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कुसंग, (बुरा संग)

                             कुसंग, यानि बुरा संग बचपन का सत्संग जीवन भर के लिए लाभदायक होता है। इसी तरह बचपन का कुसंग भी जीवन को बिगाड़ देता है। दिनभर सत्संग में रहो, एक क्षण भी यदि कुसंग मिल गया तो सत्संग का प्रभाव नष्ट हो जाएगा। व्यक्ति के संग का, वेशभूषा का, खानपान का, कुसंग भी हानिकारक है।            जे राखे  रघुवीर ते उबरे तेहि काल महूँ।।  प्रभु ही सत्संग देने वाले हैं और कुसंग से बचाने वाले हैं। अतः हरिः शरणं हरिः शरणं । मैं भगवान की शरण में हूं, मैं भगवान की शरण में हूं। बार-बार कहना चाहिए, स्मरण रखना चाहिए।(दादा गुरु श्री गणेशदास भक्त माली जी के श्री मुख से)

कभी सुख कभी दुख भाग्य के अनुसार मिलते हैं

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कभी सुख कभी दुख भाग्य के अनुसार मिलते हैं जो लोग अपने मन को भगवान में लगाते हैं ,वाणी से नाम गुणों का कीर्तन करते हैं। शरीर से मंदिर में सेवा करते हैं वह भाग्यशाली हैं। इन्हीं कामों को प्रेम पूर्वक करते-करते भगवान के रूपों का ह्रदय में साक्षात्कार कर लेते हैं।संसार में प्राणी निरंतर सुखी नहीं रह सकता है। कभी सुख कभी दुख भाग्य के अनुसार मिलते हैं, इनसे घबराना नहीं चाहिए। सच्चाई के साथ व्यवहार करते हुए, किसी का बुरा नहीं सोचना चाहिए ।अपने साथ बुराई करने वाले को भी सज्जन शाप नहीं देते हैं ।ऐसे परोपकारी पर भगवान प्रसन्न रहते हैं। कष्ट के समय भक्तों की परीक्षा होती है। परीक्षा समझ कर बुद्धि को स्थिर करके कष्ट सहन करना चाहिए। इतिहास देखने से पता चलता है कि बड़े-बड़े भक्तों को अवतार काल में परमात्मा को कष्ट सहन करते देखा जाता है। कष्ट काल में भी अपने धर्म का त्याग ना करके जो उपकार करते हैं, वही धन्य हैं। जो करना चाहिए उसे कर्तव्य कहते हैं। वही धर्म भी है अतः शास्त्र एवं बड़ों की सम्मति से जो कर्तव्य है, उसे तत्परता पूर्वक करना चाहिए। अधिकारी शासक को मालिक बनने की इच्छा नहीं करनी चाह...