क्या सच्ची भक्ति भगवान से माँगने में है या समर्पण करने में? जानिए भक्ति की गहराई और आत्मिक सत्य इस भावनात्मक लेख में।
🌼 सच्ची भक्ति क्या है – माँगना या समर्पण करना?
जब हम भगवान के सामने हाथ जोड़ते हैं,तो अक्सर हमारे मन में कोई न कोई इच्छा होती है —
स्वास्थ्य, शांति, समाधान, या किसी अपने की भलाई।
तब प्रश्न उठता है —क्या भगवान की भक्ति सिर्फ माँगने तक सीमित है? या सच्ची भक्ति समर्पण में छुपी होती है?
🌿 माँगना भी भक्ति है, पर शुरुआत मात्र
भगवान से माँगना गलत नहीं है। दुख में, टूटे मन से, जब हम उन्हें पुकारते हैं — तो वही हमारी पहली भक्ति होती है।
माँगना यह दर्शाता है कि हमें विश्वास है कि कोई है जो सुनता है। लेकिन माँगने वाली भक्ति अक्सर शर्तों से जुड़ी होती है —
“अगर यह मिल जाए, तो मैं मानूँ।”
🌸 समर्पण – जहाँ भक्ति परिपक्व होती है
समर्पण का अर्थ है — जो भी मिले, उसे स्वीकार करना। जब भक्त कहता है —
“हे प्रभु, जो आप दें वही स्वीकार है”
तब भक्ति गहराई पकड़ लेती है। समर्पण में: अपेक्षा नहीं होती शिकायत कम हो जाती है और मन शांत रहने लगता है। यही वह अवस्था है जहाँ इंसान भगवान को बदलना नहीं, खुद को बदलना सीखता है।
🌼 माँगने से समर्पण तक की यात्रा
हर भक्त पहले माँगता है,फिर धीरे-धीरे समझता है।
दुख, प्रतीक्षा और अनुभव ,हमें सिखाते हैं कि भगवान हमेशा वही देते हैं जो हमारे लिए उचित होता है —
भले ही वह हमारी इच्छा के अनुसार न हो। यहीं से माँग समर्पण में बदलने लगती है।
🌺 सच्ची भक्ति का स्वरूप
सच्ची भक्ति न तो केवल माँगना है और न ही केवल चुप रह जाना।
👉 सच्ची भक्ति है —
भगवान से सब कहना, और फिर उन पर सब छोड़ देना।
जब मन यह कह सके — “मैंने आपको अपना सब सौंप दिया”
तब भक्ति पूर्ण होती है।
🌸 अंत में एक सत्य
अगर आज आप भगवान से कुछ माँग रहे हैं,तो स्वयं को दोषी मत समझिए ,और अगर आप समर्पण की ओर बढ़ रहे हैं, तो समझिए —आपकी भक्ति परिपक्व हो रही है।
क्योंकि माँगना भक्ति की शुरुआत है, और समर्पण उसका शिखर। 🙏🌼
।।जय श्री राधे।।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
अगर आपको मेरी post अच्छी लगें तो comment जरूर दीजिए
जय श्री राधे