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गीता के तीसरे अध्याय का सरल अर्थ

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                  गीता के तीसरे अध्याय का सरल तात्पर्य इस मनुष्य लोक में सभी को निष्काम पूर्वक अपने कर्तव्य का तत्परता से पालन करना चाहिए। चाहे ज्ञानी हो या अज्ञानी हो, चाहे वह भगवान का अवतार ही क्यों ना हो। कारण की सृष्टि चक्र अपने-अपने कर्तव्य का पालन करने से ही चलता है। मनुष्य ना तो कर्मों का आरंभ किए बिना सिद्धि को प्राप्त होता है और ना कर्मों के त्याग से सिद्धि को प्राप्त होता है। ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना के समय प्रजा से कहा कि तुम लोग अपने-अपने कर्तव्य कर्म के द्वारा एक दूसरे की सहायता करो, एक दूसरे को उन्नत करो, तो तुम लोग परम श्रेय को प्राप्त हो जाओगे। जो सृष्टि चक्र की मर्यादा के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता उसका इस संसार में जीना व्यर्थ है। यद्यपि मनुष्य रूप में अवतरित भगवान के लिए इस त्रिलोकी में कोई कर्तव्य नहीं है फिर भी वे लोग संग्रह के लिए अपने कर्तव्य का तत्परता से पालन करते हैं। ज्ञानी महापुरुष को भी लोक संग्रह के लिए अपने कर्तव्य का तत्परता से पालन करना चाहिए। अपने कर्तव्य का निष्काम भाव पूर्वक पालन करते हुए मनुष्य...

गीता के दूसरे अध्याय का अर्थ

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                         गीता के दूसरे अध्याय का अर्थ अपने विवेक को महत्व देना और अपने कर्तव्य का पालन करना– इन दोनों उपाय में से किसी भी एक उपाय को मनुष्य दृढ़ता से काम में ले तो शौक चिंता मिट जाते हैं। जितने शरीर दिखते हैं, वह सभी नष्ट होने वाले हैं, मरने वाले है,पर उनमें रहने वाला कभी मरता नही है। जैसे शरीर बाल्यावस्था को छोड़कर युवावस्था को और युवावस्था को छोड़कर वृद्धावस्था को धारण कर लेता है ऐसे ही शरीर में रहने वाला एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को धारण कर लेता है। मनुष्य जैसे पुराने वस्त्र को छोड़कर नए वस्त्र को पहन लेता है। ऐसे ही शरीर में रहने वाला शरीर रूपी एक चोले को छोड़कर दूसरा चोला पहन लेता है। जितनी अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों आती है वह पहले नहीं थी और पीछे भी नहीं रहेगी और बीच में भी उन में प्रतिक्षण वियोग हो रहा है। तात्पर्य यह है कि वे परिस्थितियों आने जाने वाली है सदा रहने वाली नहीं है। इस प्रकाश स्पष्ट विवेक हो जाए तो हलचल, शोक, चिंता नहीं रह सकती। शास्त्र की आज्ञा के अनुसार जो कर्तव्य कर्म प्राप्त हो ...

गीता दर्पण गीता के प्रत्येक अध्याय का सरल अर्थ

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           गीता के प्रत्येक अध्याय का तात्पर्य          गीता का पहले अध्याय का अर्थ                                   पहला अध्याय जिन्होंने अपने प्रिय भक्त अर्जुन के कल्याण के लिए अत्यंत गोपनीय अपना गीता नमक हृदय प्रकट किया है तथा जिन्होंने ’मनुष्य जिस किसी परिस्थिति में स्थित रहता हुआ ही अपना कल्याण कर सकता है’ यह नहीं कला बताई है, उन भगवान श्री कृष्ण के लिए नमस्कार है।  जो लोग अपने सिद्धांत को गीता में घटाना चाहते हैं, वे इस गीता को देखते हैं तो उन्हें अपना पक्षरूप मुख दिखाने के लिए गीता स्वयं दर्पण है, परंतु जो मनुष्य पक्षपात और आग्रह से रहित होकर गीता के मत को जानना चाहते हैं उनके लिए मैंने यह अद्भुत गीता दर्पण लिखा है। मोह के कारण ही मनुष्य मैं क्या करूं और क्या नहीं करूं, इस दुविधा में फंसकर कर्तव्यच्युत हो जाता है अगर वह मोह के वशीभूत ना हो तो वह कर्तव्यच्युत नहीं हो सकता। भगवान, धर्म,परलोक आदि पर श्रद्धा रखने वाले मनुष्यों के भीतर...

गीता दर्पण(श्रीमद् भागवत गीता का सरल रूप

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गीता दर्पण(श्रीमद् भागवत गीता का सरल रूप भगवान की दिव्य वाणी श्रीमद् भागवत गीता के भाव बहुत ही गंभीर और अनायास कल्याण करने वाले हैं। उनका मनन करने से साधक के हृदय में नए-नए विलक्षण भाव प्रकट होते हैं। समुद्र में मिलने वाले रतन का तो अंत आ सकता है, पर गीता में मिलने वाले मनो मुग्धकारी  भाव रूपी रतन का कभी अंत नहीं आता। गीता के भावों को भलीभांति समझने से गीता के वक्ता( भगवान श्रोता (अर्जुन) का, गीता का और अपने स्वरूप का ठीक ठीक बोध हो जाता है। बोध होने पर मनुष्य कृतकृत्य, ज्ञातज्ञातव्य(जो जानना चाहते हो जान जाते हो),और  प्राप्तप्राप्तव्य(जो पाना चाहते हो पा जाते हो)  हो जाता है। उसके लिए कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता। उसका मनुष्य जन्म सर्वथा सफल हो जाता है। जैसे भक्त जिस भाव से भगवान का भजन करता है, भगवान भी उसी भाव से उसका भजन करते हैं। ऐसे ही मनुष्य जिस मान्यता को लेकर गीता को देखता है, गीता भी इस मान्यता के अनुसार उसको देखने लग जाती है। जैसे मनुष्य दर्पण के सामने जैसा मुख बनाकर जाता है उसको वैसा ही मुख दर्पण में दिखने लग जाता है। ऐसे ही भगवान की वाणी गीता इतन...

प्रार्थना कैसे स्वीकार होती है।

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                        प्रार्थना कैसे स्वीकार होती है। प्रार्थना, एक आत्मिक संबंध जो परमात्मा या उच्चतम शक्ति से होता है, को स्वीकार करना मानव जीवन में महत्वपूर्ण है। प्रार्थना में व्यक्ति अपने मन, शरीर, और आत्मा को दिव्यता की ओर मोड़ता है। इसके माध्यम से, वह अपनी इच्छाओं, आशाओं, और आत्मविश्वास को व्यक्त करता है और उच्चतम से आशीर्वाद मांगता है। प्रार्थना स्वीकार करना एक आत्मिक विकास का साधन होता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन को एक उच्च स्तर पर ले जाने के लिए संजीवनी शक्ति प्राप्त करता है। यह एक आत्मा की अंतर्दृष्टि को बढ़ाता है और उसे जीवन के चुनौतीपूर्ण पहलुओं का सामना करने के लिए शक्तिशाली बनाता है। सार्वजनिक या व्यक्तिगत स्तर पर, प्रार्थना एक सकारात्मक शक्ति है जो समृद्धि, शांति, और समर्पण की भावना को संतुष्ट करने में सहारा करती है। प्रार्थना का मतलब है भगवान या ऊँची शक्ति से बातचीत करना। इसमें हम अपनी चिंताओं, इच्छाओं और आभासों को उनसे साझा करते हैं। यह हमें आत्मिक शांति और संबल प्रदान करता है। प्रार्थना करने से हम अपने जीवन...

अकेलेपन को कैसे दूर करें

                      अकेलेपन को कैसे दूर करें अकेलेपन को दूर करने के लिए, आपको सकारात्मक क्रियाएं अपनानी चाहिए। शुरुआत में, आत्म-समीक्षा करें और अपने लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से देखें। साथ ही, नए लोगों से मिलें और सामाजिक गतिविधियों में भाग लें। अपनी रूचियों को पुनर्जीवित करें और नए कौशल सीखें। मेडिटेशन और योग का अभ्यास भी आत्म-समर्थन में मदद कर सकता है। समय के साथ, आप नए दृष्टिकोण बना सकते हैं और अपने आत्मविश्वास को मजबूत कर सकते हैं। सकारात्मक क्रियाएं आपको आत्म-समर्थन में मदद कर सकती हैं। कुछ सकारात्मक क्रियाएं शामिल हैं: 1. ध्यान और मेडिटेशन:यह मानसिक शांति और सकारात्मकता को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। 2. नए लोगों से मिलना:समाज में बढ़ावा देने के लिए नए दोस्त बनाना और सोशल ग्रुप्स में शामिल होना। 3. रेगुलर एक्सर्साइज: यह ताजगी और सकारात्मक ऊर्जा देने में मदद कर सकता है। 4. कला और रुचियां: अपनी रुचियों और कला में लिपटना, सकारात्मकता को बढ़ावा देने में सहारा कर सकता है। 5. स्वयं से उत्तराधिकारी बनना:अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के...

दुखी मन को कैसे संभाले?

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                      दुखी मन को कैसे संभाले? दुखी मन को संभालने के लिए कई तरीके हैं। यह समाधान ढूंढने में समय लगा सकता है, लेकिन यह आपको सहारा प्रदान कर सकते हैं: 1. अपने आत्म-समर्पण को बढ़ाएं: ध्यान, योग, और प्राणायाम के माध्यम से अपनी आत्मा के साथ संबंध स्थापित करें। 2. विचारशीलता: अपने विचारों को सकारात्मक बनाने के लिए प्रयास करें और नकारात्मकता से दूर रहें। 3. सामाजिक संबंधों का समर्थन: अपने दोस्तों और परिवार से बातचीत करें, उनसे सहायता मांगें और समर्थन प्राप्त करें। 4. स्वस्थ जीवनशैली: सही आहार, पर्याप्त नींद, और नियमित व्यायाम से अपनी शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखें। 5. कल्याणमय गतिविधियां: ऐसी क्रियाएं जैसे कि किताबें पढ़ना, कला, संगीत, या कोई रुचिकर गतिविधि मनोबल बढ़ा सकती हैं। अगर आपका दुःख गंभीर है या बना रहता है, तो विशेषज्ञ सलाह लेना महत्वपूर्ण हो सकता है।

साधना कैसे करें?

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                              साधना कैसे करें? साधना करने के लिए: 1. स्थिरता बनाएं: एक स्थिर स्थान चुनें और नियमित समय पर साधना करें. 2. आसन और श्वासप्रश्वास: योगासन और ध्यानासन में स्थिर बैठें, ध्यान केंद्रित करें और शांति से श्वासप्रश्वास का ध्यान रखें. 3. मन को शांत करें:अपने विचारों को ध्यान से गुजरने दें, मन को शांत करने के लिए मन्त्र जाप भी कर सकते हैं. 4. सकारात्मक भावना: सकारात्मक भावना को अपनाएं, धन्यवाद, कृतज्ञता, और शांति के भाव को बढ़ावा दें. 5. समर्पण:साधना को समर्पित रूप से करें, उसमें निष्ठा बनाएं और नियमित रूप से अभ्यास करें. 6. गुरु की मार्गदर्शन: अगर संभावना हो, एक आदर्श गुरु से मार्गदर्शन प्राप्त करें. साधना में धीरज रखें और नियमित रूप से अभ्यास करने का प्रयास करें।

प्रभु के मंगल विधान में विश्वास

                      प्रभु के मंगल–विधान में विश्वास जो कुछ मिला, मिल रहा है जो कुछ, जो कुछ आगे होगा प्राप्त।  सब प्रभु का मंगल विधान है, सब में कृपा नित्य परि व्याप्त।।  जन्म मरण, निरवधि सुख, दारुण दुख, मान अति, अति अपमान।  पूर्व रचित मंगलमय प्रभु के सब मंगल अनिवार्य विधान।।  करूण, भयानक, सुंदर, शुभ, विभत्स, सुसर्जन, अति संहार।  एकमात्र रसमय का सब में, सदा मधुर  लीला विस्तार।। करना नहीं गर्व सुख में, करना ना दुख में कभी विषाद।  रहना आती संतुष्ट, समझकर सब में प्रभु का कृपा प्रसाद।। (पद रत्नाकर) faith in God's providence belief in god's providence Whatever I got, whatever I am getting, whatever will happen next get. Everything is God's good will, blessings are always there in everything. Pervasive.. Birth and death, everlasting happiness, excruciating sorrow, extreme respect and extreme insult. All the auspicious and mandatory rules of the auspicious Lord written earlier. Compassionate, terrible, b...

सामान्य धर्म और परम धर्म में अंतर (परमार्थ के पत्र पुष्प)

सामान्य धर्म और परम धर्म में अंतर (परमार्थ के पत्र पुष्प) श्री दशरथ दशरथ जी के मरने के बाद जब उनकी अंत्येष्टि क्रिया हो रही थी उस समय तीनों लोकों के महान से महान ऋषि महर्षि उपस्थित थे। तीनों माताएं सती कालिक श्रृंगार करके आई और चिता  की ओर बढ़ रही थी। उपस्थित ऋषि समूह सती हो जाना ही ठीक समझ रहे थे। इसी बीच श्री भरत लाल जी ने उन माताओं के श्री चरणों में प्रणाम किया। श्री तुलसीदास जी ने लिखा है कि–  गहि पद भरत मातु सब राखी। रही राम दर्शन अभिलाषी।। मानस अयोध्याकांड 239 /2 उक्त वाक्य में ध्वनि यह है कि श्री भरत जी ने माताओं को प्रणाम करके उन्हें समझाया कि पति के साथ सती होना सामान्य धर्म है। शरीर को रखकर श्री राम का दर्शन करना परम धर्म है। परम धर्म से भक्ति होती है। भक्ति करने से ,परमधर्म का आचरण करने से सामान्य धर्म के त्याग का दोष नहीं लगता है। सामान्य पालन हुआ माना जाता है, सो के नोट में 50, 20, 10, 5 आदि के नोट समाए रहते हैं। सो के नोट को प्राप्त करने में यदि पांच का नोट छूट जाए, तो हानि नहीं मानी जाएगी। पांच का नोट सामान्य धर्म है और 100 का नोट भक्ति का आचरण है। सती होने में ...

महाराज दशरथ का जन्म एक बहुत ही अद्भुत घटना है पौराणिक धर्म ग्रंथों के आधार पर बताया जाता है

  महाराज दशरथ का जन्म एक बहुत ही अद्भुत घटना है पौराणिक धर्म ग्रंथों के आधार पर बताया जाता है कि एक बार राजा अज दोपहर की वंदना कर रहे थे। उस समय लंकापति रावण उनसे युद्ध करने के लिए आया और दूर से उनकी वंदना करना देख रहा था। राजा अज ने भगवान शिव की वंदना की और जल आगे अर्पित करने की जगह पीछे फेंक दिया। यह देखकर रावण को बड़ा आश्चर्य हुआ। और वह युद्ध करने से पहले राजा अज के सामने पहुंचा तथा पूछने लगा कि हमेशा वंदना करने के पश्चात जल का अभिषेक आगे किया जाता है, न कि पीछे, इसके पीछे क्या कारण है। राजा अज ने कहा जब मैं आंखें बंद करके ध्यान मुद्रा में भगवान शिव की अर्चना कर रहा था, तभी मुझे यहां से एक योजन दूर जंगल में एक गाय घास चरती हुई दिखी और मैंने देखा कि एक सिंह उस पर आक्रमण करने वाला है तभी मैंने गाय की रक्षा के लिए जल का अभिषेक पीछे की तरफ किया। रावण को यह बात सुनकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ। रावण ऐक योजन दूर वहाँ गया और उसने देखा कि एक गाय हरी घास चर रही है जबकि शेर के पेट में कई वाण लगे हैं अब रावण को विश्वास हो गया कि जिस महापुरुष के जल से ही बाण बन जाते हैं और बिना किसी लक्ष्य साधन के...

कृष्णं वंदे जगदगुरूम्

                 कृष्णं वंदे जगदगुरूम् जिस प्रकार ईशतत्व सर्व व्याप्त है। उसी प्रकार गुरुतत्व सर्व व्याप्त है। गुरु में और कृष्ण में भेद नहीं है। कृष्णम वंदे जगदगुरूम। कृष्ण ही गुरु रूप में मिलकर उपदेश देते हैं। गुरु सेवा से कृष्ण कृपा सुलभ होती है, तात्पर्य यह है कि संत, भगवंत, गुरु में एकता है। संत, भगवंत, गुरु कृपा निरंतर जीवों पर बरसती रहती हैं। जो साधक सात्विक है वे कृपा को पचा लेते हैं और पुष्ट हो जाते हैं। उनका ज्ञान बुद्धि भक्ति सब कुछ पुष्ट हो जाता है। जो कृपा को नहीं पचा पाते हैं, वह दुष्ट हो जाते हैं। जैसे पौष्टिक पदार्थ पचेगा ,तो शरीर पुष्ट होगा। अति मात्रा में सेवन किया गया पौष्टिक तत्व जब नहीं पचता है, तो उल्टे शरीर में रोग पैदा कर देता है। इसलिए कृपा का अनुभव प्रत्येक परिस्थिति में करना चाहिए। यदि प्रभु की कृपा ना हो तो हमारी जिव्हा पर प्रभु का नाम भी नहीं आ सकता है। ।।जय श्री कृष्ण।।

गंगा में गुरु भाव प्रगट होने से.....

                        गंगा में गुरु भाव प्रगट होने से....... गुरुदेव प्रदेश जाने लगे तो शिष्य से कहा कि गंगा जी को गुरु मानो। मेरे स्थान पर उन्हें प्रणाम करो। शिष्य ने गंगा जी में स्नान, वस्त्र धोना बंद कर दिया। गुरु के आने पर भी गंगा में गुरु भाव बना रहा। लोगों के मन में गुरु भक्ति दृढ़ करने के लिए गुरु ने गंगा में प्रवेश कर के, शिष्य से वस्त्र मांगे। गुरु आज्ञा पालन करना है वस्त्र देना है, पर गंगा में पैर नहीं रखना। धर्म संकट के समय धर्म की निष्ठा की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। कमल पत्र प्रकट हो गए, उन पर चलकर वस्त्र दिए। गुरु वचनों में विश्वास का अद्भुत दृष्टांत है।

विश्वास से परधाम गए गुरु वापस आए

                  विश्वास से प्रधान गए गुरु वापस आए संत सदगुरुदेव में श्रद्धा की आवश्यकता है। जहां पर श्रद्धा होगी वहीं पर प्रभु अपना रूप प्रकट करके अनुभव करा देते हैं और अश्रद्धा के द्वारा दिया गया दान, हवन तुच्छ ल देता है। श्रद्धा पूर्वक थोड़ा दान भी महान फल देता है। शिष्य प्रदेश जाने लगा तो गुरु ने कहा कि वापस आओगे तो रहस्य की बात बताऊंगा। वापस आते आते गुरु का शरीर छूट गया, पर अपनी श्रद्धा के कारण उसने गुरु के शरीर त्याग को स्वीकार नहीं किया।बिना मुझे उस बात को बताए गुरुदेव भगवान वैकुंठ नहीं जा सकते, गुरु की वाणी में शिष्य का विश्वास था अतः गुरुदेव वैकुंठ में से वापस आ गए और कहा संत में मुझसे अधिक श्रद्धा रखकर सेवा करो। गुरु वचन में विश्वास से रहस्यमय  उपदेश मिला। वैकुंठ जाकर कोई वापस नहीं आता पर शिष्य की श्रद्धा ने गुरु को वापस बुला लिया। पुनः जीवित कर लिया।  जय गुरुदेव।।

परमार्थ के पत्र पुष्प (गुरु महिमा)

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                   परमार्थ के पत्र पुष्प( गुरु महिमा) ईश्वर परम दयालु है। तभी हम लोग सुख पूर्वक रह रहे हैं। यदि हमारे दोषों को प्रभु देखें तो एक क्षण भी हमको सुख ना मिले। जैसे अबोध शिशु के दोषों को देखकर माता-पिता उन पर ध्यान नहीं देते हैं, उसी प्रकार संसारी माता-पिता से भी कई गुना दयालु ईश्वर हम जीवो के दोषों पर ध्यान नहीं देता है। हम पग-पग पर अनेक अपराध करते हैं। भगवत कृपा से सत्संग प्राप्त हो, जीव ईश्वर की शरण में पहुंच जाए तो यह निष्पाप व निर्भय हो जाता है। ईश्वर का नियम है कि वह किसी संत सद गुरु देव की सिफारिश के बिना किसी को नहीं अपनाता है। गुरुदेव के रूप धारण कर ईश्वर ही अपनी प्राप्ति का उपाय बताता है। प्रत्येक शिष्य का गुरु ईश्वर ही होता है। ईश्वर और गुरु एक ही है। फिर भी वह ईश्वर जब गुरु रूप धारण करता है तब ईश्वर की अपेक्षा अधिक दयामय और क्षमाशील होता है। गुरु भक्त पर ईश्वर प्रसन्न रहता है। इतिहास में जिन लोगों ने गुरुवाणी में विश्वास किया, उन्हें प्रत्यक्ष फल मिला। कल्याणकारी शिक्षा देने वाले को गुरु कहते हैं। सर्वप्रथम शिक्षा ...

चाहे मन लगे या न लगे, यदि भगवान्‌का नाम जीभसे निरन्तर लेने लग जाइयेगा

                                    ॥ श्री हरिः ॥ जीभ से निरन्तर भगवान्‌ का नाम लीजिये — भगवान्ने कहा है—‘सभी धर्मोका आश्रय छोड़कर केवल एकमात्र मेरी शरणमें चले आओ। फिर मैं तुम्हें सब पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तुम चिन्ता मत करो।'  सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा  शुचः ॥  (गीता १८ । ६६  ) जरूर पढ़े– https://www.parmatmaaurjivan.co.in/2022/02/blog-post.html मनकी कैसी भी अवस्था क्यों न हो, कोई परवाह नहीं । केवल जीभसे निरन्तर भगवान्‌का नाम लीजिये, फिर सारी जिम्मेवारी भगवान् सँभाल लेंगे। केवल जीभसे नाम - स्मरण, और कोई शर्त नहीं ।  चाहे मन लगे या न लगे, यदि भगवान्‌ का नाम जीभ से निरन्तर लेने लग जाइयेगा तो फिर न तो कोई शंका उठेगी, न कोई चाह रहेगी । थोड़े ही दिनों में शान्ति का अनुभव करने लगियेगा। इससे सरल उपाय कोई नहीं है । पूर्व के पापों के कारण नाम लेने की इच्छा नहीं होती । यदि एक बार हठसे निरन्तर नाम लेकर नियम लेकर ४-६ महीने बैठ जाय...

जब मन दुखी हो तो क्या करें?

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                            जब मन दुखी हो तो क्या करें? जब मन दुखी होता है, तो कई तरह की चीजें करके आप अपने मन को शांत कर सकते हैं। यहां कुछ सुझाव हैं जो आपको मदद कर सकते हैं: अपने भावनाओं को व्यक्त करें: वक्त निकालें और अपनी भावनाओं को लिखें, चित्र बनाएं, या दूसरों के साथ बातचीत करें। अपनी मन की स्थिति को साझा करने से आपको राहत मिल सकती है और आपका दुख कम हो सकता है। व्यायाम करें: शारीरिक गतिविधि और व्यायाम आपके मन को स्थिरता देने में मदद कर सकते हैं। योग, प्राणायाम, या किसी अन्य व्यायाम तकनीक का अभ्यास करना आपके मानसिक स्थिति को सुधार सकता है। संगीत सुनें: संगीत आपके मन को शांति और आनंद प्रदान कर सकता है। आपकी पसंद के गाने सुनें या स्वयं गायें, जो आपको खुशी महसूस कराते हैं। मनोरंजन करें: किसी अपने पसंदीदा गतिविधि में समय बिताएं, जैसे कि किताब पढ़ना, फिल्म देखना, कला या शौक के साथ समय बिताना। यह आपको मनोरंजन का मौका देता है और दुख को भुलाने में मदद कर सकता है। समय के साथ दुख को स्वीकार करें: दुख भाग्य का हिस्सा है और ...

कैलाश पर्वत और चंद्रमा का रहस्य.....

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                    कैलाश पर्वत और चंद्रमा का रहस्य..... कैलाश पर्वत एक अनसुलझा रहस्य, कैलाश पर्वत के इन रहस्यों से नासा भी हो चुका है चकित.. कैलाश पर्वत, इस एतिहासिक पर्वत को आज तक हम सनातनी भारतीय लोग शिव का निवास स्थान मानते हैं। शास्त्रों में भी यही लिखा है कि कैलाश पर शिव का वास है। किन्तु वहीं नासा जैसी वैज्ञानिक संस्था के लिए कैलाश एक रहस्यमयी जगह है। नासा के साथ-साथ कई रूसी वैज्ञानिकों ने कैलाश पर्वत पर अपनी रिपोर्ट दी है। उन सभी का मानना है कि कैलाश वास्तव में कई अलौकिक शक्तियों का केंद्र है। विज्ञान यह दावा तो नहीं करता है कि यहाँ शिव देखे गये हैं किन्तु यह सभी मानते हैं कि, यहाँ पर कई पवित्र शक्तियां जरूर काम कर रही हैं। तो आइये आज हम आपको कैलाश पर्वत से जुड़े हुए कुछ रहस्य बताते हैं। कैलाश पर्वत के रहस्य. रहस्य 1– रूस के वैज्ञानिको का ऐसा मानना है कि, कैलाश पर्वत आकाश और धरती के साथ इस तरह से केंद्र में है जहाँ पर चारों दिशाएँ मिल रही हैं। वहीं रूसी विज्ञान का दावा है कि यह स्थान एक्सिस मुंडी है और इसी स्थान पर व्यक्ति अलौकिक...

परमार्थ के पत्र पुष्प (हृदय अशांत रहेगा)

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           परमार्थ के पत्र पुष्प ( हृदय अशांत रहेगा) अपने मन में सबके प्रति सद्भाव बनाए रखना चाहिए। दूसरे लोग मेरे प्रति ईर्ष्या द्वेष रखें, तो उससे हमारा कुछ भी ना बिगड़ेगा। ईर्ष्या क्रोध जिसके मन में है, उसी की हानि होगी। हृदय अशांत हो जाएगा। क्रोध ईर्ष्या से हृदय का रोग भी पैदा हो जाता है। मन शांत रहने से शरीर स्वस्थ रहेगा। शांत रहकर दूसरे को शांत रख सकेंगे। हम क्रोध करेंगे तो दूसरे को भी क्रोध की प्रेरणा मिलेगी। सभी जीव ईश्वर के अंश है। इसलिए सब के प्रति सद्भाव बना कर रखना चाहिए।इसी से प्रभु प्रसन्न होंगे, यही सच्ची भक्ति है। बिना कारण के उपकार करने वाले दो हैं –1.ईश्वर और 2.भक्त। शेष सब स्वार्थी हैं। ।।दादा गुरु के श्री मुख से।।

परमार्थ के पत्र पुष्प(जो लोग भगवान में अपने मन को लगाते है

          जो लोग अपने मन को भगवान में लगाते हैं। जो लोग अपने मन को भगवान में लगाते हैं, वाणी से नाम गुणों का कीर्तन करते हैं। शरीर से मंदिर में सेवा करते हैं, वह भाग्यशाली हैं। इन्हीं कामों को प्रेम पूर्वक करते-करते भगवान के रूपों का, हृदय में साक्षात्कार कर लेते हैं। संसार में प्राणी निरंतर सुखी नहीं रह सकता है कभी सुख, कभी दुख प्रारब्ध के अनुसार मिलते हैं। इनसे घबराना नहीं चाहिए। सच्चाई के साथ व्यवहार करते हुए किसी का बुरा नहीं सोचना चाहिए। अपने साथ बुराई करने वाले को भी सज्जन शाप नहीं देते हैं। ऐसे परोपकारी पर भगवान प्रसन्न होते हैं। कष्ट के समय भक्तों की परीक्षा होती है, परीक्षा समझकर बुद्धि को स्थिर करना चाहिए। इतिहास देखने से पता चलता है कि बड़े-बड़े भक्तों को अवतार काल में परमात्मा को कष्ट सहन करते देखा जाता है। काल में भी अपने धर्म का त्याग करके जो उपकार करता है वही धन्य है। दादा गुरु भक्तमाली श्री गणेशदास जी के श्री मुख से

श्रीमद् भागवत का सूक्ष्म रूप

                      श्रीमद् भागवत का सूक्ष्म रूप                             मूल भागवत हिंदी में                             ॐ श्री परमात्मने नमः  श्री भगवान बोले– ब्रह्मा जी! मेरा जो अत्यंत गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान है, वह तथा रहस्य सहित उसके अंग मेरे द्वारा कहे गए हैं, उसको तुम ग्रहण करो, धारण करो।  मैं जितना हूं, जिन जिन भाव वाला हूं, जिन जिन रूपों, गुणों और कर्मों वाला हूं, उस मेरे सभी रूप के तत्व का यथार्थ अनुभव तुम्हें मेरी कृपा से ज्यों का त्यों हो जाए। सृष्टि से पहले भी मैं था, मेरे सिवा और कुछ भी नहीं था और सृष्टि उत्पन्न होने के बाद जो कुछ भी यह संसार दिखता है, वह भी मैं ही हूं। सत् (चेतन,अविनाशी), असत (नाशवान) तथा सत व असत से परे जो कुछ कल्पना की जा सकती है, वह भी मैं ही हूं।सृष्टि के सिवाय जो कुछ है वह मैं ही हूं और सृष्टि का नाश होने पर जो शेष है वह भी मैं ही हूं।  ...

पंचामृत जीवन में एक बार इसको अपना लो फिर सुख ही सुख है

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  पंचामृत जीवन में एक बार इसको अपना लो फिर जीवन में सुख ही सुख है। 1  हम भगवान के ही हैं 2  हम जहां भी रहते हैं भगवान के ही दरबार में रहते हैं। 3  हम जो भी शुभ काम करते हैं भगवान का ही काम करते हैं। 4  शुद्ध सात्विक जो भी पाते हैं भगवान का ही प्रसाद पाते हैं। 5  भगवान के दिए प्रसाद से, भगवान के ही जनों की सेवा करते हैं।

महामृत्युंजय मंत्र की रचना

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       महामृत्युंजय मंत्र की रचना कैसे हुई?    किसने की महामृत्युंजय मंत्र की रचना? शिवजी के अनन्य भक्त मृकण्ड ऋषि संतानहीन होने के कारण दुखी थे. विधाता ने उन्हें संतान योग नहीं दिया था. मृकण्ड ने सोचा कि महादेव संसार के सारे विधान बदल सकते हैं. इसलिए क्यों न भोलेनाथ को प्रसन्नकर यह विधान बदलवाया जाए. मृकण्ड ने घोर तप किया. भोलेनाथ मृकण्ड के तप का कारण जानते थे इसलिए उन्होंने शीघ्र दर्शन न दिया लेकिन भक्त की भक्ति के आगे भोले झुक ही जाते हैं. महादेव प्रसन्न हुए. उन्होंने ऋषि को कहा कि मैं विधान को बदलकर तुम्हें पुत्र का वरदान दे रहा हूं लेकिन इस वरदान के साथ हर्ष के साथ विषाद भी होगा.भोलेनाथ के वरदान से मृकण्ड को पुत्र हुआ जिसका नाम मार्कण्डेय पड़ा. ज्योतिषियों ने मृकण्ड को बताया कि यह विलक्ष्ण बालक अल्पायु है. इसकी उम्र केवल 12 वर्ष है. ऋषि का हर्ष विषाद में बदल गया. मृकण्ड ने अपनी पत्नी को आश्वत किया- जिस ईश्वर की कृपा से संतान हुई है वही भोले इसकी रक्षा करेंगे. भाग्य को बदल देना उनके लिए सरल कार्य है. मार्कण्डेय बड़े होने लगे तो पिता ने उन्हें शिवमंत्र क...

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने माता-पिता के लिए बनाये थे - ब्रज में चार धाम

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भगवान श्रीकृष्ण ने अपने माता-पिता के लिए बनाये थे - ब्रज में चार धाम भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी माता यशोधा और पिता नंद बाबा के लिए ब्रज की धरती पर ही चार धाम का निर्माण किया था। वैसे ये चार धार - यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ भारत के राज्य उत्तराखंड में स्थित है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने माता-पिता को चार धाम की यात्रा पर जाते देख और चार धाम यात्रा कठनाईयों को देखते हुए ब्रज की धरती पर ही चार धाम का आह्वान करके बुलाया था। इसके बाद एक-एक करके सारे तीर्थ ब्रज में आ गए। ये भी माना जाता है कि इन चार धाम के दर्शन से ही लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। वृन्दावन में हर जगह राधा जी का नाम ही क्यों नंद बाबा और यशोदा को आई चार धाम यात्रा की याद नंद बाबा और यशोदा वृद्धा वस्था में भी कोई संतान ने होने पर यह संकल्प लिया था कि अगर उनको संतान की प्राप्ती होगी तो चार धाम की यात्रा करेगें। श्रीकृष्ण की गौचरण लीला के बाद नंद बाबा और यशोदा को चारधाम की यात्रा का संकल्प याद आया। इसके बाद उन्होंने तीर्थ यात्रा पर जाने की तैयारी शुरू कर दी। श्रीकृष्ण जब गायों को चराकर घर लौटे तो देखा कि घर में ...

बाबा मस्ती में आके बोले लाडली जू आपका दर्शन पा लिया अब ये जीवन ही सुलझ गया जटा की क्या बात है।

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                    बाबा मस्ती में आके बोले लाडली जू आपका दर्शन पा लिया अब ये जीवन ही सुलझ गया जटा की क्या बात है।        करूणा मयी श्री राधे  एक  बार वृन्दावन में एक संत हुए कदम्खंडी जी महाराज। उनकी बड़ी बड़ी जटाएं थी। वो वृन्दावन के सघन वन में जाके भजन करते थे। एक दिन जा रहे थे तो रास्ते में उनकी बड़ी बड़ी जटाए झाडियो में उलझ गई। उन्होंने खूब प्रयत्न किया किन्तु सफल नहीं हो पाए। और थक के वही बैठ गए और बैठे बैठे गुनगुनाने लगे। "हे मुरलीधर छलिया मोहन हम भी तुमको दिल दे बैठे, गम पहले से ही कम तो ना थे, एक और मुसीबत ले बैठे " बहोत से ब्रजवासी जन आये और बोले बाबा हम सुलझा देवे तेरी जटाए तो बाबा ने सबको डांट के भगा दिया और कहा की जिसने उलझाई वोही आएगा अब तो सुलझाने। बहोत समय हो गया बाबा को बैठे बैठे...... "तुम आते नहीं मनमोहन क्यों इतना हमको तडपाते हो क्यों । प्राण पखेरू लगे उड़ने, तुम हाय अभी शर्माते हो क्यों।" तभी सामने से 15-16 वर्ष का सुन्दर किशोर हाथ में लकुटी लिए आता हुआ दिखा। जिसकी मतवाली चाल देखकर करोडो काम ल...

भगवान के होकर भगवान का नाम जप करो।

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                                    ॥श्री हरिः॥            भगवान के होकर भगवान का नाम जप करो।                                     परम वचन                        श्री रामसुखदासजी महाराज         जैसे आदमी दूर विदेशमें चला जाता है,  ऐसे आप खास भगवानके बेटे होते हुए भी दूर चले गये हैं। इसलिये सभी भाई-बहनोंसे मेरी प्रार्थना है कि आप कृपा करके स्वीकार कर ले कि हम भगवानके बेटा--बेटी है।  हम कपूत--सपूत, अच्छे--मन्दे, भले-- -बुरे जैसे भी हैं, भगवानके हैं। अब केवल भगवान की तरफ चलना ही हमारा काम है। भगवत्प्राप्तिके समान दूसरा कोई काम है ही नहीं। इसलिये भगवानके भजनमें लग जाओ। चलते--फिरते,   उठते--बैठते हर समय भगवानको याद रखो। भगवानका होकर भगवानके नामका जप करो ।     बिगरी जनम अनेक...

वैष्णव सदाचार का प्रतीक है तिलक

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              वैष्णव सदाचार का प्रतीक है  तिलक ऐसा कहा जाता है कि तिलक लगाते समय यदि भक्त दर्पण अथवा पानी मे अपना प्रतिबिम्ब ध्यानपूर्वक देखता है तो वह भगवान के धाम को जाता है तिलक लगाना इस बात का प्रतिक है की आप सनातनी है और वैष्णव तिलक लगाना कृष्ण भक्ति का प्रतीक है। जिस प्रकार स्त्री अपने स्वामी की प्रसन्नता के लिये श्रृँगार करती है उसी प्रकार वैष्णव अपने स्वामी(श्री कृष्ण)की प्रसन्नता के लिये श्रृँगार करते है जिसमे तिलक मुख्य है। तिलक अनेक प्रकार के होते है  चार मुख्य सम्प्रदायो के अपने अपने तिलक होते है जो जिस सम्प्रदाय से दीक्षित हो, वे उसका तिलक धारण करे अथवा जो दीक्षित ना हो वे श्री चैतन्य महाप्रभु को गुरू मान  कर उनका तिलक धारण करे।  तिलक लगाने के लिये सिन्दूर,सफेद चन्दन,पीला चन्दन,लाल चन्दन,गोपी चन्दन और शिव भक्त सम्प्रदाय के भक्त भस्म का तिलक धारण करते है।कृष्ण भक्त वैष्णवो के लिये सबसे उत्तम तिलक है, गोपी चन्दन का इसलिये गोपी चन्दन का तिलक धारण करे। -अपने हाथ मे गोपी चन्दन घिसते समय नीचे ना गिराएँ यदि वह नीचे गिर जा...

देवों में सबसे सुंदरतम भगवान श्री कृष्ण के जीवन की कई बातें अनजानी और रहस्यमयी है आइए जानें 24 अनजाने तथ्य.

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देवों में सबसे सुंदरतम भगवान श्री कृष्ण के जीवन की कई बातें अनजानी और रहस्यमयी है आइए जानें 24 अनजाने तथ्य. 1. भगवान् श्री कृष्ण के खड्ग का नाम नंदक, गदा का नाम कौमौदकी और शंख का नाम पांचजन्य था जो गुलाबी रंग का था।  2. भगवान् श्री कृष्ण के परमधामगमन के समय ना तो उनका एक भी केश श्वेत था और ना ही उनके शरीर पर कोई झुर्री थीं। 3.भगवान् श्री कृष्ण के धनुष का नाम शारंग व मुख्य आयुध चक्र का नाम सुदर्शन था। वह लौकिक, दिव्यास्त्र व देवास्त्र तीनों रूपों में कार्य कर सकता था उसकी बराबरी के विध्वंसक केवल दो अस्त्र और थे पाशुपतास्त्र ( शिव, कॄष्ण और अर्जुन के पास थे) और प्रस्वपास्त्र ( शिव, वसुगण, भीष्म और कृष्ण के पास थे)। 4. भगवान् श्री कृष्ण की परदादी 'मारिषा' व सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) 'नाग' जनजाति की थीं। 5. भगवान श्री कृष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं। 6. भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेमिका राधा का वर्णन महाभारत, हरिवंशपुराण, विष्णुपुराण व भागवतपुराण में नहीं है। उनका उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण, गीत गोविं...

महादेव-पार्वती संग झूमे

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                            महादेव-पार्वती संग झूमे रावण के वध के बाद अयोध्या पति श्री राम ने राजपाट संभाल लिया था और प्रजा राम राज्य से प्रसन्न थी. एक दिन भगवान महादेव की इच्छा श्री राम से मिलने की हुई। पार्वती जी को संग लेकर महादेव कैलाश पर्वत से अयोध्या नगरी के लिए चल पड़े. भगवान शिव और मां पार्वती को अयोध्या आया देखकर श्री सीता राम जी बहुत खुश हुए। माता जानकी ने उनका उचित आदर सत्कार किया और स्वयं भोजन बनाने के लिए रसोई में चली गईं. भगवान शिव ने श्री राम से पूछा- हनुमान जी दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, कहां हैं ? श्री राम बोले- वह बगीचे में होंगे. शिव जी ने श्री राम जी से बगीचे में जाने की अनुमति मांगी और पार्वती जी के साथ बगीचे में आ गए. बगीचे की खूबसूरती देखकर उनका मन मोहित हो गया। आम के एक घने वृक्ष के नीचे हनुमान जी दीन-दुनिया से बेखबर गहरी नींद में सोए थे और एक लय में खर्राटों से राम नाम की ध्वनि उठ रही थी. चकित होकर शिव जी और माता पार्वती एक दूसरे की ओर देखने लगे। माता पार्वती मुस्करा उठी और वृक्ष की डालियों की ओर ...

आपको क्या नही पता!

                          आपको क्या नहीं पता! एक जिज्ञासु किसी प्रसिद्ध संत के पास पहुंचा तथा विनती की, 'महात्मा जी ऐसा ज्ञान दीजिए जीवन सफल हो जाए। महात्मा ने पूछा ’अच्छा बताइए, क्या चोरी करना पुण्य है? जिज्ञासु बोला, कदापि नहीं महात्मा जी!  माता पिता की सेवा करनी चाहिए? ’ जी बिल्कुल। जीव जगत के प्रति दया रखनी चाहिए?’  जी हां । किसी से छल कपट नहीं करना चाहिए?  ’कभी नहीं।’  ’संकट में किसी की सहायता करनी चाहिए? जी, अवश्य करनी चाहिए। जिज्ञासु ने सभी प्रश्नों के सटीक उत्तर दिए।  तो महात्मा जी बोले तू ही बता तुझे क्या पता नहीं! इस पृथ्वी पर निवास कर रहे सभी मनुष्य को यह सब कुछ पता है। हर कोई अच्छा बुरा समझता है। समस्या तो ज्ञान को व्यवहार में उतारने की है। जो मनुष्य ज्ञान के अनुरूप आचरण करने लगेगा, उसका जीवन सफल हो जाएगा। ।। जय जय श्री राधे।।

दान व पुण्य

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  दान व पुण्य वही है जो एक हाथ से करें तो दुसरे हाथ को भी पता न हो कि दान किया है | एक गांव मे एक बहुत गरीब सेठ रहता था जो कि किसी जमाने बहुत बड़ा धनवान था जब सेठ धनी था उस समय सेठ ने बहुत पुण्य किए,गउशाला बनवाई, गरीबों को खाना खिलाया,अनाथ आश्रम बनवाए और भी बहुत से पुण्य किए थे लेकिन जैसे जैसे समय गुजरा सेठ निर्धन हो गया  एक समय ऐसा आया कि राजा ने ऐलान कर दिया कि यदि किसी व्यक्ति ने कोई पुण्य किए हैं तो वह अपने पुण्य बताएं और अपने पुण्य का जो भी उचित फल है ले जाए यह बात जब सेठानी ने सुनी तो सेठानी सेठ को कहती है कि हमने तो बहुत पुण्य किए हैं तुम राजा के पास जाओ और अपने पुण्य बताकर उनका जो भी फल मिले ले आओ सेठ इस बात के लिए सहमत हो गया और दुसरे दिन राजा के महल जाने के लिए तैयार हो गया जब सेठ महल जाने लगा तो सेठानी ने सेठ के लिए चार रोटी बनाकर बांध दी कि रास्ते मे जब भूख लगी तो रोटी खा लेना  सेठ राजा के महल को रवाना हो गया गर्मी का समय दोपहर हो गई,सेठ ने सोचा सामने पानी की कुंड भी है वृक्ष की छाया भी है क्यों ना बैठकर थोड़ा आराम किया जाए व रोटी भी खा लूंगा  सेठ वृक्ष क...

इंद्रपुत्र जयंत को श्रीराम से पहले नृसिंह भगवान ने भी दिया था दंड

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इंद्रपुत्र जयंत को श्रीराम से पहले नृसिंह भगवान ने भी दिया था दंड आपने रामायण में पढ़ा होगा कि जब भगवान् श्रीराम सीता और लक्ष्मण के संग चित्रकूट में निवास कर रहे थे, तब एक दिन इंद्र का पुत्र जयंत भगवान श्रीराम के बल की परीक्षा लेने के लिए कौए का रूप धरकर आया और सीता जी के चरण में चोंच मारकर भागा। सीता जी के चरण से रक्त की धारा बहते देख भगवान् श्रीराम ने एक सींक को अभिमंत्रित कर जयंत की ओर छोड़ा। जयंत की रक्षा करने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। अंततः नारद जी के कहने पर वह राम के पास आकर क्षमा माँगने लगा। सीताजी ने उस कौए का शीश श्रीराम के चरणों में रख करुणानिधान श्रीराम से उस दुष्ट जयंत को क्षमा करने की प्रार्थना की। अतः श्रीराम ने दया कर मात्र एक नेत्र से अँधा कर उसे छोड़ दिया। किंतु क्या आप जानते हैं कि इंद्र का यह पुत्र अपने कुकर्मों के कारण इससे पूर्व भी नृसिंह भगवान् के हाथों दंड पा चुका था? प्राचीन काल में अंतर्वेदी नामक नगरी में रवि नाम का एक माली रहता था। उसने अपने घर के अंदर 'वृंदावन' नाम का तुलसी का एक बगीचा लगा रखा था। उस बगीचे में उसने तुलसी के साथ-साथ मल्लिका, मालती, जात...

प्रभु का स्मरण किसी भी तरह लिया जाए शुभ ही होता है।

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प्रभु का स्मरण किसी भी तरह लिया जाए शुभ ही होता है। एक बार गौ लोक धाम में कृष्णप्रिया श्री राधा रानी जी ने श्री गोविन्द से पुछा.. हे माधव !!! कंस आपका सगा मामा होते हुए भी आपके माता पिता को घोर पीड़ा देता था और  निरंतर आपका अपमान करता था l आपका संतों का उपहास करता था l  आपको मार देने के कई बार प्रयास करता रहा l कभी किसी को भेजता कभी किसी को, हत्या के प्रयत्न करता रहता था l फिर भी उस महापापी के ऐसे कौन से पुण्य थे की उसे आपके हाथों मृत्यु यानि परम मोक्ष प्राप्त हुआ..... ?? य़ह सुनकर मोहन ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया कि राधे!!! कंस कुछ भी करता, कुछ सोचता तो मेरे ही बारे में चाहे द्वेष और क्रोध अथवा भय के कारण,,,,,, परन्तु मेरा स्मरण उसे हर पल रहता था, और जो व्यक्ति हर समय मेरा सुमिरण करेगा उसे में मोक्ष ही दूंगा चाहे वो मेरा विरोधी ही क्यों न हो। इसलिए श्रीमद्भगवत के अंत में एक सबसे मत्वपूर्ण श्लोक आता है।,,,,, नाम संकीर्तनं यस्य सर्व पाप प्रणाशनम् । प्रणामो दुःख शमनः तं नमामि हरिं परम्॥ (मैं उन 'हरि' को प्रणाम करता हूँ जिनका नाम संकीर्तन सभी पापों को समाप्त करता है और जिन्हें प्...

रुद्राष्टकम : हिंदी भावार्थ के साथ

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                      रुद्राष्टकम : हिंदी भावार्थ के साथ       नमामीशमीशान निर्वाणरूपं       विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम       निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं       चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं जो कि महान ॐ के दाता हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्मान्द में व्यापत हैं जो अपने आपको धारण किये हुए हैं जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं जिनका आकार आकाश के सामान हैं जिसे मापा नहीं जा सकता, उनकी मैं उपासना करता हूँ |       निराकारमोङ्करमूल* तुरीयं       गिराज्ञानगोतीतमीशं* गिरीशम् ।       करालं महाकालकालं कृपालं      गुणागारसंसारपारं* नतोहम जिनका कोई आकार नहीं, जो ॐ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी यानि पर्वत के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह हैं, जो कि काल के स्वामी ...

दादा गुरु भक्तमाली जी को जब लड्डू गोपाल जी

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                दादा गुरु भक्तमालीजी को जब लड्डू गोपाल जी ने दर्शन दिए          पण्ड़ित श्री जगन्नाथ प्रसाद जी 'भक्तमाली' के भक्तिभाव के कारण वृंदावन के सभी संत उनसे बहुत प्रभावित थे और उनके ऊपर कृपा रखते थे। सन्तों की कौन कहे स्वयं 'श्रीकृष्ण' उनसे आकृष्ट होकर जब तब किसी न किसी छल से उनके ऊपर कृपा कर जाया करते थे।         एक बार श्री जगन्नाथ प्रसाद जी 'भक्तमाली' अपने घर में बैठे हारमोनियम पर भजन गा रहे थे। उसी समय एक बहुत ही सुन्दर बालक आकर उनके सामने बैठ गया, और तन्मय होकर भजन सुनने लगा।  'भक्तमाली' जी ने बालक का श्रृंगार देखकर समझा कि वह किसी रासमण्डली का बालक है जो उनके भजन से आकृष्ट होकर चला आया है। भक्तमाली जी ने भजन समाप्त करने के बाद बालक से पूछा -"बेटा तुम कहाँ रहते हो ?"  बालक ने कहा - "अक्रूर घाट पर भतरोड़ मन्दिर में रहता हूँ।"  भक्तमाली जी - "तुम्हारा नाम क्या है ?"  बालक - "लड्डू गोपाल।"  'भक्तमाली' जी - "तो तुम लड्डू खाओगे या पेड़ा खाओगे ?"  उस समय 'भक्तमाली' ...