in

त्रिपुरारिसिरधामिनी (गंगा जी का यह नाम कैसे पडा़

                            त्रिपुरारिसिरधामिनी( शिव के मस्तक में निवास करने वाली)


जब महाराज भगीरथ ने ब्रह्मलोक से गंगा जी को प्राप्त कर लिया,तब यह कठिनाई सामने आई कि यदि गंगा जी की धारा वहां से सीधे भूलोक पर गिरेगी तो उससे भूलोक जलमग्न हो जाएगा। इसलिए उन्होंने भव भय हारी भगवान शंकर की स्तुति की और शंकर जी ने ब्रह्मलोक से अवतरित होती हुई गंगा की धारा को, अपनी जटा जाल में रोक लिया। इसी से श्री गंगा जी को त्रिपुरारी (शिव )के मस्तक में निवास करने वाली कहा जाता है।

2 टिप्‍पणियां:

अगर आपको मेरी post अच्छी लगें तो comment जरूर दीजिए
जय श्री राधे

Featured Post

कृतज्ञता का महत्व", "मानसिक शांति के उपाय", "शुक्राना का जादू", "Spirituality in daily life".

शिकायत से शुक्राने तक: जीवन बदलने वाला महामंत्र ​ प्रस्तावना: क्या हम वास्तव में जी रहे हैं? ​आज के आधुनिक युग में इंसान एक ऐसी दौड़ में श...