संदेश

जनवरी, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हमारा सफर - श्री राम से श्री कृष्ण और कलयुग में

चित्र
  हमारा सफर - श्री राम से श्री कृष्ण और कलयुग में भी जारी श्री राम का घर छोड़ना एक षड्यंत्रों में घिरे राजकुमार की करुण कथा है और कृष्ण का घर छोड़ना गूढ़ कूटनीति। राम जो आदर्शों को निभाते हुए कष्ट सहते हैं, कृष्ण षड्यंत्रों के हाथ नहीं आते बल्कि स्थापित आदर्शों को चुनौती देते हुए एक नई परिपाटी को जन्म देते हैं। श्री राम से श्री कृष्ण हो जाना एक सतत प्रक्रिया है। श्रीराम को मारीच भ्रमित कर सकता है लेकिन कृष्ण को पूतना की ममता भी नहीं उलझा सकती। श्रीराम अपने भाई को मूर्छित देखकर ही बेसुध बिलख पड़ते हैं लेकिन कृष्ण अभिमन्यु को दांव पर लगाने से भी नहीं हिचकते। राम राजा हैं कृष्ण राजनीति राम रण हैं कृष्ण रणनीति। श्री राम मानवीय मूल्यों के लिए लड़ते हैं श्री कृष्ण मानवता के लिए।  श्री राम धर्म है तो श्री कृष्ण धर्म स्थापना  हर मनुष्य की यात्रा राम से ही शुरू होती है और "समय" उसे कृष्ण बनाता है। व्यक्ति का कृष्ण होना भी उतना ही जरूरी है जितना राम होना लेकिन राम से प्रारंभ हुई यह यात्रा तब तक अधूरी है जब तक इस यात्रा का समापन कृष्ण पर न हो.!! ।।जय राम कृष्ण हरे।।

राम नाम की शक्ति क्या होती हैं

चित्र
                     राम नाम की शक्ति क्या होती हैं जब प्रभु राम जी को समुद्र देवता ने बतलाया, कि हे भगवन् आपकी ही सेना में नल और नील नाम का दो बानर है जो पुल निर्माण करने में अति कुशल है।आप उन दोंनों की सहायता से सेतु का निर्माण कराकर लंका तक आसानी से पहुँच जायेंगें। तब राम जी ने दोनों को बुलाकर सेतु निर्माण का आदेश दिया और सभी बानर पत्थर उठा उठकर लाने लगे। ,हनुमान जी उन पत्थरों पर राम राम लिखते जाते और नल तथा नील उसे ले जाकर समुद्र में गिराते जाते। इस प्रकार जो भी पत्थर समुद्र में गया सभी के सभी एक दुसरे से जुड़कर उपलाते हुए सेतु के रूप में बँधते रहे।सेतु निर्माण कार्य बहुत द्रुत गति से सुचारू रूप से चल रहा था।प्रभु राम को शाम की वेला में सेतु बंधन कार्य की प्रगति के बारे में बता दिया गया।हनुमान ने बताया कि भगवन ,सभी पत्थरें आपका नाम लिखकर समुद्र में डालने पर वे सभी आपस में जुड़कर सेतु के रूप में हो जा रहे हैं। इस प्रकार सेतु निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। परन्तु ज्यों ज्यों रात होती गयी प्रभु राम जी की बैचेनी बढ़ती गयी।उन्हें आ...

श्रीमद् भागवत गीता का 13 अध्याय का सरल अर्थ

चित्र
    श्रीमद् भागवत गीता का 13 अध्याय का सरल अर्थ संसार में एक परमात्मा तत्व ही जानने योग्य है। उसको जरूर जान लेना चाहिए। उसको तत्व से जानने पर जानने वाले की परमात्मा तत्व के साथ अभिन्नता हो जाती है।  जिस परमात्मा को जानने से अमरता की प्राप्ति हो जाती है ,उसे परमात्मा के हाथ, पैर,सिर, नेत्र , कान सब जगह है।वह संपूर्ण इंद्रियों से रहित होने पर भी संपूर्ण विषयों को प्रकाशित करता है, संपूर्ण गुणों से रहित होने पर भी संपूर्ण गुणों का भोक्ता है और आसक्ति रहित होने पर भी  सबका पालन पोषण करता है। वह संपूर्ण प्राणियों के बाहर भी है और भीतर भी है, तथा चर अचर प्राणियों के रूप में भी वही है, संपूर्ण प्राणियों में विभक्त रहता हुआ भी वह विभाग रहित है। वह संपूर्ण ज्ञानो का प्रकाशक है वह संपूर्ण विषम प्राणियों में सम रहता है। गतिशील प्राणियों में गति रहित रहता है। नष्ट होते हुए  प्राणियों में अविनाशी रहता है। इस तरह परमात्मा का यथार्थ जान लेने पर परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।

सूर्य को हनुमान जी कैसे निगल गये?

चित्र
            सूर्य को हनुमान जी कैसे निगल गये? पृथ्वी से 28 लाख गुना सूर्य हनुमान जी ने कैसे निगल लिया? क्या यह विज्ञान के साथ मजाक है ? इस हिसाब से तो आपको हर उस चीज पर सवाल उठाने चाहिए जो की आसान नहीं है। जैसे कि हनुमान जी ने बिन थके इतना विशाल समुद्र कैसे पार कर लिया। अरे श्री हनुमान जी भगवान का अंश है उन्हे विभिन्न तरीके के वरदान प्राप्त हुए है। भगवान है। हनुमान जी के पास अष्ट महासिद्धि और नौ निधि हैं. ये अष्ट महासिद्धि अणिमा, लघिमा, महिमा, ईशित्व, प्राक्रम्य, गरिमा और वहित्व हैं। इन्ही सिद्धि के सहारे उनका सूर्य के पास जाना और उसे निगलना संभव हैं लेकिन हनुमान जी निगलते नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखी हनुमान चालीसा के इस 18वीं चौपाई में सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी का वर्णन है। जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। यह दोहा अवधी भाषा में है इस दोहे का हिंदी भाषा में अर्थ है कि हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था (खाने ही वाले थे तभी देवराज इंद्र ने प्रहार कर दिया)। अगर आप यहा...

कर्मो के हिसाब

                                कर्मो के हिसाब  एक भिखारी रोज एक दरवाजें पर जाता और भीख के लिए आवाज लगाता, और जब घर मालिक बाहर आता तो उसे गंदी गंदी गालिया और ताने देता, मर जाओ, काम क्यूं नही करतें, जीवन भर भीख मांगतें रहोगे, कभी कभी गुस्सें में उसे धकेल भी देता, पर भिखारी बस इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें। एक दिन सेठ बड़े गुस्सें में था, शायद व्यापार में घाटा हुआ था, वो भिखारी उसी वक्त भीख मांगने आ गया, सेठ ने आव देखा ना ताव, सीधा उसे पत्थर से दे मारा, भिखारी के सर से खून बहने लगा, फिर भी उसने सेठ से कहा ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें, और वहां से जाने लगा, सेठ का थोड़ा गुस्सा कम हुआ, तो वहां सोचने लगा मैंने उसे पत्थर से भी मारा पर उसने बस दुआ दी, इसके पीछे क्या रहस्य है जानना पड़ेगा, और वहां भिखारी के पीछे चलने लगा, भिखारी जहाँ भी जाता सेठ उसके पीछे जाता, कही कोई उस भिखारी को कोई भीख दे देता तो कोई उसे मारता, जलील करता गालियाँ देता, पर भिखारी इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारे पापों को...

शिव जी की आधी परिकर्मा क्यों की जाती है ?

चित्र
          शिव जी की आधी परिकर्मा क्यों की जाती है ? शिव जी की आधी परिक्रमा करने का विधान है, वह इसलिए की शिव के सोमसूत्र को लांघा नहीं जाता है। जब व्यक्ति आधी परिक्रमा करता है, तो उसे चंद्राकार परिक्रमा कहते हैं। शिवलिंग को ज्योति माना गया है और उसके आसपास के क्षेत्र को चंद्र। आपने आसमान में अर्ध चंद्र के ऊपर एक शुक्र तारा देखा होगा। यह शिवलिंग उसका ही प्रतीक नहीं है बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड ज्योतिर्लिंग के ही समान है। '' अर्द्ध सोमसूत्रांतमित्यर्थ: शिव प्रदक्षिणीकुर्वन सोमसूत्र न लंघयेत।। इति वाचनान्तरात।'' सोमसूत्र : शिवलिंग की निर्मली को सोमसूत्र की कहा जाता है, शास्त्र का आदेश है कि शंकर भगवान की प्रदक्षिणा में सोमसूत्र का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है। सोमसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया है कि भगवान को चढ़ाया गया जल जिस ओर से गिरता है,वहीं सोमसूत्र का स्थान होता है। क्यों नहीं लांघते सोमसूत्र : सोमसूत्र में शक्ति-स्रोत होता है अत: उसे लांघते समय पैर फैलाते हैं और वीर्य ‍निर्मित और 5 अन्तस्थ वायु के प्रवाह पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे दे...

जब रामजी वनवास जाने लगे तो लक्ष्मण जी की क्या स्थिति थी?

 जब रामजी  वनवास जाने लगे तो लक्ष्मण जी की क्या स्थिति थी? राम-लक्ष्मण संवाद  समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए ॥जब लक्ष्मणजी ने समाचार पाए, तब वे व्याकुल होकर उदास मुँह उठ दौड़े। भगवान के चरणों में गिर गए हैं। और सोच रहे हैं मुझको श्री रघुनाथजी क्या कहेंगे? घर पर रखेंगे या साथ ले चलेंगे? और लक्ष्मण हाथ जोड़ कर कहते हैं की भगवान मेरे लिए क्या आज्ञा है? भगवान श्री राम ने देखा की लक्ष्मण हाथ जोड़े खड़े हुए है और समझ गए हैं की ये भी साथ चलना चाहते हैं। श्री रामचन्द्रजी वचन बोले- तुम प्रेमवश अधीर मत होओ। मेरी सीख सुनो और माता-पिता के चरणों की सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घर पर नहीं हैं, और तुम यहाँ पर राज काज सम्भालो। यदि मैं तुमको साथ लेकर जाऊंगा तो अयोध्या अनाथ हों जाएगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार सभी पर दुःख का दुःसह भार आ पड़ेगा॥ प्रेमवश लक्ष्मणजी से कुछ उत्तर देते नहीं बनता। उन्होंने व्याकुल होकर श्री रामजी के चरण पकड़ लिए और कहा- हे नाथ! मैं दास हूँ और आप स्वामी हैं, अतः आप मुझे छोड़ ही दें तो मेरा क्या वश है? आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मैं तो एक प्र...

हमारे जीवन में चुनौतियां क्यों आती हैं?

                  क्या चुनौतियाँ  हम कुछ सिखाती है। महाराज दशरथ को जब संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी तब वो बड़े दुःखी रहते थे। पर ऐसे समय में उनको एक ही बात से हौंसला मिलता था जो कभी उन्हें आशाहीन नहीं होने देता था। और वह था श्रवण के पिता का श्राप। दशरथ जब-जब दुःखी होते थे तो उन्हें श्रवण के पिता का दिया श्राप याद आ जाता था। (कालिदास ने रघुवंशम में इसका वर्णन किया है) श्रवण के पिता ने ये श्राप दिया था कि ''जैसे मैं पुत्र वियोग में तड़प-तड़प के मर रहा हूँ वैसे ही तू भी तड़प-तड़प कर मरेगा'' दशरथ को पता था कि ये श्राप अवश्य फलीभूत होगा और इसका मतलब है कि मुझे इस जन्म में तो जरूर पुत्र प्राप्त होगा (तभी तो उसके शोक में मैं तड़प के मरूँगा)। यानि यह श्राप दशरथ के लिए संतान प्राप्ति का सौभाग्य लेकर आया। ऐसी ही एक घटना सुग्रीव के साथ भी हुई।  वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि सुग्रीव जब माता सीता की खोज में वानर वीरों को पृथ्वी की अलग - अलग दिशाओं में भेज रहे थे..  उसके साथ-साथ उन्हें ये भी बता रहे थे कि किस दिशा में तुम्हें कौन सा स्थान या देश...

भगवान राम के प्रसिद्ध नाम और उनके अर्थ

चित्र
           भगवान राम के प्रसिद्ध नाम और उनके अर्थ आदिराम - नित्य, स्वयंभू, शाश्वत सनातन अनंतराम, सर्वशक्तिमान परमात्मा जो सभी के सृजनकर्ता, पालनहार है राम - मनभावन, रमणीय, सुंदर, आनंददायक प्राणीमात्र के हृदय में 'रमण' (निवास, विहार) करते हैं, वह 'राम' हैं तथा भक्तजन जिनमें 'रमण' (ध्याननिष्ठ) होते हैं, वह 'राम' हैं रामलला - शिशु रुप राम रामचंद्र - चंद्र जैसे शीतल एवं मनोहर राम रामभद्र - मंगलकारी कल्याणमय राम राघव - रघुवंश के संस्थापक राजा रघु के वंशज, रघुवंशी, रघुनाथ, रघुनंदन रघुवीर - रघुकुल के सबसे वीर राजा राम रामेश्वर - राम जिनके ईश्वर है अथवा जो राम के ईश्वर है कौशल्या नंदन - कौशल्या को आनंद देने वाले, कौशल्या पुत्र, कौशलेय दशरथी - दशरथ पुत्र, दशरथ नंदन जानकीवल्लभ - जनकपुत्री सीता के प्रियतम श्रीपति - लक्ष्मी स्वरूपा सीता के स्वामी जानकीनाथ, सीतापति मर्यादा पुरुषोत्तम - धर्मनिष्ठ न्याय परायण पुरुषों में सर्वोत्तम  नारायणावतार - भगवान नारायण के अवतार, विष्णु स्वरूप जगन्नाथ - जगत के स्वामी, जगतपति हरि - पाप, ताप को हरने वाले जनार्दन - जो सभी जीवों का ...

सिय राम मय सब जग जानी ;

 श्री रामचरितमानस लिखने के दौरान तुलसीदास जी ने लिखा -             सिय राम मय सब जग जानी ;             करहु प्रणाम जोरी जुग पानी ! अर्थात सब में राम हैं और हमें उनको हाथ जोड़ कर प्रणाम करना चाहिये ! यह लिखने के उपरांत तुलसीदास जी जब अपने गाँव की तरफ जा रहे थे  तो किसी बच्चे ने आवाज़ दी -महात्मा जी उधर से मत जाओ  बैल गुस्से में है और आपने लाल वस्त्र भी पहन रखा है ! तुलसीदास जी ने विचार किया हू ,कल का बच्चा हमें उपदेश दे रहा है ! अभी तो लिखा था कि सबमे राम हैं ;उस बैल को प्रणाम करूगा और चला जाऊंगा ! पर जैसे ही वे आगे बढे बैल ने उन्हें मारा और वे गिर पड़े ! किसी तरह से वे वापिस वहाँ जा पहुँचे जहाँ श्री रामचरितमानस लिख रहे थे  सीधा चौपाई पकड़ी और जैसे ही उसे फाड़ने जा रहे थे कि... श्री हनुमान जी ने प्रगट हो कर कहा -तुलसीदास जी ये क्या कर रहे हो ? तुलसीदास जी ने क्रोधपूर्वक कहा -यह चौपाई गलत है ! और उन्होंने सारा वृत्तान्त कह सुनाया ! हनुमान जी ने मुस्करा कर कहा - चौपाई तो एकदम सही है आपने बैल में तो भगवान को देख...

अच्छे लोगो के साथ ही बुरा क्यो होता है?

      अच्छे लोगो के साथ ही बुरा क्यो होता है? सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥ भावार्थ:-मुनिनाथ ने बिलखकर (दुःखी होकर) कहा- हे भरत! सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाता के हाथ हैं॥ स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने दिया इसका उत्तर, जाने,,,,, अच्छे लोगो के साथ ही बुरा क्यो होता है, यह सवाल कई लोगो के मन मे आता होगा। मैंने तो किसी का बुरा नही किया, फिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ। मैं तो सदैव ही धर्म और नीति के मार्ग का पालन करता हूँ, पर मेरे साथ हमेशा बुरा क्यो होता है। ऐसे कई विचार अधिकांश लोगों के मन मे आते होंगे।  ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने दिए हैं। एक बार अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि हे वासुदेव! अच्छे और सच्चे बुरे लोगो के साथ ही बुरा क्यो होता है, इस पर भगवान श्री कृष्ण ने एक कहानी सुनाई। इस कहानी में हर मनुष्य के सवालों का जवाब वर्णित है। श्री कृष्ण कहते हैं, कि एक नगर में दो पुरूष रहते थे। पहला व्यापारी जो बहुत ही अच्छा इंसान था, धर्म और नीति का प...

भगवान राम के प्रसिद्ध नाम

चित्र
                      भगवान राम के प्रसिद्ध नाम आदिराम - नित्य, स्वयंभू, शाश्वत सनातन अनंतराम, सर्वशक्तिमान परमात्मा जो सभी के सृजनकर्ता, पालनहार है राम - मनभावन, रमणीय, सुंदर, आनंददायक प्राणीमात्र के हृदय में 'रमण' (निवास, विहार) करते हैं, वह 'राम' हैं तथा भक्तजन जिनमें 'रमण' (ध्याननिष्ठ) होते हैं, वह 'राम' हैं रामलला - शिशु रुप राम रामचंद्र - चंद्र जैसे शीतल एवं मनोहर राम रामभद्र - मंगलकारी कल्याणमय राम राघव - रघुवंश के संस्थापक राजा रघु के वंशज, रघुवंशी, रघुनाथ, रघुनंदन रघुवीर - रघुकुल के सबसे वीर राजा राम रामेश्वर - राम जिनके ईश्वर है अथवा जो राम के ईश्वर है कौशल्या नंदन - कौशल्या को आनंद देने वाले, कौशल्या पुत्र, कौशलेय दशरथी - दशरथ पुत्र, दशरथ नंदन जानकीवल्लभ - जनकपुत्री सीता के प्रियतम श्रीपति - लक्ष्मी स्वरूपा सीता के स्वामी जानकीनाथ, सीतापति मर्यादा पुरुषोत्तम - धर्मनिष्ठ न्याय परायण पुरुषों में सर्वोत्तम  नारायणावतार - भगवान नारायण के अवतार, विष्णु स्वरूप जगन्नाथ - जगत के स्वामी, जगतपति हरि - पाप, ताप को हरने वाले जना...

श्रीमद् भागवत गीता के 12वीं अध्याय का सरल अर्थ

चित्र
    श्रीमद् भागवत गीता के 12वें अध्याय का सरल अर्थ भक्त भगवान का अत्यंत प्यारा होता है; क्योंकि वह शरीर इंद्रियां, मन, बुद्धि सहित अपने आप को भगवान के अर्पण कर देता है। जो परम श्रद्धा पूर्वक अपने मन को भगवान में लगाते हैं, वे भक्त सर्वश्रेष्ठ है। भगवान के पारायण हुए जो भक्त संपूर्ण कर्मों को भगवान के अर्पण करके अनन्य भाव से भगवान की उपासना करते हैं, भगवान स्वयं उनके संसार सागर से शीघ्र उद्धार करने वाले बन जाते हैं। जो अपने मन बुद्धि को भगवान में लगा देता है, वह भगवान में ही निवास करता है। जिनका प्राणी मात्र के साथ मित्रता एवं करुणा का बर्ताव है जो अहंता ममता से रहित है, जिसे कोई भी प्राणी उद्विग्न नहीं होता तथा जो स्वंय किसी प्राणी से उद्विग्न नहीं होते जो नये कर्मों के आरंभ के त्यागी हैं, जो अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों के आने पर हर्षित एवं उद्विग्न नही होते, जो मान अपमान आदि में सम रहते हैं, जो जिस किसी भी परिस्थिति में निरंतर संतुष्ट रहते हैं, वे भक्त भगवान को प्यारे है। अगर मनुष्य भगवान के ही हो कर रहे, भगवान में ही अपनापन रखें, तो सभी भगवान के प्यार बन सकते हैं। गीता प्रे...

काशी विश्वनाथ मंदिर के महत्व पूर्ण स्थान दर्शन के लिए

चित्र
   काशी विश्वनाथ मंदिर के महत्व पूर्ण स्थान दर्शन के लिए और खरीदारी के लिए प्रसिद्ध वस्तु 5. भूतेश्वरनाथ मंदिर: यह एक प्राचीन शिव मंदिर है जो वाराणसी में स्थित है और भक्तों को आकर्षित करने वाला है। 6. काशीक्षेत्र विश्वविद्यालय :यह विश्वविद्यालय भारतीय संस्कृति और तथ्यवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है और यहाँ के कैम्पस में भी दर्शनीय स्थल हैं। 7. रानी लक्ष्मीबाई स्मारक (भवानी शंकर मंदिर ): यह स्मारक झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को समर्पित है और भवानी शंकर मंदिर के रूप में भी जाना जाता है।  8.मणिकर्णिका घाट–  वाराणसी के प्रमुख और पवित्र घाटों में से एक है। यह घाट गंगा नदी के किनारे स्थित है और हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण स्थानों में से एक है। इसे मुक्तिदायिनी घाट भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ श्रद्धालु लोग अपने पितृगण के लिए श्राद्ध करने आते हैं और मृत्यु के बाद मुक्ति प्राप्त करने की आशा करते हैं। मणिकर्णिका घाट पर स्थित मान्यवर्गीय मंदिर में देवी अनपूर्णा की पूजा की जाती है। यह घाट अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है और इसे गंगा आरती, पूजा, और साधु-संतों के स...

बनारस कुछ प्रमुख खरीदने के स्थान:और खाने की स्वादिष्ट चीजें

चित्र
                  बनारस   कुछ प्रमुख खरीदने के स्थान:और खाने की स्वादिष्ट चीजें वाराणसी एक प्राचीन और रमणीय शहर है, जिसमें विभिन्न प्रकार के और अद्वितीय वस्त्र, शिल्पकला और पूजा सामग्री के लिए प्रसिद्ध बाजार हैं। यहाँ कुछ प्रमुख खरीदने की वस्तुएं : 1. बनारसी साड़ीयाँ:  वाराणसी को बनारसी साड़ीयों के लिए प्रसिद्ध है, जो भारतीय स्थानीय सारी कला का प्रतीक हैं। 2. भगवान शिव की मूर्तियाँ और शिवलिंग : वाराणसी में शिवलिंग और भगवान शिव की मूर्तियाँ प्राप्त करने के लिए प्रसिद्ध हैं। 3. इत्र (अर्क) : वाराणसी में अद्भुत इत्रों का विक्रय होता है, जो स्थानीय बाजारों में उपलब्ध हैं। 4. कछुआ शिल्पकला : वाराणसी में कछुआ शिल्पकला के आदर्श और सुंदर नमूने मिलते हैं, जो एक विशेष शैली का प्रतीक हैं। 5. बनारसी पान   :वाराणसी में विशेष तरीके से बने पान का आनंद लेना भी एक स्थानीय अनुभव हो सकता है। इसके साथ साथ सुबह सुबह गली गली में स्वादिष्ट कचौड़ी, बेडमी पूरी,मसाला चाय,टमाटर चाट आदि खाने योग्य है। आपको एक बताना तो भूल ही गई जब भी काशी जाएं तो बाब...

काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में महत्व पूर्ण जानकारी

चित्र
  काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में महत्व पूर्ण जानकारी काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी शहर में स्थित है और यह हिन्दू धर्म का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसे विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग का स्थान माना जाता है। मंदिर का निर्माण 18वीं सदी में मराठा राजा आहिल्याबाई होलकर द्वारा किया गया था। काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी के सबसे प्रमुख और पवित्र मंदिरों में से एक है जिसे लाखों भक्त वाराणसी में प्रतिवर्ष यात्रा करते हैं। मंदिर के प्रांगण में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर के अलावा, यहाँ कई छोटे-बड़े मंदिर और कुंज भी हैं जो आराधकों को एक आध्यात्मिक और धार्मिक अनुभव प्रदान करते हैं। गंगा घाटों पर भी अनगिनत पूजा-स्थल हैं जो यहाँ के धार्मिक माहौल को और भी प्रशंसा करते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक ऐतिहासिकता का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह भक्तों के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर का स्थान ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसे हिन्दू धर्म में एक प्रमुख तीर्थ स्थल ...

श्रीमद् भागवत गीता संबंधी प्रश्न उत्तर

                      श्रीमद् भागवत गीता संबंधी प्रश्न उत्तर 5 से 7  5 प्रश्न– शरीरी (जीवात्मा) अविनाशी है, इसका विनाश कोई  कर ही नहीं सकता,(2/17) यह ना मरता है और ना मारा जाता है(2/19) तो फिर मनुष्य को प्राणियों की हत्या का पाप लगना ही नहीं चाहिए? उत्तर –पाप तो पिंड–प्राणों का वियोग करने का लगता है; क्योंकि प्रत्येक प्राणी पिंड–प्राण में रहना चाहता है, जीना चाहता है। यद्यपि महात्मा लोग जीना नहीं चाहते, फिर भी उन्हें मारने का बड़ा भारी पाप लगता है क्योंकि उनका जीवन संसार मात्र चाहता है। उनके जीने से प्राणी मात्र का परम हित होता है। प्राणी मात्र को सदा रहने वाली शांति मिलती है। जो वस्तुएं प्राणियों के लिए जितनी आवश्यक होती हैं, उनका नाश करने का उतना ही अधिक पाप लगता है। 6 प्रश्न–आत्मा नित्य है, सर्वत्र परिपूर्ण है, स्थिर स्वभाव वाला है(2/24), तो फिर इसका पुराने शरीर को छोड़कर दूसरे नए शरीर में चला जाना कैसे संभव है(2/22)? उत्तर –जब यह प्रकृति के अंश शरीर को अपना मान लेता है ,उसके साथ तादाम्य में कर लेता है, तब यह प्रकृति के...

गीता के 11 अध्याय का सरल अर्थ

                 गीता के 11वें अध्याय का सरल अर्थ अर्जुन ने भगवान की कृपा से जिस दिव्या विश्व रूप के दर्शन किये, उसको तो हर एक मनुष्य नहीं देख सकता, परंतु आदि- अवतार रूप से प्रकट हुए इस संसार को श्रद्धापूर्वक भगवान का रूप मानकर तो हर एक मनुष्य विश्व रूप के दर्शन कर सकता है। अर्जुन ने विश्व रूप दिखाने के लिए भगवान से नम्रता पूर्वक प्रार्थना की तो भगवान ने दिव्य नेत्र प्रदान करके अर्जुन को अपना दिव्य विश्व रूप दिखा दिया। उसमें अर्जुन ने भगवान के अनेक मुख, नेत्र, हाथ आदि देखे ब्रह्मा, विष्णु और शंकर को देखा, देवताओं, गंधर्व, सिद्धों सांपों आदि को देखा उन्होंने विश्व रूप के सौम्य, उग्र अतिउग्र आदि कई स्तर देखे। इस दिव्य विश्वरूप को हम सब नहीं देख सकते, पर नेत्रों से दिखने वाले इस संसार को भगवान का स्वरूप मानकर, अपना उद्धार तो हम कर ही सकते हैं। कारण कि यह संसार भगवान से ही प्रकट हुआ है, भगवान ही सब कुछ बने हुए हैं।

गीता के दसवें अध्याय का सरल अर्थ

           गीता के दसवें अध्याय का  सरल अर्थ मनुष्य के पास चिंतन करने की जो शक्ति है उसको भगवान  के चिंतन में ही लगाना चाहिए। संसार में जिस किसी में, जहां कहीं विलक्षणता, विशेषता, मेहत्ता, अलौकिकता, सुंदरता आदि दिखती है, उसमें वह खिंचता है,वह विलक्षणता आदि सब वास्तव में भगवान ही है। अतः वहां भगवान का ही चिंतन होना चाहिए। उस वस्तु, व्यक्ति आदि का नहीं। यही विभूतियों के वर्णन का तात्पर्य है।

गीता के नवें अध्याय का सरल अर्थ

चित्र
                 गीता के नवें अध्याय का तात्पर्य  सभी मनुष्य भगवत प्राप्ति के अधिकारी हैं, चाहे वह किसी भी वर्ण, आश्रम,संप्रदाय,देश, वेश आदि के क्यों ना हो। वे सभी भगवान की तरफ चल सकते हैं। भगवान का आश्रय लेकर, भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। भगवान को इस बात का दुख है, खेद है,पश्चाताप है कि यह जीव मनुष्य शरीर पाकर, मेरी प्राप्ति का अधिकार पाकर भी ,मेरे को प्राप्त न करके, मेरे पास ना आकर मौत (जन्म मरण)में जा रहे हैं। मेरे से विमुख होकर भी कोई तो मेरी अवहेलना करके, कोई आसुरी संपत्ति का आश्रय लेकर और कोई साकाम भाव से यज्ञ आदि का अनुष्ठान करके, जन्म मरण के चक्कर में जा रहे हैं। वह पापी से पापी हों, किसी नीच योनि में पैदा हुए हो, किसी भी वर्ण, आश्रम, देश आदि के हों, वे सभी मेरा आश्रय लेकर मेरी प्राप्ति कर सकते हैं अतः इस मनुष्य शरीर को पाकर जीव को मेरा भजन करना चाहिए

गीता के आठवें अध्याय का सरल अर्थ

चित्र
               गीता के आठवें अध्याय का सरल अर्थ अंतकालीन चिंतन के अनुसार ही जीव की गति होती है। इसलिए मनुष्य को हरदम सावधान रहना चाहिए, जिससे अंत काल में भागवत स्मृति बनी रहे। अंत समय में शरीर छुटते समय मनुष्य जिस वस्तु व्यक्ति आदि का चिंतन करता है, उसी के अनुसार उसको आगे का शरीर मिलता है। जो अंत समय में भगवान का चिंतन करता हुआ शरीर छोड़ता है वह भगवान को ही प्राप्त होता है। उसका फिर जन्म मरण नहीं होता। अतः मनुष्य को सब समय में, सभी अवस्थाओं में और शास्त्र विहित सब काम करते हुए भगवान को याद रखना चाहिए जिससे अंत समय में भगवान ही याद आए। जीवन भर रागपूर्वक जो कुछ किया जाता है प्राय: वहीं अंत समय में याद आता है। इस अध्याय में भगवान कृष्ण ने स्वभाव, प्रकृति, और पुरुष के तात्पर्य को स्पष्ट किया है। वह यह बताते हैं कि सभी जीवों का अधिष्ठान प्रकृति है और उनका नियंत्रण पुरुष करता है। कर्मों के माध्यम से पुरुष को प्रकृति से मुक्ति प्राप्त होती है। इसके साथ ही, भक्ति और ज्ञान के माध्यम से भी व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। यह अध्याय जीवन को संतुलित रू...

गीता के सातवें अध्याय का तात्पर्य

चित्र
                गीता के सातवें अध्याय का सरल अर्थ सब कुछ वासुदेव ही है, भागवत रूप ही है– इसका मनुष्य को अनुभव कर लेना चाहिए।  सूत के मणियों से बनी हुई महिलाओं में सूत की तरह भगवान ही सब संसार में ओत प्रोत है। पृथ्वी, जल, तेज,वायु आदि तत्वों में; चांद, सूर्य आदि रूपों में; सात्विक, राजस्व और तमस भाव, क्रिया आदि में भगवान ही परिपूर्ण है। ब्रह्म, जीव ,क्रिया, संसार, ब्रह्मा और विष्णु रूप से भगवान ही हैं। इस तरह तत्व से सब कुछ भगवान ही भगवान हैं। इस अध्याय में भगवान कृष्ण अर्जुन को यह भी बताते हैं कि भक्ति में समर्पण करने से सब कुछ संभव है और व्यक्ति अपनी आत्मा को परमात्मा में मिला सकता है। इस अध्याय के माध्यम से जीवन में उद्दीपना और मार्गदर्शन मिलता है, जो सच्चे धर्म की प्राप्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं।

रामचरितमानस और रामायण में क्या अंतर है?

चित्र
            रामचरितमानस और रामायण में क्या अंतर है "रामचरितमानस" और "रामायण" दोनों ही महाकाव्य हैं जो भगवान राम के जीवन को बयान करते हैं, लेकिन इनमें कुछ अंतर हैं। "रामचरितमानस" का रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास था, जबकि "रामायण" का अद्भुत महाकाव्य वाल्मीकि ने लिखा। तुलसीदास ने "रामचरितमानस" को अपनी भक्ति भावना से भरा हुआ बनाया, जिसमें भगवान राम की प्रशंसा और भक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसमें अधिकतर भक्ति भावनाओं को सुरक्षित करने के लिए विशेष पहलुओं का उल्लेख है। वहीं, वाल्मीकि की "रामायण" ने राम के जीवन को ऐतिहासिक और तात्कालिक पृष्ठभूमि से दर्शाने का प्रयास किया है। इसमें राम, सीता, हनुमान, लक्ष्मण आदि के चरित्रों को अद्वितीय रूप से प्रस्तुत किया गया है, जिससे यह एक महाकाव्य और एक ऐतिहासिक ग्रंथ भी है। "रामचरितमानस" ने भगवान राम के कथानक को अपने धार्मिक दृष्टिकोण से दर्शाया है, जिसमें भक्ति, नैतिकता, और आदर्शवाद को महत्वपूर्ण स्थान मिलता है। तुलसीदास ने भक्ति मार्ग को प्रमोट किया और राम के चरित्र को एक नेतृत्वपूर्ण आ...

श्रीमद भागवत गीता सम्बन्धी प्रश्नोत्तर

चित्र
                         श्रीमद् भागवत   गीता सम्बन्धी प्रश्नोत्तर 1 से 4 तक 1प्रश्न – गौरव सेना के तो शंख ,भेरी, ढोल आदि कई बाजे बजे ,पर पांडव सेना के केवल शंख ही बजे, ऐसा क्यों? उत्तर- युद्ध में विपक्ष की सेना पर विशेष व्यक्तियों का ही असर पड़ता है, सामान्य व्यक्तियों का नहीं। कौरव सेना के मुख्य व्यक्ति भीष्म जी के शंख बजाने के बाद संपूर्ण सैनिकों ने अपने-अपने कई प्रकार के बाजे बजाए, जिसका पांडव सेना पर कोई असर नहीं पड़ा। परंतु पांडव सेना के मुख्य व्यक्तियों ने अपने-अपने शंख बजाए जिनकी तुमुल ध्वनि ने कौरवों के हृदय को विदीर्ण कर दिया। 2 प्रश्न – भगवान तो जानते ही थे कि भीष्मजी ने दुर्योधन को प्रसन्न करने के लिए ही शंख बजाया है, यह युद्ध आरंभ की घोषणा नहीं है। फिर भी भगवान ने शंख क्यों बजाया? उत्तर –भीष्म जी का शंख बजते ही कौरव सेवा के सब बाजे एक साथ बजे उठे। अतः ऐसे समय पर अगर पांडव सेना के बाजे ना बजते तो बुरा लगता, पांडव सेना की हार सूचित होती और व्यवहार भी उचित नहीं लगता। अतः भक्तपक्षपाती भगवान ने पांडव सेना के स...

श्री राम स्तुति का सरल अर्थ।।

चित्र
                       ।। श्री राम स्तुति का सरल अर्थ ।। "श्री रामचंद्र कृपालु भजुमन" का स्वरूप इस प्रकार है: 1. श्री रामचंद्र : स्तुति का आरंभ हो रहा है भगवान राम की महिमा के साथ। 2. हरण भवभय दारुणं : भगवान राम भक्तों के लिए संसारिक भयों को दूर करने वाले हैं। 3 . नव कंज लोचन... कंजारुणं :यह श्लोक भगवान के सुंदर रूप, आँखें, मुख, हाथ, और पैर की प्रशंसा करता है। हे मन, कृपानिधान प्रभु श्रीरामचंद्र को नित्य भज जो भवसागर के जन्म-मृत्यु रूपी कष्टप्रद भय को हरने वाले हैं। उनके नयन नए खिले कमल की तरह हैं। मुँह-हाथ और पैर भी लाल रंग के कमल की तरह हैं ॥१॥ 4. कन्दर्प अगणित अमित छवि... नोमि जनक सुतावरं इसमें हरिवंश (कृष्ण) के अनगिनत रूपों की प्रशंसा है और राम को  कहकर स्तुति की जा रही है। उनकी सुंदरता की अद्भुत छ्टा अनेकों कामदेवों से अधिक है। उनके तन का रंग नए नीले-जलपूर्ण बादल की तरह सुन्दर है। पीताम्बर से आवृत्त मेघ के समान तन विद्युत के समान प्रकाशमान है। ऐसे पवित्र रूप वाले जानकीपति प्रभु राम को मैं नमन करता हूं। ॥२॥ 5. भजु दीनब...

गीता के छठे अध्याय का सरल तात्पर्य

चित्र
           गीता के छठे अध्याय का सरल तात्पर्य किसी भी साधन से अन्त:करण मे समता आनी चाहिए;क्योंकि समता के बिना मनुष्य अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों में,मान अपमान में सम (निर्विकार) नही रह सकता और अगर वह परमात्मा का ध्यान करना चाहे तो ध्यान भी नहीं कर सकता। तात्पर्य यह है कि अंतःकरण में समता आए बिना सुख-दुख आदि द्वन्द्वो का असर नहीं मिटेगा और मन भी ध्यान में नहीं लगेगा। जो मनुष्य प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों में वर्तमान में किए जाने वाले कर्मों की पूर्ति आपूर्ति में सिद्ध असिद्धि में, दूसरों के द्वारा किए गए मान अपमान में, धन संपत्ति आदि में, अच्छे बुरे मनुष्यों में सम रहता है, वह श्रेष्ठ है। जो साध्य रूप में समता का उद्देश्य रखकर मन इंद्रियों के संयम पूर्वक परमात्मा का ध्यान करता है, उसके संपूर्ण प्राणियों में और उनके सुख-दुख में समबुद्धि हो जाती है। समता प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला मनुष्य वेदों में कहे हुए सकाम कर्मों का अतिक्रमण कर जाता है। समता वाला मनुष्य से सकाम भाव वाले तपस्वी ज्ञानी और कर्मी मनुष्य से श्रेष्ठ है। गीता के ...

गीता के पांचवे अध्याय का सरल तात्पर्य

चित्र
                    गीता के पांचवे अध्याय का तात्पर्य मनुष्य को अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति में सुखी दु:खी,राजी नाराज नहीं होना चाहिए;क्योंकि इन सुख दुःख आदि द्वंदो में फंसा हुआ मनुष्य संसार से ऊंचा नही उठ सकता। स्त्री पुत्र,परिवार,धन–संपत्ति का केवल स्वरूप से त्याग करने वाला ही सन्यासी नही है अपितु जो अपने कर्तव्य का पालन करते हुए राग द्वेष नहीं करता,वही सच्चा सन्यासी है।जो अनुकूल परिस्थिति आने पर हर्षित नही होता और प्रतिकूल परिस्थितियों में उदास नही होता,ऐसा वह द्वंदो से रहित मनुष्य परमात्मा में ही स्थित रहता है।सांसारिक सुख दुःख,अनुकूलता प्रतिकूलता आदि द्वंद दुखो के ही कारण है। अतः बुद्धिमान व्यक्ति को उनमें नही फसना चाहिए। गीता के पांचवें अध्याय में, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग और संन्यास के सिद्धांतों का बोध कराया। इसमें जीवन के उद्देश्य, कर्तव्य, और भक्ति के महत्व पर चर्चा है। अर्जुन को स्वधर्म में कर्म करने की महत्वपूर्णता को समझाते हुए, उन्होंने यह भी बताया कि भगवान के प्रति भक्ति और समर्पण से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है। यह ...

गीता के चौथा अध्याय का सरल अर्थ

                  गीता के   चौथा अध्याय का सरल अर्थ सम्पूर्ण कर्मों के लीन करने के , संपूर्ण कर्मों के बंधन से रहित होने के दो उपाय हैं– कर्मों के तत्वों को जानना और तत्व ज्ञान को प्राप्त करना।  भगवान सृष्टि की रचना तो करते हैं, पर उस कर्म में और उसके फल में कर्तव्य अभिमान एवं आसक्ति ना होने से बंधते  नहीं। कर्म करते हुए जो मनुष्य कर्म फल की आसक्ति, कामना, ममता आदि नहीं रखते अर्थात कर्म फल से सर्वप्रथम निर्लिप्त रहते हैं और निर्लिप्त रहते हुए कर्म करते हैं। वह संपूर्ण कर्मों को काट देते हैं। जिसके संपूर्ण कर्म संकल्प और कामना से रहित होते हैं, उसके संपूर्ण कर्म जल जाते हैं। जो कर्म और कर्म फल की आसक्ति नहीं रखता वह कर्मों में सांगोपांग प्रवृत होता हुआ भी कर्मों से नहीं बंधता। जो केवल शरीर निर्वाह के लिए ही कर्म करता है तथा जो कर्मों की सिद्धि, असिद्धि में सम रहता है, वह कर्म करके भी नहीं बंधता। जो केवल कर्तव्य परंपरा सुरक्षित रखने के लिए ही कर्म करता है उसके संपूर्ण कर्म लीन हो जाते हैं। इस तरह कर्मों के तत्वों को ठीक तरह से जा...