गीता के नवें अध्याय का सरल अर्थ

                 गीता के नवें अध्याय का तात्पर्य 


सभी मनुष्य भगवत प्राप्ति के अधिकारी हैं, चाहे वह किसी भी वर्ण, आश्रम,संप्रदाय,देश, वेश आदि के क्यों ना हो। वे सभी भगवान की तरफ चल सकते हैं। भगवान का आश्रय लेकर, भगवान को प्राप्त कर सकते हैं। भगवान को इस बात का दुख है, खेद है,पश्चाताप है कि यह जीव मनुष्य शरीर पाकर, मेरी प्राप्ति का अधिकार पाकर भी ,मेरे को प्राप्त न करके, मेरे पास ना आकर मौत (जन्म मरण)में जा रहे हैं। मेरे से विमुख होकर भी कोई तो मेरी अवहेलना करके, कोई आसुरी संपत्ति का आश्रय लेकर और कोई साकाम भाव से यज्ञ आदि का अनुष्ठान करके, जन्म मरण के चक्कर में जा रहे हैं। वह पापी से पापी हों, किसी नीच योनि में पैदा हुए हो, किसी भी वर्ण, आश्रम, देश आदि के हों, वे सभी मेरा आश्रय लेकर मेरी प्राप्ति कर सकते हैं अतः इस मनुष्य शरीर को पाकर जीव को मेरा भजन करना चाहिए

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