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राम तत्त्व की महिमा

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                           राम तत्त्व की महिमा अवधपुरी में राजा दशरथ के घर श्रीराम अवतरित हुए तब से ही लोग श्रीराम का भजन करते हैं, ऐसी बात नहीं  है  ।  राजा दिलीप, राजा रघु एवं राजा दशरथ के पिता राजा अज भी श्रीराम का ही भजन करते थे क्योंकि श्रीराम केवल दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, बल्कि रोम-रोम में जो चेतना  व्याप्त रही है, रोम-रोम में जो रम रहा है उसका ही नाम है 'राम'। राम जी के अवतरण से हजारों-लाखों वर्ष पहले राम नाम की महिमा वेदों में पायी जाती है। रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः। 'जिसमें योगी लोगों का मन रमण करता है उसी को कहते हैं 'राम'।' एक राम घट-घट में बोले, दूजो राम दशरथ घर डोले। तीसर राम का सकल पसारा, ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।। इस कथनानुसार तो चार राम हुए। ऐसा कैसे ?" "थोड़ी साधना करो, जप-ध्यानादि करो, फिर समझ में आ जायेगा।"  जीव राम घट-घट में बोले। ईश राम दशरथ घर डोले। बिंदु राम का सकल पसारा। ब्रह्म राम है सबसे न्यारा।। जीव, ईश, बिंदु व ब्रह्म इस प्रकार भी तो राम चार ही हुए न ?" साधना...

क्या ऐसा हो सकता है कि 6 मिनट में किसी साधन से करोडों विकार दूर हो सकते हैं।

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क्या ऐसा हो सकता है कि 6 मिनट में किसी साधन से करोडों विकार दूर हो सकते हैं। "ऊँ" की ध्वनि का वैज्ञानिक महत्व एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी में पुनि आध..  क्या ऐसा हो सकता है कि 6 मिनट में किसी साधन से करोडों विकार दूर हो सकते हैं। तुलसी चरचा प्रेम की, हरै कोटि अपराध...    1 घड़ी  = 24 मिनट  1/2घडी़ = 12 मिनट  1/4घडी़ =   6 मिनट    क्या ऐसा हो सकता है कि 6 मिनट में किसी साधन से करोडों विकार दूर हो सकते हैं।  उत्तर है हाँ हो सकते हैं..! वैज्ञानिक शोध करके पता चला है कि ...      सिर्फ 6 मिनट ॐ का उच्चारण करने से सैकडौं रोग ठीक हो जाते हैं जो दवा से भी इतनी जल्दी ठीक नहीं होते....       6 मिनट ऊँ का उच्चारण करने से मस्तिष्क में विशेष वाइब्रेशन (कम्पन) होता है.... और औक्सीजन का प्रवाह पर्याप्त होने लगता है। कई मस्तिष्क रोग दूर होते हैं.. स्ट्रेस और टेन्शन दूर होती है, मैमोरी पावर बढती है..! लगातार सुबह शाम 6 मिनट ॐ के तीन माह तक उच्चारण से रक्त संचार संतुलित होता है और रक्त में औक्सीजन लेबल बढता है।रक्त चाप, हृदय र...

गजराज को बचाने के लिए भगवान विष्णु नंगे पैर ही दौड़ पड़े थे, गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र से मिलती है कर्ज़ से मुक्ति

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           गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र से मिलती है कर्ज़ से मुक्ति   गजराज को बचाने के लिए भगवान विष्णु नंगे पैर ही दौड़ पड़े थे, गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र से मिलती है कर्ज़ से मुक्ति। भगवान विष्णु अपने भक्तों को जरा भी कष्ट नहीं होने देते हैं. गजेंद्र मोक्ष की कथा हमें यही बताती है. आइए जानते हैं इस कथा और गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र के महत्व के बारे में..... गजेंद्र मोक्ष की कथा का वर्णन श्रीमद भागवत पुराण में भी मिलता है. कथा के अनुसार क्षीरसागर में त्रिकुट नाम का पर्वत था. जिसके आसपास हाथियों का परिवार रहता था. गजेंद्र हाथी इस परिवार का मुखिया था. एक दिन घूमते-घूमते उसे प्यास लगी.परिवार के अन्य सदस्यों के साथ ही गजेंद्र पास के ही एक सरोवर से पाने पी कर अपनी प्यास बुझाने लगा. लेकिन तभी एक शक्तिशाली मगरमच्छ ने गजराज के पैर को दबोच लिया और पाने के अंदर खीचने लगा. मगर से बचने के लिए गजराज ने पूरी शक्ति लगा दी लेकिन सफल नहीं हो सका. दर्द से गजेंद्र चीखने लगा. गजेंद्र की चीख सुनकर अन्य हाथी भी शोर करने लगे. इन्होंने भी गजेंद्र को बचाने का प्रयास किया लेकिन कोई सफलता नहीं मि...

भगवान पर विश्वास

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                            भगवान पर विश्वास  एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था। पंडित जी बहुत विद्वान थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।. नदी के दूसरे किनारे पर लक्ष्मी नाम की एक ग्वालिन अपने बूढ़े पिताश्री के साथ रहती थी।. लक्ष्मी सारा दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी। सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दोहती,.फिर अपने पिताजी के लिए खाना बनाती, तत्पश्चात् तैयार होकर दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।. पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था।. एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था।  उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए।. लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।. अगले दिन लक्ष्मी ने सुबह जल्दी उठकर अपना सारा काम समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी।. नदी किनारे उसने आकर देखा कि कोई मल्लाह अभी तक आया नहीं था।  लक्ष्मी बगैर नाव के नदी कैसे पार...

सोमनाथ

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                                      सोमनाथ   चंद्रमा की सुंदरता पर राजा दक्ष की सत्ताइस पुत्रियां मोहित हो गईं. वे सभी चंद्रमा से विवाह करना चाहती थीं. दक्ष ने समझाया सगी बहनों का एक ही पति होने से दांपत्य जीवन में बाधा आएगी लेकिन चंद्रमा के प्रेम में पागल दक्ष पुत्रियां जिद पर अड़ी रहीं.         अश्विनी सबसे बड़ी थी. उसने कहा कि पिताजी हम आपस में मेलजोल से मित्रवत रहेंगे. आपको शिकायत नहीं मिलेगी. दक्ष ने सत्ताईस कन्याओं का विवाह चंद्रमा से कर दिया.         विवाह से चंद्रमा और उनकी पत्नियां दोनों बहुत प्रसन्न थे लेकिन ये खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रही. जल्द ही चंद्रमा सत्ताइस बहनों में से एक रोहिणी पर ज्यादा मोहित हो गए और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करने लगे.         यह बात दक्ष को पता चली और उन्होंने चंद्रमा को समझाया. कुछ दिनों तक तो चंद्रमा ठीक रहे लेकिन जल्द ही वापस रोहिणी पर उनकी आसक्ति पहले से भी ज्यादा तेज हो गई.   ...

हनुमान जी के पाठ से करें अपनी सभी समस्याओं का हल

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  हनुमान जी के पाठ से करें अपनी सभी समस्याओं का हल  हनुमानजी की प्रार्थना में तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान बहुक आदि अनेक स्तोत्र लिखे, लेकिन हनुमानजी की पहली स्तुति किसने की थी? तुलसीदासजी के पहले भी कई संतों और साधुओं ने हनुमानजी की श्रद्धा में स्तुति लिखी है। लेकिन क्या आप जानते हैं सबसे पहले हनुमानजी की स्तुति किसने की थी? जब हनुमानजी लंका का दहन कर रहे थे तब उन्होंने अशोक वाटिका को इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि वहां सीताजी को रखा गया था। दूसरी ओर उन्होंने विभीषण का भवन इसलिए नहीं जलाया, क्योंकि विभीषण के भवन के द्वार पर तुलसी का पौधा लगा था। भगवान विष्णु का पावन चिह्न शंख, चक्र और गदा भी बना हुआ था। सबसे सुखद तो यह कि उनके घर के ऊपर 'राम' नाम अंकित था। यह देखकर हनुमानजी ने उनके भवन को नहीं जलाया। विभीषण के शरण याचना करने पर सुग्रीव ने श्रीराम से उसे शत्रु का भाई व दुष्ट बताकर उनके प्रति आशंका प्रकट की और उसे पकड़कर दंड देने का सुझाव दिया। हनुमानजी ने उन्हें दुष्ट की बजाय शिष्ट बताकर शरणागति देने की वकालत की। इस पर श्रीरामजी ने विभीषण को शरणागति न देने के सुग्...

कालिका माता के छठा रहस्य

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                        कालिका माता के छठा और सातवां रहस्य    छठा रहस्य,रक्तबीज का वध : - ब्रह्माजी के शरीर से ब्राह्मी, विष्णु से वैष्णवी, महेश से महेश्वरी और अम्बिका से चंडिका प्रकट हुईं। पलभर में सारा आकाश असंख्य देवियों से आच्छादित हो उठा। ब्राह्मणी ने अपने कमंडल से जल छिड़का जिससे राक्षस तेजहीन होने लगे, वैष्णवी अपने चक्र, महेश्वरी अपने त्रिशूल से, इन्द्राणी वज्र से और सभी देवियां अपने अपने आयुधों से आक्रमण कर रही थीं। राक्षस सेना भागने लगीं। तब रक्तबीज ने राक्षसों को धिक्कारा कि वे स्त्रियों से डरकर भाग रहे हैं? रक्तबीज हमला करने आया, तो इन्द्राणी ने उस पर शक्ति चलाई जिससे उसका सर कट गया और रक्त भूमि पर गिरा। किंतु पूर्व वरदान के प्रभाव से उस रक्त से फिर एक रक्तबीज उठ खड़ा हुआ और अट्टहास करने लगा। जैसे ही शक्तियां उसे मारतीं, उसके रक्त से और असुर उठ खड़े होते। जल्द ही असंख्य रक्तबीज सब और दिखने लगे। मां चंडिका ने श्रीकाली से कहा कि इसका रक्त भूमि पर गिरने से रोकना होगा जिससे और रक्तबीज न जन्में। देवी काली ने कह...