मन को काबू में लाना हो तो,

मन को काबू में लाना हो तो,


समय सार्थक होगा, समय सार्थक वही है जो भगवान अथवा
भगवान के भक्तों के गुणों पर चर्चा हो कहने को मिले, चाहे सुनने को मिले,चाहे किसी  सदग्रंथ में पढ़ने को मिले और अंतःकरण से उनपर  विचारने का अवसर मिले। तो समय की सार्थकता होती हैं धन्य घड़ी सोई जब सत्संगा धन्य जन द्विज भक्तिअभंगा समय की सार्थकता होगी और जो गायेंगे उनकी वाणी पवित्र होगी और जो सुनेंगे उनके कान पवित्र होंगे और क्या होगा? मन की वृत्ति सधी रहे। बोले महाराज- मन बहुत भटकता है। मन बहुत भटकाता  है। चंचल  बंचक जानिए मनहि भूत विकराल, कबहूँ जाए आकाश में कबहूँ जाए पाताल। मन काबू में नहीं आता है, तो कहते हैं मन को काबू में लाना हो तो, तो भक्तों का चरित्र गाने बैठ जाओ, सुनने बैठ जाओ ।मजाल है जो मन इधर-उधर भाग जाए। कम से कम इतनी देर के लिए मन की वृत्ति सधी रहे और बुद्धि,बुद्धि कंप्यूटर वाली बात उतनी देर नहीं सोच सकती है।
 मन की वृती सधी रहे ,बुद्धि प्रभु से बंधी रहे। अंतर की ही स्वच्छता और आवे प्रीत रीत ज्यों
मन की स्वच्छता जरूरी है जैसे घर में  गंदगी आ जाती है तो बुहारी से स्वच्छता हो जाती है, पोछा लगा कर के स्वच्छता हो जाती हैं और गाड़ी में गंदगी आ जाती है तो सर्विसिंग स्टेशन पर  ले जाकर  सफाई कराते हैं कपड़े में गंदगी आ जाती है तो धोबी घाट पर ले जाकर सफाई करा देते हैं। शरीर में गंदगी आ जाती है तो  स्नान इत्यादि प्रक्रिया से पूरी हो जाती है और अगर मन के भीतर कोई गंदगी आ गई तो कहते हैं भक्तों के चरित्र,भक्तमाल पढो़गें तो एकदम धो के पोंछ के उसको निर्मल बना देते हैं। प्रभु के चरणों में पहुंचने लायक बना देते हैं और ऐसे बना देंगे कि प्रभु ललक उठेंगे। आजा बेटा! तुम बहुत अच्छे लग रहे हो, भक्तों का चरित्र सुनते हो,पढ़ते हो और अनुसरण कर रहे हो। तो मुझे बहुत प्यारे लगते हो, आओ तो मैं गोदी में बैठा लूँ। तुम्हें प्यार दूं ।इस प्रकार से ही प्रभु की प्रीति की रीति आएगी और प्रभु का प्यार मिलेगा। अंतःकरण की स्वच्छता हो जाएगी।
इसलिए अपने मन को भटकने से बचाने के लिए भक्तो का चरित्र,भक्तमाल ग्रन्थ का अध्यन जरूर करना चाहिए।
(मामा जी महाराज श्री नारायणदास भक्तमाली जी)

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