स्वामी विवेकानंद जी पर उनके गुरु की कृपा हुई तो वह नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद हो गए।

        स्वामी विवेकानंद जी पर उनके गुरु की कृपा हुई तो वह नरेंद्र से स्वामी विवेकानंद हो गए।


विवेकानंद जी का नाम नरेंद्र था पूरे नास्तिक थे। वह कहते थे कि पत्थर की जड़ मूर्तियों में चैतन्य आत्मा को लगाने से क्या लाभ। श्री रामकृष्ण देव परमहंस को पागल समझते थे। किसी दिन मन में आया कि देखे उसे पागल को। जब परमहंस जी के पास आए तो उन्होंने कहा– क्यों नरेंद्र! तुम इतनी देर से आए? नरेंद्र के मन में आया इन्हें मेरा नाम कैसे पता चला। इन्होंने कहा कि पत्थर की मूर्ति के सामने मां मां करने से क्या लाभ? परमहंस जी ने कहा बेटा! यह साक्षात माता है, प्यार करती हैं, बातचीत करती हैं। कृपा करके परमहंस ने कहा तुम माता जी के सामने बैठ ध्यान लगाकर मां पुकारो। नरेंद्र ने ऐसा ही किया। इस बालक पर दया करो। परमहंस की प्रार्थना पर माता ने ध्यान में दर्शन दिया सर पर हाथ रखा। उसी पल नरेंद्र के मन में विवेक की जागृति हो गई और गुरु चरण रज के सिर पर लगाते ही विवेकानंद हो गए। हाय-हाय! कर पछताने लगे कि गुरु चरणों से अलग रहकर कितना समय व्यर्थ गया।

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