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श्रीमद् भागवत गीता अध्याय का तीसरा श्लोक हिंदी में

  श्रीमद्भागवत गीता पहले अध्याय का तीसरा श्लोक हिंदी में

            कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में सैन्य निरीक्षण


पश्यैतां --------------------- शिष्येण धीमता ।।३।।

हे आचार्य! पांडू पुत्रों की विशाल सेना को देखें, जिसे आप के बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र ने इतनी कौशल से व्यवस्थित किया है। 

रम राजनीतिज्ञ दुर्योधन महान ब्राह्मण सेनापति द्रोणाचार्य के दोषों को इंगित करना चाहता था। अर्जुन की पत्नी द्रोपदी के पिता राजा द्रुपद के साथ द्रोणाचार्य का कुछ राजनीतिक झगड़ा था। झगड़े के फल स्वरुप द्रुपद ने एक महान यज्ञ संपन्न किया, जिससे उसे एक ऐसा पुत्र प्राप्त होने का वरदान मिला, जो द्रोणाचार्य का वध कर सके। द्रोणाचार्य यह भलीभांति जानता था, किंतु जब द्रुपद का पुत्र धृष्टद्युम्न युद्ध शिक्षा के लिए उस को सौंपा गया ,तो द्रोणाचार्य को उसे अपने सारे सैनिक रहस्य प्रदान करने में कोई झिझक नहीं हुई। अब वह युद्ध भूमि में पांडवों का पक्ष ले रहा था और उसने द्रोणाचार्य से जो कला सीखी थी उसी के आधार पर उसने यह व्यूहरचना की थी। दुर्योधन ने द्रोणाचार्य की दुर्बलता की ओर इंगित किया, जिससे वह युद्ध में सजग रहें और समझौता ना करें। इसके द्वारा द्रोणाचार्य को यह भी बताना चाह रहा था कि कहीं वह अपने प्रिय शिष्य पांडवों के प्रति युद्ध में उदारता ना दिखा बैठे, विशेष रूप से अर्जुन उसका अत्यंत प्रिय एवं तेजस्वी शिष्य था। दुर्योधन ने यह भी चेतावनी दी कि युद्ध में इस प्रकार की उदारता से हार हो सकती है।



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जय श्री राधे

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