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देवराहा बाबा के वचनामृत

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                    देवराहा बाबा के वचनामृत  जितना सत्संग करें उससे दुगना मनन करें । प्रतिदिन यथा  संभव कुछ ना कुछ दान अवश्य करें इससे त्याग की प्रवृत्ति जागेगी।  संसार सराय की तरह है, हमारा अपना स्थाई आवास तो प्रभु का धाम है।  खूब जोर जोर से भगवान का नाम उच्चारण करें ,उच्च स्वर में भजन करने से मन संकल्प विकल्प से मुक्त हो जाता है । सत्य ईश्वर का स्वरूप है और असत्य के बराबर कोई पाप नहीं।  मन को निविषय करना ध्यान है ,मन के विकारों को त्यागना  स्नान है । भक्ति  चरम अवस्था पर तब पहुंचती है जब भक्त के लिए भगवान व्याकुल होते हैं । संपत्ति पाकर भी जिन में उदारता पूर्वक दान की ,या सेवा की भावना नहीं आती है वह भाग्य हीन है।  इस भाव का बारंबार बनाकर रखना चाहिए कि संसार हमसे प्रति दिन छूट रहा है । कलयुग में पाप नहीं करना ही महान पुण्य है।  संसार में कितना कितना सुख भाग  हमें प्राप्त होगा, पहले ही ईश्वर ने सुनिश्चित कर दिया है । जो व्यक्ति वाणी का, मन का,तृषणा का वेग सहन कर लेता है व...

ईश्वर का कहना है कि मै तुम्हारे अंग- संग हूं, तुम महसूस तो करो

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                         मैं तुम्हारे अंग संग हूं  एक नई भोर के आगमन के साथ आज जब तुम उठे, तो मैंने तुम्हें देखा ,सोचा कि तुम अपने दिन की शुरुआत करने से पहले मेरा आशीर्वाद लेना जरूरी समझोगे ।भले ही तुम चुप रहोगे पर मुझे प्रणाम जरूर करोगे, पर तुम तो पहनने के लिए सही कपड़े ढूंढने में व्यस्त थे और इधर उधर भाग कर काम पर जाने के लिए तैयार हो रहे थे।  तुम नाश्ता करने बैठे ,मुझे लगा ,अब तुम मुझसे भी दो निवाले खाने को कहोगे, पर तुम इतनी जल्दी में थे कि यह भूल ही गए कि तुम्हारे द्वारा प्यार से खिलाया गया एक निवाला ही मेरी भूख मिटा सकता है। फिर भी तुम्हें जी भर कर खाता देख ,मैं अपनी भूख भी भूल गया ।खाने के पश्चात तुम्हारे पास 15 मिनट का समय था, तुम खाली बैठे मन ही मन कुछ सोचते रहे, मैंने सोचा कि अब तुम मुझसे बात करने के लिए हिचकिचा  रहे हो कि कहीं मैं तुमसे नाराज तो नहीं, नादान समझ, मैंने तुम्हारी तरह अपना पहला कदम उठाया ब ही था कि तुम अपनी फोन की तरफ भागे ,अपने मित्र से ताजी खबर लेने के लिए। मेरी आशा एक ...

अपने जन्म को सफल कैसे करें

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                             मानव कल्याण  मानव जीवन की सफलता भगवत प्राप्ति में है, ना कि विषय भोगों की प्राप्ति में , जो मनुष्य जीवन के असली लक्षय, भगवान को भूलकर विषय भोगो की प्राप्ति और उनके भोग में ही रचा बसा रहता है, वह अपने दुर्लभ अमूल्य जीवन को केवल व्यर्थ ही नहीं खो रहा है, बल्कि अमृत के बदले में भयानक विष ले रहा है। बहुत जन्मों के बाद बड़े पुण्य बल तथा भगवत कृपा से जीव को मानव शरीर प्राप्त होता है, इंद्रियों के भोग तो अन्यान्य योनियों में भी मिलते हैं, पर भगवत प्राप्ति का साधन तो केवल इसी शरीर में है, इस को पा कर भी जो मनुष्य विषय भोगो में ही फंसा रहता है ,वह तो पशु से भी अधिक मूर्ख है।  तुम मनुष्य हो , अपने मनुष्यत्व को सदा जगाए रखो। एक क्षण के लिए भी भगवान को मत भूलो, सदा याद रखो कि यहां इस शरीर में भगवान ने तुमको पशु की भांति केवल इंद्रिय भोगो को भोगने के लिए नहीं भेजा है, तुम्हें उस बहुत बड़ी सफलता को प्राप्त करना है जिससे अब तक तुम वंचित रहते आए हैं, वह सफलता है भगवत प्राप्ति। इस सफल...