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संत के विचार साधना करने के लिए क्या करना पड़ेगा

संत -उदबोधन 
(ब्रह्मलीन श्रद्धेय स्वामी श्रीशरणान्दजी महराज)




साधक को अपने प्रति ,जगत के प्रति ,प्रभु के प्रति क्या कर्तव्य हैं जिसका पालन करना चाहिए। अपने प्रति हमारा कर्तव्य यह हैं कि हम अपने को बुरा न बनाए ,जगत के प्रति कर्तव्य हैं कि हम जगत को बुरा न समझे और प्रभु के प्रति कर्तव्य हैं की हम उनको अपना माने। 
हम तीनो में से एक भी नहीं करते ,फिर चाहते हैं साधक होना। तो यह नहीं हो सकता। प्रभु की चीज को अपना मानते हैं पर प्रभु को नहीं मानते। 
इसलिए त्याग द्वारा जीवन अपने लिए ,सेवा द्वारा जीवन जगत के लिए ,तथा प्रेम द्वारा जीवन भगवान के लिए उपयोगी हो जाता हैं। 
आप स्वीकार करिये कि प्रभु मेरे हैं ,इससे जीवन प्रभु के लिए उपयोगी सिद्ध हो जाएगा। सेवा का व्रत ले लीजिए तो जीवन जगत के लिए उपयोगी हो जाएगा। जब किसी से कोई चाह नहीं रहेगी तो जीवन अपने लिए उपयोगी हो जाएगा। 

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