श्रीमद् भागवत गीता संबंधी प्रश्न उत्तर

                      श्रीमद् भागवत गीता संबंधी प्रश्न उत्तर 5 से 7 

5 प्रश्न– शरीरी (जीवात्मा) अविनाशी है, इसका विनाश कोई  कर ही नहीं सकता,(2/17) यह ना मरता है और ना मारा जाता है(2/19) तो फिर मनुष्य को प्राणियों की हत्या का पाप लगना ही नहीं चाहिए?

उत्तर –पाप तो पिंड–प्राणों का वियोग करने का लगता है; क्योंकि प्रत्येक प्राणी पिंड–प्राण में रहना चाहता है, जीना चाहता है। यद्यपि महात्मा लोग जीना नहीं चाहते, फिर भी उन्हें मारने का बड़ा भारी पाप लगता है क्योंकि उनका जीवन संसार मात्र चाहता है। उनके जीने से प्राणी मात्र का परम हित होता है। प्राणी मात्र को सदा रहने वाली शांति मिलती है। जो वस्तुएं प्राणियों के लिए जितनी आवश्यक होती हैं, उनका नाश करने का उतना ही अधिक पाप लगता है।

6 प्रश्न–आत्मा नित्य है, सर्वत्र परिपूर्ण है, स्थिर स्वभाव वाला है(2/24), तो फिर इसका पुराने शरीर को छोड़कर दूसरे नए शरीर में चला जाना कैसे संभव है(2/22)?

उत्तर –जब यह प्रकृति के अंश शरीर को अपना मान लेता है ,उसके साथ तादाम्य में कर लेता है, तब यह प्रकृति के अंश के आने जाने को,उसके जीने मरने को, अपना आना-जाना, जीना-मारना मान लेता है। इस दृष्टि से इसका अन्य शरीरों में चला जाना कहा गया है। वास्तव में तत्वों से इसका आना-जाना,जीना- मरना है ही नहीं।

7 प्रश्न– भगवान कहते हैं कि क्षत्रिय के लिए युद्ध के सिवाय कल्याण का दूसरा कोई साधन है ही नहीं तो क्या लड़ाई करने से ही क्षत्रिय का कल्याण होगा दूसरे किसी साधन से कल्याण नहीं होगा?

ऐसी बात नहीं है उसे समय युद्ध का प्रसंग था और अर्जुन युद्ध को छोड़कर भिक्षा मांगना श्रेष्ठ समझते थे। अतः भगवान ने कहा कि ऐसा स्वतःप्राप्त धर्म युद्ध शूरवीर क्षत्रिय के लिए कल्याण का बहुत बढ़िया साधन है। अगर ऐसे मौके पर शूरवीर क्षत्रिय युद्ध नहीं करता, तो उसकी अपकीर्ति होती है। यह आदरणीय पूजनीय मनुष्यों की दृष्टि में लघुता को प्राप्त हो जाता है। वैरी लोग उसको ना कहने योग्य वचन कहने लग जाते हैं। तात्पर्य यह है कि अर्जुन के सामने युद्ध का प्रसंग था इसलिए भगवान ने युद्ध को श्रेष्ठ साधन बताया। युद्ध के सिवाय दूसरे साधन से क्षत्रिय अपना कल्याण नहीं कर सकता- यह बात नहीं है ;क्योंकि पहले भी बहुत से राजा लोग चौथे आश्रम में वन में जाकर साधन भजन करते थे और उनका कल्याण भी हुआ है।

यह प्रश्न उत्तर गीता दर्पण (स्वामी रामसुखदास जी के वचन) पुस्तक से लिए गए हैं।

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