श्रीमद्भागवत गीता के प्रथम अध्याय का 12 और 13 श्लोक हिंदी में
तस्य ---------------------------------------------- दध्मौ प्रतापवान् ।। 12।।
कुरुवंश के वयोवृद्ध परम प्रतापी एवं वृद्ध पितामह ने सिंह गर्जना की सी ध्वनि करने वाले अपने शंख को, उच्च स्वर से बजाया। जिससे दुर्योधन को हर्ष हुआ।
कुरु वंश के वृद्ध पितामह ने अपने पौत्र दुर्योधन का मनोभाव जान गए और उसके प्रति अपनी स्वाभाविक दयावश उन्होंने उसे प्रसन्न करने के लिए अत्यंत उच्चस्वर से अपना शंख बजाया, जो उनकी सिंह के समान स्थिति के अनुरूप था। अप्रत्यक्ष रूप से शंख के द्वारा प्रतीकात्मक ढंग से उन्होंने अपने हताश पौत्र दुर्योधन को बता दिया कि उन्हें युद्ध में विजय की आशा नहीं है क्योंकि दूसरे पक्ष में साक्षात भगवान श्रीकृष्ण है। फिर भी युद्ध का मार्गदर्शन करना उनका कर्तव्य था और इस संबंध में वे कोई कसर नहीं रखेंगे।
तत:----------------------------------शब्दस्तुमुलोऽभवत् ।। 13।।
तत्पश्चात शंख, नगाड़ा, बिगुल ,तुरही तथा सींग सहसा एक साथ बजे उठे। वह समवेत स्वर अत्यंत कोलाहल पूर्ण था।
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