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मनुष्य के कल्याण में सबसे बड़ा बाधक

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मनुष्य के कल्याण में सबसे बड़ा बाधक (ब्रह्मलीन परम श्रधेय श्री जय दयालजी गोयन्दका) मनुष्य के कल्याण में सबसे प्रधान बाधक बुद्धि ,मन और इन्द्रियों के द्वारा विषयों में आसक्त होकर उन सबके आधीन हो जाना ही हैं |जब तक मन वश में नही होता ,तब तक परमात्मा की प्राप्ति होना बहुत ही कठिन हैं | भगवान कहते हैं - जिसका मन वश में नहीं हुआ हैं ,ऐसे पुरुष द्वारा योग प्राप्त होना मुश्किल हैं | अत: मन को वश में करने के लिए शास्त्रों में बहुत से उपाय बताए हुए हैं ,उनमे से किसी भी एक को अपना कर मन को वश में करना चाहिए |मन की चंचलता तो प्रत्यक्ष हैं |अर्जुन ने भी चंचल होने के कारण मन को वश में करना कठिन बतलाया हैं |परन्तु श्री कृष्ण कहते हैं कि अभ्यास के द्वारा यह संभव हैं इस अभ्यास के अनेक प्रकार हैं : 1-जहाँ -जहाँ मन जाए ,वहाँ- वहाँ ही परमात्मा के स्वरूप का अनुभव करना और वहीं मन को परमात्मा में लगा देना ;क्योंकि परमात्मा सब जगह सदा ही व्यापक हैं ,कोई भी ऐसा स्थान या काल नहीं हैं ,जहाँ परमात्मा नहीं हो | 2-मन जहाँ -जहाँ संसार के पदार्थो में जाए ,वहां से उसको विवेक पूर्वक हटाकर परमात्मा के स्वर...

dukho ka ant kese ho

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दुखो का अंत कैसे हो  मनुष्य की स्वभाविक इच्छा हैं ,दुखो से छुटकारा और सुख की प्राप्ति।  जिस मार्ग पे सुख पाना चाहते हो प्राय: गलत मार्ग होता हैं जिससे दुःख अशांति बढ़ती हैं। आज मनुष्य के अंदर सदाचार नियम तथा नियम का आभाव हैं तथा कलुषित बुराइयो का भंडार हैं। सुखासक्ति इतनी तीव्र हें कि कोई कर्म कुकर्म करने में संकोच नहीं हैं | आज मानव धर्म और नीति का चोला पहन रखा हैं ,परन्तु व्यवहार में अधर्म और अनीति के कार्य करतेहैं |यदि मनुष्य सचमें दुखो का अंत और सुख की प्राप्ति चाहता हैं तो उसे सही मार्ग अपनाना पड़ेगा |उसका उपाय यह हैं कि वह दुसरो के दुखो को अपना ले ,स्वयं दुःख लेकर दुसरो को सुख देने लगे तो उसे निश्चय ही परम सुख की प्राप्ति होगी | अपने आप से भिन्न दुसरो से सुख की आशा करना ही दुःख का मूल कारण हैं |परमात्मा से विमुख होना भी दुःख का कारण हैं |मनुष्य को यह मन में बिठा लेना चाहिय की ईश्वर ही मेरे हैं ,यह चिंता नहीं करनी चाहिय की मैं उनका हूँ कि नहीं ,वे मुझसे प्यार करते हैं या नहीं -यह संदेह तो संसार के जीवो से करना चाहिए |गीता में कहा हैं कि जो जीव जिस भाव से जित...

मन की उलझन

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एक बड़ी उलझन  यदि तुममे सम्पूर्ण आस्था हैं ,तब कोई प्रश्न नहीं .यदि तुममे आस्था नहीं हैं , तो प्रश्न पूछने की कोई जरुरत नहीं , क्योंकि उसके उत्तर में तुम्हे आस्था कैसे होगी ? उलझन - और उन प्रश्नो का क्या जो हम आपसे सम्पूर्ण आस्था से पूछते हैं ?  उत्तर - अगर ईश्वर में तुम्हारी आस्था हैं , जब तुम जानते हो कोई तुम्हारी देख - रेख कर रहा हैं , तो फिर प्रश्न पूछने की क्या आव श्यकता हैं ? यदि तुम बेंगलोर जाने के लिए कर्नाटक एक्सप्रेस में बैठे हो , तो क्या हर स्टेशन पर यह पूछने की जरूरत हैं की यह रेलगाड़ी कहाँ जा रही हैं ? और जब तुम्हारे पास कोई हैं जो तुम्हारी इच्छाओ का ध्यान रख रहा हैं तो ज्योतिषी के पास जाना ही क्यों हैं ? उलझन - अंधी आस्था ( ब्लाइंड फेथ ) क्या हैं ?  उत्तर - आस्था आस्था हैं ..... अंधी हो ही नहीं सकती .जिसे तुम अँधा कहते हो वह आस्था नहीं हैं . अंधेपन और आस्था का कोई मेल नहीं .जब तुम आस्था खो देते हो तो , तब तुम अंधे हो जाते हो .

Kalyan

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कल्याण   भजन में श्रद्धा करो। यह विश्वास करो कि भजन से ही सब कुछ होगा। भजन के बिना न संसार के कलेश मिटेंगे ,न विषयो से वैराग्य होगा ,न भगवान के  प्रभाव का महत्व समझ में आएगा और न परम श्रद्धा ही होगी ,सच्ची बात तो यह हैं कि जब तक भगवान की प्राप्ति नहीं होगी ,तब तक क्लेशो का पूर्ण रूप से नाश नहीं होगा।  भगवान की प्राप्ति के इस कार्य में जरा भी देर नहीं करनी चाहिए। ऐसा मत सोचो कि अमुक कार्य हो जाए तब भगवान का भजन करूँगा। यह तो मन का धोखा हैं। सम्भव हैं तुम्हारी वैसी स्थिति हो ही नहीं ,हो सकता हैं कि फिर कोई और स्थिति उत्पन्न हो जाए जो आपको भजन करने ही न दे। इससे अभी जिस स्थिति में हो उसी में भजन कर लो।  एक संत का भजन हैं जो मुझे बहुत अच्छा लगता हैं -अब न बनी तो फिर न बनेगी ,नर तन बार -बार नहीं मिलता। 

संत के विचार साधना करने के लिए क्या करना पड़ेगा

संत -उदबोधन  (ब्रह्मलीन श्रद्धेय स्वामी श्रीशरणान्दजी महराज) साधक को अपने प्रति ,जगत के प्रति ,प्रभु के प्रति क्या कर्तव्य हैं जिसका पालन करना चाहिए। अपने प्रति हमारा कर्तव्य यह हैं कि हम अपने को बुरा न बनाए ,जगत के प्रति कर्तव्य हैं कि हम जगत को बुरा न समझे और प्रभु के प्रति कर्तव्य हैं की हम उनको अपना माने।  हम तीनो में से एक भी नहीं करते ,फिर चाहते हैं साधक होना। तो यह नहीं हो सकता। प्रभु की चीज को अपना मानते हैं पर प्रभु को नहीं मानते।  इसलिए त्याग द्वारा जीवन अपने लिए ,सेवा द्वारा जीवन जगत के लिए ,तथा प्रेम द्वारा जीवन भगवान के लिए उपयोगी हो जाता हैं।  आप स्वीकार करिये कि प्रभु मेरे हैं ,इससे जीवन प्रभु के लिए उपयोगी सिद्ध हो जाएगा। सेवा का व्रत ले लीजिए तो जीवन जगत के लिए उपयोगी हो जाएगा। जब किसी से कोई चाह नहीं रहेगी तो जीवन अपने लिए उपयोगी हो जाएगा। 
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कल्याण  भगवत्कृपा  प्रश्नोत्तर  (स्वामी रामसुखदास जी के द्वारा प्रश्नों के उत्तर वह प्रश्न जो हमारे मन में उठा करते हैं) प्रश्न -अगर हमने विश्वास कर लिया की भगवान दयालु हैं ,फिर? उत्तर -फिर इस विश्वास को पक्का कीजिए ,इसका अभ्यास करना होगा कि भगवान के प्रत्येक कार्य में दया भरी हैं। चाहे वह कष्ट कारी ही क्यों न हो।  प्रशन -कष्ट में भी भगवान की दया कैसे हो सकती हैं ? उत्तर - जब माता हमे रगड़ -रगड़ कर नहलाती हैं तो हमे कष्ट होता हैं ,परन्तु माँ हमारे मैल को दूर करने के लिए ही ऐसा करती हैं। इसी प्रकार ईश्वर हमे कष्ट के द्वारा ही हमारे मन रूपी मैल को दूर करता हैं। जैसे माँ प्रेम मयी हैं, वैसे ही ईश्वर का हृदय भी प्रेम से भरा होता हैं।  भगवान को न मानो, लकिन भगवान की आज्ञा को मानो तब भी वह प्रसन्न रहते हैं। उनकी आज्ञा हैं कि किसी से घृणा नहीं करो,  राग द्वेष को छोड़ना ही भगवान की आज्ञा हैं। जो रागद्वेष छोड़ देता हैं ईश्वर उसे शांति देते हैं ,यह सोचकर कि वह मुझे नहीं मानता ,उसकी शांति को कम नहीं करते।  और अगर आज्ञा पालन की शक्ति नहीं है...
रक्ताल्पता या खून की कमी (ANAEMIA ) - हमारे खून में दो तरह की कोशिका होती हैं -लाल व सफ़ेद | लाल रक्त  कोशिका की कमी से शरीर में खून की कमी हो जाती है जिसे रक्ताल्पता  या अनीमिया कहा जाता है | लाल रक्त कोशिका के लिए लौहतत्व (iron)  आवश्यक है अत ः हमारे हीमोग्लोबिन में लौह तत्व की कमी के कारण  भी रक्ताल्पता होती है |  रक्ताल्पता या खून की कमी होने से शरीर में कमज़ोरी उत्पन्न होना,काम  में मन नहीं लगना,भूख न लगना,चेहरे की चमक ख़त्म होना,शरीर थका- थका लगना आदि इस रोग के मुख्य लक्षण हैं | स्त्रियों में खून की कमी के  कारण 'मासिक धर्म' समय से नहीं होता है | खून की कमी बच्चों में हो  जाने से बच्चे शारीरिक रूप से कमज़ोर हो जाते हैं जिसके कारण उनका  विकास नहीं हो पाता तथा दिमाग कमज़ोर होने के कारण याद्दाश्त पर  भी असर पढता है | इस वजह से बच्चे पढाई में पिछड़ने लगते हैं |  आइये जानते हैं रक्ताल्पता के कुछ उपचार - १- खून की कमी को दूर करने के लिए,अनार के रस में थोड़ी सी काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाकर पीने से लाभ होता है | ...
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कल्याण  भगवत्कृपा  प्रश्नोत्तर  स्वामी रामसुखदास जी के द्वारा प्रश्नों के उत्तर वह प्रश्न जो हमारे मन में उठा करते हैं) प्रशन -शास्त्र भगवान को परम दयालु और सर्वभूतों का सुहृदय कहते हैं  ;किन्तु संसार में प्रत्यक्ष देखा गया हैं कि बहुत से कष्ट हैं और जीव दुःखी हैं। इससे तो भगवान की निष्ठुरता सिद्ध होती हैं ,वे दयालु कैसे ? उत्तर -एक बालक देखता हैं कि किसी को फोड़ा हुआ हैं और डॉक्टर उसे चीर रहा हैं। बीमार आदमी बुरी तरह से चिल्लाता हैं ,यहाँ तक कि डॉक्टर को गालियाँ भी दे रहा हैं। बालक जाकर दुसरो से कहता हैं कि डॉक्टर साहब बहुत निष्ठुर हैं ;तो क्या डॉक्टर साहिब सचमुच में निष्ठुर हैं ?उनका उद्देश्य तो बीमार आदमी को निरोग करना हैं और फोड़ा अच्छा होने के बाद बीमार आदमी भी उनको दयालु मानकर उनका धन्यवाद करता हैं।  अज्ञानवश हमलोग भी असली तत्व को न जानने के कारण इसी बालक की तरह भगवन को निष्ठुर कहते हैं।  प्रशन -किन्तु हम तो बालक नहीं हैं ? उत्तर -जब हम लोगो में अज्ञानता हैं ,तब हम बालक नहीं तो और क्या हुएं ? प्रशन -मान लिया संसार के द...