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गीता के दूसरे अध्याय का अर्थ

                         गीता के दूसरे अध्याय का अर्थ


अपने विवेक को महत्व देना और अपने कर्तव्य का पालन करना– इन दोनों उपाय में से किसी भी एक उपाय को मनुष्य दृढ़ता से काम में ले तो शौक चिंता मिट जाते हैं। जितने शरीर दिखते हैं, वह सभी नष्ट होने वाले हैं, मरने वाले है,पर उनमें रहने वाला कभी मरता नही है। जैसे शरीर बाल्यावस्था को छोड़कर युवावस्था को और युवावस्था को छोड़कर वृद्धावस्था को धारण कर लेता है ऐसे ही शरीर में रहने वाला एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर को धारण कर लेता है। मनुष्य जैसे पुराने वस्त्र को छोड़कर नए वस्त्र को पहन लेता है। ऐसे ही शरीर में रहने वाला शरीर रूपी एक चोले को छोड़कर दूसरा चोला पहन लेता है। जितनी अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों आती है वह पहले नहीं थी और पीछे भी नहीं रहेगी और बीच में भी उन में प्रतिक्षण वियोग हो रहा है। तात्पर्य यह है कि वे परिस्थितियों आने जाने वाली है सदा रहने वाली नहीं है। इस प्रकाश स्पष्ट विवेक हो जाए तो हलचल, शोक, चिंता नहीं रह सकती। शास्त्र की आज्ञा के अनुसार जो कर्तव्य कर्म प्राप्त हो जाए उनका पालन कार्य की पूर्ति, आपूर्ति और फल की प्राप्ति और अप्राप्ति  में सम रहकर किया जाए तो भी हलचल नहीं रह सकती।

दूसरे अध्याय में, भगवान श्रीकृष्ण ने यह भी बताया कि सब कुछ ईश्वर की दृष्टि से हो रहा है और सभी जीव ईश्वर के अंश हैं। यहाँ जीवन के कार्यों को निर्दिष्ट फलों के लिए नहीं करना चाहिए, बल्कि कर्मों को निष्काम भाव से करना चाहिए। इससे मन शांत रहता है और कर्मयोगी व्यक्ति सुख और दुःख में समान रहता है। अध्याय ने जीवन के मार्गदर्शन के लिए एक सार्थक दृष्टिकोण प्रदान किया है, जिससे व्यक्ति अपने कर्मों को सही दृष्टिकोण से समझ सकता है और अच्छे निर्णय ले सकता है।

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जय श्री राधे

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