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रामायण क्या है?

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                               रामायण क्या है? ‘* रा * का अर्थ है * प्रकाश *, * * मा * का अर्थ है * मेरे भीतर *, * मेरे दिल में *। इसलिए, * राम * का अर्थ है * मेरे भीतर का प्रकाश * ।। * राम * का जन्म * दशरथ और कौसल्या * से हुआ था। * दशरथ * का अर्थ है 10 * 10 रथ * * ।। दस रथ * 5 इन्द्रिय अंगों * (* ज्ञानेंद्रिय *) और * कर्म के 5 अंगों * (* कर्मेन्द्रिय *) का प्रतीक है। * कौसल्या * का अर्थ है Skill * कौशल * '।। * 10 रथों के कुशल सवार राम * को जन्म दे सकते हैं। जब 10 रथों का कुशलता से उपयोग किया जाता है, * मूलाधार * का जन्म भीतर होता है ।। * राम * का जन्म * अयोध्या * में हुआ था। * अयोध्या * का अर्थ है a * एक ऐसी जगह जहाँ कोई युद्ध नहीं हो सकता * * ।। जब हमारे मन में कोई संघर्ष नहीं है, तो द रेडिएंस कैन डॉन .. * रामायण * केवल एक कहानी नहीं है जो बहुत पहले हुई थी। इसमें एक * दार्शनिक *, * आध्यात्मिक महत्व * और एक * गहरा सत्य * है। ऐसा कहा जाता है कि * रामायण हमारे अपने शरीर में हो रही है। हमारी * आत्मा * * राम * ...

चंदा मामा क्यों कहा जाता है?

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   आपको मालूम है चंदा को बहुत लोग मामा कहते हैं क्यों क्योंकि जिस समुद्र से लक्ष्मी जी का प्रादुर्भाव हुआ है उसी समुंदर से चंद्रमा भी प्रकट हुए है। एक ही समुंदर से उत्पन्न होने के कारण श्री लक्ष्मी जी के भाई लगते हैं चंद्रमा। लक्ष्मी जी सारे जगत की माता है और यह जगत माता के भाई होने के कारण, जगत मामा कहलाते हैं। इसलिए सब चंदा मामा कहते हैं।

कुसंग, (बुरा संग)

                             कुसंग, यानि बुरा संग बचपन का सत्संग जीवन भर के लिए लाभदायक होता है। इसी तरह बचपन का कुसंग भी जीवन को बिगाड़ देता है। दिनभर सत्संग में रहो, एक क्षण भी यदि कुसंग मिल गया तो सत्संग का प्रभाव नष्ट हो जाएगा। व्यक्ति के संग का, वेशभूषा का, खानपान का, कुसंग भी हानिकारक है।            जे राखे  रघुवीर ते उबरे तेहि काल महूँ।।  प्रभु ही सत्संग देने वाले हैं और कुसंग से बचाने वाले हैं। अतः हरिः शरणं हरिः शरणं । मैं भगवान की शरण में हूं, मैं भगवान की शरण में हूं। बार-बार कहना चाहिए, स्मरण रखना चाहिए।(दादा गुरु श्री गणेशदास भक्त माली जी के श्री मुख से)

कभी सुख कभी दुख भाग्य के अनुसार मिलते हैं

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कभी सुख कभी दुख भाग्य के अनुसार मिलते हैं जो लोग अपने मन को भगवान में लगाते हैं ,वाणी से नाम गुणों का कीर्तन करते हैं। शरीर से मंदिर में सेवा करते हैं वह भाग्यशाली हैं। इन्हीं कामों को प्रेम पूर्वक करते-करते भगवान के रूपों का ह्रदय में साक्षात्कार कर लेते हैं।संसार में प्राणी निरंतर सुखी नहीं रह सकता है। कभी सुख कभी दुख भाग्य के अनुसार मिलते हैं, इनसे घबराना नहीं चाहिए। सच्चाई के साथ व्यवहार करते हुए, किसी का बुरा नहीं सोचना चाहिए ।अपने साथ बुराई करने वाले को भी सज्जन शाप नहीं देते हैं ।ऐसे परोपकारी पर भगवान प्रसन्न रहते हैं। कष्ट के समय भक्तों की परीक्षा होती है। परीक्षा समझ कर बुद्धि को स्थिर करके कष्ट सहन करना चाहिए। इतिहास देखने से पता चलता है कि बड़े-बड़े भक्तों को अवतार काल में परमात्मा को कष्ट सहन करते देखा जाता है। कष्ट काल में भी अपने धर्म का त्याग ना करके जो उपकार करते हैं, वही धन्य हैं। जो करना चाहिए उसे कर्तव्य कहते हैं। वही धर्म भी है अतः शास्त्र एवं बड़ों की सम्मति से जो कर्तव्य है, उसे तत्परता पूर्वक करना चाहिए। अधिकारी शासक को मालिक बनने की इच्छा नहीं करनी चाह...

हम अपने जीवन में उन्नति कर रहे हैं अथवा अवनति यह हमें कैसे पता लगेगा

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   हम अपने जीवन में उन्नति कर रहे हैं अथवा अवनति यह         हमें कैसे पता लगेगा धार्मिक जीवन में आध्यात्मिक जीवन में हम उन्नति कर रहे हैं अथवा हम नीचे गिर रहे हैं, इस पर भी विचार करना चाहिए। जब भगवत चर्चा, सत्संग प्रिय लगे, भगवान की सेवा पूजा प्रिय लगे, दीन दुखी प्राणियों की सेवा प्रिय लगे, तो समझो कि हम उन्नति की ओर बढ़ रहे हैं। कुसंग में संसारी बातें अच्छी लगे दुष्टों के संग में आसक्ति हो जाए, दूसरों को धोखा देकर, छल कपट से संपत्ति बढ़ाने की इच्छा हो जाए, तो समझो कि हमारी अवनति हो रही है। प्रत्येक बुद्धिमान मनुष्य अवनति से बचकर उन्नति चाहता है। हमारा मन हमारी बुद्धि भगवत सेवा में लग रही है या नहीं, यदि लग रही है तो इसे भगवान की कृपा या प्रेरणा ही समझो। कभी कभी मन की आंखों से प्रभु को सामने खड़ा देखो, कभी बैठे हैं, कभी कुछ कह रहे हैं। इस प्रकार धीरे-धीरे भगवत का सानिध्य प्राप्त करें। मन में कोई संकट हो व्याकुलता हो तो प्रभु के सामने निवेदन करके निश्चिंत हो जाना चाहिए। जो कुछ भी हो उसे प्रभु की इच्छा मानकर संतुष्ट रहना चाहिए। गुरुदेव की कृपा से श...

मन आपका मित्र भी है और शत्रु भी

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                 मन आपका मित्र भी है और शत्रु भी गीता में प्रभु का कथन है कि अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए अर्थात भवसागर से पार होना चाहिए। यत्न पूर्वक साधन करने से प्रभु कृपा अवश्य करेंगे। मन अपना मित्र है और शत्रु भी है। अपने वश में हुआ मन अपना मित्र है, उसे भजन साधन बनेगा, मित्रता का काम करेगा। विषयी मन, अवश मन,अवश इंद्रियां शत्रु है। यह सब नर्क में गिरा देंगें।अतः मन की ओर से सावधान रहें। हठ करके भजन में लगावे। मन भजन में ना लगे तो भी बिना मन लगे, भजन करने से मन लगने लग जाएगा। सबका मन भगवान में लगे, सब पर प्रभु की कृपा बनी रहे।  जय श्री राधे  (परमार्थ के पत्र पुष्प दादा गुरु भक्त माली जी के श्री मुख से)

कलयुग बुरा युग नहीं है अगर

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कलयुग बुरा युग नहीं है अगर कलयुग है ऐसा मानकर असत्य, मिथ्या, हिंसा, कपट नहीं करना चाहिए। कलयुग राजा है उसके अधर्म से बचकर उसमें जो गुण हैं उनकी बढ़ाई करनी चाहिए। उसका लाभ उठाना चाहिए। नास्तिक दुष्टों के लिए कलयुग बुरा युग है। आस्तिक भक्तों के, भगवान नाम जपने वालों के लिए यह युग अच्छा है। इसके समान कोई दूसरा युग नहीं है यह बात श्री भागवत, रामायण आदि में बार-बार कही गई है। ज्ञान वैराग्य के साथ प्रभु की भक्ति करनी चाहिए। ज्ञान वैराग्य केवल विरक्त साधु के लिए नहीं है गृहस्थाश्रम में उसकी बड़ी आवश्यकता है।बिना ज्ञान वैराग्य के गृहस्थाश्रम अति दुखदाई है। परिवार के जितने सदस्य हैं वह अपने पूर्व जन्म के संस्कारों से मिले हैं। अतः उनका प्रेम से पालन करना चाहिए। हमको अच्छा, हमारे मन के अनुकूल यदि कोई पुत्र,स्त्री, भाई आदि नहीं मिले तो उनके दोष नहीं है, वे बुरे नहीं है, हमारी तपस्या पूर्व जन्म का पुण्य ही कम है। ऐसा मानकर संतुष्ट रहना चाहिए ।आग के बिना, बिजली के बिना हमारा काम नहीं चलता है पर यदि हम चुक जाए तो वह हमारे प्राण ले लेंगे।इसी तरह आग बिजली से बचकर हम अपना काम करते हैं। उसी तरह ...