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पान वाले चूने से होते हैं हमारे शरीर को बहुत से फायदे----

                           चूने से होने वाले फायदे  जब भी किसी को पीलिया हो जाए,  उसके सबसे अच्छी दवा है चुना। गेहूं के दाने के बराबर चूना ले लीजिए। गन्ने के रस में मिलाकर पिलाने से पीलिया में आराम मिल जाता है।  गेहूं के दाने के बराबर चूना लीजिए, उसे दही में मिलाकर या दाल में मिलाकर, नहीं तो पानी के साथ मिला कर ले लीजिए शरीर में होने वाली कैल्शियम की कमी को दूर करता है। 50 की उम्र के बाद जिनको कैल्शियम की कमी हो जाती है, उन्हें गेंहू के दाने के बराबर  पानी में लेने से, कैल्शियम की कमी दूर हो जाती है ।जोड़ों का दर्द ठीक हो जाता है, और मासिक धर्म रुकने के बाद होने वाली सभी तरह की की परेशानियों से आराम मिल जाता है।एनीमिया की प्रॉब्लम हो तो चूने से आराम मिलता है।  कई बार हमारी रीढ़ की हड्डियों में gape  पाया जाता है, वह भी चूने से आराम मिलता है। अनार के रस में गेहूं के दाने के बराबर चूना मिलाकर पीने से खून बहुत ज्यादा बढ़ता है। घुटने में घिसाव आ जाता है, उसके लिए भी चुना बहुत लाभकारी है...

आप अकेले नहीं आपके आसपास कोई है जो कह रहा है मैं हूं ना और वह है हम सबके प्रभु

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                                  मैं हूं ना यह शब्द देखने में तो छोटे हैं ,लेकिन जब कोई अकेला और उदास होता है।तो इन शब्दों के मायने बढ़ जाते हैं। जब हम छोटे होते हैं और हमें किसी खिलौने की तलाश होती है, तो मां और पिता नजर आते हैं,, जो कह रहे होते हैं मैं हूं ना ।जब हमें एग्जाम में नोट्स की या स्टडी की जरूरत होती है ,तो दोस्त होते हैं करीबी ,जो कहते हैं मैं हूं ना। जब हमें जीवन में आगे बढ़ना होता है चाहे वह पढ़ाई का क्षेत्र हो, चाहे वह जॉब्स या व्यापार का, उस समय पिता सामने होते हैं ,जो कह रहे होते हैं- मैं हूं ना ।चिंता क्यों करते हो/ या करती हो। ऐसे ही जब हम बड़े हो जाते हैं तो माता-पिता साथ नहीं होते हैं, वह हमें छोड़कर जा चुके होते हैं । तो केवल और केवल एक ईश्वर का साथ ही होता है, जो हमें अकेले होने पर वह हमारा साथ देता है। उस पर अगर आपका विश्वास हो, और श्रद्धा हो,, तो ईश्वर हर मोड़ पर, हर जगह यही अहसास दिलाता है कि ,तू अकेला नहीं है मैं हूं ना। तो विश्वास को बनाकर रखिए। ईश्वर से जुड़े रहिए। तो...

क्या आप जल्दी ही सभी दुखों से मुक्ति चाहते हैं तो श्री रामायण मनका 108 का हफ्ते में एक बार पाठ जरूर करें।

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     जिनके पास पूरी रामायण पढ़ने का समय नहीं है, वह यह रामायण मनका पढ़कर लाभ उठा सकते हैं।                                                       श्री रामायण मनका 108 रघुपति राघव राजाराम। पतित पावन सीताराम।। जय रघुनंदन जय घनश्याम। पतित पावन सीताराम।। भीड़ पड़ी जब भक्त पुकारे। दूर करो प्रभु दुख हमारे।। दशरथ के घर जन्मे राम। पतित पावन सीताराम।। विश्वामित्र मुनीश्वर आये। दशरथ भूप से वचन सुनाए।। संग में भेजें लक्ष्मण राम। पतित पावन सीताराम।। वन में जाए ताड़का मारी। चरण छू आए अहिल्या तारी।। ऋषियों के दुख हरते राम। पतित पावन सीताराम। जनकपुरी रघुनंदन आए। नगर निवासी दर्शन पाए।। सीता के मन भाए राम। पतित पावन सीताराम।। रघुनंदन ने धनुष चढ़ाया। सब राजों का मान घटाया।। सीता ने वर पाए राम। पतित पावन सीताराम।। परशुराम क्रोधित हो आए। दुष्ट भूप में मन में हरषायें।। जनक राय ने किया प्रणाम। पतित पावन सीताराम।। बोले लखन सुनो मुनि ज्ञानी...

गुरु गीता से लाभ

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                            गुरु गीता से लाभ   जब हम गुरु गीता का पाठ करते हैं तो बस हम उसे पढ़ ही नहीं रहे होते बल्कि हम अपने अंतर में श्री गुरु की पूजा कर रहे होते हैं। गुरु गीता, गुरु की चैतन्य मंत्र- देह है। गुरु गीता के प्रत्येक अक्षर में श्री गुरु का वास है। हम गुरु पूजा ही कर रहे होते हैं।  स्वामी मुक्तानंद

स्वंय शास्त्रों का व ग्रंथों का अध्ययन करने से क्या लाभ होता है?

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              स्वाध्याय का अर्थ श्री गुरु के शब्दों में जब तुम शास्त्रों का पाठ करते हो या सिद्ध जनों द्वारा रचित ग्रंथ पढ़ते हो  , तो तुम सकारात्मक ऊर्जा का एक भंडार बना लेते हो । तुम एक अत्यंत उत्थान कारी वातावरण का निर्माण कर लेते हो । तुम अपने अस्तित्व की समस्त कोशिकाओं को शुद्ध कर लेते हो। पवित्र ग्रंथों का नित्य पाठ करना, पवित्र नदियों में स्नान करने जैसा है। यह मन को तरोताजा करता है, वाणी को निर्मल कर देता है और तुम्हें शक्ति से भर देता है।    - गुरुमाई चिद्विलासानंद

मंत्रधुन का महत्व

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                                 मंत्रधुन जब तुम बहुत समय तक निरंतर मंत्र धुन गाते हो तो तुम मंत्र की अग्नि को उत्पन्न कर रहे हो, जो तुम्हारी संपूर्ण सत्ता में फैल जाती है।  - गुरुमाई चिद्विलासान्नद इसलिए जब कभी कुछ विपदा हो, कुछ संकट हो, मन निराश हो ,चारों ओर निराशा ही निराशा नजर आ रही हो। तो जो भी मंत्र आपको पसंद है ।जिस मंत्र से भी आपके मन को शांति मिलती है। उस मंत्र को आप जरूर सुनिए, घर में ऑडियो क्लिप के द्वारा या वीडियो के द्वारा घर में चला दीजिए। जब आपके घर में वह मंत्र प्रतिदिन चलता रहेगा ,तो आप महसूस करेंगे ,धीरे-धीरे आपके मन में और आपके घर में और आपके जीवन में शांति आ रही है। एक बार करके जरुर देखिएगा। मंत्र जब घर में चलता है ,तो आपके दिमाग में जो नकारात्मक सोच होती है, और जो आपके जीवन में, आपके विचार में नकारात्मक सोच होती है। वह धीरे-धीरे खत्म हो जाती है और आपके अंदर विश्वास पैदा हो जाता है और यही विश्वास आपको हर संकट में लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। राम राम

मनन के लिए श्री गुरु के शब्द

                       मनन के लिए श्री गुरु के शब्द सेवा का अर्थ है ,बिना किसी अपेक्षा या शर्त के अपना समय और अपनी शक्ति अर्पित करना और इस तरह से,पूर्ण स्वतंत्रता के साथ काम कर पाना। सेवा का अर्थ है ,उच्चतम उद्देश्य के लिए कार्य करना, दूसरे मनुष्य की योग्यता को पहचानते हुए कार्य करना और जीवन के मूल्यों को ध्यान में रखना। सेवा का अर्थ है ,कार्य को ऐसे करना जैसे पूजा का एक रूप हो ,भगवान की महिमा गाने का एक तरीका हो, परमोच्च प्रेम के लिए किया गया एक अर्पण हो । गुरु माई चिद्विलासानन्द

श्री राधा माधव के यवन भक्त श्री सनम साहब

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        श्री राधा माधव के यवन भक्त श्री सनम साहब भक्त  श्री सनम साहब जी का पूरा नाम था- मोहम्मद याकूब साहब। आपका जन्म सन् 1883 ईस्वी के लगभग अलवर में हुआ था। इनके पिता अजमेर के सरकारी अस्पताल के प्रधान चिकित्सक थे। इनकी मां एक पठान की पुत्री थी, फिर भी पूर्व जन्म के संस्कार वश उन्हें गोस्वामी श्री तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस पढ़ने और गाने का शौक था। श्री राम जी की कृपा से उन्हें श्री रामचरितमानस के मूल ग्रंथ वाल्मीकि रामायण को पढ़ने की इच्छा हुई। किंतु पर्दे में रहने के कारण बाहर जाना नहीं हो सका। तो उन्होंने एक पंडित जी को घर बुलवाकर रामायण सुनने की इच्छा व्यक्त की। किंतु उसमें भी सफलता नहीं मिली । तब मां ने कहा- 'बेटे ,तुम संस्कृत पढ़ लो ।"पर कोई पंडित गोमांस तथा प्याज खाने वाले मुसलमान को संस्कृत पढ़ाने के लिए तैयार नहीं हुआ। माता पुत्र  ने निश्चय पूर्वक मांस आदि का त्याग कर दिया। फिर मां के कहने पर सनम साहब ने पंडित गंगा सहाय शर्मा से सारी बात बताई और उनकी अनुमति मिलने पर पंडित जी से संस्कृत पढी। भागवत आदि ग्रंथों के अध्ययन के पश्चात उनका चित...

श्री कृष्ण दीवाने रसखान जी

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                   श्री कृष्ण दीवाने रसखान जी  हमारे बांके बिहारी कोई -ना -कोई  अहेतु की लीला करते ही रहते हैं। उनकी माया का कोई पार नहीं पा सकता, ना जाने कब किस पर रीझ जायँ, ना जाने कब किस जीव पर कृपा हो जाए। बुलाने पर तो वह कभी आते नहीं ,चाहे सिर पटक पटक कर मर जाए। ना तप से मिलते हैं, ना जप से, न ध्यान से ।यदि इन्हें इस प्रकार मिलना हो तो योगी, यति, ऋषि, ध्यान करते रहते हैं, परंतु यह उनकी ओर देखते तक नहीं। जब कृपा करते हैं, तो अचानक करते हैं।  कृष्ण के दीवाने रसखान जी एक मुसलमान थे। एक बार की घटना है  वे अपने उस्ताद के साथ मक्का मदीना जा रहे थे। उनके उस्ताद ने कहा- देखो, रास्ते में हिंदुओं का तीर्थ वृंदावन आएगा ,वहां एक काला नाग रहता है। तू आगे- पीछे मत देखना ,नहीं तो वह तुझे डस लेगा, तू मेरे पीछे-पीछे चला आ।अपने दाएं- बाएं भी मत देखना, वरना जब मौका दिखेगा तुझेडँस लेगा।  बस रसखान जी के मन में एक उत्कंठा सी जाग गई ,क्या मुझे वहां काला नाग दिखाई देगा। वह यही सोचते जा रहे थे उनके लो लग गई, हमारी श्री बांके ब...

अधिक चंचलता उचित नहीं है।

                      अधिक चंचलता उचित नहीं है   प्राचीन काल की बात है सूर्यवंश  में शर्याती नाम के एक राजा थे ।उनके नगर के समीप ही मानसरोवर के समान एक सरोवर था । महर्षि भृगु का चयव्न  नामक एक बड़ा ही तेजस्वी पुत्र था। वह इस सरोवर के तट पर तपस्या करने लगा, वह मुनि कुमार बहुत समय तक वृक्ष के समान निश्चल रहकर एक ही स्थान पर विरासन में बैठे रहा, धीरे-धीरे अधिक समय बीतने पर उसका शरीर तृण और लताओं से ढक गया ।उस पर चीटियों ने अड्डा जमा लिया। ऋषि बांबी के रूप में दिखाई देने लगे ,वे चारों ओर से केवल मिट्टी का पिंड जान पड़ते थे। इस प्रकार बहुत काल व्यतीत होने के बाद एक दिन राजा शर्याति इस सरोवर पर क्रीडा करने के लिए आए उनकी 4 सहस्त्र सुंदर रानियां और एक सुंदर कन्या थी, उसका नाम सुकन्या था ।वह दिव्य गुणों से विभूषित कन्या अपनी सहेलियों के साथ विचरती   हुई उस चय्वन ऋषि के बांबी के पास पहुंच गई ,उसने उस बांबी के छिद्र में से चमकती हुई आंखों को देखा ,इससे उसे बड़ा कोतूहल हुआ, फिर बुद्धि भ्रमित हो जाने से उसने उन्हे...

क्या है चरणामृत का महत्व ?

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              क्या है चरणामृत का महत्व ????? अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है,क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की कि चरणामृतका क्या महत्व है, शास्त्रों में कहा गया है। अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।। "अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है। जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता" जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है। चरणामृत से सम्बन्धित एक पौराणिक गाथा काफी प्रसिद्ध है जो हमें श्रीकृष्ण एवं राधाजी के अटूट प्रेम की याद दिलाती है। कहते हैं कि एक बार नंदलाल काफी बीमार पड़ गए। कोई दवा या जड़ी-बूटी उन पर बेअसर साबित हो रही थी। तभी श्रीकृष्ण ने स्वयं ही गोपियों से एक ऐसा उपाय करने को कहा जिसे सुन गोपियां दुविधा में पड़ गईं। श्रीकृष्ण हुए बीमार,,,,दरअसल श्रीकृष्ण ने गोपियों से उन्हें चरणामृत पिलाने को क...

वृन्दावन आखिर है क्या?

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                                  वृन्दावन क्या है?  वृन्दावन आखिर है क्या? लोग क्यों यहां एक बार जाकर केवल तन से वापस आते हैं, मन वहीं छूट जाता है? वृन्दावन का आध्यातमिक अर्थ है- "वृन्दाया तुलस्या वनं वृन्दावनं" तुलसी का विषेश वन होने के कारण इसे वृन्दावन कहते हैं। वृन्दावन ब्रज का हृदय है जहाँ भगवान श्री राधाकृष्ण ने अपनी दिव्य लीलायें की हैं। इस दिव्य भूमि की महिमा बड़े-बड़े तपस्वी भी नहीं समझ पाते। ब्रह्मा जी का ज्ञान भी यहाँ के प्रेम के आगे फ़ीका पड़ जाता है। । इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि वृन्दावन का कण-कण रसमय है। रसिकों की राजधानी भी वृन्दावन को कहा जाता है। वृन्दावन श्री राधिका जी का निज धाम है। विद्वत्जन श्री धाम वृन्दावन का अर्थ इस प्रकार भी करते हैं "वृन्दस्य अवनं रक्षणं यत्र तत वृन्दावनं" जहाँ श्री राधारानी अपने भक्तों की दिन-रात रक्षा करती हैं, उसे वृन्दावन कहते हैं। वृन्दावन तीर्थों का राजा है। कृष्ण और वृन्दावन एक दूसरे का पर्याय हैं दोनों एक हैं अलग नही। जिस प्रकार श्रीमद ...

एसा न हो फिर देर हो जाऐ

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                       ऐसा न हो फिर देर हो जाऐ जब सारे शरीर की शक्ति क्षीण हो जाती है, उसका चलना फिरना, उठना बैठना --- सब दूभर हो जाता है । खटिया पर पड़े पड़े वह पश्चाताप करता रहता है कि हाय - हाय सारा जीवन बेकार चला गया । अब उसे ईश्वर का ध्यान आता है, उनसे प्रार्थना करता है, किंतु तब तक तो बहुत देर हो चुकी होती है ---- इतने पर भी करुणा वरुणालय प्रभू उस पर कृपा कर कहते है ---- वत्स! अभी भी कुछ नही बिगड़ा है, तुम्हारी जिभ्हा अभी भी काम कर रही है, तुम चाहो तो अभी भी  लोक - परलोक बना सकते हो । इसलिये तुम " नारायण " नाम रुपी अमृत का निरंतर पान करो ।

जीवन मे सफलता के लिए भगवान श्रीकृष्ण के ग्यारह सूत्र

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जीवन मे सफलता के लिए भगवान श्रीकृष्ण के ग्यारह सूत्र!!!! !!!!" भगवान कृष्ण ने गीता के माध्यम से संसार को जो शिक्षा दी, वह अनुपम है। वेदों का सार है उपनिषद और उपनिषदों का सार है ब्रह्मसूत्र और ब्रह्मसूत्र का सार है गीता। सार का अर्थ है निचोड़ या रस। गीता में उन सभी मार्गों की चर्चा की गई है जिन पर चलकर मोक्ष, बुद्धत्व, कैवल्य या समाधि प्राप्त की जा सकती है। दूसरे शब्दों में कहें तो जन्म-मरण से छुटकारा पाया जा सकता है। तीसरे शब्दों में कहें तो खुद के स्वरूप को पहचाना जा सकता है। चौथे शब्दों में कहें तो आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और पांचवें शब्दों में कहें तो ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। भगवान श्रीकृष्ण के वे रहस्यमय सूत्र जिन्हें जानकर आपको लगेगा कि सच में यह बिलकुल ही सच है। निश्‍चित ही उनके ये सूत्र आपके जीवन में बहुत काम आएंगे। जीवन में सफलता चाहते हैं ‍तो गीता के ज्ञान को अपनाएं और निश्‍चिंत तथा भयमुक्त जीवन पाएं।  पहला सूत्र,सफलता : - भगवान श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि यदि आप लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल रहते हैं, तो अपनी रणनीति बदलें, लक्ष्य नहीं। ...इस ज...

प्रतीक्षा, परीक्षा और समीक्षा।

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                    प्रतीक्षा, परीक्षा और समीक्षा। प्रतीक्षा- भक्ति के मार्ग में प्रतीक्षा बहुत आवश्यक है। प्रभु जरूर आयेंगे, कृपा करेंगे, ऐसा विश्वास रखते हुए प्रतीक्षा करें। बहुत बड़ी प्रतीक्षा के बाद शबरी की कुटिया में प्रभु आये थे। परीक्षा- संसार की परीक्षा करते रहें। इस संसार में सब अपने कारणों से जी रहे हैं। किसी के भी महत्वाकांक्षा के मार्ग पर बाधा बनोगे वही तुम्हारा अपना, पराया हो जायेगा। संसार का तो प्रेम भी छलावा है। संसार को जितना जल्दी समझ लो तो अच्छा है ताकि प्रभु के मार्ग पर तुम जल्दी आगे बढ़ो। समीक्षा - अपनी समीक्षा रोज करते रहो, आत्मचिन्तन करो। जीवन उत्सव कैसे बने ? प्रत्येक क्षण उल्लासमय कैसे बने? जीवन संगीत कैसे बने, यह चिन्तन जरूर करना। कुछ छोड़ना पड़े तो छोड़ने की हिम्मत करना और कुछ पकड़ना पड़े तो पकड़ने की हिम्मत रखना। अपनी समीक्षा से ही आगे के रास्ते दिखेंगे।  ।।जय श्री कृष्ण।।

मां दुर्गा के नौ रूप

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मां दुर्गा के नौ रूप मां दुर्गा के नौ रुपों की पूजा की जाती है। देवी दुर्गा के नौ रूप हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंधमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। इन नौ रातों में तीन देवी पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ रुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। नवदुर्गा के नौ स्वरूप स्त्री के जीवनचक्र को दर्शाते है।  1. जन्म ग्रहण करती हुई कन्या "शैलपुत्री" स्वरूप है।  2.स्त्री का कौमार्य अवस्था तक "ब्रह्मचारिणी" का रूप है। 3. विवाह से पूर्व तक चंद्रमा के समान निर्मल होने से वह "चंद्रघंटा" समान है। 4. नए जीव को जन्म देने के लिए गर्भ धारण करने पर वह "कूष्मांडा" स्वरूप में है। 5. संतान को जन्म देने के बाद वही स्त्री "स्कन्दमाता" हो जाती है। 6. संयम व साधना को धारण करने वाली स्त्री "कात्यायनी" रूप है। 7. अपने संकल्प से पति की अकाल मृत्यु को भी जीत लेने से वह "कालरात्रि" जैसी है। 8. संसार (कुटुंब ही उसके लिए संसार है) का उपकार करने से "महागौरी...

भजन सिमरन करने से क्या खास होता है?

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            भजन सिमरन करने से क्या खास होता है? अर्जुन श्री कृष्णजी से बोले :-"केशव, जब मृत्यु सभी की होनी है तो हम सत्संग भजन सेवा सिमरन क्यों करे, जो इंसान मौज मस्ती करता है मृत्यु तो उसकी भी होगी..!" "श्री कृष्णजी ने अर्जुन से कहा:-"हे पार्थ, बिल्ली जब चूहे को पकड़ती है तो दांतो से पकड़कर उसे मार कर खा जाती है, लेकिन उन्ही दांतो से जब अपने बच्चे को पकड़ती है तो उसे मारती नहीं बहुत ही नाजुक तरीके से एक जगह से दूसरी जगह पंहुचा देती है..!दांत भी वही है मुह भी वही है पर परिणाम अलग अलग। ठीक उसी प्रकार मृत्यु भी सभी की होगी ,पर एक प्रभु के धाम में और दूसरा 84 के चक्कर में!  तो यह आपको निर्णय लेना है कि प्रभु का नाम लेते हुए इस जीवन का बिताना है ,या सिर्फ मौज मस्ती करते हुए। मौज मस्ती भी करो, लेकिन प्रभु को कभी नहीं भूले।पूरे दिन में एक समय निश्चित कर लो कि दिन में एक बार अपने प्रभु को जरूर याद करना है और उस को धन्यवाद करना है कि उन्होंने आपको इतना सामर्थ्य वान बनाया कि आप मौज मस्ती कर रहे हैं ।😊 जय श्री राधे🙏🌹

साधना सफल कैसे होती है

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                    साधना सफल कैसे होती ?                           साधनाऐं देवी-देवताओं की, मन्त्र, तंत्र की जो कर्मकांडों एवं अनुष्ठानों के साथ की जाती है, पर साधनाएँ साधक की आत्मिक स्थिति के अनुसार ही सफल होती हैं।             श्रद्धा और विश्वास , साहस और धैर्य, एकाग्रता और स्थिरता, दृढ़ता और संकल्प ही वे तत्व हैं, जिनके आधार पर यह साधनाएँ सफल होती है।             यदि साधक का संकल्प दुर्बल हो, श्रद्धा और विश्वास ढीलें हों, चित्त अस्थिर और अधीर रहे तो विधि-विधान सही होते हुए भी सही परिणाम नहीं मिलता।          सच तो यह है कि आत्मा के अंतरंग प्रदेश में ही उन अदृश्य दैवी-शक्तियों का निवास होता है जो हमें कहीं बाहर रहती दिखती है। जय श्री राधे

मुश्किलों में

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मुश्किलों में मुश्किलें बिन बुलाए मेहमान की तरह होती हैं, जो हमें बिना बताए परेशान करने चली आती हैं । और तब तक नहीं जाती हैं, जब तक कि हम उनका अपने विश्वास ,हौसला और परिश्रम से मुकाबला नहीं करते हैं ॥ लेकिन मुश्किलों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वो हमें पहले से ज्यादा सतर्क, पहले से ज्यादा मजबूत और पहले से ज्यादा होशियार बना देती हैं. और इनकी सबसे अच्छी बात ये होती है कि, जाते-जाते हमें कोई-न-कोई सबक जरुर सीखा देती हैं। ।।राधे राधे।।

प्रकृति के तीन कड़वें नियम

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प्रकृति के तीन कड़वे नियम जो सत्य है 1-: प्रकृति  का पहला  नियम- यदि खेत में  बीज न डालें जाएं  तो कुदरत  उसे *घास-फूस* से  भर देती हैं...!! ठीक  उसी  तरह से  दिमाग  में *सकारात्मक* विचार  न भरे  जाएँ  तो *नकारात्मक*  विचार  अपनी  जगह  बना ही लेती है...!! 2-: प्रकृति  का दूसरा  नियम- जिसके  पास  जो होता है...!!   वह वही बांटता  है....!!* सुखी *सुख* बांटता है... दुःखी *दुःख* बांटता है.. ज्ञानी *ज्ञान* बांटता है.. भ्रमित *भ्रम* बांटता है.. भयभीत *भय* बांटता हैं......!!  3-: प्रकृति  का तीसरा नियम- आपको जीवन से जो कुछ भी मिलें उसे पचाना  सीखें क्योंकि भोजन* न पचने  पर रोग बढते है...! पैसा न *पचने* पर दिखावा बढता है...! बात  न *पचने* पर चुगली  बढती है...! प्रशंसा  न *पचने* पर  अंहकार  बढता है....! निंदा  न *पचने* पर  दुश्मनी  बढती है...! राज न *पचने* पर  खतरा  बढता है...! दुःख...

आज का शुभ विचार

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यदा न कुरूते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम्। समदृष्टेस्तदा पुंस: सर्वा: सुखमया दिश:॥ अर्थात्:-- जो मनुष्य किसी भी जीव के प्रति अमंगल भावना नही रखता, जो मनुष्य सभी की ओर सम्यक् दॄष्टीसे देखता है, ऐसे मनुष्य को सब ओर सुख ही सुख है। ।।जय श्री राधे।।

परिपक्वता यानि मैच्योरिटी किसे कहते हैं?

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आदि शंकराचार्य जी से प्रश्न किया गया कि "परिपक्वता" का क्या अर्थ है? आदि शंकराचार्य जी ने उत्तर दिया – 1. परिपक्वता वह है - जब आप दूसरों को बदलने का प्रयास करना बंद कर दे, इसके बजाय स्वयं को बदलने पर ध्यान केन्द्रित करें. 2. परिपक्वता वह है – जब आप दूसरों को, जैसे हैं, वैसा ही स्वीकार करें. 3. परिपक्वता वह है – जब आप यह समझे कि प्रत्येक व्यक्ति उसकी सोच अनुसार सही हैं. 4. परिपक्वता वह है – जब आप "जाने दो" वाले सिद्धांत को सीख लें. 5. परिपक्वता वह है – जब आप रिश्तों से लेने की उम्मीदों को अलग कर दें और केवल देने की सोच रखे. 6. परिपक्वता वह है – जब आप यह समझ लें कि आप जो भी करते हैं, वह आपकी स्वयं की शांति के लिए है. 7. परिपक्वता वह है – जब आप संसार को यह सिद्ध करना बंद कर दें कि आप कितने अधिक बुद्धिमान है. 8. परिपक्वता वह है – जब आप दूसरों से उनकी स्वीकृति लेना बंद कर दे. 9. परिपक्वता वह है – जब आप दूसरों से अपनी तुलना करना बंद कर दें. 10. परिपक्वता वह है – जब आप स्वयं में शांत है. 11. परिपक्वता वह है – जब आप जरूरतों और चाहतों के बीच का अंतर करने में...

नवरात्र क्या है?

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नवरात्र या नवरात्रि → संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं। नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुध्द है। नवरात्र क्या है →  पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक साल की चार संधियाँ हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियाँ बढ़ती हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुध्द रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है। नौ दिन या रात → अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है।  यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है। रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है।...

शुभ वचन

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                        🌹।शाश्वत वचन।🌹  संसार का सब काम करो, परंतु मन ईश्वर पर रखो और समझो कि घर, परिवार, पुत्र सब ईश्वर के हैं। मेरा कुछ भी नहीं है। मैं केवल उनका दास हूँ। मैं मन से त्याग करने के लिये कहता हूँ। संसार छोड़ने के लिये मैं नहीं कहता। अनासक्त होकर, संसार में रह कर, अन्तर से उनकी प्राप्ति की इच्छा रखने पर, उन्हें मनुष्य पा सकता है॥ (श्रीरामकृष्णवचनामृत) *"हरि: शरणम्"*

बस एक बार राधा नाम लेने की कीमत

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                बस एक बार राधा नाम लेने की कीमत एक बार एक व्यक्ति था। वह एक संत जी के पास गया। और कहता है कि संत जी, मेरा एक बेटा है। वो न तो पूजा पाठ करता है और न ही भगवान का नाम लेता है। आप कुछ ऐसा कीजिये कि उसका मन भगवान में लग जाये। देवों में सबसे सुंदरतम भगवान श्री कृष्ण के जीवन की कई बातें अनजानी और रहस्यमयी है आइए जानें 24 अनजाने तथ्य. संत जी कहते है- "ठीक है बेटा, एक दिन तू उसे मेरे पास लेकर आ जा।" अगले दिन वो व्यक्ति अपने बेटे को लेकर संत जी के पास गया। अब संत जी उसके बेटे से कहते है- "बेटा, बोल राधे राधे..." बेटा कहता है- मैं क्यू कहूँ? संत जी कहते है- "बेटा बोल राधे राधे..." वो इसी तरह से मना करता रहा और अंत तक उसने यही कहा कि- "मैं क्यू कहूँ राधे राधे..." संत जी ने कहा- जब तुम मर जाओगे और यमराज के पास जाओगे तब यमराज तुमसे पूछगे कि कभी भगवान का नाम लिया। कोई अच्छा काम किया। तब तुम कह देना की मैंने जीवन में एक बार 'श्री राधा रानी' के नाम को बोला है। बस एक बार। इतना बताकर वह चले गए। समय व्यतीत हुआ और एक दिन वो मर गय...

कृष्ण से कृष्ण को मांगिए

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                       कृष्ण से कृष्ण को मांगिए        हृदय की इच्छाएं शांत नहीं होती हैं। क्यों??? एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी। किसी फकीर ने सम्राट से भिक्षा मांगी थी। सम्राट ने उससे कहा,''जो भी चाहते हो, मांग लो।''* दिवस के प्रथम याचक की कोई भी इच्छा पूरी करने का उसका नियम था। उस फकीर ने अपने छोटे से भिक्षापात्र को आगे बढ़ाया और कहा,''बस इसे स्वर्ण मुद्राओं से भर दें।''सम्राट ने सोचा इससे सरल बात और क्या हो सकती है! लेकिन जब उस भिक्षा पात्र में स्वर्ण मुद्राएं डाली गई, तो ज्ञात हुआ कि उसे भरना असंभव था। वह तो जादुई था। जितनी अधिक मुद्राएं उसमें डाली गई, वह उतना ही अधिक खाली होता गया!  सम्राट को दुखी देख वह फकीर बोला,''न भर सकें तो वैसा कह दें। मैं खाली पात्र को ही लेकर चला जाऊंगा! ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि लोग कहेंगे कि सम्राट अपना वचन पूरा नहीं कर सके ! ''सम्राट ने अपना सारा खजाना खाली कर दिया, उसके पास जो कुछ भी था, सभी उस पात्र में डाल दिया गया, लेकिन अद्भुत पात्...

भगवान के नाम की महिमा

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                     भगवान के नाम की महिमा                      जय श्री सीताराम                         कल्याण 86/8                      गीता प्रेस गोरखपुर                           नाम--महिमा                          °°°°°°°°°°°°           भगवान के नाम की अमित महिमा है । वह कही नहीं जा सकती। स्वयं भगवान भी अपने नाम के गुणों का पार नहीं पा सकते- कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।          भूल से लोग नाम और नामी को दो विभिन्न वस्तु तथा नाम को नामी से छोटा मानते हैं। नाम का माहात्म्य अपार है,  असीम है,  अनन्त है ।        नाम और न...

अथार्गलास्तोत्रम्( हिन्दी मे)

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अर्गला स्तोत्र का पाठ दुर्गा कवच   के बाद और कीलक स्तोत्र  के पहले किया जाता है। यह देवी माहात्म्य के अंतर्गत किया जाने वाला स्तोत्र अत्यंत शुभकारक और लाभप्रद है। इस स्तोत्र का पाठ नवरातत्रि के अलावा देवी पूजन में भी किया जाता है। ।। अथार्गलास्तोत्रम् ।। विनियोग- ॐ अस्य श्री अर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः अनुष्टुप छन्दः श्रीमहालक्ष्मीर्देवता श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशती पाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः । ॐ नमश्चण्डिकायै [ मार्कण्डेय उवाच ] ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते ।। १।। जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तुते ।।२।। ॐ चंडिका देवी को नमस्कार है।  मार्कण्डेय जी कहते हैं - जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा - इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो। देवि चामुण्डे! तुम्हारी जय हो। सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। सब में व्याप्त रहने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। कालरात्रि!...

आज का शुभ विचार

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                        आज का शुभ विचार जीवन मे कैसा भी दुख और कष्ट आये पर भक्ति मत छोडिए। क्या कष्ट आता है तो आप भोजन करना छोड देते है। क्या बीमारी आती है तो आप सांस लेना छोड देते है, नही ना।        फिर जरा सी तकलीफ़ आने पर आप भक्ति करना क्यों छोड़ देते हो ? कभी भी दो चीज मत छोडिए भजन और भोजन।         भोजन छोड दोगे तो ज़िंदा नही रहोगे। भजन छोड दोगे तो कही के नही रहोगे सही मायने में भजन ही भोजन है। "दिल" कहता हैं की लिख दू ये जिन्दगी तेरे नाम की कृष्ण तुझे खुश ना कर पाऊ, तो ये ज़िन्दगी किस काम की "मेरे कृष्ण  जय श्री राधे

पितृपक्ष में श्राद्ध का महत्व क्यों है?

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         पितृपक्ष में श्राद्ध करने का विशेष महत्व क्यों है? हिंदू धर्म में व्यक्ति के कर्म और उसके पुनर्जन्म का विशेष संबंध देखा जाता है। यही वजह है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत उसका श्राद्ध कर्म करना अत्यंत आवश्यक माना गया है। ऐसी मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति के द्वारा उसके पूर्वजों का पूरे विधि-विधान से श्राद्ध अथवा तर्पण ना किया जाए तो उस जीव की आत्मा को मुक्ति प्राप्त नहीं होती और वह इस संसार में ही रह जाती है और अपने वंशजों से बार-बार यह उम्मीद रहती है कि वह उसके मुक्ति के मार्ग को खोलने के लिए श्राद्ध कर्म करें। यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि विशेष रूप से जौ और चावल में मेधा की प्रचुरता होने के कारण और ये दोनों ही सोम से संबंधित होने के कारण पितृ पक्ष में यदि इन्ही से पिंडदान किया जाए तो पितृ अपने 28 अंश रेतस को पाकर तृप्त हो जाते हैं और उन्हें प्रचुर शक्ति मिलती है और इसके बाद वे सोम लोक में ये रेतस के अंश देकर अपने लोक में चले जाते हैं। श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌। अर्थात जो पूर्ण श्रद्धा के साथ किया जाये, वही श्राद्ध है। पितृ पक्ष ...