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हिंदू धर्म और शास्त्र क्या हैं,इसकी सरल अर्थों में व्याख्या

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          हिंदू ग्रंथों के ज्ञान का सार :- . ईश्वर के बारे में :- ब्रह्म (परमात्मा) एक ही है जिसे कुछ लोग सगुण (साकार) कुछ लोग निर्गुण (निराकार) कहते हैं। हालांकि वह अजन्मा, अप्रकट है। उसका न कोई पिता है और न ही कोई उसका पुत्र है। वह किसी के भाग्य या कर्म को नियंत्रित नहीं करता। ना कि वह किसी को दंड या पुरस्कार देता है। उसका न तो कोई प्रारंभ है और ना ही अंत। वह अनादि और अनंत है। उसकी उपस्थिति से ही संपूर्ण ब्रह्मांड चलायमान है। सभी कुछ उसी से उत्पन्न होकर अंत में उसी में लीन हो जाता है। ब्रह्मलीन।   ब्रह्मांड के बारे में :- यह दिखाई देने वाला जगत फैलता जा रहा है और दूसरी ओर से यह सिकुड़ता भी जा रहा है। लाखों सूर्य, तारे और धरतीयों का जन्म है तो उसका अंत भी। जो जन्मा है वह मरेगा। सभी कुछ उसी ब्रह्म से जन्में और उसी में लीन हो जाने वाले हैं। यह ब्रह्मांड परिवर्तनशील है। इस जगत का संचालन उसी की शक्ति से स्वत: ही होता है। जैसे कि सूर्य के आकर्षण से ही धरती अपनी धूरी पर टिकी हुई होकर चलायमान है। उसी तरह लाखों सूर्य और तारे एक महासूर्य के आकर्षण से टिके होकर संच...

जानिए किस ग्रंथ में क्या है?

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        जानिए किस ग्रंथ में क्या है? अधिकतर हिंदुओं के पास अपने ही धर्मग्रंथ को पढ़ने की फुरसत नहीं है। वेद, उपनिषद पढ़ना तो दूर वे गीता तक को नहीं पढ़ते जबकि गीता को एक घंटे में पढ़ा जा सकता है। हालांकि कई जगह वे भागवत पुराण सुनने या रामायण का अखंड पाठ करने के लिए समय निकाल लेते हैं या घर में सत्यनारायण की कथा करवा लेते हैं। लेकिन आपको यह जानकारी होना चाहिए कि पुराण, रामायण और महाभारत हिन्दुओं के धर्मग्रंथ नहीं है। धर्मग्रंथ तो वेद ही है।  शास्त्रों को दो भागों में बांटा गया है:- श्रुति और स्मृति। श्रुति के अंतर्गत धर्मग्रंथ वेद आते हैं और स्मृति के अंतर्गत इतिहास और वेदों की व्याख्‍या की पुस्तकें पुराण, महाभारत, रामायण, स्मृतियां आदि आते हैं। हिन्दुओं के धर्मग्रंथ तो वेद ही है। वेदों का सार उपनिषद है और उपनिषदों का सार गीता है। आओ जानते हैं कि उक्त ग्रंथों में क्या है। वेदों में क्या है? वेदों में ब्रह्म (ईश्वर), देवता, ब्रह्मांड, ज्योतिष, गणित, रसायन, औषधि, प्रकृति, खगोल, भूगोल, धार्मिक नियम, इतिहास, संस्कार, रीति-रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भर...

श्रीमद्भागवत गीता के प्रथम अध्याय का 11 श्लोक सरल अर्थों में हिंदी में

  श्रीमद्भागवत गता के प्रथम अध्याय का 11वां श्लोक सरल अर्थ में अयनेषु ------------------------------------------- सर्व एवं हि ।।११।। अपने अपने मोर्चों पर खड़े होकर रहकर आप सभी भीष्म पितामह को पूरी पूरी सहायता दे।  भीष्म पितामह के शोर्य की प्रशंसा करने के बाद दुर्योधन ने सोचा कि कहीं अन्य योद्धा यह ना समझें कि उन्हें कम महत्व दिया जा रहा है। अतः दुर्योधन ने अपने सहज कूटनीतिक ढंग से स्थिति संभालने के उद्देश्य से उपयुक्त शब्द कहें। उसने बलपूर्वक कहा कि भीष्मदेव निसंदेह महानतम योद्धा है, किंतु अब वृद्ध हो चुके हैं। अतः प्रत्येक सैनिकों को चाहिए कि चारों ओर से उनकी सुरक्षा का विशेष ध्यान रखें ,हो सकता है कि वह किसी एक दिशा में युद्ध करने में लग जाएं और शत्रु इस व्यस्तता का लाभ उठा लें। अंत: यह आवश्यक है कि अन्य योद्धा मोर्चों पर अपनी अपनी स्थिति पर अडिग रहें और शत्रु को व्यूह न तोड़ने दे।  दुर्योधन को पूर्ण विश्वास था कि कुरूओं की विजय भीष्म देव की उपस्थिति पर निर्भर है।उसे युद्ध में भीष्म तथा द्रोणाचार्य के पूर्ण सहयोग की आशा थी क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि इन दोनों ने उस...

श्रीमद्भागवत गीता प्रथम अध्याय का 9 10 वां श्लोक का सरल अर्थ हिंदी में

  श्रीमद्भगवत गीता प्रथम अध्याय का 9, 10  श्लोक हिंदी में अन्ये च बहव:--------------------------------------- सर्वे युद्धविशारदा:।।९।। ऐसे अन्य अनेक वीर भी हैं जो मेरे लिए अपना जीवन त्याग करने के लिए उद्यत है। वह विविध प्रकार के हथियारों से सुसज्जित हैं और युद्ध विद्या में निपुण है।  तात्पर्य –जहां तक अन्यों का - यथा जयद्रथ, कृतवर्मा तथा शल्य का संबंध है, वह सब दुर्योधन के लिए अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार रहते थे। दूसरे शब्दों में,यह पूर्व निश्चित है कि वह सब पापी दुर्योधन के दल में सम्मिलित होने के कारण,कुरुक्षेत्र के युद्ध में मारे जाएंगे।निसंदेह अपने मित्रों की संयुक्त शक्ति के कारण दुर्योधन अपनी विजय के प्रति आश्वस्त था। अपर्याप्तं ------------------------------------------- भीमाभिरक्षितम् ।।११।।  हमारी शक्ति अपरिमेय है और हम सब पितामह द्वारा भलीभांति संरक्षित है, जबकि पांडवों की शक्ति भीम द्वारा भलीभांति संरक्षित होकर भी सीमित है।  तात्पर्य- यहां पर दुर्योधन में तुलनात्मक शक्ति का अनुमान प्रस्तुत किया है। वह सोचता है कि अत्यंत अनुभवी सेनानायक भीष...

श्रीमद्भागवत गीता के प्रथम अध्याय के 7 और 8 श्लोक का सरल अर्थ हिंदी में

 श्रीमद्भागवत गीता के प्रथम अध्याय के 7 और 8 श्लोक हिंदी में आस्मां तु ----------------------------------------- तान्ब्रवीमि थे ।।७।। किंतु है ब्राह्मण श्रेष्ठ! आप की सूचना के लिए मैं अपनी सेना के उन नायकों के विषय में बताना चाहूंगा जो मेरी सेना को संचालित करने में विशेष रुप से निपुण हैं। भवान्भीष्मश्च ----------------------------------------- सौमदत्तिस्तथैव च।।८।।  मेरी सेना में आप, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा विकर्ण तथा सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा आदि है जो युद्ध में सदैव विजयी रहे हैं। दुर्योधन उन अद्वितीय युद्ध वीरो का उल्लेख करता है जो सदैव विजयी होते रहे हैं। विकर्ण दुर्योधन का भाई है। अश्वत्थामा   द्रोणीचार्य का पुत्र है और सोमदत्ति  या भूरिश्रवा बाह्लीको के राजा का पुत्र है। कर्ण अर्जुन का आधा भाई है क्योंकि वह कुंती के गर्भ से राजा पांडु के साथ विवाहित होने के पूर्व उत्पन्न हुआ था ।कृपाचार्य की जुड़वा बहन द्रोणाचार्य को ब्याही थी।

श्रीमद्भागवत गीता प्रथम अध्याय का चौथा श्लोक हिंदी में

 श्रीमद्भागवत गीता प्रथम अध्याय का चौथा श्लोक हिंदी में अत्र ----------------------------------- द्रुपदश्च महारथ: ।।४।। इस सेना में भीम तथा अर्जुन के समान युद्ध करने वाले अनेक वीर धनुर्धर हैं यथा महारथी युयुधान, विराट और द्रुपद। यद्यपि युद्ध कला में द्रोणाचार्य की महान शक्ति के समक्ष ध्रृष्टधुम्न महत्वपूर्ण बाधक नहीं था, किंतु ऐसे अनेक योद्धा थे, जिनसे भय था। दुर्योधन इन्हें विजयपथ में अत्यंत बाधक बताता है क्योंकि इनमें से प्रत्येक योद्धा भीम तथा अर्जुन के सामान दुर्जेय था। उसे भीम तथा अर्जुन के बल का ज्ञान था। इसलिए वह अन्य की तुलना इन दोनों से करता है। 📖 भगवद्गीता — अध्याय 1, श्लोक 4 संस्कृत श्लोक: अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि। युयुधानो विराट द्रुपदश्च महारथः॥ 🪷 श्लोक का सरल हिंदी अर्थ दुर्योधन आचार्य द्रोण से कहता है— इस सेना में बहुत से महान धनुर्धर और वीर योद्धा हैं जो युद्ध में भीम और अर्जुन के समान पराक्रमी हैं। इनमें सात्यकि (युयुधान), राजा विराट और राजा द्रुपद जैसे महारथी भी शामिल हैं । 🌿 श्लोक का विस्तृत भावार्थ यह श्लोक कुरुक्षेत्र युद्ध के आरम्भ में बोला गया...

श्रीमद् भागवत गीता अध्याय का तीसरा श्लोक हिंदी में

   श्रीमद्भागवत गीता पहले अध्याय का तीसरा श्लोक हिंदी में             कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में सैन्य निरीक्षण पश्यैतां --------------------- शिष्येण धीमता ।।३।। हे आचार्य! पांडू पुत्रों की विशाल सेना को देखें, जिसे आप के बुद्धिमान शिष्य द्रुपद के पुत्र ने इतनी कौशल से व्यवस्थित किया है।  प रम राजनीतिज्ञ दुर्योधन महान ब्राह्मण सेनापति द्रोणाचार्य के दोषों को इंगित करना चाहता था। अर्जुन की पत्नी द्रोपदी के पिता राजा द्रुपद के साथ द्रोणाचार्य का कुछ राजनीतिक झगड़ा था। झगड़े के फल स्वरुप द्रुपद ने एक महान यज्ञ संपन्न किया, जिससे उसे एक ऐसा पुत्र प्राप्त होने का वरदान मिला, जो द्रोणाचार्य का वध कर सके। द्रोणाचार्य यह भलीभांति जानता था, किंतु जब द्रुपद का पुत्र धृष्टद्युम्न युद्ध शिक्षा के लिए उस को सौंपा गया ,तो द्रोणाचार्य को उसे अपने सारे सैनिक रहस्य प्रदान करने में कोई झिझक नहीं हुई। अब वह युद्ध भूमि में पांडवों का पक्ष ले रहा था और उसने द्रोणाचार्य से जो कला सीखी थी उसी के आधार पर उसने यह व्यूहरचना की थी। दुर्योधन ने द्रोणाचार्य की दुर्बल...