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शरणागति का क्या स्वरूप होता है।

              शरणागति का क्या स्वरूप होता है।

भूल जान यह जीव का स्वभाव है। कन्या अपने पति का वरण कर लेती है तो उसे दृढ़ विश्वास होता है कि यह मेरे पति हैं। बार-बार वह ना कहे तो कोई आपत्ति नहीं है। पर जीव शरणागत होकर भी दृढ़ विश्वास नहीं कर पाता है संसार के संबंध अपनी और खींचते हैं अतः उसे बार-बार शरणागति का स्मरण करना चाहिए। मन को नाम, रूप, लीला में अनन्य भाव से लगा लिया जाए तो उस भक्त का स्मरण भगवान अपने आप करते हैं। भक्त बार-बार ना भी कहे कि मैं शरण में हूं तो कोई आपत्ति नहीं है। पर नए साधक को बार-बार स्मरण करना ही है। जब तक जीव भगवान की शरण में नहीं जाएगा, तब तक उसे शांति नहीं मिलेगी। आज नहीं तो आगे घूम फिर कर भगवान के पास अवश्य पहुंचेंगे। इस प्रकार पहुंचने में विलंब होगा अनेक बार 84 लाख योनियों में भटकना पड़ेगा अतः प्रयत्न करके साधन को भजन करके शीघ्र से शीघ्र अपने प्रभु के पास पहुंच जाना चाहिए। इससे वह प्रभु अति प्रसन्न होंगे। जीव के विमुख होने पर ईश्वर को कष्ट होता है।

 आवत निकट हंसहि प्रभु भाजत रुदन कराही 

जब  भक्त निकट आता है तो भगवान प्रसन्न होकर हंसने लगते हैं भगवान से दूर भागता है तो बाल गोविंद भगवान रोने लगते हैं। इसलिए इष्ट को प्रसन्न रखने के लिए प्रभु की ओर जाना चाहिए भगवान की ओर पीठ करके उनसे अलग नहीं जाना चाहिए।

दादा गुरु भक्त माली जी महाराज के श्री मुख से परमार्थ के पत्र पुष्प पुस्तक में से

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जय श्री राधे

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