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रसखान जी कन्हैया के भक्त

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                      रसखान जी कन्हैया के भक्त एक मुसलमान था जो रोज पान की दुकान पर पान खाने जाता था। एक दिन उसकी नजर वहां लगी हुई कन्हैया की तस्वीर पर पड़ी तो उसने पान वाले से पूछा भाई ये बालक किसका है और इसका क्या नाम है। पान वाला बोला ये श्याम है । खान साहब बोले ये बालक बहुत सुंदर है घुंघराले बाल हैं हाथ में मुरली भी मनोहर लगती है मगर ये जिस जमीन पर खड़ा है वो खुरदरी है इसके पैरों में छाले पड़ जायेंगे, इसको चप्पल क्यों नहीं पहनाते हो। पान वाला बोला तुझे दया आ रही है तो तू ही पहनादे। अब ये बात खान भाई के दिल में उतर गई और दूसरे दिन कन्हैया के लिए चप्पल खरीदकर ले आया और बोला लो भाई में चप्पल ले आया बुलाओ बालक को। पान वाला बोला कि ये बालक यहां नहीं रहता है ये वृंदावन रहता है वृंदावन ही जाओ। खान साहब ने पूछा की इसका पता तो बताओ कि वृंदावन में कहां रहता है पान वाला बोला इसका नाम श्याम है और वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में रहता है। खान साहब वृंदावन के लिए चल दिए वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर में जैसे ही प्रवेश करने लगा तो मंदिर के प...

शुभ-अशुभ शकुन विचार कौन से होते है

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                        श्री तुलसी दास जी के अनुसार   शुभ-अशुभ शकुन विचार - बाबा तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में राम विवाह के समय कुछ शुभसंकेत बतायें है, हम मनुष्यों के जीवन में नित्य ऐसी बहुत सी घटनाएँ होती है जो हम पर अपना व्यापक प्रभाव डालती है । हम सभी अपने किसी भी अच्छे कार्य के लिए निकलते समय जो शुभ-अशुभ संकेत होते हैं अथवा घटनाएँ घटती है, उससे अपने कार्य की सफलता-असफलता का पूर्व अनुमान लगा सकते है । यदि शुभ शकुन है तो बहुत ही अच्छा है लेकिन यदि अशुभ शकुन लगे तो उसका त्वरित आसान उपाय कर सकते है जिससे हमें निर्विवाद रूप से अपने कार्य में सफलता प्राप्त हो सके। शकुन हमारे भविष्य में होने वाली घटना का संकेत देते हैं। प्राचीन काल से ही इनकी बहुत ही मान्यता रही है । बहुत से लोग इन शकुनों को अंधविश्वास मानते हैं लेकिन अधिकतर लोग इन शकुनों की उपेक्षा बिलकुल भी नहीं करते है । हम सभी मनुष्य कभी-कभी किसी ना किसी रूप में इन शकुनों को अवश्य ही मानते है। शकुनों का इतिहास मनुष्य जाति जितने ही प्राचीन है । भारत में ही नहीं अपितु प...

जाग मुसाफिर यह संसार हमेशा के लिए नही है।

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     जाग मुसाफिर यह संसार हमेशा के लिए नही है। मृत्यु कब कैसे आएगी ये किसी को नही पता लेकिन इतना पता जरूर होता है कि मृत्यु आएगी। मानव 24 घण्टे संसार में इस तरह जीवन जीता है जैसे संसार को खरीद लिया है। मानव को पता है कि मृत्यु आएगी लेकिन ये नही पता कब आएगी तब मानव ये जानने का प्रयास क्यों नही करते है कि मानव तन मिला क्यों है जब मानव तन प्राप्त कर कुछ ले जा नही सकते है तो इतना भाग-दौड़ क्यों? मानव जीवन मिला है तो क्यों मिला है इसका मंजिल कहाँ है? बचपन से लेकर बुढापा तक मानव बस अपने तन को सजाता है धन को कमाता है और इज्जत भी लेकिन वो धन भी क्या वो तन भी क्या वो इज्जत भी क्या अगर मानव तन के उद्देश्य को न जान पाया या नही प्राप्त कर पाया?

जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना कठिन नही है।

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              जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना कठिन नही है। जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना यूं तो कठिन नहीं है, लेकिन लोभ, मोह अहंकार और ईर्ष्या जीव को उसके जीवन की सीधी और सरल राह से भटका रही है। अपनी क्षमता के अनुसार जिसके पास जितना है, उससे वह संतुष्ट नहीं। आज लखपति, कल करोड़पति, फिर अरबपति बनने की चाह में उलझकर इंसान दौड़ रहा है। अनेक लोग ऐसे हैं जिनके पास सब कुछ है। भरा-पूरा परिवार, कोठी, बंगला, एक से एक बढ़िया कारें, क्या कुछ नहीं है। फिर भी उनमें बहुत से दुखी रहते हैं। बड़ा आदमी बनना, धनवान बनना बुरी बात नहीं, बनना चाहिए। यह हसरत सबकी रहती है। उसके लिए स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होगी तो थकान नहीं होगी। लेकिन दूसरों के सामने खुद को बड़ा दिखाने की चाह के चलते आदमी राह से भटक रहा है और यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है।यही परम सत्य है।  ।।जय श्री राधे।।

शिव मानस पूजा हिंदी में भावार्थ

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                      शिव मानस पूजा हिंदी में भावार्थ आदि गुरु  शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानस पूजा शिव की एक अनूठी स्तुति है। इस स्तुति में मात्र कल्पना से शिव को सामग्री अर्पित की गई है और पुराण कहते हैं कि साक्षात शिव ने इस पूजा को स्वीकार किया था।  यह स्तुति भगवान भोलेनाथ की महान उदारता को प्रस्तुत करती है। इस स्तुति को पढ़ते हुए भक्तों द्वारा शिवशंकर को श्रद्धापूर्वक मानसिक रूप से समस्त पंचामृत दिव्य सामग्री समर्पित की जाती है।  हम कल्पना में ही उन्हें रत्नजडित सिहांसन पर आसीन करते हैं, दिव्य वस्त्र, भोजन तथा आभूषण आदि अर्पण करते हैं। हिन्दी अनुवाद सहित शिव मानस पूजा   रत्नैः कल्पितमानसं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं। नाना रत्न विभूषितम्‌ मृग मदामोदांकितम्‌ चंदनम॥ जाती चम्पक बिल्वपत्र रचितं पुष्पं च धूपं तथा। दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितम्‌ गृह्यताम्‌॥1 ॥ भावार्थ --- मैं अपने मन में ऐसी भावना करता हूँ कि हे पशुपति देव! संपूर्ण रत्नों से निर्मित इस सिंहासन पर आप विराजमान होइये। हिमालय के शीतल जल से...

एक विवाह की अनोखी शर्त

                एक विवाह की अनोखी शर्त एक राजा की लड़की की शादी होनी थी, लड़की की शर्त ये थी कि जो भी 20 तक कि गिनती सुनाएगा उसको राजकुमारी अपना पति चुनेगी,गिनती ऐसी हो जिसमें सारा संसार समा जाए, यदि नहीं सुना सकेगा तो उसको 20 कोड़े खाने पड़ेंगे और ये शर्त केवल राजाओं के लिए ही है। अब एक तरफ - राजकुमारी का वरण और दूसरी तरफ कोड़े!एक-एक करके राजा महाराजा आए राजा ने दावत भी रखी। मिठाई और सब पकवान तैयार कराए गए।पहले सब दावत का मजा ले रहे होते हैं,फिर सभा में राजकुमारी का स्वयंवर शुरू होता है! -एक से बढ़ कर एक राजा महाराजा आते हैं!सभी गिनती सुनाते हैं जो उन्होंने पढ़ी हुई थी,लेकिन कोई भी वह गिनती नहीं सुना सका जिससे राजकुमारी संतुष्ट हो सके!अब जो भी आता कोड़े खा कर चला जाता,कुछ राजा तो आगे ही नहीं आए उनका कहना था!कि गिनती तो गिनती होती है राजकुमारी पागल हो गई है,ये केवल हम सबको पिटवा कर मजे लूट रही है! ये सब नजारा देख कर एक हलवाई हंसने लगता है!वह कहता है अरे डूब मरो राजाओं, आप सबको 20 तक गिनती नहीं आती! -ये सब सुनकर सब राजा उसको दण्ड देने के लिए बोलते ...

।। राम जी का सहारा ||

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                          ।। राम जी का सहारा |    कथा उस समय की है, जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए पूरी वानर सेना सेतु निर्माण के कार्य में लगी थी| सभी वानर दूर-दूर से शिलाएँ लेकर आ रहे थे। नल-नील को मिला श्राप वरदान साबित हो रहा था।  वे प्रभु श्रीराम का नाम ले-लेकर सभी शिलाओं को सागर में ड़ाल रहे थे। प्रभु श्रीराम के नाम के प्रताप से ड़ाली गयी सभी शिलायें सागर जल में डूबने की ज़गह तैर रही थीं। शीध्रता से सेतु निर्माण का कार्य चल रहा था।  लक्ष्मण, विभीषण तथा सुग्रीव जहा सेतु निर्माण कार्य का निरीक्षण कर रहे थे, वही श्री रामचन्द्र जी भी समीप ही एक शिला पर बैठे इस कार्य को देख रहे थे। उनके मन में विचार आया कि सभी सेतु निर्माण में व्यस्त हैं किन्तु मैं यहाँ खाली बैठ कर देखता रहूँ, यह तो उचित नहीं है।  वे चुपके से उठे और सबसे नजरें बचा कर एक शिला को उठाकर उन्होंने भी सागर जल में छोड़ दिया।  किन्तु यह क्या, जहाँ सभी शिलायें सागर जल में तैर रही थी, प्रभु श्रीराम द्वारा छोड़ी गई शिला तुरन्त जल में डूब गई।...