दूसरों का भला करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है

         दूसरों का भला करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है।
                  परहित सरिस धर्म नहीं भाई

कविवर रहीम का प्रसिद्ध दोहा है -
यो रहीम सुख होत है उपकारी के संग 
बाँटन वारे को लगे ज्यो मेहंदी के रंग।।
 दूसरों की भलाई करने वाला उसी प्रकार से सुखी होता है जैसे दूसरों के हाथों पर मेहंदी लगाने वाले की उंगलियों खुद भी मेहंदी के रंग में रंग जाती है। जो इत्र बेचते हैं ,वह खुद उसकी खुशबू से महकती रहते हैं। जिस प्रकार एक फूल बेचने वाले के कपड़ों और बदन से फूलों की सुगंध नहीं जा सकती। उसी प्रकार दूसरों की भलाई करने वाले व्यक्ति का का भी अहित नहीं हो सकता। दूसरों की मदद अथवा परोपकार निःसन्देह  बड़ा महत्व है ।प्रत्यक्ष रुप से ही नहीं, परोक्ष रूप से भी इसका बड़ा महत्व है।
एक बुढ़िया थी ,जो बहुत कमजोर , बीमार थी। रहती भी अकेली थी । उसके कंधों में दर्द रहता था ।लेकिन वह इतनी कमजोर थी कि खुद अपने हाथों से दवा लगाने में भी असमर्थ थी ,कंधों पर दवा लगाने के लिए कभी किसी से विनती करती तो कभी किसी से। एक दिन बुढ़िया ने पास से गुजरने वाले एक युवक से कहा कि बेटा जरा मेरे कंधे पर दवा मल दो  भगवान तेरा भला करेगा । युवक ने कहा कि अम्मा मेरे हाथों की उंगलियों में तो खुद दर्द रहता है ,मैं कैसे तेरे कंधों की मालिश करूँ। बुढ़िया ने कहा कि बेटा दवा मलने की जरूरत नहीं, बस इस डिबिया  में से थोड़ा मलहम अपनी उंगलियों से निकाल कर, मेरे कंधों पर फैला दो। युवक ने अनमने मन से मलहम लेकर 1 हाथ की उंगली से दोनों कंधों पर लगा दिया। दवा लगाते ही बुढ़िया की बेचैनी कम होने लगी और इसके लिए उस युवक को आशीर्वाद देने लगी । बेटा भगवान भी तेरी उंगलियों को जल्दी ठीक कर दे। बुढिया के आशीर्वाद पर युवक अविश्वास से हंस दिया लेकिन साथ ही उसे महसूस किया कि उसकी उंगलियों का दर्द भी गायब होता जा रहा है ।वास्तव में बुढ़िया को मलहम लगाने के बाद युवक की उंगलियों पर कुछ मलहम लगा रह गया था ,उसे दूसरे हाथ के उंगली से पूछने की कोशिश की तो सारी उंगलियों पर भी लग गया, उसका ही कमाल था कि जिससे युवक के दोनों हाथों का दर्द कम होता जा रहा था। अब तो युवक सुबह दोपहर शाम तीनों वक्त अम्मा के कंधे पर मलहम लगा था और उनकी सेवा करता । कुछ ही दिनों में बुढ़िया पूरी तरह से ठीक हो गई और साथ ही युवक के दोनों हाथों की उंगलियों का भी दर्द ठीक हो गया । तभी तो कहा गया है कि जो दूसरों के जख्मों पर मरहम लगाता है उसके खुद के जख्म को भी भरने में देर नहीं लगती।
इस मुहावरे का अर्थ है कि किसी को सांत्वना देना ,किसी की पीड़ा को कम करना । जरूरी नहीं कि इसके लिए कोई दवाई या मरहम ही लगाया जाए क्योंकि यह पीड़ा भौतिक नहीं, मानसिक भी हो सकती है ।पीड़ा जो भी हो कष्टदायक होती है। यदि कोई किसी को किसी भी प्रकार की पीड़ा से मुक्त करता है ,तो पीड़ित को भी राहत मिलती है, और पीड़ा को कम करने वाला या कष्ट को समाप्त करने वाले के प्रति कृतज्ञता से भर उठता है, और आशीर्वाद या दुआएं देने लगता है । जब कोई उसके प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करता है अथवा उसको धन्यवाद करता है। तो वह एकदम विनम्र होकर परमार्थ के भावों से भर उठता है। उसका मन करता है कि मैं सदैव लोगों के कष्ट दूर करने में लगा रहूं ।दुनिया के सभी लोगों को कष्ट मुक्त हो जाए ,ऐसी भावना मन में रख लेता है ।दूसरों की भलाई के समान कोई दूसरा धर्म नहीं और दूसरों को कष्ट देने के समान कोई अधर्म अथवा पाप नहीं है। यही सभी पुराणों वेदों का सार है। विद्वान लोग यह जानते हैं कि मनुष्य का शरीर पाकर जो भी लोग दूसरों को कष्ट पहुंचाते हैं उन्हें महान संसार के महान कष्ट भोगने पड़ते हैं।  इस प्रकार स्वार्थ और अज्ञानता के वश हो कर भी जो अनेकानेक पाप कर्मों में लिप्त रहते हैं उनका परलक भी नष्ट हो जाता है। गोस्वामी जी कहते हैं जिसके मन में परहित तथा दूसरों की भलाई का भाव बना रहता है, उनके लिए संसार की कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो उसे ना मिल सके। दूसरों के जख्मों पर मरहम लगाने वाले, सच्चे मन से लोगों की सेवा करने वाले, आध्यात्मिक , भौतिक और  देविक तीनों प्रकार की व्याधियों से मुक्त होकर आनंद पूर्वक जीवन ही जीते हैं, बल्कि वह धर्म का सही पालन करते हैं ,स्वस्थ -प्रसन्न रहते हैं और उनका यही नहीं परलोक भी  सँवर जाता है।



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

श्री राधा कवच

भजन- गोवर्धन वासी सांवरे तुम बिन रहा न जाए-------

क्या आप जल्दी ही सभी दुखों से मुक्ति चाहते हैं तो श्री रामायण मनका 108 का हफ्ते में एक बार पाठ जरूर करें।

आपके कल्याण की पक्की गारंटी, छप्पय छंद

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने माता-पिता के लिए बनाये थे - ब्रज में चार धाम

राम रक्षा स्तोत्र हिदी में

जब मन दुखी हो तो क्या करें?