कौन सर्वश्रेष्ठ है भक्ति या भगवान्

                                                                                                         (परमार्थ के पत्र पुष्प )

                                                                                                       भगवद्भक्ति

सच्चा स्मरण उसे कहते हैं कि जब अपने नेत्र , त्वचा , मन , बुद्धि आदि के विषय केवल अपने इष्ट देव  ही हो। नेत्र से यदि स्वान दिखाई  पड़ा तो हमने उसे नीच समझकर उसको मारा , तिरस्कृत  किया तो हमारा स्मरण खंडित हो गया। .प्रभु ही सब रूपो में हैं फिर चाहे वह स्थावर हो या जंगम। श्री प्रह्लाद जी स्मरण भक्ति के आचार्य हैं। महाभागवत प्रह्लाद के उपदेशो का सार यही हैं  कि जब से सुधि बुधि हो तभी से वैष्णव धर्म का आचरण करना। वृद्धावस्था में भजन करूँगा ऐसा नहीं सोचना। देह नाशवान हैं इससे अविनाशी प्रभु  प्रेम प्राप्त करना ही समझदारी हैं। उत्तम बारह गुणों से युक्त कोई ब्राह्मण  परन्तु उसमे भक्ति नहीं है  तो उससे वह चांडाल श्रेष्ठ हैं जिसने अपने मन , वाणी , कर्म ,लोक , परलोक प्राण आदि को भगवदर्पण कर दिया  हैं स्वंय अपने लाभ से पूर्ण आप आत्माराम हैं। इतने पर भी जो आपका पूजन , सम्मान करते हैं उसका लाभ उस पूजन करने वाले को अवश्य मिलता हैं। जैसे मुख   का श्रृंगार करने पर दर्पण के प्रतिबिम्ब का श्रृंगार अपने आप हो जाता हैं।

नित्य जहाँ भगवान् की कथा , सत्संग चर्चा आदि होती हैं   वहाँ  कलियुग का प्रभाव नहीं होता हैं। श्रद्धा पूर्वक भगवान् की पूजा करने वाले यहाँ भी भगवद्धाम में हैं और शरीर का त्यागकर अन्त में भी हरी धाम में वास करेंगे। जो काम , क्रोध , मोह आदि के वश में होकर मर्यादा का उल्लंघन करते हैं , दुसरो को पीड़ा पहुँचाते हैं , ऐसे विमुख लोग यहाँ नरक में हैं और मरने के बाद भी  वे लोग नरक में कष्ट भोगेंगे।
शास्त्रो में प्रभु भक्ति के भिन्न भिन्न उपाय बताये हैं उनमे से चार मुख्य हैं -कर्म, योग , ज्ञान , भक्ति। इस संबंध में बहुत ही विचार विमर्श करने के बाद गुरुजनो ने भागवत पुराण आदि के आधार पर यह निर्णय किया कि इनमे से भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ हैं। भक्ति ही श्री कृष्ण के नजदीक लाती  हैं , उनका दर्शन और अनुभव कराती हैं भक्ति के वश में श्री कृष्ण रहते हैं और भक्ति ही श्रेष्ठ हैं।
जय श्री राधे 

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