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(बिल्वाष्टकम्) शिव जी को बिल्वपत्र (बेल का पत्ता)अर्पण करते समय बोलने वाला मंत्र

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                                 बिल्वाष्टकम्  यह महीना सावन का है। इन दिनों भगवान शिव जी की पूजा का विशेष महत्व होता है और बिल्वपत्र यानी बेल का पत्ता भगवान शिव को बहुत प्रिय है ।बेलपत्र को अर्पण करते समय बिल्वाष्टकम् मंत्र को बोला जाता है।     त्रिदलं  त्रिगुणाकारं त्रिनेत्र ं च त्रयायुधम ।  त्रिजन्मपापसंहारं बिल्वपत्र ं शिवार्पणम्।।  तीन दलवाला ,सत्त्व,रज एवं तमःस्वरूप,सूर्य,चन्द्र तथा अग्नि-त्रिनेत्रस्वरूप और आयुधत्रय स्वरूप ,तथा तीनोजन्मो के पापो को नष्ट करने वाला बिल्वपत्र मै भगवान शिव के लिये समर्पित करता हूँ।।१।।    त्रिशाखैर्बिल्वपत्र ेश्च ह्मच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः। शिवपूजां करिष्यामि बिल्वपत्रेणं शिवार्पणम्।।  छिद्र रहित ,सुकोमल, तीन पत्ते वाले ,मंगल प्रदान करने वाले बिल्वपत्र से मैं भगवान शिव की पूजा करूंगा। यह बेलपत्र शिव को समर्पित करता हूं। अखंडबिल्वपत्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे । शुद्धयन्ति सर्वपापेभ्यो बिल्व...

श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्त्रोत हिंदी में

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                 श्री कृष्णा कृपा कटाक्ष स्त्रोत हिंदी में  भावार्थ - बृज मंडल के भूषण तथा समस्त पापों के नाश करने वाले सच्चे भक्तों के चित्त में बिहार करने वाले आनंद देने वाले नंद नंदन का मैं सर्वदा भजन करता हूं। जिनके मस्तक पर मनोहर मोर पंखों के गुच्छे हैं ,जिनके हाथों में सुरीली मुरली है तथा जो प्रेम तरंगों के समुद्र है उन नटनगर श्री कृष्ण भगवान को मैं नमस्कार करता हूं।  भावार्थ - कामदेव का गर्व नष्ट करने वाले, बड़े-बड़े चंचल लोचनो वाले ,ग्वाल बालों का शोक नष्ट करने वाले, कमल लोचन को मेरा नमस्कार है ।कर कमल पर गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले ,मुस्कान युक्त सुंदर चितवन वाले, इंद्र का मान मर्दन करने वाले ,गजराज के सदृश मत्त श्री कृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है।  भावार्थ- कदंब पुष्पों के कुंडल धारण करने वाले ,अत्यंत सुंदर गोल कपोल वाले ,ब्रिजांगनाओ के लिए ऐसे परम दुर्लभ श्री कृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। ग्वाल बाल और श्री नंद राय जी के सहित मोदमयी मैया यशोदा जी को आनंद देने वाले श्री गोप नायक को मेरा नमस्कार है ...

श्री राधा कृपा कटाक्ष स्रोत हिंदी में

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              Radha kripa kataksh stotar                श्री राधा कृपा कटाक्ष स्त्रोत हिंदी में   भावार्थ- मुनींद्र वृंद जिनके चरणों की वंदना करते हैं तथा जो तीनों लोकों का शौक दूर करने वाली है मुस्कान युक्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली निकुंज भवन में विलास करने वाली, राजा वृषभानु की राजकुमारी ,श्री बृज राजकुमार की हृदयेश्वरी श्री राधिके! कब मुझे अपने कृपा कटाक्ष का पात्र बनाओगी?  भावार्थ -अशोक की वृक्ष लताओं से बने हुए 'लता मंदिर' में विराजमान और  मूँगे अग्नि तथा नवीन लाल पल्लवों के समान अरुण कांति युक्त कोमल चरणों वाली, भक्तों को अभीष्ट वर दान देने वाली तथा अभय दान देने के लिए उत्सुक रहने वाले कर- कमलो वाली अपार ऐश्वर्या की स्वामिनी श्री राधे मुझे कब अपने कृपा कटाक्ष का अधिकारी बनाओगी। भावार्थ -प्रेम क्रीड़ा के रंगमंच पर मंगलमय प्रसंग में बाँकी भृकुटी करके, आश्चर्य उत्पन्न करते हुए सहसा कटाक्ष रूपी बाणों की वर्षा से श्री नंद नंदन को निरंतर बस में करने वाली ,हे सर्वेश्वरी अपने कृपा कटाक्ष का पात...

श्री राधा कवच

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                            श्री राधा कवच हिंदी में       पार्वती जी ने कहा- हे कैलाश वासिन! भक्तों पर अनुग्रह करने वाले हे प्रभु । श्री राधिका जी का पवित्र कवच मुझको सुनाओ(1) हे त्रिशूल और धनुष धारण करने वाले नाथ! मैं आपकी शरण में हूं, यदि मुझ पर पूर्ण कृपा है तो दुख के भय से मेरी रक्षा कीजिए(2) कर्म,भाग्य और भगवान इनमें से हमारे जीवन में किसका महत्व शिव उवाच  श्री शिवजी  बोले- हे गिरिराज कुमारी सुनो! यह वह प्राचीन कवच तुमको सुना रहा हूं जो बड़ा पवित्र है। संपूर्ण पापों को हरने वाला है और सब प्रकार से रक्षा करने वाला है।(3) सुख भोग और मोक्ष का साधन एवं श्री श्याम सुंदर की भक्ति को देने वाला है । हे देवी यह कवच त्रिलोकी का आकर्षण कर सकता है और साधक को प्रभु की सन्नधि में पहुंचा देता है।(4)  यह सभी शत्रु को डराने वाला, सर्वत्र विजय प्राप्त कराने वाला और सभी प्राणियों की मनोवृति यों को हराने वाला है। (5)इस कवच के पढ़ने से सदा ही आनंद रहता है। सालोंक्य  सृष्टि सामीप्य ,सायुज्...

सत्संग कब प्राप्त होता है?

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    "बिनु सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई......... जब व्यक्ति सच्चे मन से सत्संग की इच्छा करता है, तब कृष्ण कृपा से उस व्यक्ति को सत्संग प्राप्त होता है 1. सत्संग से व्यक्ति का अज्ञान दूर होता है। 2. अज्ञान दूर होने पर ही कृष्णा से राग उत्पन्न होने लगता है। 3. जैसे-जैसे कृष्णा से राग होता है, वैसे-वैसे ही संसार से बैराग होने लगता है। 4. जैसे-जैसे संसार से बैराग होता है, वैसे-वैसे विवेक जागृत होने लगता है। 5. जैसे-जैसे विवेक जागृत होता है वैसे-वैसे व्यक्ति कृष्णा के प्रति समर्पण होने लगता है। 6. जैसे-जैसे कृष्णा के प्रति समर्पण होता है वैसे-वैसे ज्ञान प्रकट होने लगता है। 7. जैसे-जैसे ज्ञान प्रकट होता है, वैसे-वैसे व्यक्ति सभी नये कर्म बन्धन से मुक्त होने लगता है। 8. जैसे-जैसे कर्म-बन्धन से मुक्त होता है, वैसे-वैसे कृष्णा की भक्ति प्राप्त होने लगती है 10. जैसे-जैसे भक्ति प्राप्त होती है, वैसे-वैसे व्यक्ति स्थूल-देह स्वरूप को भूलने लगता है। 11. जैसे-जैसे ही व्यक्ति स्थूल-देह स्वरूप को भूलता है, वैसे-वैसे आत्म-स्वरूप में स्थिर होने लगता है। 12....

दालचीनी एक, लाभ अनेक

                      दालचीनी एक, लाभ अनेक  जोड़ों के दर्द में आराम दिलाती है दालचीनी, जानें कैसे करना है  प्रयोग अर्थराइटिस में दालचीनी के प्रयोग से जोड़ों के दर्द से जल्दी राहत मिलती है। दालचीनी में दर्द और सूजन को खत्म करने के गुण होते हैं। तत्काल राहत ही नहीं, दालचीनी धीरे-धीरे गठिया को ठीक कर देती है। अर्थराइटिस या गठिया के कारण जोड़ों और हड्डियों में दर्द बना रहता है। आमतौर पर इस दर्द का असर घुटनों, कोहनी, उंगलियों और तलवों में ज्यादा होता है। कई बार दर्द के साथ-साथ जोड़ों में सूजन भी होती है। इस दर्द के कारण व्यक्ति को उठने-बैठने और चलने में भी परेशानी होने लगती है। इस तरह के दर्द में बार-बार दवाओं के प्रयोग से बेहतर है कि आप आयुर्वेद में बताए गए आसान घरेलू उपायों का प्रयोग करें। अर्थराइटिस में दालचीनी के प्रयोग से जोड़ों के दर्द से जल्दी राहत मिलती है। दर्द से तुरंत राहत के लिए दालचीनी पेस्ट दालचीनी पाऊडर में कुछ बूंदे पानी की मिला लें। इसका एक गाढ़ा पेस्ट तैयार कर लें। इस पेस्ट को जोड़ों पर लगाएं ...

अगर सत्संग मिल जाए तो?

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🌹🌹    मनुष्य जन्म में सत्संग मिल जाए, गीता जैसे ग्रंथ से परिचय हो जाए ,भगवान नाम से परिचय हो जाए ,तो साधक को यह समझना चाहिए कि भगवान ने बहुत विशेषता से कृपा कर दी है, अतः अब तो हमारा उद्धार होगा ही । अब आगे हमारा जन्म- मरण नहीं होगा ,कारण कि अगर हमारा उद्धार नहीं होना होता, तो ऐसा मौका नहीं मिलता। ---ब्रह्मलीन , श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी

देसी गाय के घी से इलाज

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                 *रोगानुसार गाय के घी के उपयोग* : १. गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है । २. गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है ३. गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है । ४. 20-25 ग्राम गाय का घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांजे का नशा कम हो जाता है । ५. गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है । ६. नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तरोताजा हो जाता है । ७. गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बाहर निकल कर चेतना वापस लोट आती है ८. गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है । ९. गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है । १०. हाथ-पॉँव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ठीक होता है । ११. हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी । १२. गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है । १३. ...

जप में रुचि नहीं हो रही क्या करें?

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                      नाम जप में रुचि कैसे हो?  नाम जप में रुचि के लिए कुछ विशेष सावधानियां रखनी जरूरी है -उनमें सबसे पहली है सत्संग ।  ज्यादा सत्संग करना चाहिए जिसमें भगवान की लीला का श्रवन करना चाहिए ,अध्ययन करना चाहिए और मनन करना चाहिए ।जब हमारी ईश्वर की लीला को सुनने में रुचि होने लगेगी तो जप भी होने लगेगा । दूसरा है भोजन यानी अन्न कहावत भी है कि जैसा खाए अन्न वैसा रहे मन। इसलिए हमें सात्विक अन्न ही खाना चाहिए ,पहले अपने इश्वर को भोग लगाकर फिर प्रसाद रूप में हमें उसे स्वीकार करना चाहिए ।तो हमारी जप में रूचि बढ़ने लगेगी। तीसरा है कुसंग का त्याग। जैसा हमारा संग होगा वैसा ही हमारे विचार होंगे और हमारा मन रहेगा ।इसलिए हमें कुसंग से दूर रहना चाहिए।  हमारे ना जाने कितने जन्मों के कुसंग हमारी भीतर रहते हैं यदि हम सत्संग का आश्रय लेंगे तो कुसंग बाहर निकल जाएगा। लेकिन यदि हमने कुसंग को दोबारा अपना लिया तो हमारे अंदर का सत्संग चला जाएगा।  संत कहते हैं वैसे ही इस कलयुग में दुष्टता का बहुत प्रभाव है यदि हम दुष्ट प्र...

जब हमें क्रोध आए तो क्या करें कैसे बचें?

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                    जब भी क्रोध आए तो हम क्या करें? जब भी हमें क्रोध आए तो हमें 5 सूत्रों को याद रखना चाहिए -पहला सूत्र है सोचना  - क्योंकि जब हम क्रोध में होते हैं तो हम बिना सोचे समझे कुछ  भी बोल जाते हैं और हमें बाद में ग्लानि होती है कि हमने किन शब्दों का उच्चारण किया है ?पहले हम सोचते नहीं हैं और बाद में हमें पछताना पड़ता है। इसलिए जब हमें क्रोध आए तो हमें अपने मन और जुबां पर नियंत्रण रखना चाहिए क्योंकि जब हमे क्रोध आता है तो क्रोध आने का कारण इतना बड़ा नहीं होता है  लेकिन जो हमारे अंदर  अहंकार है  वह उसे बड़ा बना देता है  । इसलिए  हमें अपने मन और अहंकार पर नियंत्रण रखना चाहिए ।अगर हम अपने अहंकार पर नियंत्रण रखेंगे तो हम जीवन के असली उद्देश्य को समझ पाएंगे कि हम धरती पर आए किसलिए है?  दूसरा - हमें कितना भी क्रोध आए हमें अपने विचारों को दूसरों के समक्ष शांत भाव से रखना चाहिए । तीसरा - हमें जब क्रोध आ रहा हो तो हमें उस जगह से चले जाना चाहिए और पैदल सैर पर निकल जाना चाहिए क्योंकि इससे हमें...

महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत 18 से 21

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                         महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत पदकमलं   करुणानिलये   वरिवस्यति योऽनुदिनं   सुशिवे अयि   कमले   कमलानिलये   कमलानिलयः स   कथं   न   भवेत्  । तव   पदमेव   परम्पदमित्यनुशीलयतो   मम किं   न   शिवे जय   जय   हे   महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि   शैलसुते  ॥ १८ ॥ Pada-Kamalam Karunnaa-Nilaye Varivasyati Yo- [A] nudinam Su-Shive Ayi Kamale Kamalaa-Nilaye Kamalaa-Nilayah Sa Katham Na Bhavet | Tava Padam-Eva Param-Padam-Ity-Anushiilayato Mama Kim Na Shive Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 18 || कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम् भजति   स   किं   न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम्  । तव   चरणं   शरणं   करवाणि   नतामरवाणि निवासि   शिवम् जय   जय   हे   महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि   शैलसुते  ॥ १९ ॥ Kanaka-La...

महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत 13 से 17

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                         महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत अविरलगण्ड   गलन्मदमेदुर   मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभुषण   भूतकलानिधि रूपपयोनिधि   राजसुते  । अयि   सुदतीजन   लालसमानस   मोहन मन्मथराजसुते जय   जय   हे   महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि   शैलसुते  ॥ १३ ॥ Avirala-Ganndda Galan-Mada-Medura Matta-Matangga ja-Raaja-Pate Tri-Bhuvana-Bhussanna Bhuuta-Kalaanidhi Ruupa-Payo-Nidhi Raaja-Sute | Ayi Sudatii-Jana Laalasa-Maanasa Mohana Manmatha-Raaja-Sute Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 13 || कमलदलामल   कोमलकान्ति कलाकलितामल   भाललते सकलविलास   कलानिलयक्रम केलिचलत्कल   हंसकुले  । अलिकुलसङ्कुल   कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय   जय   हे   महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि   शैलसुते  ॥ १४ ॥ Kamala-Dala- [A] mala Komala-Kaanti Kalaa-Kalita- [A] mala Bhaalalate Sakala-Vilaasa Kalaa-Nilaya...

महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत 9 से 12

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                             महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत सुरललना   ततथेयि   तथेयि   कृताभिनयोदर नृत्यरते कृत   कुकुथः   कुकुथो   गडदादिकताल कुतूहल   गानरते  । धुधुकुट   धुक्कुट   धिंधिमित   ध्वनि   धीर मृदंग   निनादरते जय   जय   हे   महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि   शैलसुते  ॥ ९ ॥ Sura-Lalanaa Tatatheyi Tatheyi Krta-Abhinayo- [U] dara Nrtya-Rate Krta Kukuthah Kukutho Gaddadaadika-Taala Kutuuhala Gaana-Rate | Dhudhukutta Dhukkutta Dhimdhimita Dhvani Dhiira Mrdamga Ninaada-Rate Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 9 || जय   जय   जप्य   जयेजयशब्द   परस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि   झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित   भूतपते  । नटित   नटार्ध   नटी   नट   नायक   नाटितनाट्य सुगानरते जय   जय   हे   महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि...

महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत 5 से 8

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                     महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत अयि   रणदुर्मद   शत्रुवधोदित   दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार   धुरीणमहाशिव   दूतकृत प्रमथाधिपते  । दुरितदुरीह   दुराशयदुर्मति   दानवदूत कृतान्तमते जय   जय   हे   महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि   शैलसुते ॥ Ayi Ranna-Durmada Shatru-Vadho [a-U] dita Durdhara-Nirjara Shakti-Bhrte Catura-Vicaara Dhuriinna-Mahaashiva Duuta-Krta Pramatha- [A] dhipate | Durita-Duriiha Duraashaya-Durmati Daanava-Duta Krtaanta-Mate Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 5 || अयि   शरणागत   वैरिवधुवर   वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक   शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल  शू लकरे  । दुमिदुमितामर   धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे जय   जय   हे   महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि   शैलसुते  ॥ ६ ॥ Ayi Sharannaagata Vairi-Vadhuvara Viiravara- [A] bhaya Daaya-Kare Tri-Bhuvana-Mastaka S...

महिसासुरमर्दनि स्त्रोत १ से 4

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                  महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत अयि   गिरिनन्दिनि   नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि   नन्दिनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि   जिष्णुनुते  । भगवति   हे   शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि   भूरिकृते जय   जय   हे   महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि   शैलसुते  ॥  १ ॥ Ayi Giri-Nandini Nandita-Medini Vishva-Vinodini Nandi-Nute Giri-Vara-Vindhya-Shiro- [A] dhi-Nivaasini Vissnnu-Vilaasini Jissnnu-Nute | Bhagavati He Shiti-Kannttha-Kuttumbini Bhuri-Kuttumbini Bhuri-Krte Jaya Jaya He Mahissaasura-Mardini Ramya-Kapardini Shaila-Sute || 1 || सुरवरवर्षिणि   दुर्धरधर्षिणि   दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि   शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि   घोषरते दनुजनिरोषिणि   दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि   सिन्धुसुते जय   जय   हे   महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि   शैलसुते  ॥ २ ॥ Sura-Vara-Varssinni Durdhara-Dharssinni Dur...