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श्रीमद् भगवत गीता यथारूप हिंदी में पहले अध्याय का पहला श्लोक

            श्रीमद्भागवत गीता यथारूप प्रथम अध्याय–



धर्मक्षेत्र------------------------संजय।।

महाभारत में धृतराष्ट्र तथा संजय की वार्ताएं इस महान दर्शन के मूल सिद्धांत का कार्य करते हैं। धर्म क्षेत्र शब्द सार्थक है, क्योंकि कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में अर्जुन के पक्ष में श्री भगवान स्वयं उपस्थित थे। कौरवों का पिता धृतराष्ट्र अपने पुत्रों की विजय की संभावना के विषय में अत्यधिक संदिग्ध था। अतः इसी कारण उसने अपने सचिव से पूछा "उन्होंने क्या किया?" वह आश्वस्त था कि उसके पुत्र तथा उसके छोटे भाई पांडु के पुत्र कुरुक्षेत्र की युद्ध भमि में निर्णय आत्मक संग्राम के लिए एकत्र हुए हैं। फिर भी उसकी जिज्ञासा सार्थक है, वह नहीं चाहता था कि भाइयों में कोई समझौता हो, अत: वह युद्धभूमि में अपने पुत्रों की नियति के विषय में आश्वस्त होना चाह रहा था,क्योंकि इस युद्ध को कुरुक्षेत्र में लड़ा जाना था। जिसका उल्लेख वेदों में स्वर्ग के निवासियों के लिए भी तीर्थ स्थल के रूप में हुआ है। अत: धृतराष्ट्र अत्यंत भयभीत था कि इस पवित्र स्थल का युद्ध के परिणाम पर ना जाने कैसा प्रभाव पड़े। उसे भली-भांति पता था कि इसका प्रभाव अर्जुन तथा पांडु के पुत्रों पर अत्यंत अनुकूल पड़ेगा क्योंकि स्वभाव से ही वे सभी पुण्यात्मा थे।संजय श्री व्यास का शिष्य था, उनकी कृपा से संजय  धृतराष्ट्र के कक्ष में बैठे-बैठे कुरुक्षेत्र की युद्धस्थल का दर्शन कर सकता था। इसलिए धृतराष्ट्र ने उससे युद्ध की स्थिति के विषय में पूछा।

पांडु तथा धृतराष्ट्र के पुत्र दोनों ही एक वंश से संबंधित है, किंतु यहां पर  उसके मनोभाव प्रकट होते हैं। उसने जानबूझकर अपने पुत्रों को कुरु कहा और और पांडु के पुत्रों को वंश के उत्तराधिकार से अलग कर दिया। इस तरह पांडु के पुत्रों अर्थात अपने भतीजे के साथ धृतराष्ट्र के विशिष्ट मानस स्थिति समझी जा सकती है। जिस प्रकार धान के खेत से अवांछित पौधों को उखाड़ दिया जाता है। उसी प्रकार इस कथा के आरंभ से ही ऐसी आशा की जाती है कि जहां धर्म के पिता श्री कृष्ण उपस्थित हो, वहां कुरुक्षेत्र रूपी खेत में दुर्योधन आदि धृतराष्ट्र के पुत्र रूपी अवांछित पौधों को समूल नष्ट करके, युधिष्ठिर आदि नितांत धार्मिक पुरुषों की स्थापना की जाएगी। यहां धर्म क्षेत्र तथा कुरुक्षेत्र शब्दों की उनकी ऐतिहासिक तथा वैदिक महत्व के अतिरिक्त, यही सार्थकता है।


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जय श्री राधे

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