मन आपका मित्र भी है और शत्रु भी

                 मन आपका मित्र भी है और शत्रु भी



गीता में प्रभु का कथन है कि अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए अर्थात भवसागर से पार होना चाहिए। यत्न पूर्वक साधन करने से प्रभु कृपा अवश्य करेंगे। मन अपना मित्र है और शत्रु भी है। अपने वश में हुआ मन अपना मित्र है, उसे भजन साधन बनेगा, मित्रता का काम करेगा। विषयी मन, अवश मन,अवश इंद्रियां शत्रु है। यह सब नर्क में गिरा देंगें।अतः मन की ओर से सावधान रहें। हठ करके भजन में लगावे। मन भजन में ना लगे तो भी बिना मन लगे, भजन करने से मन लगने लग जाएगा। सबका मन भगवान में लगे, सब पर प्रभु की कृपा बनी रहे।
 जय श्री राधे
 (परमार्थ के पत्र पुष्प दादा गुरु भक्त माली जी के श्री मुख से)

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