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जुलाई, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कर्म योग का जीवन में महत्व

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                                    कर्मयोग समतापूर्वक कर्तव्यकर्मोंका आचरण करना ही कर्मयोग कहलाता है। कर्मयोगमें खास निष्कामभावकी मुख्यता है। निष्कामभाव न रहनेपर कर्म केवल ‘कर्म’ होते हैं; कर्मयोग नहीं होता। शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म करनेपर भी यदि निष्कामभाव नहीं है तो उन्हें कर्म ही कहा जाता है, ऐसी क्रियाओंसे मुक्ति सम्भव नहीं; क्योंकि मुक्तिमें भावकी ही प्रधानता है। निष्कामभाव सिद्ध होनेमें राग-द्वेष ही बाधक हैं— ‘तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ’ (गीता ३। ३४); वे इसके मार्गमें लुटेरे हैं। अत: राग-द्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये। तो फिर क्या करना चाहिये ?— श्रेयान् स्वधर्मो विगुण: परधर्मात् स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: ॥ (गीता ३। ३५) —इस श्लोकमें बहुत विलक्षण बातें बतायी गयी हैं। इस एक श्लोकमें चार चरण हैं। भगवान्ने इस श्लोककी रचना कैसी सुन्दर की है ! थोड़े-से शब्दोंमें कितने गम्भीर भाव भर दिये हैं। कर्मोंके विषयमें कहा है— ‘श्रेयान् स्वधर्मो विगुण:’ यहाँ ‘श्रेयान्’ क...

एक संत की अमृत वाणी

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                         एक संत की अमृत वाणी(आत्म - दर्शन ) संत श्री रामसुखदास जी ने कल्याण मैगजीन में अपने श्री मुख से आत्मदर्शन के ऊपर प्रवचन दिए- उस परमात्मा का बहुत-बहुत शुक्रिया अदा करना है जिसने हमें यह बहुमूल्य मानव शरीर दिया है। वरना पशु-पक्षी की योनि मिलने पर किसी अन्य के सहारे को स्वीकारना पड़ता। इस शुभ अवसर को पाकर कितना अच्छा होगा कि हम अपनी   पहचान कर लें। वैसे तो दुनिया में मनुष्य के लिए जानने और मानने में कोई कमी नहीं है। बहुत विस्तार से वह ना जाने कितनी खोजकर्ता जा रहा है किसी ने हवाई जहाज उड़ा दिया तो किसी ने रेडियो-टीवी, कंप्यूटर जैसी आश्चर्यजनक चीजें जुटा डाली हैं फिर भी उसकी समझ का अंत नहीं आया, उसे स्वर को तो जाना समझा ही नहीं कि आखिर मेरा लक्ष्य क्या है? मनुष्य को सबसे बड़ा डर है वह मौत का! जो जन्म के बाद क्रमशः हर पल प्रत्येक सांस पर हो रही है चाहे ब्रह्माजी ही क्यों ना हो। अतः इस बहते हुए जीवन से कुछ ऐसा प्राप्त कर लें, जिसका कभी विनाश ना हो। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को बहुत हल्का ब...

मन में अच्छे विचार कैसे लाने चाहिए

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                       मन में अच्छे विचार कैसे लाने चाहिए मन तो चंचल है यह बात सभी जानते हैं , परंतु हमें चाहिए कि हम सदैव अपने मन में केवल सकारात्मक विचार ही लाएं। सकारात्मक सोच जब आपकी रहेगी तो मन प्रसन्न रहेगा और जब मन प्रसन्न रहेगा तो सेहत पर इसका सीधा असर पड़ेगा और सेहत अच्छी रहेगी। इसके विपरीत अगर हम नकारात्मक विचारों को ही सोचते रहेंगे, तो बेचारा दुखी मन सेहत पर भी प्रभाव डालेगा और सेहत खराब होने लगेगी। अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त हो जाएंगे और उसका सीधा असर यह होगा कि आपको अपनी जिंदगी रोचक नहीं लगेगी, भार लगने लगेगी, साथ ही साथ अधिक बीमारियां के घेरे में आप कैद हो जायेंगे। डॉक्टर, दवाई का साथ मजबूत हो जाएगा और अंत में जीवन जीने की ललक नहीं रहेगी। अतः आप कम से कम अपने स्वंय के स्वार्थ के लिए ही केवल प्रतिफल सकारात्मक सोच को अपने पवित्र मन में स्थान दें। इस बात पर जरा भी संदेह नहीं है कि आपके विचारों का प्रभाव आपके मन पर पड़ता है। इस मानव जीवन को अच्छा व्यतीत करने के लिए प्रतिफल केवल अच्छे-अच्छे विचार मन में स...

शत्रुता खत्म करने के लिए नरसिंह स्तुति का जाप करें

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                         श्री नरसिंह स्तुति (इस मंत्र का नित्य जप करने से शत्रु का नाश होता है व दुष्ट की दुष्टता खत्म हो जाती है,) स्वस्त्यस्तु विश्वस्य खल: प्रसीदतां ध्यायन्तु भुतानि शिवं मिथो धिया। मनश्च भद्रं भजतादधोक्षजे आवेश्यतां नो मतिरप्यहैतुकी॥ अथार्त्- समग्र विश्व का कल्याण हो, दुष्ट भी प्रसन्न हो जाएं (दुष्टों की दुष्टता समाप्त होकर उनमें साधुता का उदय हो, क्योंकि जब तक वह दुष्टता की आग में जलते रहेंगे तब तक प्रसन्न कैसे रह सकते हैं?) सभी प्राणी परस्पर एक दूसरे के कल्याण का चिंतन करें। हमारा मन शुभ संकल्प करने वाला हो और हे इंद्रियातीत भगवान नृसिंह! हमारी निष्काम बुद्धि निरंतर आप में ही लगी रहे। अगर आप संस्कृत में इसका जाप नहीं कर सकते, तो आप हिंदी में अनुवाद के द्वारा भी स्तुतिं  भी कर सकते हैं। आपकी भाषा कोई भी हो ईश्वर सब समझ जाते हैं इसलिए केवल हृदय से प्रार्थना कीजिए।

श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में अध्याय-3 का शेष

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            श्रीमद् भागवत गीता (हिंदी में अध्याय 3 का शेष) श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा- वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, , समस्त मनुष्य समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है॥२१॥  हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में ना तो कुछ कर्तव्य है और ना कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है । तो भी मैं क्रम में ही बरतता हूं॥२२॥  क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् में सावधान हो कर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए; क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं॥२३॥ इसलिए यदि मैं कर्म ना करूं, तो यह सब मनुष्य नष्ट भ्रष्ट हो जाएं और मैं सडंक्रता का करने वाला होंऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ॥२४॥  हे भारत! कर्म में आसक्त से अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्ति रहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करें॥२५॥  परमात्मा के स्वरुप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्र विहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अथार्त क...

सूर्य देव की उपासना -आदित्य हृदय स्त्रोत हिंदी में

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                     सूर्य देव की उपासना -आदित्य हृदय स्त्रोत हिंदी में                                   ॥श्री हरि॥ २१जून को सूर्य गृहण है इस दिन इसका पाठ करना चाहिए।इसके बाद  ॐ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात"का जाप करना चाहिए। 'उधर श्री रामचंद्र जी युद्ध से थक कर चिंता करते हुए रणभूमि में खड़े हुए थे । इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आए थे श्री राम के पास जाकर बोले' ॥१-२॥ 'सबके हृदय में रमण करने वाले महाबाहो राम! यह सनातन गोपनीय स्त्रोत सुनो। वत्स इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे। इस गोपनीय स्त्रोत का नाम है 'आदित्यहृदय'। यह परम पवित्र और संपूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्त्रोत है। संपूर्ण मंगलों का भी मंगल है। ...

श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में अध्याय 3

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                 श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में अध्याय 3                               अर्जुन ने कहा अर्जुन बोले-हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर यह केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?॥१॥ आप मिले हुए - से वचनों से मेरी बुद्धि को मानव मोहित कर रहे हैं।इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण प्राप्त हो जाऊं ॥२॥                              श्रीभगवानुवाच श्री भगवान बोले- हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गई है उनमें से शाम के योगियों की निष्ठा * साधन के परिपक्व अवस्था अथार्थ पराकाष्ठा का नाम निष्ठा है) ज्ञानयोग से*( माया से उत्पन्न हुए संपूर्ण गुणों के गुण में बरतते हैं, ऐसे समझकर तथा मन इंद्रियों और शरीर द्वारा होने वाली संपूर्ण क्रियाओं में कर्तापन के अभिमान से रहित होकर सर्वव्यापी  परमात्मा में एक ...

क्रोध करने से अपने आप को कैसे रोकें

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                             क्रोध करने से बचे                                     अक्रोध प्रभु कृपा से बुद्धि शुद्ध सात्विक रहे। परस्पर प्रेम बनाए रहें। किसी से कोई भूल हो तो उसे क्षमा करें। हम जानते हैं कि यह थोड़ा मुश्किल है, पर असम्भव नहीं, जिस पर भी क्रोध आ रहा है, उसके पास से कुछ समय के लिए दूर हो जाए, एक लम्बी  गहरी साँस ले, फिर अपने आप को समझा दे, क्रोध ना करें। जिसके ऊपर क्रोध किया जाता है, उसकी हानि नहीं होती है । जो क्रोध करता है उसी का रक्त जलता है। क्रोध करने से बुद्धि का नाश होता है ।विकास की गति मंद हो जाती है। क्रोध से हिंसा के और बदला लेने के भावों का उदय होता है। भाव से कर्म बनता है,कर्म को भोगने के लिए और फिर जन्म । बार-बार जन्म मरण होता है। जन्म लेना है, सत्संग भजन के लिए , बदला चुकाने के लिए नहीं। इसलिए शांत रहे। जब आप भजन कीर्तन में रम जाएंगे तो धीरे - धीरे मन शांत होने लगेगा, बस कोशिश करो कि...

प्रभु की कृपा कैसे बरसती है ,और कब बरसती हैं

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                  प्रभु की कृपा सभी पर हमेशा बरसती रहती है   दयामय प्रभु की कृपा सभी पर सदा बरसती रहती है। अन्यथा जीव - मनुष्य सुख की सांस नहीं ले सकता है। तीर्थ में सब की कामनाएं पूर्ण होती हैं। प्रभु एक ना एक कष्ट चिंता इसलिए देते हैं कि प्राणी हमारा स्मरण करें। भक्तों का जीवन चरित्र प्रेरणादायक रहता है। हर भक्त ने भगवान का चिंतन और विश्वास करके भगवान को पाया और सद्बुद्धि प्राप्त की। सद्बुद्धि बनी रहे इसी बात की तो आवश्यकता है। इससे प्राणियों के प्रति प्रेम बना रहता है। अपने वर्णाश्रम के कर्तव्य को यदि सच्चाई के साथ पालन किया जाए तो इसी से प्रभु संतुष्ट हो जाते हैं। मन की प्रसन्नता, प्रभु की कृपा का अनुभव कराती है ( दादा गुरु महाराज जी मलूक पीठ वृंदावन के मुख से

श्रीमद्भागवत गीता हिंदी में(अध्याय 2 का शेष)

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                 श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में अध्याय 2 या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा ॥३७॥ जय -पराजय, लाभ लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझ कर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा ;इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा॥३८॥  हे पार्थ !यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञान योग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्म योग के विषय में सुन - जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भलीभांति त्याग देगा अथाार्त सर्वथा नष्ट कर डालेगा॥ ३९॥  इस कर्मयोग में आरंभ का अथार्त बीज का नाश नहीं है और उल्टा फल स्वरुप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्म योग रूप धर्म का थोड़ा सा भी साधन जन्म मृत्युरूप महान भय से रक्षा कर लेता है॥४०॥  हे अर्जुन! इस कर्म योग में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही होती है ;किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्य की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनंत होती है॥४१॥  हे अर्जुन! जो भ...

श्रीमद् भागवत गीता हिंदी में अध्याय 2

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                           ॐ परमातम्ने नम: कल्याण की इच्छा करने वाले मनुष्य को जीवन में एक बार गीताजी का पाठ जरूर करना चाहिए और अगर वह सरल भाषा में उपलब्ध हो तो उसका लाभ जरूर उठाना चाहिए                       अथ द्वितीय अध्याय                         संजय उवाच संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्र वाले शोक युक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा।।१॥                   श्रीभगवानुवाच श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि ना तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, ना स्वर्ग को देने वाला है, और ना कीर्तन को करने वाला है ॥२॥ इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो ,तुझ में यह उचित नहीं जान पड़ती ।हे परंतु! हृदय की दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा॥...

श्रीमद भगवत गीता हिंदी में अध्याय 1 का शेष( पार्ट 2)

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                           श्रीमद्भागवत गीता(प्रथम अध्याय) अर्जुन ने कहा- हे राजन! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने मोर्चा बांधकर डटे हुए धृतराष्ट्र संबंधियों को देखकर,उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठा कर हृषीकेश श्री कृष्ण महाराज से यह वचन कहा - हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए।। 20-21।।  और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख लूं कि इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन किन के साथ युद्ध करना योग्य है तब तक उसे खड़ा रखिए ।।22।। दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित चाहने वाले जो जो यह राजा लोग इस सेना में आए हैं, इन युद्ध करने वालों को मैं देखूंगा।। 23।। संजय ने कहा  संजय बोले- हे धृतराष्ट्र! अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज श्री कृष्ण चंद्र ने दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने तथा संपूर्ण राजाओं के सामने उत्तम रथ को खड़ा करके इस प्रकार का कि हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कोंरवों देख।।...

श्रीमद्भागवत गीता (हिन्दी में) अध्याय 1

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                         श्री गीता जी की महिमा वास्तव में श्रीमद्भागवत गीता का महात्म्य वाणी द्वारा वर्णन करने के लिए किसी की भी सामर्थ्य नहीं है क्योंकि यह एक परम रहस्यमय ग्रंथ है। इस में संपूर्ण वेदों का सार संग्रह किया गया है। इसकी संस्कृत इतनी सुंदर और सरल है कि थोड़ा अभ्यास करने से मनुष्य उसको सहज ही समझ सकता है, परंतु उसका आशय इतना गंभीर है कि आजीवन निरंतर अभ्यास करते रहने पर भी उसका अंत नहीं आता है प्रतिदिन नए-नए भाव उत्पन्न होते रहते हैं। भगवान ने श्रीमद्भगवद्गीता रूप एक ऐसा अनूपमेय शास्त्र कहा है जिसमें एक भी शब्द  सदुपदेश से खाली नहीं है। श्री वेदव्यास जी ने महाभारत में गीता जी का वर्णन करने के उपरांत कहा है कि गीता सुगीता करने योग्य है। अतः श्री गीता जी को भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भाव सहित अंतकरण में धारण कर लेना मुख्य कर्तव्य है जो कि स्वयं भगवान विष्णु के मुखारविंद से निकली हुई है                       प्रथम अध्याय धृतराष्ट्र कह रहे हैं - हे स...

भक्ति करने से भक्तों को क्या लाभ मिलता है

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                                भक्ति की महिमा एक गृहस्थ कुम्हार भक्त था। एक संत ने उन्हें नाम दिया वह भजन करने लगे  सीधे सरल स्वभाव में भक्ति प्रकट हो गई अपने घर का काम करते हुए , भजन करते हुए वह सिद्ध हो गए, पर उन्हें पता ही नहीं कि मुझ में कुछ प्रभाव है। उन के समीप जो भी कोई जिस कामना से आता, उस की कामना पूर्ण हो जाती, उसका कष्ट मिट जाता। धीरे-धीरे उसकी प्रसिद्धि हो गई। गांव के राजा ने सुना तो वह फल फूल लेकर आया दर्शन कर भेट दे कर उन के समीप बैठे राजा ने पूछा भक्ति की क्या महिमा है। भक्त कुमार ने कहा राजन मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं अतः शास्त्रों का मुझे ज्ञान नहीं है पर अपने प्रत्यक्ष अनुभव की बात बतलाता हूं मैं मिट्टी के बर्तन बनाता हूं। व मेरी स्त्री व बच्चे भी इसी काम में लगे रहते हैं, मिट्टी में मिलाने के लिए घोड़े की लीद की जरूरत पड़ती है। घोड़े के लीद से खाद भी नहीं बनती, सुखाकर उसे जलाने के काम में भी नहीं लाया जाता है, आपके बहुत से घोड़े हैं। ढेरों लीद पड़ी रहती है। मेरी बीवी, बच्चों उ से...

भक्ति करने के लिए क्या करें

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                           भक्ति कैसे करें हम सब का मानना यह है कि सब प्रकार के अनुकूलता अथार्त (आसपास का वातावरण मेरे अनुसार हो।) प्राप्त हो तो मैं भक्ति करूं, परंतु सारी अनुकूलता किसी को इस संसार में नहीं मिलती है। भगवान जी मनुष्य को अनेक प्रकार से अपनी ओर आकर्षित करते हैं, कभी सुख देकर और कभी दुख देकर कुछ लोग कहते हैं कि परमात्मा का कोई रुप नहीं है परंतु वैष्णव लोग जो भी रूप सामने आता है उसे भगवान का ही रूप मानते हैं, सम्मुख का यही लक्षण है। विमुख को कहीं भी भगवान नहीं दिखते। विमुखता, दुष्टता क्षणिक है। थोड़ी देर के लिए हैं सदा नहीं रहेंगे। काम क्रोध भी थोड़ी देर के लिए ही होता है। शांति, दया  क्षमा आदि हमेशा रहते हैं, यह सर्वदा रह सकते हैं। हिरण्यकश्यप की दुष्टता थोड़ी देर की थी, प्रह्लाद की भक्ति नित्य है, सदा रहेगी. भगवान के नाम रूप लीला यह सच्चे साथी हैं सत्संग के लिए जब भी कोई ना मिले, कहने वाला या सुनने वाला ना हो, तब सबसे बड़े संत भगवान का नाम हैं। इनको साथ रखो अर्थात भगवान  का नाम जपो। जो प्...

असली पूजा है सबके काम आना

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असहाय की सेवा ही असली भगवान की पूजा है निष्काम भाव से की गई सेवा कभी-कभी भजन से विशिष्ट बन जाती है.। संकट में पड़े व्यक्ति को जल वस्त्र, औषधि आदि के दांन से उस में विराजमान भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए प्राणी मात्र की सेवा करने वाले का भी उद्धार हो जाता है। भूले भटके को रास्ता बता देना, बुरे मार्ग  से बचाकर सन्मार्ग पर चलाना, हरि भक्ति के पथ पर जी वो को पहुंचाना, यह सब ईश्वर को प्रसन्न करने के उत्तम साधन है। सच बात तो यह है कि इन शुभ कार्य के लिए ही यह मनुष्य शरीर मिला है इसलिए सब की उन्नति में अपनी उन्नति मानना, दूसरों के विनाश में अपना विनाश समझना, यही संत का लक्षण है ।मनुष्य के शरीर के भोगों को भोगने के लिए ईश्वर ने नहीं दिया है। खान-पान, निद्रा, संतान उत्पन्न करना आदि जानवरों आदि  की योनियों में भी सुलभ है। केवल विवेक, ज्ञान, भक्ति पशुओं में नहीं है। अतः मनुष्य शरीर से विवेक प्रेम प्राप्त कर ईश्वर की आराधना करनी चाहिए  यही उद्देश्य दूसरों को भी देना चाहिए।  जय श्री राधे (परमार्थ के पत्र मैं हमारे पूजनीय दादा गुरु के श्री मुख से) 

कैसे कर्म करने चाहिए

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   श्रीराम सब जगह हैं। धर्मशील अथार्त धर्मपाल के पास सभी प्रकार की सुख संपत्तियां बिना बुलाए ही आ जाती हैं। संपत्तियां रूप गुणों पर रहती हैं, विवेकपूर्वक कर्म करने वाले संकट से बच जाते हैं, बिना सोचे विचारे जो कर्म करता है उस पर अनेक आपत्तियां आती हैं कर्म के आरंभ में परिणाम पर विचार करना चाहिए। मेरे करम का क्या फल मिलेगा, मुझे तथा दूसरों को सुख होगा या दुख होगा, इस कर्म की लोक में प्रशंसा या निंदा होगी, यह करम भजन में बाधक है या साधक है, इस पर विचार करके ही कोई काम करना चाहिए इसी प्रकार संत भगवान के शुभ आशीर्वाद भी सज्जनों को बिना मांगे मिल जाते हैं। भक्ति का आचरण करने वाले साधु संतों के स्वय श्री हनुमान जी रक्षक हैं, असुर निकंदन है  दुष्टता  करके फिर हनुमान जी का शुभ आशीर्वाद मिलना कठिन है। प्रभु दीन दयालु हैं, आप सब पर दया करें, सत्संग सेवा में रुचि बड़े जब तक मन प्रभु में तल्लीन ना हो जाए, तब तक अपने कर्म को करते रहना चाहिए कर्म करने का उद्देश्य प्रभु की प्रसन्नता ही होनी चाहिए। जिस प्रकार प्रभु प्रसन्न हो वही कार्य करना चाहिए हम जब भगवान के अनुकूल रहेंगे तो भ...
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संसार के सभी प्राणियों में परमात्मा सूक्ष्म रुप से विराजमान है अतः किसी भी प्राणी का अपमान ईश्वर का अपमान है प्राणियों का सम्मान ईश्वर पूजा है। पिता माता आदि का , गुरुजनों का अपमान उनके वध के समान है। अपने मुंह अपनी बड़ाई करना आत्महत्या के समान है । अपने द्वारा हुए गुणों का वर्णन तथा अपनी प्रशंसा आत्महत्या के समान है। अपने शरीर के आराम के लिए अत्यधिक धन का, समय का खर्च नहीं करना चाहिए। संसारी कामों में आमदनी के अनुसार खर्च करना चाहिए। अपने से छोटों को शिक्षा देने के लिए अपने आचरण को सुधारना चाहिए। जब तक मन प्रभु में तल्लीन हो ना हो जाए, तब तक अपने कर्म को करते रहना चाहिए कर्म करने का उद्देश्य प्रभु की प्रसन्नता ही होनी चाहिए जिस प्रकार प्रभु प्रसन्न हो, वही कार्य करना चाहिए। भगवान के अनुकूल रहेंगे तो भगवान हमारे अनुकूल रहेंगे       जय श्री राधे