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श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्त्रोत का अर्थ

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                     श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्त्रोत(हिंदी में)  भावार्थ= ब्रजमंडल के भूषण तथा समस्त पापों के नाश करने वाले सच्चे भक्त के चित्त में विहार कर आनंद देने वाले नंदनंदन का मै  सर्वदा भजन करता हूं। जिनके मस्तक पर मनोहर मोर पंखों के गुच्छे हैं। जिनके हाथों में सुरीली मुरली है तथा जो प्रेम तरंगों के समुंद्र हैं उन् नटनागर श्री कृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। कामदेव का गर्व नाश करने वाले बड़े-बड़े चंचल लोचनों वाले, ग्वाल बालों का शौक नष्ट करने वाले, कमल लोचन को मेरा नमस्कार है। कर कमल पर गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले, मुस्कान युक्त सुंदर चितवन वाले, इंद्र का मान मर्दन करने वाले, गजराज के सदृश मत्त श्री कृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। कदम्ब पुष्पों के कुंडल धारण करने वाले, अत्यंत सुंदर गोल कपोलों वाले, ब्रिजांगनाओं के लिए ऐसे परम दुर्लभ श्री कृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। ग्वाल बाल और श्री नंद राय जी के सहित मोदमयी यशोदा जी को आनंद देने वाले श्री गोप नायक को मेरा नमस्कार है। मेरे हृदय में सदा अपने चरण कमलों को स्थापन ...

भगवान की भक्ति और श्रद्धा पाने के लिए क्या करना चाहिए?

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              भगवान की भक्ति के लिए क्या करना चाहिए? केवल इच्छा करने मात्र से संसार का कोई काम नहीं बनेगा ,उसके लिए तन मन धन से मेहनत करनी पड़ेगी। परंतु श्री हरि की भक्ति, उत्कट इच्छा मात्र से प्राप्त हो जाएगी। प्रभु हमें हर जीव को सदा देखा करते हैं। मन की कामना को पूर्ण करने के लिए वाणी और शरीर से कर्म बनने लग जाएंगे। मन की कामनाओं को पूर्ण करने के लिए प्राणी परिश्रम करता है। मानसिक परिश्रम श्रेष्ठ है। उसी से प्रभु प्रसन्न होते हैं शारीरिक परिश्रम से संसारी संतुष्ट होते हैं। संसार प्रभु का स्वरूप है। ऐसा मानना भक्ति ही है। जो कुछ जीवो के भले के लिए किया जाएगा उससे भगवान संतुष्ट होंगे। भगवान के संतुष्ट होने पर सभी देवी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान को प्रसन्न करने के लिए सब कुछ करना चाहिए। शास्त्र का रहस्य यही हैं। भक्ति के साथ-साथ निष्ठा और श्रद्धा का होना भी बहुत जरूरी है। अगर हमारे अंदर भक्ति है लेकिन श्रद्धा नहीं है तो वह पूर्ण नहीं मानी जाएगी। यह ऐसे ही होगा जैसे कि हम ईश्वर की भक्ति में तो आनंद का अनुभव करते हैं लेकिन मंत्र जाप, दान पुण्य,आरती...

श्रीराम और शिव में कभी मतभेद न कीजिए।

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                     श्रीराम और शिव में कभी मतभेद न कीजिए। 'भगवान शिव' राम के इष्ट एवं 'राम' शिव के इष्ट हैं। ऐसा संयोग इतिहास में नहीं मिलता कि उपास्य और उपासक में परस्पर इष्ट भाव हो , इसी स्थिति को संतजन 'परस्पर देवोभव' का नाम देते हैं।   शिव का प्रिय मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' एवं 'श्रीराम जय राम जय जय राम' मंत्र का उच्चारण कर शिव को जल चढ़ाने से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।  भगवान राम ने स्वयं कहा है–   शिव द्रोही मम दास कहावा सो नर मोहि सपनेहु नहि पावा।'  अर्थात्‌* :- जो शिव का द्रोह कर के मुझे प्राप्त करना चाहता है वह सपने में भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता। इसीलिए शिव आराधना के साथ श्रीरामचरितमानस पाठ का बहुत महत्वपूर्ण होता है।  मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम 14 वर्ष के वनवास काल के बीच जब जाबालि ऋषि की तपोभूमि मिलने आए तब भगवान गुप्त प्रवास पर नर्मदा तट पर आए। उस समय यह पर्वतों से घिरा था। रास्ते में भगवान शंकर भी उनसे मिलने आतुर थे, लेकिन भगवान और भक्त के बीच वे नहीं आ रहे थे। भगवान राम के पैरों को कं...