोगे वही तुम्हारा अपना, पराया हो जायेगा। संसार का तो प्रेम भी छलावा है। संसार को जितना जल्दी समझ लो तो अच्छा है ताकि प्रभु के मार्ग पर तुम जल्दी आगे बढ़ो। समीक्षा - अपनी समीक्षा रोज करते रहो, आत्मचिन्तन करो। जीवन उत्सव कैसे बने ? प्रत्येक क्षण उल्लासमय कैसे बने? जीवन संगीत कैसे बने, यह चिन्तन जरूर करना। कुछ छोड़ना पड़े तो छोड़ने की हिम्मत करना और कुछ पकड़ना पड़े तो पकड़ने की हिम्मत रखना। अपनी समीक्षा से ही आगे के रास्ते दिखेंगे।  ।।जय श्री कृष्ण।।

मां दुर्गा के नौ रूप

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मां दुर्गा के नौ रूप मां दुर्गा के नौ रुपों की पूजा की जाती है। देवी दुर्गा के नौ रूप हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंधमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। इन नौ रातों में तीन देवी पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ रुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। नवदुर्गा के नौ स्वरूप स्त्री के जीवनचक्र को दर्शाते है।  1. जन्म ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री" स्वरूप है।  2.स्त्री का कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" का रूप है। 3. विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह "चंद्रघंटा" समान है। 4. नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह "कूष्मांडा" स्वरूप में है। 5. संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री "स्कन्दमाता" हो जाती है। 6. संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री "कात्यायनी" रूप है। 7. अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह "कालरात्रि" जैसी है। 8. संसार (कुटुंब ही उसके लिए संसार है) का उपकार करने से "महागौरी...

भजन सिमरन करने से क्या खास होता है?

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            भजन सिमरन करने से क्या खास होता है? अर्जुन श्री कृष्णजी से बोले :-"केशव, जब मृत्यु सभी की होनी है तो हम सत्संग भजन सेवा सिमरन क्यों करे, जो इंसान मौज मस्ती करता है मृत्यु तो उसकी भी होगी..!" "श्री कृष्णजी ने अर्जुन से कहा:-"हे पार्थ, बिल्ली जब चूहे को पकड़ती है तो दांतो से पकड़कर उसे मार कर खा जाती है, लेकिन उन्ही दांतो से जब अपने बच्चे को पकड़ती है तो उसे मारती नहीं बहुत ही नाजुक तरीके से एक जगह से दूसरी जगह पंहुचा देती है..!दांत भी वही है मुह भी वही है पर परिणाम अलग अलग। ठीक उसी प्रकार मृत्यु भी सभी की होगी ,पर एक प्रभु के धाम में और दूसरा 84 के चक्कर में!  तो यह आपको निर्णय लेना है कि प्रभु का नाम लेते हुए इस जीवन का बिताना है ,या सिर्फ मौज मस्ती करते हुए। मौज मस्ती भी करो, लेकिन प्रभु को कभी नहीं भूले।पूरे दिन में एक समय निश्चित कर लो कि दिन में एक बार अपने प्रभु को जरूर याद करना है और उस को धन्यवाद करना है कि उन्होंने आपको इतना सामर्थ्य वान बनाया कि आप मौज मस्ती कर रहे हैं ।😊 जय श्री राधे🙏🌹

साधना सफल कैसे होती है

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                    साधना सफल कैसे होती ?                           साधनाऐं देवी-देवताओं की, मन्त्र, तंत्र की जो कर्मकांडों एवं अनुष्ठानों के साथ की जाती है, पर साधनाएँ साधक की आत्मिक स्थिति के अनुसार ही सफल होती हैं।             श्रद्धा और विश्वास , साहस और धैर्य, एकाग्रता और स्थिरता, दृढ़ता और संकल्प ही वे तत्व हैं, जिनके आधार पर यह साधनाएँ सफल होती है।             यदि साधक का संकल्प दुर्बल हो, श्रद्धा और विश्वास ढीलें हों, चित्त अस्थिर और अधीर रहे तो विधि-विधान सही होते हुए भी सही परिणाम नहीं मिलता।          सच तो यह है कि आत्मा के अंतरंग प्रदेश में ही उन अदृश्य दैवी-शक्तियों का निवास होता है जो हमें कहीं बाहर रहती दिखती है। जय श्री राधे

मुश्किलों में

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मुश्किलों में मुश्किलें बिन बुलाए मेहमान की तरह होती हैं, जो हमें बिना बताए परेशान करने चली आती हैं । और तब तक नहीं जाती हैं, जब तक कि हम उनका अपने विश्वास ,हौसला और परिश्रम से मुकाबला नहीं करते हैं ॥ लेकिन मुश्किलों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वो हमें पहले से ज्यादा सतर्क, पहले से ज्यादा मजबूत और पहले से ज्यादा होशियार बना देती हैं. और इनकी सबसे अच्छी बात ये होती है कि, जाते-जाते हमें कोई-न-कोई सबक जरुर सीखा देती हैं। ।।राधे राधे।।

प्रकृति के तीन कड़वें नियम

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प्रकृति के तीन कड़वे नियम जो सत्य है 1-: प्रकृति  का पहला  नियम- यदि खेत में  बीज न डालें जाएं  तो कुदरत  उसे *घास-फूस* से  भर देती हैं...!! ठीक  उसी  तरह से  दिमाग  में *सकारात्मक* विचार  न भरे  जाएँ  तो *नकारात्मक*  विचार  अपनी  जगह  बना ही लेती है...!! 2-: प्रकृति  का दूसरा  नियम- जिसके  पास  जो होता है...!!   वह वही बांटता  है....!!* सुखी *सुख* बांटता है... दुःखी *दुःख* बांटता है.. ज्ञानी *ज्ञान* बांटता है.. भ्रमित *भ्रम* बांटता है.. भयभीत *भय* बांटता हैं......!!  3-: प्रकृति  का तीसरा नियम- आपको जीवन से जो कुछ भी मिलें उसे पचाना  सीखें क्योंकि भोजन* न पचने  पर रोग बढते है...! पैसा न *पचने* पर दिखावा बढता है...! बात  न *पचने* पर चुगली  बढती है...! प्रशंसा  न *पचने* पर  अंहकार  बढता है....! निंदा  न *पचने* पर  दुश्मनी  बढती है...! राज न *पचने* पर  खतरा  बढता है...! दुःख...

आज का शुभ विचार

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यदा न कुरूते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम्। समदृष्टेस्तदा पुंस: सर्वा: सुखमया दिश:॥ अर्थात्:-- जो मनुष्य किसी भी जीव के प्रति अमंगल भावना नही रखता, जो मनुष्य सभी की ओर सम्यक् दॄष्टीसे देखता है, ऐसे मनुष्य को सब ओर सुख ही सुख है। ।।जय श्री राधे।।

परिपक्वता यानि मैच्योरिटी किसे कहते हैं?

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आदि शंकराचार्य जी से प्रश्न किया गया कि "परिपक्वता" का क्या अर्थ है? आदि शंकराचार्य जी ने उत्तर दिया – 1. परिपक्वता वह है - जब आप दूसरों को बदलने का प्रयास करना बंद कर दे, इसके बजाय स्वयं को बदलने पर ध्यान केन्द्रित करें. 2. परिपक्वता वह है – जब आप दूसरों को, जैसे हैं, वैसा ही स्वीकार करें. 3. परिपक्वता वह है – जब आप यह समझे कि प्रत्येक व्यक्ति उसकी सोच अनुसार सही हैं. 4. परिपक्वता वह है – जब आप "जाने दो" वाले सिद्धांत को सीख लें. 5. परिपक्वता वह है – जब आप रिश्तों से लेने की उम्मीदों को अलग कर दें और केवल देने की सोच रखे. 6. परिपक्वता वह है – जब आप यह समझ लें कि आप जो भी करते हैं, वह आपकी स्वयं की शांति के लिए है. 7. परिपक्वता वह है – जब आप संसार को यह सिद्ध करना बंद कर दें कि आप कितने अधिक बुद्धिमान है. 8. परिपक्वता वह है – जब आप दूसरों से उनकी स्वीकृति लेना बंद कर दे. 9. परिपक्वता वह है – जब आप दूसरों से अपनी तुलना करना बंद कर दें. 10. परिपक्वता वह है – जब आप स्वयं में शांत है. 11. परिपक्वता वह है – जब आप जरूरतों और चाहतों के बीच का अंतर करने में...

नवरात्र क्या है?

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नवरात्र या नवरात्रि → संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं। नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुध्द है। नवरात्र क्या है →  पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुध्द रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है। नौ दिन या रात → अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है।  यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है। रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है।...

शुभ वचन

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                        🌹।शाश्वत वचन।🌹  संसार का सब काम करो, परंतु मन ईश्वर पर रखो और समझो कि घर, परिवार, पुत्र सब ईश्वर के हैं। मेरा कुछ भी नहीं है। मैं केवल उनका दास हूँ। मैं मन से त्याग करने के लिये कहता हूँ। संसार छोड़ने के लिये मैं नहीं कहता। अनासक्त होकर, संसार में रह कर, अन्तर से उनकी प्राप्ति की इच्छा रखने पर, उन्हें मनुष्य पा सकता है॥ (श्रीरामकृष्णवचनामृत) *"हरि: शरणम्"*

बस एक बार राधा नाम लेने की कीमत

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                बस एक बार राधा नाम लेने की कीमत एक बार एक व्यक्ति था। वह एक संत जी के पास गया। और कहता है कि संत जी, मेरा एक बेटा है। वो न तो पूजा पाठ करता है और न ही भगवान का नाम लेता है। आप कुछ ऐसा कीजिये कि उसका मन भगवान में लग जाये। देवों में सबसे सुंदरतम भगवान श्री कृष्ण के जीवन की कई बातें अनजानी और रहस्यमयी है आइए जानें 24 अनजाने तथ्य. संत जी कहते है- "ठीक है बेटा, एक दिन तू उसे मेरे पास लेकर आ जा।" अगले दिन वो व्यक्ति अपने बेटे को लेकर संत जी के पास गया। अब संत जी उसके बेटे से कहते है- "बेटा, बोल राधे राधे..." बेटा कहता है- मैं क्यू कहूँ? संत जी कहते है- "बेटा बोल राधे राधे..." वो इसी तरह से मना करता रहा और अंत तक उसने यही कहा कि- "मैं क्यू कहूँ राधे राधे..." संत जी ने कहा- जब तुम मर जाओगे और यमराज के पास जाओगे तब यमराज तुमसे पूछगे कि कभी भगवान का नाम लिया। कोई अच्छा काम किया। तब तुम कह देना की मैंने जीवन में एक बार 'श्री राधा रानी' के नाम को बोला है। बस एक बार। इतना बताकर वह चले गए। समय व्यतीत हुआ और एक दिन वो मर गय...

कृष्ण से कृष्ण को मांगिए

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                       कृष्ण से कृष्ण को मांगिए        हृदय की इच्छाएं शांत नहीं होती हैं। क्यों??? एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी। किसी फकीर ने सम्राट से भिक्षा मांगी थी। सम्राट ने उससे कहा,''जो भी चाहते हो, मांग लो।''* दिवस के प्रथम याचक की कोई भी इच्छा पूरी करने का उसका नियम था। उस फकीर ने अपने छोटे से भिक्षापात्र को आगे बढ़ाया और कहा,''बस इसे स्वर्ण मुद्राओं से भर दें।''सम्राट ने सोचा इससे सरल बात और क्या हो सकती है! लेकिन जब उस भिक्षा पात्र में स्वर्ण मुद्राएं डाली गई, तो ज्ञात हुआ कि उसे भरना असंभव था। वह तो जादुई था। जितनी अधिक मुद्राएं उसमें डाली गई, वह उतना ही अधिक खाली होता गया!  सम्राट को दुखी देख वह फकीर बोला,''न भर सकें तो वैसा कह दें। मैं खाली पात्र को ही लेकर चला जाऊंगा! ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि लोग कहेंगे कि सम्राट अपना वचन पूरा नहीं कर सके ! ''सम्राट ने अपना सारा खजाना खाली कर दिया, उसके पास जो कुछ भी था, सभी उस पात्र में डाल दिया गया, लेकिन अद्भुत पात्...

भगवान के नाम की महिमा

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                     भगवान के नाम की महिमा                      जय श्री सीताराम                         कल्याण 86/8                      गीता प्रेस गोरखपुर                           नाम--महिमा                          °°°°°°°°°°°°           भगवान के नाम की अमित महिमा है । वह कही नहीं जा सकती। स्वयं भगवान भी अपने नाम के गुणों का पार नहीं पा सकते- कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।          भूल से लोग नाम और नामी को दो विभिन्न वस्तु तथा नाम को नामी से छोटा मानते हैं। नाम का माहात्म्य अपार है,  असीम है,  अनन्त है ।        नाम और न...

अथार्गलास्तोत्रम्( हिन्दी मे)

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अर्गला स्तोत्र का पाठ दुर्गा कवच   के बाद और कीलक स्तोत्र  के पहले किया जाता है। यह देवी माहात्म्य के अंतर्गत किया जाने वाला स्तोत्र अत्यंत शुभकारक और लाभप्रद है। इस स्तोत्र का पाठ नवरातत्रि के अलावा देवी पूजन में भी किया जाता है। ।। अथार्गलास्तोत्रम् ।। विनियोग- ॐ अस्य श्री अर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः अनुष्टुप छन्दः श्रीमहालक्ष्मीर्देवता श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः । ॐ नमश्चण्डिकायै [ मार्कण्डेय उवाच ] ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।। १।। जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तुते ।।२।। ॐ चंडिका देवी को नमस्कार है।  मार्कण्डेय जी कहते हैं - जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा - इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो। देवि चामुण्डे! तुम्हारी जय हो। सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। सब में व्याप्त रहने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। कालरात्रि!...