वृंदावन भाव..... वृंदावन वास चाहूं और कुछ ना चाहूं।

            
ब्रज की महिमा का बखान कैसे संभव है? प्रभु कृपा से ऐसा कोई तीर्थ नहीं; जो ब्रज में नहीं है।   वृंदावन भाव..... वृंदावन वास चाहूं और कुछ ना चाहूं।



ब्रज की महिमा का बखान कैसे संभव है? प्रभु कृपा से ऐसा कोई तीर्थ नहीं; जो ब्रज में नहीं है। 

अपने बाबा और मैया यशोदा की इच्छापूर्ति हेतु कन्हैया ने सभी तीर्थों को ब्रज में ही बुला लिया और उन्हें ब्रज चौरासी कोस में सभी तीर्थों के दर्शन कराये। यही कारण है कि "ब्रजवासी" जावे तो कहाँ ?

 ब्रज-चौरासी कोस की एक परिक्रमा 84 लाख योनियों के पाप-कर्मों के फ़ल से मुक्ति प्रदान कर श्रीश्यामा-श्याम के श्रीचरणों की भक्ति प्रदान करती है। 

एक बार अयोध्या जाओ, दो बार द्वारिका, तीन बार जाके त्रिवेणी में नहाओगे।  
चार बार चित्रकूट, नौ बार नासिक, बार-बार जाके बद्रीनाथ घूम आओगे॥  
कोटि बार काशी, केदारनाथ, रामेश्वर, गया-जगन्नाथ, चाहे जहाँ जाओगे।  
होंगे प्रत्यक्ष जहाँ दर्शन श्याम-श्यामा के, वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे॥ 
वृन्दावन सा कहीं आनन्द नहीं पाओगे..........

 बस, यहीं पड़ी रहूँ, कभी गिरिराज गोवर्धन की तलहटी में, कभी राधाकुन्ड और श्यामकुन्ड के मध्य, कभी श्रीलाड़लीजू के बरसाने और कभी कन्हैया के नन्दगाँव, कभी गोकुल, कभी मानसरोवर, बिहारवन, गहवरवन, मोरकुटि, चरण-पहाड़ी, कुन्ज-निकुन्जों में, यमुना पुलिन पर, वृन्दावन की कुन्ज गलियों में विचरती रहूँ। 

श्रीकिशोरीजू की कृपा से जिहवा पर, अंतर में राधे-राधे का उच्चारण हो रहा हो, कभी विरह में आर्तनाद हो तो कभी खिलखिलाकर अट्टाहास हो, नेत्रों के सामने श्रीयुगलकिशोर की लीलायें चल रही हों,

 यमुना पुलिन पर कभी उन्हें खेलते देखूँ तो कभी कुन्जों में श्रीजी का पुष्पों से श्रंगार करते अपने प्राणधन मोहन की अमृतमयी लीलाओं को निहारुँ, कभी श्रीजी के श्रीचरणों में बैठे नन्दनन्दन को मनुहार करते देखूँ।

 यह देखते-देखते दृष्टि ऐसी हो जाये कि एक श्रीयुगलकिशोर के अतिरिक्त इस संसार में कुछ भी न दिखाई दे। ब्रज हो, ब्रजवासी हों, प्रिय वृन्दावन हो और श्रीयुगलकिशोर ! 

और क्या चाहूँ, क्या माँगू ? हे किशोरीजी, इस दासी का ऐसा सौभाग्य कब होगा ! जब मुझे वृन्दावन बसाओगी, यह कृपा कब करोगी ! ये भी आपकी ही अहैतु की कृपा है जो आपके चरणों में चित्त लगा, यह कृपा भी तो कम नहीं तो ।

।। श्रीराधे ।।

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