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भए प्रगट कृपाला (हिन्दी में अर्थ)

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                    भए प्रगट कृपाला (हिन्दी में अर्थ)   भए प्रगट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी  हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी  लोचन अभिरामा तनु घनश्याम निज आयुध भुज चारी  भूषन वनमाला नयन विशाला शोभा सिंधु खरारी।।  दीनों पर दया करने वाले कौशल्या जी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरने वाले उनके अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से भर गई। नेत्रों को आनंद देने वाले, मेघ के समान श्याम शरीर था; चारों भुजाओं में अपने खास आयुध धारण किए हुए थे दिव्या भूषण और वनमाला पहने थे। बड़े बड़े नेत्र थे। इस प्रकार शोभा के समुद्र तथा राक्षस को मारने वाले भगवान प्रकट हुए ।  कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता मा या गुन ग्यानातीत अमाना वेद पुरान भनंता  करुणा सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंताा।। दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी हे अनन्त! में किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूं।वेद और पुराण तुमको माया, गुण और ज्ञान से परे परिमा...

इन नामों का श्रवण करने तथा पाठ करने से सब कार्य बिना किसी रुकावट के संपन्न हो जाते हैं।

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              गणेश जी के 12 नामों का जप करने से लाभ  इन नामों का श्रवण करने तथा पाठ करने से सब कार्य बिना किसी रुकावट के संपन्न हो जाते हैं। सुमुख, एकदंत, कपिलो, गजकर्ण, लंबोदर, विकट, विघ्ननाशन, गणाधिप, धूम्रकेतु ,गणाध्यक्ष, भालचंद्र तथा गजानन।  इन 12 नामों का जो भी विद्या, विवाह,ग्रह प्रवेश, यात्रा प्रस्थान, संग्राम या संकट के समय पाठ करता है अथवा सुनता है। उसके कार्य में कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता है। सभी बाधाओं को शांत करने के लिए, श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा के समान श्वेत आभा वाले, चार भुजाओं को धारण करने वाले तथा प्रसन्न मुख मंडल  भगवान गणेश का ध्यान करना चाहिए जो मनुष्य प्रातकाल उठकर शोच, स्नानादि से निवृत हो, पवित्र होकर समाहित चित्त, श्रद्धा भक्ति से इन 12 नामों का पाठ करता है। उस व्यक्ति को कोई भी विघ्न बाधा नहीं पहुंचती।उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं और अंत में वह मोक्ष को प्राप्त करता है।  ।।श्री गणेशा।।

प्रभु इच्छा पर निर्भर रहने से क्या होता है?

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                                    प्रभु इच्छा हमको प्रभु इच्छा के अधीन रहना चाहिए। यह संसार का नियम है कि जिस वस्तु से सुख प्राप्त होता है उसी से दुख भी होता है। संसारी सुख के बदले संसारी दुख मिलता है। श्री कृष्ण के मिलन से गोपियों को दिव्य सुख मिला, फिर वियोग में उन्हें दिव्य दुख मिला। कृष्ण के विरह का दुख स्वर्गादि के सुखों की अपेक्षा अनंत गुना अधिक सुखप्रद है। अतः भक्तजन विरह की कामना करते हैं। इस संसार में अपने ही प्रारब्ध के अनुसार सुख दुख प्राप्त होते हैं। परंतु भगवान का अनन्य भक्त सुख दुख में अपने इष्ट देव की कृपा का अनुभव करता है। हानि लाभ में दूसरों को कारण मान कर उनसे राग द्वेष नहीं करता है। जिसने आत्मसमर्पण किया है उसे निश्चिंत रहना चाहिए। प्रभु जैसे रखे उसी प्रकार रहकर सर्वेश्वर को धन्यवाद देना चाहिए।

भगवान की लीला सत्संग से क्या मिलता है?

                                    भक्ति में आनन्द                 भगवान की लीला सत्संग से क्या मिलता है? भगवान के प्रेमी जनों के सत्संग में जो भगवान की लीला कथाएं सुनने को मिलती हैं उनसे उन दुर्लभ ज्ञान की प्राप्ति होती है जिससे इस संसार के दुख निवृत हो जाते हैं। मन शांत हो जाता है। हृदय शुद्ध होकर आनंद का अनुभव करने लगता है। भक्ति योग प्राप्त हो जाता है।भगवान की ऐसी रसमई कथा का चस्का लग जाने पर भला कौन ऐसा है जो कथा में प्रेम ना करें। भगवान के गुण ऐसे मधुर हैं कि ज्ञानी लोगों को भी अपनी और खींच लेते हैं। ज्ञानी यानी आत्मज्ञानी कृष्ण रूप में मगन होते हैं। अन्य विषयों का ज्ञानी कृष्ण की ओर आकर्षित नहीं हो सकता है। जय श्री राधे  दादा गुरु गणेशदास भक्तमाली जी महाराज के श्री मुख से, परमार्थ के पत्र पुष्प में से।

श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्त्रोत का अर्थ

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                     श्री कृष्ण कृपा कटाक्ष स्त्रोत(हिंदी में)  भावार्थ= ब्रजमंडल के भूषण तथा समस्त पापों के नाश करने वाले सच्चे भक्त के चित्त में विहार कर आनंद देने वाले नंदनंदन का मै  सर्वदा भजन करता हूं। जिनके मस्तक पर मनोहर मोर पंखों के गुच्छे हैं। जिनके हाथों में सुरीली मुरली है तथा जो प्रेम तरंगों के समुंद्र हैं उन् नटनागर श्री कृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। कामदेव का गर्व नाश करने वाले बड़े-बड़े चंचल लोचनों वाले, ग्वाल बालों का शौक नष्ट करने वाले, कमल लोचन को मेरा नमस्कार है। कर कमल पर गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले, मुस्कान युक्त सुंदर चितवन वाले, इंद्र का मान मर्दन करने वाले, गजराज के सदृश मत्त श्री कृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। कदम्ब पुष्पों के कुंडल धारण करने वाले, अत्यंत सुंदर गोल कपोलों वाले, ब्रिजांगनाओं के लिए ऐसे परम दुर्लभ श्री कृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। ग्वाल बाल और श्री नंद राय जी के सहित मोदमयी यशोदा जी को आनंद देने वाले श्री गोप नायक को मेरा नमस्कार है। मेरे हृदय में सदा अपने चरण कमलों को स्थापन ...

भगवान की भक्ति और श्रद्धा पाने के लिए क्या करना चाहिए?

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              भगवान की भक्ति के लिए क्या करना चाहिए? केवल इच्छा करने मात्र से संसार का कोई काम नहीं बनेगा ,उसके लिए तन मन धन से मेहनत करनी पड़ेगी। परंतु श्री हरि की भक्ति, उत्कट इच्छा मात्र से प्राप्त हो जाएगी। प्रभु हमें हर जीव को सदा देखा करते हैं। मन की कामना को पूर्ण करने के लिए वाणी और शरीर से कर्म बनने लग जाएंगे। मन की कामनाओं को पूर्ण करने के लिए प्राणी परिश्रम करता है। मानसिक परिश्रम श्रेष्ठ है। उसी से प्रभु प्रसन्न होते हैं शारीरिक परिश्रम से संसारी संतुष्ट होते हैं। संसार प्रभु का स्वरूप है। ऐसा मानना भक्ति ही है। जो कुछ जीवो के भले के लिए किया जाएगा उससे भगवान संतुष्ट होंगे। भगवान के संतुष्ट होने पर सभी देवी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान को प्रसन्न करने के लिए सब कुछ करना चाहिए। शास्त्र का रहस्य यही हैं। भक्ति के साथ-साथ निष्ठा और श्रद्धा का होना भी बहुत जरूरी है। अगर हमारे अंदर भक्ति है लेकिन श्रद्धा नहीं है तो वह पूर्ण नहीं मानी जाएगी। यह ऐसे ही होगा जैसे कि हम ईश्वर की भक्ति में तो आनंद का अनुभव करते हैं लेकिन मंत्र जाप, दान पुण्य,आरती...

श्रीराम और शिव में कभी मतभेद न कीजिए।

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                     श्रीराम और शिव में कभी मतभेद न कीजिए। 'भगवान शिव' राम के इष्ट एवं 'राम' शिव के इष्ट हैं। ऐसा संयोग इतिहास में नहीं मिलता कि उपास्य और उपासक में परस्पर इष्ट भाव हो , इसी स्थिति को संतजन 'परस्पर देवोभव' का नाम देते हैं।   शिव का प्रिय मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' एवं 'श्रीराम जय राम जय जय राम' मंत्र का उच्चारण कर शिव को जल चढ़ाने से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।  भगवान राम ने स्वयं कहा है–   शिव द्रोही मम दास कहावा सो नर मोहि सपनेहु नहि पावा।'  अर्थात्‌* :- जो शिव का द्रोह कर के मुझे प्राप्त करना चाहता है वह सपने में भी मुझे प्राप्त नहीं कर सकता। इसीलिए शिव आराधना के साथ श्रीरामचरितमानस पाठ का बहुत महत्वपूर्ण होता है।  मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम 14 वर्ष के वनवास काल के बीच जब जाबालि ऋषि की तपोभूमि मिलने आए तब भगवान गुप्त प्रवास पर नर्मदा तट पर आए। उस समय यह पर्वतों से घिरा था। रास्ते में भगवान शंकर भी उनसे मिलने आतुर थे, लेकिन भगवान और भक्त के बीच वे नहीं आ रहे थे। भगवान राम के पैरों को कं...