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चतुर्शलोकीय भागवत(चार शलोको में भागवत)

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चार श्लोको में भागवत चतुरश्लोकि  भागवत  अहमेवास  मेवाग्रे नान्यद् यत् सद्सत्परम।  पश्चादहं यदेतच्च योSवशिष्येत सॊस्म्म्यहम।। १  ऋतेSर्थ यत् प्रतीयेत् न प्रतीयेत् चात्मनि।  तद् विद्यादात्मनो मायाँ यथाSSभासो यथातमः।। २  यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चाबचेस्वनु।  प्रतिष्टान्य प्रविष्टानि तथा तेषु  न तेष्वहम्। । ३  एतावदेव जिज्ञास्यं तत्व जिज्ञासुनाSSत्मनः।  अन्वय व्यतिरकाम्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा।। ४    अर्थ - भगवान नारायण ,प्रजापति ब्रह्मा कि तपस्या से सृष्टि के आरम्भ में अति प्रसन्न हुए तब उन्होंने ब्रह्मा जी को वर मांगने के लिए कहा। तब ब्रह्मा जी ने निम्नलिखित चार वर मांगे जिन्हे हम चतुर्श्लोकीय भागवत भी कहते हैं  १ हे भगवन !आपके सुक्ष्म अप्राकृतिक रूप को जिसे 'पर 'कहते हैं ,तथा स्थूल या प्राकृतिक रूप जिसे 'अपर ' कहते हैं। इन दोनों पर अपर 'स्वरूप का मुझे ज्ञान प्राप्त हो जाए।  २ हे परमात्मन् !आप मुझे वह बुद्धि दीजिये जिससे मैं आपकी लीलाओं के गुह्मतम भेद को ...

सुभाषित विचार

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सुभाषित विचार                             जय सिध्दि विनायक                       यह संसार हार जीत का खेल हैं इसे नाटक   समझ कर खेलो।  इच्छाएं रखने वाला, कभी अच्छा कर्म नहीं कर सकता। 

और क्या चाहते हैं हम भगवान् से

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 और  क्या चाहते है भगवान से ? अपूर्व गुप्त शक्तियाँ   -इसके साथ ही उसने हमे अनेक गुप्त शक्तियाँ दी हैं। हमारी स्मरण शक्ति ,योगशक्ति ,आत्मशक्ति ,इच्छाशक्ति ,कल्पनाशक्ति ,संकल्पशक्ति ,धारणाशक्ति आदि उसी परमपिता कि देन हैं। यही नहीं उन्होंने हमे कर्म  करने के लिए दो हाथ भी दिए हैं इन हाथों के बल पर ही हम निर्माण कार्य करने में सफल होते हैं।  यह शरीर एक कल्प वृ क्ष -कल्पवृक्ष इच्छित फल देता हैं। हम इसी शरीर में छिपी गुप्त शक्तियों से ही मन चाही सिद्धियाँ प्राप्त कर  सकते हैं। इसी शरीर में दुर्गा एवं शिव का तृतीय नेत्र भी हैं। आठों सिद्धियाँ और नवों निधिंयाँ हमे इसी शरीर से प्राप्त हो सकती हैं।  कितने मूल्यवान हैं हमारे अंग - हमारे शरीर का प्रत्येक अंग इतना मूल्यवान हैं कि हमें  अपार धन दोलत देकर भी इसका मूल्यांकन नहीं कर सकते। कोई हमे चाहे कितना ही धन दे दें पर हम अपने हाथ ,पैर ,आखं आदि नहीं दे सकते। अब आप ही अनुमान लगाइये कि ईश्वर ने हमे कितने अमूल्य उपहारों से विभूषित किया हैं।  इश्वर ने जब हमे इतना सब कुछ दिया हैं ...

aur kya chahte hain aap bhagwaan se.

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kalyan  और  क्या चाहते है भगवान से ? हमारी सनातन मान्यता है कि चौरासी लाख योनियों  मैं भटकने के बाद मानव योनि प्राप्त होती है। इसी मानव शरीर से हम जीवन के चारो पुरुषार्थ -धर्म ,अर्थ,काम ,और मोक्ष करते हैं। मनुष्य अपनी बुद्धि के कारण ही पशु -पक्षियों आदि योनियो से अलग हैं। अन्य योनि तो प्रकृति पर ही पूर्ण रूप से निर्भर हैं। जिस वातावरण मैं जैसी प्रकृति होती हैं ,उसी के अनुसार उन्हें चलना और रहना होता हैं। मानव मैं बुद्धितत्व उसे अन्य योनियो से पृथक क्र देता हैं।  दीर्घ आयु - प्रभु ने पशु -पक्षिओं  से अधिक लम्बी आयु हमे दी हैं। अधिकांश   पशु -पक्षी  तो मात्र 5 से 25 वर्षो कि ही आयु पाते हैं। कुछ कीड़े -मकोड़े तो कुछ घंटो की ही आयु पाते  हैं। और  अपनी आयु का उपयोग किसी स्रजन में नहीं ,बल्कि क्षुधापूर्ति ,निद्रा आदि में ही बीता देते हैं कारण कि उनमे बुद्धितत्व एकदम शून्य होता हैं। हम इस प्रभु के वरदान कि महत्ता पर चिंतन करे कि उसने हमे 100 वर्ष कि दीर्घ आयु दी हैं 1 दिन में 24 घंटे होते हैं ,और एक वर्ष में लगभग 8760 घंटे होते ह...

हर समय मंगल ही मंगल होगा, अगर यह निश्चय कर लो

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कल्याण                            निश् चय  करो.                        - मुझ पर भगवान कि अनंत कृपा हैं। भगवत कृपा की अनवरत वर्षा हो रही हैं। मेरा तन मन ,मेरा रोम- रोम भगवत कृपा से भीग कर तर हो गया हैं। मैं भगवत कृपा के सुधा  सागर  में निमग्न हो रहा हूँ। मेरे ऊपर -नीचे ,दाहिने -बाएं ,बाहर -भीतर -सर्वत्र भगवत कृपा भरी हैं। मैं सब और से भगवत कृपा से सरोबार हो रहा हूँ।  अब यह शरीर ,मन ,इन्द्रियाँ सब कुछ भगवान के हो गए हैं। अब इनके द्वारा जो कुछ भी होगा ,सब भगवान कि प्रेरणा से ,उन्ही कि शक्ति से ,उन्ही के मंगलमय संकल्प से होगा। अब इस शरीर से मंगलमय कार्य ही होंगे ,मन से मंगल-चिंतन ही होगा और इन्द्रियो से मंगल का ग्रहण ही होगा।  जब हम यह सोचने लग जाते हैं ,यह चिंतन करने लग जाते हैं ,तो हम पर ईश्वर की कृपा की अनुभूति होने लगती है ,और हम एक विशेषता का अनुभव करने लगते हैं ।हमें यह अनुभूति होने लगती है कि हमने ईश्वर...