संदेश

जुलाई, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मन शांत कैसे हो ?

चित्र
कलयाण कहते हैकि बवंडर-(चकर्वात) के ठीक बीच में एक ऐसा  स्थान भी रहता है,जँहा कोई हलचल नही। वँहा वायू का थोडा सा भी प्रकोप नही है,बल्कि इतनी शान्ति रहती है कि यदि किसी छोटे शिशु को वहाँ  सुला दिया जाए तो वह सुख की नींद सोता रहेगा ।ठीक इसी प्रकार इस संसार के कोलाहल के मध्य मे प्रभु विराजित हैं तथा जहाँ वे हैं वहाँ न तो जगत की हलचल है और न ही त्रिताप की विषमयी ज्वाला ,वँहा सर्वदा ,हर जगह सुख शान्ति बनी रहती हैं। हम अपने जीवन पर विचार करके देखे तो पता चलेगा कि उसमे न जाने कितने उतार चढाव हुए हैं कितनी बार हम हँसें है ,कितनी बार रोये है । संसार के इस प्रवाह मे बहते जा रहे हैं,अब तक एसा कोई स्थान नही मिला जँहा हमे शान्ति मिली हो हम अपनी थकान मिटा सके।शान्ति के लिये जिसका भी सहारा लेने लगते है ,पता लगता है वो भी हमारी तरह हलचल मे है और विचलित हैं।इन्द्रिया हर जगह सुख की तलाश में भटकती रहती हैं पर सुख या तो मिलता नही हैं या फिर थोडे से समय के लिये ही मिलता हैं । मन अनुकुलता ढुढँने के लिये भटकता रहता हैं,अमुक परििस्थति मेरे अनुकूल बन जाये ,अमुक व्यक्ति एसा बन जाये ,आपके अनुस...

भक्त और भगवान की लीला

चित्र
                                                                         वामन भगवान के चरित्र में यह बात पता लगती हैं कि प्रभु ने कृपा करके  सर्वस्व ले लिया।बलि राजा को तो कुछ क्षण के लिए बंधन में बांधा गया पर प्रभु तो राजा बलि के बंधन से सर्वथा बंध गए , द्वार पर हाजिर रहते हैं। उस चरित्र में शिक्षा यही हैं कि बलि की तरह प्रभु में विश्वास करके उनके द्वारा दिए गए कष्टों में भी कृपा का अनुभव करे। हमारा तन मन सर्वस्व प्रभु ले ले , बंधन में डाले , मारे या रक्षा करे वे ही हमारी गति हैं। प्रभु प्रेमी को अपना जो पथ और दृढ़ विचार हैं उसका त्याग नहीं करना चाहिए। द्रोपदी का चीर दुःशासन खींच रहा था उस समय द्रोपदी को पूर्ण विश्वास था कि सभा में बैठे हुए उसके अपने उसकी रक्षा जरूर करेंगे उसने पुकार पुकार कर सबसे सहायता मांगी , गुरु द्रोण आपका शिष्य अन्याय कर रहा हैं , पितामह भीष्म आपकी पुत्र बहु को भरी ...