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कालकूट विष

                                 कालकूट विष




देवता और असुरों ने एक बार मेरु पर्वत की मथानी और शेषनाग का दण्ड बनाकर समुद्र का मंथन किया।उसमें सबसे पहले हलाहल विष निकला और उसने दसों दिशाओं को अपनी ज्वाला से व्याप्त कर दिया। फिर तो देवता और असुर सभी त्राहि-त्राहि करने लगे, सबों ने मिलकर विचारा कि बिना भक्तवत्सल भगवान शंकर के इस महाघातक वि‌ष से त्राण पाना कठिन है।इसलिए उन्होंने एक साथ आर्त स्वर से भगवान शंकर को पुकारा। भक्त आर्ति हर करुणामय भगवान शंकर जी प्रकट हुए और उनको भयभीत देखकर हलाहल विष को उठाकर पान कर गए। परंतु शीघ्र ही उन्हें स्मरण हुआ कि हृदय में तो ईश्वर अपनी अखिल सृष्टि के साथ विराजमान है। इसलिए उन्होंने इस विष को कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया गया और उस विघ्न के प्रभाव से उनका कंठ नीला हो गया और दोषपूर्ण वह विष भगवान का भूषण बन गया। तभी से शिव 'नीलकंठ' कहलाने लगे।

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जय श्री राधे

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