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मार्च, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

श्री कृष्ण जी के नामों के अर्थ का वर्णन

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 श्री कृष्ण जी के नामों के अर्थ का वर्णन परम भागवत श्री संजय जी के द्वारा-  श्री कृष्णा माया से आवरण  करते हैं , यानी कि ढके रहते हैं और सारा जगत उन में निवास करता है ,तथा वे प्रकाशमान है इसलिए इन्हें 'वासुदेव' कहते हैं। अथवा सब देवता इन में निवास करते हैं, इसलिए इन्हें 'वासुदेव' कहते हैं।  सर्व व्यापक होने के कारण इनका नाम विष्णु है। मा यानी आत्मा कि उपाधि रूप बुद्धि वृत्ति को ,मौन, ध्यान या योग से दूर कर देते हैं ।इससे श्री कृष्ण का नाम 'माधव' है।  मधु अर्थात पृथ्वी आदि तत्वों के संहार-कर्ता होने से अथवा वे सब तत्व इन में लय को प्राप्त होते हैं।इन्हें 'मधुहा' भी कहते हैं । मधु नामक देत्य का वध करने के कारण इनका नाम 'मधुसूदन' कहा जाता है । कृषि शब्द सत्ता वाचक है व 'ण 'सुख वाचक है, दोनों धातु के अर्थ रूप सत्ता व आनंद के संबंध से भगवान का नाम 'कृष्ण' हो गया।  अक्षय ,अविनाशी ,परम स्थान का या हृदय कमल का नाम पुंडरीक है, भगवान वासुदेव उस में विराजित रहते हैं और उसका कभी क्षय नहीं होता ,इसलिए इन्हें 'पुंडरीकाक्ष' भी ...

नारायण कवच( इस पाठ के द्वारा शत्रु से रक्षा हो जाती है)

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                    Narayan Kavach नारायण कवच ।। श्री हरिः ।। अथ श्रीनारायणकवच राजोवाच यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्। क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्।।१।।  भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्। यथाssततायिनः शत्रून् येन गुप्तोsजयन्मृधे।।२।।  राजा परिक्षित ने पूछा - भगवन् ! देवराज इंद्र ने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओं की चतुरंगिणी सेना को खेल-खेल में - अनायास ही जीतकर त्रिलोकी की राजलक्ष्मी का उपभोग किया, आप उस नारायण कवच को सुनाइये और यह भी बतलाईये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की ।। १-२ ।।  श्रीशुक उवाच  वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते। नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः श्रुणु ।।३।।  विश्वरुप उवाच  धौताड़् घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः । कृतस्वांगकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ।।४ ।।  नारायणमयं वर्म संह्येद् भय आगते । पादयोर्जानुनोरुर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ।।५।...

भजन कैसे करें?

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                           भजन कैसे करें 'भजन करना ' एक बात है और 'भजन होना' दूसरी बात है। हम  सांस लेते नहीं है, हमें सांस आती है ।सांस लेने के लिए अभ्यास नहीं करना पड़ता, ना किसी शास्त्रज्ञ या सत्संग की आवश्यकता होती है। सांस सहज ही आती हैं ,कभी रुक जाती हैं, तो परम व्याकुलता होती है। इसी प्रकार सांस की भांति ,भजन होना चाहिए। क्षणभर भजन छुटने से व्याकुलता हो जाए ,तभी भजन है।

कर्ज से मुक्ति अगर चाहते हैं तो ऋण मोचक मंगल स्त्रोत का पाठ करें

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उत्तम कुल कौन सा कहलाता है (विदुर नीति )

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                 विदुर नीति के अंतर्गत उत्तम कुल का वर्णन  धृतराष्ट्र ने कहा -विदुर! धर्म और अर्थ के नित्य ज्ञाता और बहुश्रत देवता भी उत्तम कुल में उत्पन्न पुरुषों की इच्छा करते हैं। इसलिए मैं तुमसे यह प्रश्न करता हूं कि उत्तम कुल कौन सा है? विदुर जी बोले - जिनमें तप, इंद्रिय, संयम ,वेदों का स्वाध्याय ,यज्ञ ,पवित्र विवाह, सदा अन्नदान और सदाचार- यह 7 गुण होते हैं ।उन्हें उत्तम कुल कहते हैं । जिनका सदाचार शिथिल नहीं होता है, जो अपने दोषों से माता पिता को कभी कष्ट नहीं पहुंचाते। सदा प्रसन्न चित्त से धर्म का आचरण करते हैं तथा असत्य का परित्याग कर, अपने कुल की विशेष कीर्ति चाहते हैं ,उन्हीं का कुल उत्तम है । यज्ञ ना होने से,निन्दित कुल में विवाह करने से, वेद का त्याग करने से ,धर्म का उल्लंघन करने से ,उत्तम कुल भी अधम हो जाता है। देवताओं के धन का नाश ,ब्राह्मण के धन का अपहरण और ब्राह्मण की मर्यादा का उल्लंघन करने से, उत्तम कुल भी अधम हो जाता है।  गाय मनुष्य और धन से संपन्न हो कर भी जो कुल सदाचार से हीन है ,वह अच्छे कुलों की गणना म...

शिव जी के १०८ नाम

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                          शिवजी के 108 नाम  देवों के द्वारा भगवान शिव के 108 नामों का जो स्मरण श्रवन और पठन करते हैं ,उन्हें तीनों ताप दैहिक, दैविक और भौतिक नहीं सताते ,तथा ना तो उन्हें कभी शौक, व्याधि और ग्रह पीड़ा ही होती है ।इसका पाठ करने वाले को श्री ,प्रज्ञा ,आरोग्य ,आयुष ,सोभाग्य, भाग्य ,उन्नति ,विद्या, धर्म मे मति और भगवान शिव में भक्ति प्राप्त होती है। इसमें संदेह नहीं है। 1. हे शंभू !आपकी जय हो। 2. हे विभो! 3. हे रूद्र!  4.हे शंभू ! 5. हे शंकर ! आपकी जय हो। 6. हे ईश्वर ! 7. हे ईशान! 8. हे सर्वज्ञ ! तथा 9. हे कामद! (कामनाओं को प्रदान करने वाले भगवान शिव) आपकी जय हो जय हो। 10. हे नीलकंठ!11. हे श्रीद (ऐश्वर्या प्रदान करने वाले) 12. हे श्रीकंठ! 13. हे धूर्जटे! 14. हे अष्टमूर्त! 15. हे अनंतमूर्ते ! 16. हे महामूरते! 17. हे अनघ! आपकी जय हो। 18. हे पापहारी! 19. अनङ्गनिसङ्ग ! 20. हे भङ्गनाशन! (बाधा और भय के नाशक)  21. हे त्रिदशाधार (देवताओ के आधार ) 22. त्रिलोकेश (तीनों लोकों के स्वामी) ! 23. हे त्रि...