देवराहा बाबा के वचनामृत
देवराहा बाबा के वचनामृत जितना सत्संग करें उससे दुगना मनन करें । प्रतिदिन यथा संभव कुछ ना कुछ दान अवश्य करें इससे त्याग की प्रवृत्ति जागेगी। संसार सराय की तरह है, हमारा अपना स्थाई आवास तो प्रभु का धाम है। खूब जोर जोर से भगवान का नाम उच्चारण करें ,उच्च स्वर में भजन करने से मन संकल्प विकल्प से मुक्त हो जाता है । सत्य ईश्वर का स्वरूप है और असत्य के बराबर कोई पाप नहीं। मन को निविषय करना ध्यान है ,मन के विकारों को त्यागना स्नान है । भक्ति चरम अवस्था पर तब पहुंचती है जब भक्त के लिए भगवान व्याकुल होते हैं । संपत्ति पाकर भी जिन में उदारता पूर्वक दान की ,या सेवा की भावना नहीं आती है वह भाग्य हीन है। इस भाव का बारंबार बनाकर रखना चाहिए कि संसार हमसे प्रति दिन छूट रहा है । कलयुग में पाप नहीं करना ही महान पुण्य है। संसार में कितना कितना सुख भाग हमें प्राप्त होगा, पहले ही ईश्वर ने सुनिश्चित कर दिया है । जो व्यक्ति वाणी का, मन का,तृषणा का वेग सहन कर लेता है व...